प्राननाथ,
चरन स्पर्श।
गर्मी तो निकल चुकी है। लू अपना खूब तांडव मचाय रही। इस वर्ष समय पर मानसून आ गए हैं। पहला दोंगरा गिरने के बाद गर्मी से राहत मिल गई थी। सुहाना मौसम दिल में उमंगें जगा रहा था, लेकिन अति बुरी होती है। वर्षा शुरू हुई तो बन्द ही नहीं हुई। इससे लोगों के अषाढ़ू काम ठप्प कर दिए। बरसात ने आदमी को छौना-छत्तर तक का मौका न दिया। पानी से भरे बादल भय पैदा कर रहे हैं। क्या करूँ, बिलबिला रही हूँ।
मूसलाधार वर्षा हो रही है। सब घर बिना छबे पड़े हैं। घरों का चूना बन्द नहीं हो रहा है। किसको कहूँ कि घर छा-बना दे? सरबत चाची से कहा था कि रोहू लला को भेज देना, वह घर छा देगा। चाची ‘हाँ’ कर देती है, काम नहीं बनाती है। बहुत गुस्सा आता है पर क्या करूँ? मैं तो बेबस हूँ।
रोहू लला से मैं ही कह देती, तो वह घर छा देता। मैंने सोचा, महतारी से कहलवा दूँ, तो ज्यादा ठीक रहेगा। चाची ने सुना ही नहीं।
मैंने कल फिर चाची से कहा, तो वह खीझ गई, “बूँद तो बन्द नहीं हो रही है, तुझे घर दिख रहा है। खप्पर उघाड़ दिए, तो तेरी रही-सही गृहस्थी भी भीग जाएगी। तुझे तो हाव में ताव, दही में मूसल की पड़ी रहती है।”
चाची ने मुझे समझाया कि रमकल्लो धीरज धर, तेरा घर छबवा दूँगी।
चाची सही कह रही थी। लला को भी तो फुरसत नहीं है। दिन भर भैंसें चराते हैं और सुबह-शाम दुहनी-बंधनी में लग जाते हैं।
बरगओ मड़इया में मैं जिधर खाट बिछाती हूँ, उधर ही पानी टपकने लगता है। रात भर खाट इधर से उधर सरकाती रहती हूँ। मूसलाधार बारिश से छप्पर में तुल्लु लग जाती है। जाग-जागकर रातें गुजारती हूँ। पोखर बनी मड़इया का पानी रात भर उलीचती हूँ। कच्चा घर है, पानी समा गया तो गिरने का डर है। घर गिर गया, तो मैं उसी में न दब जाऊँगी। तुम कौन यहाँ हो। सवेरे जब तक लोग देखेंगे, तब तक तो मेरे प्रान कढ़ जाएँगे। बरसात ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि कुछ भी होता रहे, लोग घरों से बाहर नहीं निकलते हैं। बादलों की गड़गड़ाहट और मूसलाधार बारिश से लोग शाम से ही घरों में दुबक जाते हैं। आक्रोशित बादल तड़तड़ाते हैं, तो अच्छे-अच्छों के दिल दहल उठते हैं। मुसीबत में जान फँसी है।
भैंस की शाला भी तालाब बन गई है। बरसात में जानवर मूतते भी बहुत हैं। हरा चारा जो खाते हैं। शाला को सुखाने की कोशिश करती हूँ पर बारिश थम ही नहीं रही है। पैर गीले रहते हैं, जिससे उनमें खुजली होने लगी है। मैंने पैरों की उँगलियों में गर्म तेल लगाया था, थोड़ी देर आराम मिला, अब फिर खुजली। चारपाई की अदवाइन में पैर रगड़ती हूँ। खुजली तो बन्द हो जाती है लेकिन बाद में बहुत कल्लान मचती है। रात को बादल गरजते हैं, तो डर लगता है। उस समय तुम्हारी बहुत याद आती है। तुम साथ होते, तो बादलों का गरजना भी उमंगें पैदा करता।
रोहू लला भैंस चराने लगा है। मैंने कह दिया था कि चौमासे भर मेरी भैंस चरा दे। मैं हर महीने पैसे देती रहूँगी। प्राननाथ, पैसे की क्या चिन्ता? भैंस को हरा चारा मिलता रहेगा। रोहू लला अपनी भैंसें तो चराता ही है, मैंने भी उन्हीं में ढील दी। दो लाठी लेकर तो चरानी नहीं है। खुद की भैंसें चरानी ही है, चराई के पैसे मिल जाए तो बुरा थोड़े है। खेतों की बुवाई के बाद चरागाह नहीं बचते हैं। इसलिए दीपावली बाद भैंस बाँध लूँगी। घर पर ही चारा-पानी खिलाती-पिलाती रहूँगी।
