ये ब्रेक्सिट ब्रेक्सिट क्या है…

  • अरुण सभरवाल

वैसे तो पिछले तीन वर्षों से ब्रेक्सिट का शोर मचा हुआ है …..किंतु कुछ महीनों से कुछ अधिक ही चर्चा का विषय बन गया है ….लगता है ब्रिटेन  कि सोच की सुई ब्रेक्सिट पर ही जम गयी है ..

जमे भी क्यूँ न ? समय की अवधि जो पूरी होने वाली है ….इसलिए चारों ओर ब्रेक्सिट की ही चर्चा हो रही है …..हाउस-ऑफ़–कॉमंज़ में तो अच्छी ख़ासी गहमा-गहमी चलती  रहती है …..चारों ओर अनिश्चितता का वातावरण फैला  हुआ है ……स्टाफ़ रूम में, कैनटीन, ट्रेन में, बसों में ,यहाँ तक की वेटरोज़ , सेन्ज़बरी, टेस्को सूपर्मार्केट में भी गुटों में खड़े लोगों का भी यही चर्चा का विषय है….सबके मस्तिष्क में एक ही सवाल है “अंदर या बाहर”? हमारे स्कूल के स्टाफ़ रूम में भी दो गुट हैं और दोनों में भी यही बहस  चलती रहती है । स्कूल में दो रोमानियन  बहु-भाषी सहायिकाएँ हैं ……ब्रेक्सिट की चर्चा आरम्भ होते ही वह उठ के बाहर चली जाती हैं ….आजकल वह दोनों ही बहुत उखड़ी-उखड़ी रहती हैं… पूछो कुछ जवाब कुछ और ही मिलता है …..एसा लगता है मानो उनका दिमाग़ और जीभ साथ नहीं दे पा रहे ….आज भी कुछ ऐसा ही हुआ ब्रेक्सिट सुनते ही दोनों उठ कर बाहर चलीं गयीं…..सभी हैरान थे कि कहीं किसी  के मुंह से कुछ ऐसा तो नहीं निकल गया जो उन्हें बुरा लगा हो …?

देखा जाये तो मुद्दा ही बहुत गंभीर है ,विशेष रूप से ईस्टर्न युरोपियन लोगों के लिये….उन्हें विश्वास  है कि युरोप से बाहर होते ही उन्हें ब्रिटेन से बाहर निकाल दिया जाएगा ।

उन्नीस  सौ सत्तर में जब ब्रिटेन (ई.यू)। ई.ई.सी. का हिस्सा बना तो यूरोपियन देशों के आवागमन की सीमायें खोल दी गयीं ….परिणाम यह हुआ कि

यूरोप के सब देशों से लोग टिड्डी-दल की भाँति आ कर ब्रिटेन में बस गये ।

इंद्रैं और आस्ता भी अपनें परिवार के संग ब्रिटेन में आ के बस गयीं….आरम्भ में उन्हें कठनाइयाँ तो बहुत हुईं  होंगी …..नया देश …नये लोग ….नयी भाषा ….नया खान -पान ।  केवल रंग के अलावा सब कुछ भिन्न था ।उसके पति को तो बिल्डिंग वर्क में काम मिल गया …बहु भाषी होने के कारण इंद्रैं और आस्था को स्कूल में कक्षा में सहायिका का काम मिल गया ।

इंद्रैं काम अच्छा कर लेती है ,किंतु कभी -कभी उसे बात समझने और समझाने में मुश्किल होती तो वह निराश हो जाती ……में इंद्रैं की विडंबना बहुत ख़ूब समझती थी …….क्यूँ की मैं ख़ुद उस स्थिति से गुज़र चुकी थी ……

मुझे भली भाँति याद है ,चालीस वर्ष पहले जब में लंदन आई थी …..मुझे भी अंग्रेज़ों का उच्चारण समझने में बहुत कठनाई होती थी ….एक दिन कि बात थी

जब मैं अपना खाता खुलवाने डाक – घर गईं…..खिड़की पर खड़ी लड़की  ने दो बार मुझ से पूछा कैन यू राइट । मुझे उसकी बात समझ नहीं आई… दो दफ़ा तो मैने उसे सारी।  माफ़ करना कह दिया ….जब तीसरी बार पूछा , तो मैं असमंजस में पड़ गईं……उस वक़्त मेरे पास हाँ या ना के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था । मैने “ ना”

