संपादकीय - भारत में कोरोना का उत्पात और अवधारणाएं 3

एक ज़माने में ऐसा कहा जाता था कि बिना जान-पहचान के भारत में बच्चों को स्कूल में एडमिशन नहीं मिल सकता; नौकरी नहीं मिल सकती; सरकारी दफ़्तरों में काम नहीं बन सकता। मगर इस कोरोना काल ने इन्सान को ऐसी स्थितियों में ला खड़ा किया है कि सुन कर आँखें नम हो जाती हैं और रौंगटे खड़े हो जाते हैं। एक मित्र का फ़ोन आया। उसकी आवाज़ रुआंसी थी, “यार किसी श्मशान घाट में पहचान है क्या? दो दिन से पिताजी की लाश घर में रखी है। बरफ़ में लपेट रखी है। इस गर्मी में बरफ़ भी जल्दी-जल्दी पिघल रही है। यार प्लीज़… कहीं नंबर लगवा दो तो पिताजी का अंतिम संस्कार हो जाए।”

भारत में कोरोना की दूसरी लहर ने तबाही मचा रखी है। शनिवार 15 मई 2021 की सुबह के आंकड़े बताते हैं कि भारत में अब तक कोरोना के 2,43,72,907 मामले सामने आए हैं। उनमें से 2,04,32,898 मरीज़ ठीक हुए हैं। यानि कि ठीक होने वालों की प्रतिशत दर है 83.8 और मृतकों की संख्या है 2,66,229 जो कि बनता है 1.1 प्रतिशत। दरअसल भारत की आबादी इतनी अधिक है कि संक्रमित लोगों की संख्या और मृतकों की संख्या दिल में दहश्त भरने के लिये काफ़ी है। 
इन दिनों उत्तर प्रदेश एवं बिहार में गँगा नदी पर बहुत अत्याचार हो रहा है। श्मशान घाटों पर कतारें हैं। लकड़ी चान्दी के भाव बिक रही है। मृतकों के नाते-रिश्तेदार उनकी लाशों को या तो नदी किनारे दो दो फ़ुट ज़मीन खोद कर गाड़े दे रहे हैं या फिर सीधा नदी में बहाए दे रहे हैं। बक्सर और आरा में ऐसे तमाम मामले सामने आ रहे हैं। कुत्ते लाशें निकाल निकाल कर नोच खाने को तैयार बैठे हैं और वहाँ एक अकेला आदमी उन कुत्तों को भगाने का प्रयास कर रहा है। 
कुछ काम होते दिखाई दे रहे हैं तो टीवी चैनलों का कवरेज साफ़ दिखाता है कि अभी बहुत कुछ होना बाक़ी है। हर तरफ़ ऐसे समाचार मिल रहे हैं कि एक दिन पति की मृत्यु हुई तो दूसरे दिन पत्नी की। एक दिन पिता की मृत्यु हुई तो दूसरे दिन पुत्र की। पूरा विश्व भारत की सहायता के लिये तैयार है। मगर इन मौतों को केवल मौत नहीं माना जा सकता। ये एक तरह की हत्या है। जनता वोट देकर नेताओं को अपना भविष्यदाता बना लेती है मगर जब ज़रूरत होती है तो पता चलता है कि या तो वे दाता ग़ायब हैं या फिर राजनीति कर रहे हैं।
सीधा सादा प्रश्न यह है कि क्या किसी भी राज्य के मुख्य मंत्री ने केन्द्र सरकार से कोरोना की दूसरी लहर आने से पहले किसी भी चीज़ की माँग की थी – चाहे ऑक्सीजन हो या फिर वेंटीलेटर? हर तरफ़ एक ही बात कही जा रही थी कि भारत ने कोरोना पर विजय पा ली। बहुत से राज्यों ने तो कोरोना के लिये बनाई गयी सुविधाओं का बोरिया बिस्तर तक गोल कर दिया था। मगर जैसे ही कोरोना की दूसरी लहर ने तबाही मचाई राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार के बीच राजनीति शुरू हो गयी।
हम हमेशा भारतीय संस्कृति और परम्पराओं की बात करते हैं, मगर जब देश इतनी बड़ी महामारी से जूझ रहा है, कोई भी राजनीतिक दल भारतवासियों के बारे में नहीं सोच रहा है। कोई मोदी को बदनाम करने की सोच रहा है तो कोई केजरीवाल और अन्य मुख्यमंत्रियों की बखिया उधेड़ रहा है। मोदी को बदनाम करने के चक्कर में कुछ राजनीतिज्ञ तो भारत को बदनाम करने से भी गुरेज़ नहीं कर रहे। 
कोई इस सत्य को नहीं झुठला सकता कि ऑक्सीजन की अव्यवस्था के कारण बहुत सी जानें गयीं… वेंटिलेटर खोले तक नहीं गये थे… छोटे नगरों, कस्बों और गाँवों में इलाज की सुविधा शोचनीय स्थिति में है। आज हर नागरिक का यह हक़ है कि वह अपने प्रदेश की सरकार और केन्द्र सरकार से सवाल कर सके कि हमने आपको वोट दिया, मगर इसके बदले में इस महामारी में हमें आपसे मिला क्या है?