खेतों की ओर जाने वाला रास्ता बहुत खराब हो गया है। परधान जी ने एक साल पहले उस पर खड़ंजा बिछवाया था। वह उखड़ गया है। खफचर्रा मचा है। जानवरों के खुरों से रास्ता दलदल में तब्दील हो गया है। जाने कैसा खड़ंजा बिछवाया, पूरी साल न चला। परधान जी को जानते तो हो, एक रुपये की चार अठन्नी बनाते हैं। उन्होंने कोई काम सही से न करवाया। कोई कहता भी नहीं है। कौन बुराई मोल ले, कुछ कह दो सो भुकर जाते हैं।
घर-बाहर यही हाल है। सोचा था, पक्का मकान बनवा लूँगी पर महंगाई के मारे हिम्मत जवाब दे जाती है। खपरैल वाले मकान हर साल छाने-बनाने पड़ते हैं। कुत्ता-बिल्ली वहाँ से निकले, सो खप्पर टूट जाते हैं। टूटे खप्परों से ही बरसा का पानी दलदलाने लगता है। मैंने कुछ खप्पर हटाकर नए लगा दिए हैं पर मंगरे वाले टूटे खप्परों को मैं न सुधार सकी।
मैंने सोचा था कि चौमासे में तुम आ जाओगे पर तुम आए ही नहीं, वहीं छाकर रह गए। बरसात तो वहाँ भी होती होगी। ऐसी बरसात में काम-धाम थोड़े लगता होगा। तुम्हें किसी की फिकर थोड़े है। मैं ही पागल हूँ, जो दिन-रात तुम्हारी याद में सीझती रहती हूँ। अब तुम्हीं बताओ, मैं किससे कहूँ कि घर का चूना सुधार दे। मेरा तो दिमाग कहा नहीं कर रहा। बस रोना आ रहा है।
प्राननाथ, मैं तुमसे नाराज हूँ। हाँ, सच कह रही हूँ। तुम मुझे बेशऊर न समझा करो। मैं तुम्हारी आदत जानती हूँ। जैसे-तैसे मैं इस मुसीबत से पिंड छुड़ा लूँगी पर तुम ध्यान रखना, मैं समझा रही हूँ।
लिखना बन्द करती हूँ। चिट्ठी का उत्तर जरूर भेजना।
आपकी
रमकल्लो
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निर्विवाद रूप से रामकल्लो की पाती अपना रंग जमा चुकी है और इसे पढ़कर बीते दशकों की यादें ताजा हो जाती हैं!
अति प्रशंसनीय प्रस्तुति
बहुत बढ़िया और आप को बधाई!!
प्रोफेसर विजय महादेव गाडे सर जी ,आपने पाती पर बहुत प्यारी टिप्पणी की है। आपका बहुत-बहुत आभार
तुम बिन कंत न छाजन छाजा (भाग – 3)
रमकल्लो की तीसरी पाती
यह पाती विशाद से भरी लगी।इस बार रमकल्लो ज्यादा परेशान और दुखी है।
गर्मी में लू ने तांडव मचाया और वर्षा से दिल में उमंगें जागी ही थीं कि वर्षा अपना विकराल रूप दिखाने लगी है।
बिलबिलना शब्द बड़ा असर रखता है।
कुछ खास प्रकार की इल्लियाँ होती हैं कुछ गेरू से कलर की वह एक गुच्छे के रूप में रहती हैं। छोटी-छोटी पता नहीं आधा इंच की लंबाई भी रहती है कि नहीं। उनको जब देखो तो समझ में आता कि बिलबिलाना क्या होता है।
कच्चे घरों की छत की मरम्मत बारिश के पहले बहुत जरूरी रहती है। चाहे वह कवेलू वाले घर हों या फूस वाले।
अकेली जान रमकल्लो यहाँ *पानी से भरे बादल भय पैदा कर रहे हैं।*
यह भय सामान्य भय नहीं है। अतिवृष्टि के भय के साथ अकेलेपन का भय इस भय को कई गुना बढ़ा देता है।
ऐसे भी वर्षा ऋतु विपृलंभ/वियोग श्रंगार की दाहक है।
यह पाती तो उसी दुख से भरी है।
पैर की कंदरी तो बहुत तकलीफ देती है। हमें अपनी तकलीफ याद आ गई।बेचारी रमकल्लो को घरेलू उपचार पता नहीं होगा वरना हम लोग तो मिट्टी का तेल गुनगुना करके लगाया करते थे।बेहद जलन(कल्लान) पड़ती है।
सरबत चाची ने सही सलाह दी। जब बारिश लगातार हो रही हो तो छाने के लिये घर को खोलना उचित नहीं।
भैंस चराने का काम रोहू लला को सौंप अच्छा किया। एक ही डंडे से तो हाँकना है।
₹1 की चार अठन्नी बनाना यह लोकोक्ति पहली बार सुनी। समझ भी आई।
इस पाती में शिकायत भी है……. नहीं नहीं गाँव की भोली-भाली रमकल्लो शिकायत नहीं कर सकती …उलाहना कहना ठीक रहेगा। छठे चौमासे आ ही जाते प्राणनाथ जाते तो क्या बिगड़ जाता?