कह दिया । उसने मुझे दो फ़ॉर्म देते कहा ,तुम घर जाओ कल अपने पति को ले कर आना । मैने पूछा क्यूँ ? वह अपने हाथ से हवा में लिखते बोली क्यूँकि तुम लिख नहीं सकती। मुझे अपनी बेवकूफ़ी पर हँसी भी आई और रोना भी ।

मैंने वहीं खड़े खड़े फ़ॉर्म भर दिए । फ़ॉर्म को देखते ही उसने मुझे स्नेहिल मुस्कान  दी और मेरा खाता खोल दिया । इंद्रैं होशियार तो बहुत है ,ज़रा उच्चारण में मात खा जाती है …..धीरे-धीरे सीख जाएगी ….फिर भी न जाने क्यूँ मुझे उसकी चिंता लगी रहती है ……एक ख़ुश-मिज़ाज, उमंगों भरी चंचल लड़की गुम–सुम सी रहने लगी है ।

इंद्रैं अपना जेब ख़र्च निकालने के लिए ,हफ़्ते में एक बार , मेरे घर के कामों  में सहायता करती है। अगर भारत होता तो उसे कामवाली बाई कहती ….आज आने वाली है ,मैने ठान लिया है की आज उससे ज़रूर पूछूँगी…. प्रश्न यह है की क्या पूछूँगी…..कैसे पूछूँगी….सब कुछ तो सामने है

सोच ही रही थी, कि घंटी बजी…..इंद्रैं ही थी । उसने हेलो की और काम में जुट गई । उसका समय पूरा होने वाला था और मैं अभी तो सोच में थी ……मैने जल्दी से चाय बनाई और उसे रोकते कहा ……..”इंद्रैं मैं तुम्हारी उदासी का कारण जानती हूँ…..चिंता मत करो….मुझ से जो होगा,मैं तुम्हारी मदद ज़रूर करूँगी ….अगर तुम्हारे मन में कोई उलझन है तो, तुम बेझिझक मेरे साथ बाँट सकती हो ……मैं कुछ महीनों से देख रही हूँ , तुम्हारी चंचलता न जाने कहाँ गुम हो घी है ,अगर तुम्हारे मन में कोई शंका हो तो बताओ ….मिल कर समाधान निकाल  लेंगे।”

“क्या बताऊँ मैडम ……ज्यूँ ज्यूँ ब्रेक्सिट की तारीख़ नज़दीक आ रही है , हमारी चिंता बढ़ती जा रही है ……जहाँ देखो ब्रेक्सिट के अतिरिक्त किसी के पास और कोई बात ही नहीं है करने को ……चिंता तो यह है फ़ैसला होते ही ,हम सब को ब्रिटेन से निकाल दिया जाएगा …..अब लगता है यहाँ आना ही हमारी सबसे बड़ी भूल थी ….हमारे कई मित्र तो यहाँ आने के लिए  रोमानिया में अपनी जायदाद, घर सब कुछ बेच के आयें हैं ……अब स्थिति यह है “न घर के न घाट के “ मूलत: दो हज़ार सोलह का चुनाव भी तो विशेषकर  इमिग्रेशन के ही मुद्दे को ले कर ही हुआ था और जनता ने यूरोप से “बाहर” निकलने को ही चुना था । ब्रिटिश  जनता कहती है, इमिग्रेंट्स के कारण हमारी नैशनल -हेल्थ खोखली हो रही हैं….पढ़े लिखे लोगों के लिये नौकरियाँ नहीं हैं… अंग्रेज़ बच्चों के लिये स्कूल में सीट नहीं है ……घर नहीं हैं…”।

सड़क पर हमें नफ़रत की निगाह से देखा जाता है ,जैसे कह रहे हों ,निकलो हमारे देश से…..किसने बुलाया है तुम्हें । हमारे सामने जितनी मुसीबतें हैं हम ही जानते हैं ।किराये पर मकान नहीं मिलते ,एक एक मकान में तीन -तीन परिवार रहते हैं वो भी बहुत पुरानें ,पुराने घर बहुत गंदे , सीलन की बदबू आती है ।बच्चे बीमार होते हैं …..। आप नहीं जानती मजबूरी इंसान को क्या -क्या करने पर मजबूर कर देती है । पल – पल ज़िल्लत सहनी पड़तीं है ।जो झेलता है वही जानता है “…..वह बोलती जा रही थी और मैं सुनती जा रही थी ।

अब तक समय बहुत हो चुका था ।मैने उसे दिलाया देते कहा “….हिम्मत रखो अभी फ़ैसला ही कहाँ  हुआ है ?”

