रश्मि बजाज की कविताएँ 3
  • रश्मि बजाज

1. कहत कबीरन
जब हरसू
बरसती हों
कातिलाना नफ़रतें
तो प्रेम पर
कविता लिखना
रूमानियत नहीं
बगावत है!
ये बगावत
मेरे दौर की
लाज़मी ज़रूरत है!
2.पैरहन
उस रात
मनु,मार्क्स
अल्लाह,राम
के पैरहन उतार
टांग दिये थे
जब हमने
खूंटी पर-
तो जिस्म ही नहीं
महक उठी थीं
हमारी रूहें भी…
3.नही है
ज़िन्दगी की
किताब में
महका करते हैं
वही हरफ़,वही वरक
जो लिखे गए हैं
प्रेम की
स्निग्ध लिपि में
ज़िन्दगी नहीं है
पंचनामा
इतिहास या
राजनीति का !
4. जुर्रत
ग़मज़दा इस
दौर में
हंसने-हंसाने की
नाचने-गाने की
जश्न मनाने की
ख्वाब सजाने की
प्यार लुटाने की
एक फ़क़त औरत
कर सकती है
ये ज़ुर्रत
संगीनों के
सायों में
हादसों की
ज़द में
लम्हा-लम्हा
मर कर
लम्हा-लम्हा
जी कर
जानी उसी
ने है
ज़िन्दगी की
क़ीमत!

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