नागरिक देख रहा है कि हमें डॉक्टरों या नर्सों ने धोखा नहीं दिया। वे दिन-रात काम कर रहे हैं। हमारे वैज्ञानिकों और वैक्सीन बनाने वालों ने धोखा नहीं दिया। उन्होंने वैक्सीन इतने कम समय में तैयार कर ली और उसका निर्माण भी शुरू हो गया। हमारी पुलिस ने हमें धोखा नहीं दिया। पुलिसकर्मी बिना कोई छुट्टी लिये आम आदमी की सुरक्षा में जुटे हुए हैं। हमारी सेना ने हमें नहीं धोखा दिया। सेना हर मोर्चे पर आम आदमी के पक्ष में खड़ी दिखाई दे रही है। हमें ठगा है निजी हस्पतालों ने – दवाओं और इलाज के ऑनपॉन लागत वसूल कर के। हमें ठगा है राजनीतिज्ञों ने जो या तो सीन से ही ग़ायब हो गये हैं या बस एक दूसरे पर लांछन लगा रहे हैं। हमें ठगा है कालाबाज़ारियों ने जो इंजेक्शन और दवाओं को ब्लैक में बेच रहे हैं। हमें ठगा है टीवी चैनलों ने जो अपनी टी.आर.पी. के लिये कुछ भी कर गुज़रने को तैयार हैं।
ऊपर से नीचे तक तमाम राजनीतिक नेताओं के किरदार पर सवालिया निशान लगे हैं। अवधारणा तो यह बनती जा रही है कि ऐसे नाज़ुक मौक़े पर जबकि राजनीतिज्ञों को आम-आदमी की समस्याओं का समाधान ढूंढने का प्रयास करना चाहिये, सब बड़े नाम एक सिरे से ग़ायब हैं। मैं पहले भी यह सलाह दे चुका हूं कि भारत के प्रधानमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और किसी वरिष्ठ डॉक्टर को रोज़ाना एक प्रेस काँफ़्रेंस करनी चाहिये जैसे कि ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बॉरिस जॉन्सन करते रहे हैं। जनता के आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिये ऐसी प्रेस काँफ़्रेंस बहुत ज़रूरी है। मगर यहाँ सत्ता पक्ष का प्रतिनिधि विपक्ष को नीचा दिखाने के लिये प्रेस काँफ़्रेंस करता है तो विपक्ष सत्तापक्ष पर आरोप लगाने के लिये। किसी को भी आम जनता का कोई ख़्याल नहीं है।
टीवी चैनलों पर दिखाया जा रहा है कि बिहार के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में जहां पहले डिस्पेंसरियां थीं और डॉक्टरों के रहने का स्थान था वहां अब तबेले बने हुए हैं डंगर रखे जाते हैं। सरकारें इसके लिये जवाबदेह हैं कि यह सब कैसे हो रहा है।
एक अच्छी ख़बर यह है कि रूस ने अपनी वैक्सीन भारत भेजनी शुरू कर दी है और बुधवार से हैदराबाद में यह वैक्सीन लगाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। भारत सरकार को अन्य वैक्सीन उत्पादकों को भी कोरोना-वैक्सीन के निर्माण की अनुमति दे देनी चाहिये क्योंकि भारत-बायोटेक अकेले शायद इतनी अधिक वैक्सीनों का निर्माण न कर पाए जितनी की भारत को आवश्यक्ता है। 
एक ज़माने में ऐसा कहा जाता था कि बिना जान-पहचान के भारत में बच्चों को स्कूल में एडमिशन नहीं मिल सकता; नौकरी नहीं मिल सकती; सरकारी दफ़्तरों में काम नहीं बन सकता। मगर इस कोरोना काल ने इन्सान को ऐसी स्थितियों में ला खड़ा किया है कि सुन कर आँखें नम हो जाती हैं और रौंगटे खड़े हो जाते हैं। एक मित्र का फ़ोन आया। उसकी आवाज़ रुआंसी थी, “यार किसी श्मशान घाट में पहचान है क्या? दो दिन से पिताजी की लाश घर में रखी है। बरफ़ में लपेट रखी है। इस गर्मी में बरफ़ भी जल्दी-जल्दी पिघल रही है। यार प्लीज़… कहीं नंबर लगवा दो तो पिताजी का अंतिम संस्कार हो जाए।”
सरकारों को जागना होगा। मुश्किलों को सामने से पकड़ना होगा, उनका हल ढूंढना होगा। अमरीका ने क्या किया, फ़्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, ब्राज़ील ने क्या किया हमें इस ओर ध्यान नहीं देना… हम अलग हैं, हमारी समस्याएं अलग हैं। हमें अपनी कमर कसनी होगी और समाज में यह अवधारणा बनानी होगी कि भारत में अभी कोई क़ायदा क़ानून बचा है। सबके साथ इन्सानों जैसा व्यवहार किया जाएगा।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

3 टिप्पणी

  1. एक दम सटीक और कोरोना पर दो टूक संपादकीय। भारतीय जनमानस को इन बिंदुओं पर चिंतन करना ही चाहिए कि आख़िर इन परिस्थितियों में लापरवाही का रवैया अख़्तियार करने वाले अस्पतालों और सरकारी नेताओं पर क्या विचार करना चाहिए।

  2. सच्चा साहित्य या सार्थक काव्य वही है जो केवल प्रश्न करके न रह जाए, अपितु उसका उत्तर भी दे। केवल समस्या की ओर इंगित करके अपने लेखन की इतिश्री न करे, अपितु उस समस्या का समाधान भी प्रस्तुत करे।
    इस कसौटी पर सम्पादकीय खरा उतरा है। कोरोना काल की वस्तुस्थिति बता कर अन्तिम पैरा में तेजेन्द्र जी ने सही सुझाव और समाधान भी प्रस्तुत किए हैं। एतदर्थ हृदय से साधुवाद।

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