“फ़ैसला….? फ़ैसला होगा कैसे ? और कब…? प्रतिदिन तो नये प्रश्न उठ रहे हैं ।

ट्रेसा मे अपनी टोरी पार्टी के साथ अभी तक किसी  निर्णय तक नहीं पहुँची , उसके साथी भी उसका साथ देने को तैयार नहीं …….तभी तो ब्रेक्सिट एक तमाशा बन कर रह गया है । जनता भी दुखी हो गयी है ,चाहती है जल्दी  से फ़ैसला हो ……अगर नहीं तो दूसरा रेफ़रैंडम या फिर चुनाव ……? लोगों पर क्या बीत रही है ,इसकी किसी को परवाह ही नहीं …..जीवन में पहली बार इतनी असुरक्षित महसूस कर रही हूँ “

इतना कह कर इंद्रैं तो चली गईं……उसके  कुछ शब्दों ने  मेरा अतीत मेरे सामने ला खड़ा कर दिया ……मेरा सर चक्करघिन्नी की तरह घूमने लगा ……मैं सोच कर मुस्कुरायी, सोचने लगी इंद्रैं तुम सोचती हो मैं नहीं जानती ……? जिन -जिन  कठनाइयों से मैं गुज़री हूँ, तुम तो सपनें में भी नहीं सोच सकती……।

तुम तो क़िस्मत वाली हो …..तुम्हारा रंग-रूप ,धर्म ,खाना -पीना ,बालों का रंग ,पहनावा सब ब्रिटिश लोगों जैसा ही है ,जब तक तुम चुप रहते हो पता ही नहीं चलता । ब्रिटिश ही लगते हो ,और हम तो बिलकुल अलग ही दिखते थे जो हमने सहा था ना तुम जानती हो न ही कभी जान पाओगी ।चार दशक

पहले भारत से ब्रिटेन पहुँचते ही हमें हज़ारों चट्टानों को पार करना पड़ा …..अंगिनित बाधाओं का सामना करना पड़ा। रंग-भेद के दुर्व्यवहार को को भी सहना पड़ा क्यूँ की हमारा तो रंग रूप, रहन सहन खाना -पीना ,और धर्म सब कुछ ब्रिटिश लोगों से भिन्न था । सुबह -शाम यही सुनना पड़ता था…..ब्लैकी ….

निग्गर…..और पाकी( पाकिस्तानी )…..अपने घर वापस जाओ ….इस रंग नें बहुत गालियाँ  दिलवाईं । इस रंग के कारण मेरे  हिस्से कि गालियाँ दूर-दूर से हो कर नुक्कड तक जाती थीं ……स्कूल में भी बच्चों के साथ भेद -भाव होता था यहाँ तक कि यहाँ जन्में बच्चों को ,यह कह कर ओ लेवल ,ऐ लेवल परीक्षा , देने से  रोका जाता था  कि अंग्रेज़ी इनकी मातृभाषा नहीं है …..तुम्हारी शिक्षा के अनुकूल तुम्हें नौकरी नहीं मिलती थी । अधिकतर पढ़े लिखे लोग फ़ैक्टरी , फ़ाउंड्री ,बस बसकंडकर और बस ड्राइवर का काम करते थे ।   दूसरे शब्दों में जो नौकरियां अंग्रेज़ नहीं करना चाहते थे ,वहीं नौकरियाँ अप्रवासी करते थे । । एक मकान में तीन-चार परिवार गुज़ारा करते थे ।लोग अपने -अपने खेत और मकान बेच के टिकट  के पैसे बचा के यहाँ पहुँचे थे ।किराये पर मकान कोई भी देने को त्य्यार नहीं था…..घर देखने जाओ तो बाहर लिखा होता था पाकि , इंडियन और निग्गर दरवाज़ा न खटखटायें । इंद्रैं को क्या बताती ।हमें भी देश से निकालने के लिय अंग्रेज़ों में क्या -क्या हथकंडे नहीं अपनाये । हमें डराने के लिए आधी -आधी रात को हमारे  दरवाज़े के एक सिरे में इलास्टिक ,और दूसरे सिरे पर काँच की बोत्तल बाँध के ,उसे खींच के छोड़ना रात के बारह बजे , आगे के दरवाज़े पर बोतल के टूटने से भयानक और क्या हो सकता था

