1 – स्त्री
मुझे सहना है
क्योंकि मैं स्त्री हूं
हां मेरा जन्म हुआ है
नारी जाति में
मुझे नहीं मांगा गया
मन्नतों, दुआओं में
नहीं चढ़ाये गए
मेरी जन्म पर झूले
मंदिरों की चौखट पर
कहां लगाए गए हाथे
मनौती के रूप में
मेरे लिए
मैं तो वह बीज थी
जो अपने आप अंकुरित
हो गई मां की कोख में और
पल गई उसके आंचल में
कितना झेला उस दिन
मां ने मुझे जन्म देकर
क्योंकि जना था उसने
स्त्री होकर फिर एक स्त्री को
कितनी उदास थी
उस दिन दादी अम्मा
मेरे जन्म पर
शायद जानती थी
स्त्री होने के दर्द को
लंबी सांस भरकर
उसने कहा था
एक और स्त्री
आ गई इस संसार में
उपेक्षा,उलाहना को सहने
कहां चहकी की थी
उस दिन बुआ आंगन में
मेरे आने की खुशी में
क्योंकि जानती थी
कि एक दिन मैं भी
कर दी जाऊंगी पराई
कन्यादान कर
भेज दिया जाएगा
दूसरे के संग
मुझे हमेशा के लिए
और सुबकती रहूंगी
इस देहरी की याद में
जीवन पर्यंत
कहां पीटा था थाल बजाकर
ढ़िढोरा मोहल्ले की
बड़ी काकी ने
बस आस-पास के घर जाकर
भरी आँखों और दबी सी
आवाज में कह आई थी
फिर छोरी हुई है लाडी को
यह हमेशा होता है
मेरे जन्म पर
क्योंकि मैं स्त्री हूं……
2 – मौन
तुम हमेशा मौन थे ..….
जब -जब मैं बोली
तब -तब तुम मौन -मूरत हो गए
मैं चाहती थी तुम बोलो …
तुमने  हर सच को झुठलाने की कोशिश की मौन होकर ….
मेरा रोम -रोम विलख रहा था
तुम्हारे मेरे प्रति दायित्वों का
तुम्हें बोध कराने के लिए….
पर तुमने दिखाई
निष्ठुर होने
की पराकाष्ठा…..
और तुम सब कुछ जान कर
भी फिर मौन हो गए…..
मैं जब भी तड़प उठी अपने
सुख के लिए ….
अपने  अधिकारों के लिए
तब भी तुम पाषाण हो
मौन हो गए
आखिर क्यों? साधा यह
मौन तुमने…
क्यों? तुम हर समय देख कर भी
भींचते रहे, अपनी आंखों
को कसकर..….
मेरी चीत्कार, मेरी करुणा
कुछ भी तुम्हें सुनाई नहीं दी….
तुम्हारा यह मौन मुझे
हर पल मारता है …
तुम हत्यारे को मेरी आत्मा को
मारने वाले …
तुम सिर्फ मौन हो और
यह मौन तुम्हें …
गिरा देगा एक दिन तुम्हारी ही
नजरों में ….नीचे बहुत नीचे….
डॉ.योग्यता भार्गव (विभागाध्यक्ष हिन्दी) शा.नेहरू स्नात्तोकतर महाविद्यालय, अशोकनगर (म.प्र.) 473331 संपर्क - yogyatabhargava@gmail.com

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