1 – नगर के देवता
खण्डहर बस्ती शहर उजड़ा हुआ
आदमी हर ओर से उखड़ा हुआ
ये नज़र तेरी नगर के देवता।
उड़ वनांचल से पखेरू आ गए
वे धवल पाखी गगन में छा गए
फिर चली बन्दूक से कुछ गोलियाँ
गोलियों में दब गई सब बोलियाँ।
पँख बिखरे शेष कुछ छींटे लहू के
ये डगर तेरी नगर के देवता।
हम अदब से पेश थे दरबार में
फिर सिमट के रह गए घरद्वार में
फिर निशाचर बस्तियों में बस गए
नर्म गर्दन पर शिकंजे कस गए।
आ रहे बच्चे उठाए हाथ ईंट
गेरू हरे में लाल लहू के छिटके छींट
लेंगे ये खबर तेरी नगर के देवता….
2 – ज़हर मोहरा पास में रखिये
क्यों उछाले नाग काले
होश खोती बस्तियों में
ये हवाएँ सर्पदंशी लग रही हैं
ज़हर मोहरा पास में रखिए।
गाँव लेते हैं उबासी, शहर सोते
चार ओझा घूमते हैं ज़हर बोते
व्यर्थ सब संवेदना है
वर्जनाएँ लोकध्वंसी लग रही हैं
ज़हर मोहरा पास में रखिए।
तोड़ते बच्चे खिलौने, साँप बुनते
ये न बुलबुल, कोकिलों के गीत सुनते
कहर ढाया बस्तियों में
नीतियाँ नित नागवंशी लग रही हैं
ज़हर मोहरा पास में रखिए।
लोक विषपायी स्वयं में खो गए हैं
सब पड़ोसी नीलकंठी हो गए हैं
राख होती बस्तियाँ हैं
आँख में मणिकर्णिका सुलग रही है
ज़हर मोहरा पास में रखिए।


सर्वप्रथम पुरवाई टीम को हृदयतल से आभार। पुरवाई में छपी रचनाएँ मन को सहज ही स्पर्श कर जाती हैं। अन्य लेखकों की रचनाओं से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। पुरवाई को मेरी शुभेच्छा।
मर्मस्पर्शी कविता।