काले रंग को छुपाना भी तो मुश्किल था ,यह सब कुछ इंद्रैं को बता कर उसे डराना नहीं चाहती थी ।

स्कूल में हमारी रोज़ मुलाक़ात हो जाती थी ……आज वह मेरे घर आनें वाली थी । मैंने उसे ब्रेक्सिट के बारे में बताने का वादा किया था । काम समाप्त हुआ …दोनो मेज़ पर बैठ गये, मैंने बात आरम्भ करते कहा ……”इंद्रैं मैं तुम्हें उतना ही समझा सकूँगी जितना तुम आसानी से समझ सकोगी और मैं समझा सकूँगी……..मैं भी माहिर नहीं हूँ “ ब्रेक्सिट के मायने हैं …..”ब्रिटिश एगक्सिट “ “उन्नीस सौ सत्तर में ब्रिटेन  ई.यू का सदस्य बना , इस सदस्यता की उन्हें बहुत भारी फ़ीस देनी पड़ती थी …..धीरे – धीरे फ़ीस बढ़ती  गयी। दो हज़ार दो में ब्रिटेन ने ई.यू को एक बिल्लियन पाउंड्ज़ अधिक दिए …..।इस खाते में बाक़ी सदस्यों का भी अंशदान जाता है किंतु सबसे अधिक अंशदान ब्रिटेन का ही रहा है । जब भी किसी सदस्य देश को आवश्यकता पड़ती है तो इसी एकत्रित योगदान में से ही पैसा जाता है । ब्रिटेन को बिना कटौती के इस ई.यू के एकत्रित योगदान में पच्चास करोड़ पाउंड्ज़ डालने पड़े ……जिसका का उसे फ़ायदा तो क्या होना था बल्कि दूसरे ई.यू देशों से लाखों की संख्या में बाढ़ की भाँति आते चले गये…।इसका प्रभाव नैशनल हेल्थ सर्विस पर, स्कूलों पर, हाउज़िंग और आर्थिक इकॉनॉमी पर दिखने लगा ।स्त्रोत समाप्त होने लगें…इन स्थिति को देखते ब्रिटिश लोगों ने कहा ……हम देश को चलाने में हम किसी का हस्ताक्षेप नहीं चाहते ……”टू मेक ब्रिटेन ग्रेट अगेन “ हम अपनी अर्थव्यवस्थता , क़ानून व्यवस्थता को अपने अंकुश में रखना चाहते हैं …….। इसी लिये जून दो हज़ार सोलाह में ई.यू छोड़ो  या रहो का रेफ़रेंडम किया गया,जनता नें ई.यू को छोड़ने का निर्णय किया …..। सुना है दो हज़ार इक्कीस से पहले आये लोगों की स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा …..सो तुम निश्चिन्त रहो ….।”

इंद्रैं तुरंत बोली “अगर यही बात है ,तो अब तक फ़ैसला क्यूँ नहीं हुआ …..ख़बरें तो देखती और  सुनती आयी हूँ ,किंतु आधी – पूरी ही समझ में आती हैं । लगता है ट्रीसा मेए की जादू की छड़ी भी टूट गयी है ,और अभी तक कोई जादुई हल    लेकर भी नहीं आया …..हर रोज़ हाउस आफ कॉमन्स में बहस होती है ……नये प्रस्ताव रखे जाते हैं ….अस्वीकार होते हैं …..हर कोई अपने -अपने दृष्टिकोण से देखते हैं । सुना है अगर किसी निष्कर्ष पर न पहुँचे , तो देश की आर्थिक स्थित पर और भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है …..यह भी सुना है कि ग़लत समझौते से तो समझौता न होना ही बेहतर होगा …। लोगों ने तो राशन इकट्ठा करना आरम्भ कर. दिया है …….।”

