हिंद की हिंदी
हूँ मैं,
पर क्या निज़ाम
की बिंदी हूँ, मैं।
जन-जन की चेतना
हूँ,
संज्ञा हूँ!सर्वनाम हूँ?
और तो और
मानवी क्रिया शक्ति
की क्रिया औ
विशेषण हूँ मैं।
भारत की चेतना का
व्याकरण हूँ मैं।
वेद पुराण उपनिषद
को आत्मसात कराती हूँ, मैं।
माँ सी वाणी
विद्या की कलम
हूँ मैं।
साँसों सा संस्कार हूँ
मैं,
विचार का षोडशी
श्रृंगार हूँ मैं।
मेरी कई बहिनें हैं,
कुछ चचेरी
तो कुछ
ममेरी ऑ फुफेरी हैं।
सभी बहनों से
हिलमिल कर
समूचे देश में विचरती
हूँ,मैं।
मेरे सभी हैं
सभी की हूँ मैं।
दूर -सदूर
प्रदेशों-देशों में,
सिनेमा गीत और
संगीत से पहचानी
जाती हूँ, मैं।
कभी शैलेंद्र के
कभी साहिर के
गीतों में गूँजती
कभी सुब्रमणियम
भारत की कविता
हूँ मैं।
कितनेकितने देशों को
अपने सबल सुगंधित
समता ममता के आँचल
में समेटती-सहेजती
हूँ मैं।
आज के युवा भारत
की प्राणवायु हूँ मैं!!!
सबके साथ
सबका विश्वास
सब का विकास!!!
हाँ !हाँ! वसुधैव
कुटुम्बकम की
सहचरी हूँ मैं।
हिंदी हूँ मैं !
हिंदी हूँ मैं।
- सूर्यकांत शर्मा,द्वारका नई दिल्ली।

बहुत ही खूबसूरत रचना।हिन्दी सबकी है और हिन्दी में हूं मैं”।अद्भुत भाव! सुंदर सृजन! कितनी बिडम्बना है कि पूरे देश मे विचरण करती हिन्दी हमसे इतनी अपरिचित सी क्यों है? वह हमारी आत्मा है ,अस्मिता है,संस्कृति है। बहुत बहुत बधाई हो सर इस अति महत्वपूर्ण विषय पर सुंदर सृजन के लिए।
जी बहुत बहुत आभार आपका।इतनी सार्थक और उत्साहवर्धक टिपण्णी करने के लिए।
हिंदी के प्रति पूर्णत: समर्पित रचना है बहुत-बहुत साधुवाद
जी आपकी टिप्पणी बहुत ही उत्साहवर्धक है।
आपका दिल से आभारी हूँ।
सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए सादर धन्यवाद सर
सबका विश्वास
सबका विकास- बहुत सुंदर कविता।
जी तहे दिल से शुक्रिया आपका।
बहुत ही सुन्दर कविता, एकदम नई तरह की, पूरा अपना दर्शन, दृष्टिकोण, संसार समेटे हुए…!
जी प्रयास यही है कि मातृभाषा और राष्ट्रभाषा की सत्यता मूर्त रूप ले।
आपने इतने मनोयोग से पढ़ा उर उत्साहवर्धक टिपण्णी की,तहे दिल से शुक्रिया आपका।
आदरणीय सूर्यकांत जी!
प्रथम पुरुष के रूप में मानवीकरण करते हुए आपकी कविता में हिंदी अपनी विशेषताओं को स्वयं बता रही है।
व्याकरण के माध्यम से हिंदी की महत्ता दर्शाते हुए, सभी भाषाओं के साथ समभाव का व्यवहार अपनाते हुए चलना हिंदी की प्रकृति है। आपने इसी भाव को बेहतरीन तरीके से कविताबद्ध किया है।
हिंद की हिंदी के लिये
संपूर्ण समर्पण इस कविता की विशेषता है।
बेहतरीन कविता के लिये बहुत-बहुत बधाई आपको सूर्यकांत जी!
आपकी टिप्पणी पहने के बाद मन की बल मिला। लगा कि हिंदी को राष्ट्रभाषा की मुहिम में हम सब साथ हैं
आपकी टिप्पणी पहने के बाद मन की बल मिला। लगा कि हिंदी को राष्ट्रभाषा की मुहिम में हम सब साथ हैं