Sunday, June 23, 2024
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रमा भारती की कविताएँ

1.
‘ऐज इज़ जस्ट ए नंबर’ कहते हुए चाय की चुस्की लेती हूँ
चीनी कम या न के बराबर
शुगर का डर जो है
साथ ही मेटाबॉलिज्म ठंडा पड़ गया है
इतना कि पिछली सर्दियों में खाया घी अभी पिघला नहीं
कुछ सफ़ेद होती लटों पर
अमोनिया फ्री कलर लगाती हूँ हर माह
स्किन की रंगत से मिलाकर
वो रंगत जो अब बिगड़ती जा रही है
बहला रही हूँ खुद को उस दोस्त को याद कर
जिसके सब केश उजले हो गए थे कॉलेज में ही
उम्र के निशान कितनी तरह से सामने पड़ जाते हैं
अभी बीती रात ही सीने के दर्द ने अस्पताल पहुंचा दिया था
और बदलते मौसम में जिस तरह से खांसी ने कब्ज़ा किया
लगता है नए वेरिएंट को पता चल गया है
घुटनों ने कुछ कम चलना शुरू कर दिया
और वो जो खानदानी बीपी की गोली, वो तो लाइफ़ लाइन है
आँखों को दूर पास सब धुँधला दिखने लगा
निगाह एक जगह जमकर बीते पच्चीस-तीस सालों को छू आती है
बच्चे इतने बड़े हो गए कि हूँ-हाँ तक का संवाद बनने लगा है
अपने साथ के लोगों को खाली घोंसलों में एडजस्ट करते देख रहे हैं
ऐज इज नॉट जस्ट ए नंबर माय डिअर फ्रेंड्स, इट हैज इट्स ओन काउंट्स
सिम्पल! हमें ‘जो है सो है’ में जीने की आदत होनी चाहिए।
2.
मैं किसान हूँ
मेरा प्रिय मौसम यही है जानां!
बूँदों के रागों पर मेरे पोरों से
धान को रोपते हुए देखा है न तुमने
देखो! मेरे पसीने की गमक से
महकता है तुम्हारा बासमती
मैं तो उबले चावल
और मोटे अनाज का स्वाद भर जानता हूँ
सर्दी जुखाम में गुमटी के पास वाले
डाक्टर बाबू से पुड़िया दो पुड़िया ले आता हूँ
तुम प्रेम करते हो इस मौसम में
मैं प्रेम बोता हूँ इसी मौसम में
मैं किसान हूँ
मेरा प्रिय मौसम यही है जानां!
3.
उसे पता है
वो पर्वत नहीं है
एक ज़रा छू दो तो
भरभरा कर बिखर जाए
मुझे भी मालूम है
मैं नदी नहीं हूँ
थोड़ी सी धूप पड़े
और मरु में बदल जाऊँ
एक दूसरे की ऐसी
कठोर और तरल कल्पनाएँ
हमारे बीच की दूरी को
पाट देने वाला बाँध हैं, बस
4.
हाँ! उग आयीं हैं माथे पर बारीक लकीरें
मगर सर चढ़कर
इन्हें देखने का अधिकार तुम्हें किसने दिया?
हाँ पलकों के कोने भारी और काले हुए हैं अधिक
मगर आँखों में आँखें भर
पैमाने मापने का अधिकार तुम्हें किसने दिया?
हाँ! उजली हो गयी हैं सामने वाली लटों की जड़ें
मगर इनके रस्ते में अटककर
उलझने का अधिकार तुम्हें किसने दिया?
अधिकार उतना ही जो सीमा रेखा के भीतर रहता है
असीम कुछ भी नहीं
प्रेम भी नहीं औ’ बिछोह भी नहीं ।
5.
चाहना जब भी किसी को
एक शहर की तरह चाहना
कहीं होंगे कुछ गंदे कोने
कहीं मिलेंगी कुछ तंग गलियाँ
कहीं टकरा जाएँगे बेतरतीब मोड़
जहाँ होना चाहिए पेड़
वहीं पर होगा बस स्टैंड
और जहाँ चाय का खोम्चा
वहीं पर होगा अदद मॉल
हर रंग में कुछ फूल खिले होंगे
पर वहाँ जहाँ बच्चों की नज़र नहीं
बस एक माली के हाथ पहुँचेंगे
माली का हुनर सीखना
और बच्चे की नज़र रखना
जब भी किसी को चाहना
एक शहर की तरह चाहना…
6.
नदी की आँखों को
खोजने वाले यात्री
नदी के पार
चले जाते हैं पैदल
वे न ही डूबने की
रखते हैं ख़्वाहिश
न ही तैरने का
जानते हैं हुनर
उन्हें भटकाता है
नदी का बचा हुआ कौमार्य
वे कभी नहीं समझ पाते
नदी की आँखों से बहते
काजल की कहानी
वे तो बस नदी के अंदर तिरती
सुनहरी मछलियों पे
मचल-मचल जाते हैं…….
7.
एक लम्हा
जिसे कई-कई ज़िन्दगियों पर
कुर्बान किया जा सकता था
उसी में दुष्ट लड़कियाँ
किसी को राजकुमार मान
प्रेम कर बैठती हैं
औ’ नैहर के झूले
तनहा हिंडोले खाते हैं
उम्र भर को…………
8.
तुम चाहते हो
एक बड़ी झप्पी
मुझे आने लगी है झपकी
सुबह के साढ़े चार बजे
कभी रखना पाँव
मेरी हथेली की ज़मीन पर
कई रातों की नींद दबी हुयी है
मेरी अबला रेखाओं के बीच
घुट-घुटाती ………
9.
प्रेम इतना बेफिक्र था
शायद! मसानों में घूमता रहा
न यहाँ दिखा
न किसी दूर देस
सठियाने के आसपास
एक प्यारे पिल्ले
एक भोले बछड़े
और टूटी खुर्पी से ज़िंदगी कुरेदते
एक अजनबी की आँखों में
अलख जमाते
धूनी रमाते दिखा
दिख तो गया
भटकन से पहले!
10.
सवाल पूछने से पहले जवाब पता हो
और जवाब पता होने से पहले प्रतिक्रिया
हम एक-दूसरे के इतने आदि हैं
कभी अचानक हम अपनी इस जानकारी पर
एक साथ ठहाका लगा कर हँस पड़ते
कभी एकदम गंभीर हो अपने-अपने कामों में उलझ जाते
अब हमारी शक्लें भी मिलने लगी हैं
जैसे आँखों की बातें, चेहरे के हाव-भाव
और तो और चुप्पी भी
हाँ ! हमारा इरादा धरती को संभाले रखना है
आसमां को गिरने से रोकना
और हर हाल में साथ चलना है…

रमा भारती

संपर्क – ramabharti2013@gmail.com

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