“इंद्रैं यह समस्या केवल तुम्हारी ही नहीं है ……उन लाखों लोगों की भी तो है ,  जो ब्रिटेन को छोड़ कर यूरोप में जा बसे है । वो भी चिंताग्रस्त इसी दुविधा में होंगे “। “ मैडम , यूरोप तो तिल भर भी टस से मस नहीं होने वाला …..ब्रिटेन तो ट्रम्प कार्ड बन कर रह गया है ….रोज़ बयान बदलते है, तारीख़ें बदलती हैं….उन्नीस मार्च पर नज़रें टिकी थीं , तब भी कुछ भी हुआ …हर प्रस्ताव अस्वीकार  होता गया है ….कुछ समझ नहीं आता दुविधा में हूँ ,कभी आपका सुझाव ठीक लगता है , तो कभी पति का तर्क शास्त्र ,पति कहते हैं ,बच्चों की पढ़ायी और भविष्य का प्रश्न है ….इस उम्र में तो बच्चे बदलाव के अनुकूल बन जाएँगे ….अपने आप को ढाल भी लेंगे …बड़े हो गये तो ढालना कठिन होगा …..अपनी भाषा, संस्कृति रीति-रिवाज , पहचान …सब मूल बोध बिखर जाएँगे । दूसरे शब्दों में खोखले हो जाएँगे ….न इधर के न उधर के रहेंगे । कहावत है न “ जो दो कश्तियों में पाँव रखता है ,उनका डूबना तो निश्चित ही है ।”

“ इंद्रैं मुश्किल वक़्त तो निकल जानें के लिये होता है …।हरकाले बादल के पीछे चाँदी की लकीर होती है ….फिर भी सोचना “ वह चली गयी ।

चार सप्ताह बीत गये…स्टाफ़ रूम में किसी ने बताया इंद्रैं नें नौकरी से अस्तीफ़ा दे दिया है । वह तीस मार्च को रोमानिया वापस जा रही है ….उस दिन स्कूल से घर जाते वक़्त मैं उस से मिलनें गयी ….उसकी ड्राइव में एक बड़ा सा ट्रक पार्क था , जिसमें सामान लादा जा रहा था ….। मैं समझ गयी थी की वह पति को राज़ी नहीं कर पायी होगी ….उसके कंधे पर मैंने हाथ रख कर कहा “ तुमने सही फ़ैसला किया है ..”

“ मैडम ….पति ने समझाया ….इंसान एक ग़लती करता है…….मंज़िल से हज़ारों मील दूर हो जाता है …। इंसान, जो परिस्तिथि पर पूर्ण  विश्वास करते हैं ….विजय का अवसर उन्हें मिलता है ….पवन और भाग्य किसी भी क्षण बदल सकते हैं …जो जीतने के लिये खेलता है, उसे विजय -पराजय दोनों का सामना करना पड़ता है …, कुछ समय के बाद समझ पाओगी …। अंग्रेज़ों के मन की नफ़रत कभी  नहीं ख़त्म होने वाली । अब तो वापस जाना ही ठीक लगता है ।

अभी नहीं तो  कभी नहीं ….” ट्रक लद चुका था ….धीरे-धीरे  चलने लगा …. मैं  इंद्रैं के नयनो से आते -जाते भावों को समझना चाहती थी …..अपने देश ….अपनी मातृभूमि को लौटने की ख़ुशी  उसकी आँखो में छलक रही थी ….कार में बैठते -बैठते उसने सोच की पुडीया मेरे हाथ में धर दी थी ….।

मैं निशब्द  खड़ी खड़ी सोचती रही , काश चालीस वर्ष पहले …..” मैं इतनी हिम्मत जुटा पाती…..।”

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ये ब्रेक्सिट ब्रेक्सिट क्या है - अरुण सभरवाल 3अरुण सब्बरवाल, 2, Russettings, Westfield Park, Hatch End, Middlesex, HA5 4JF UK. Email: sab_aurn@hotmail.co.uk

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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