सारे उलहाने के बाद भी एक स्त्री कितनी संतुष्ट किंतु चिंतित व फिक्रमंद रहती हैं अपने पति के प्रति कि” मैं संभाल लूँगी। तुम चिंता मत करना।”
आपबीती बताती हुई कुछ उलाहना, कुछ उम्मीदें, कुछ फिक्र और फिर बेफिक्री की आश्वासन से भरी बेहतरीन पाती है आपकी रमकल्लो की सर जी।
अबकी बार बहुत दुखी है बेचारी! चिट्ठी का जवाब तो कम से कम आना चाहिये।
बहुत बहुत बधाइयाँ आपको सर जी।
नीलिमा करैया जी, आपने रमकल्लो पर अपनी सहृदयता लुटा दी है। उसके दुख और सुख का अहसास आपकी इस समीक्षा में बखूबी झलका है। आपने बहुत गहराई में जाकर उसकी कसक को महसूस किया है। पाती को इतना मान देने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। पुरवाई में रचना को धारावाहिक प्रकाशित करने के लिए आदरणीय तेजेन्द्र सर जी का बहुत-बहुत आभार।
बहुत ही सुंदर, सार्थक और मार्मिकता का पुट लिए एक आम गृहिणी की व्यथा कथा है *रमकल्लो की पाती*।पाती का यह तीसरा अंश बेहद आत्मीय सार्थक लगता है।दूर बसे पति को घर आंगन की बात कहती ,बरसात की परेशानियों का दर्द बयान करती पत्नी अंत में उनके कुशल मंगल की कामना भी करती है।कभी जायसी याद आये तो कभी तुलसीदास। पावस ऋतु के अनेक बिंब मन में उभरते रहे।यह पाती अब अत्यंत लोकप्रिय और अपनी सी ,अपने ही घर आंगन की.व्यथा लगती है।बहुत सुंदर सृजन आपका,।हार्दिक बधाई, अशेष शुभ कामनाएं,मंगलकामनाए आपकी सृजन यात्रा जारी रहे,,अगले अंश की प्रतीक्षा रहेगी।सादर प्रणाम।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
पद्मा जी , जब रचना पर ऐसी टिप्पणियां आती हैं तो मन प्रसन्न हो जाता है और लगने लगता है कि लिखना सफल हो गया। आपने रमकल्लो की भावनाओं को अपनी प्रतिक्रिया से अच्छे से व्यक्त कर दिया है। रमकल्लो है ही ऐसी।
पाती पर टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार
हम तो रमकल्लो की हिम्मत की दाद देते हैं, ऐन केन प्रकारेण अपना काम करवा लेने की जुगत में लगी है! परदेसी पति पर रोब भी गांठना नहीं छोड़ती।
शाबाश रमकल्लो , पानी थम जाए तो ,गौं निकाल कर एक दिन छाजन सुधारने खुद ही चढ़ जइयो, लाज के मारे एकाध मर्द तो’ मर्द ‘बनने आ ही जाएंगे।
भगवान तेरी हिम्मत बनाए रखें।
सरोजिनी पाण्डेय जी, आपकी प्रतिक्रिया रमकल्लो का हौसला बढ़ा रही है। आपका रचना के पात्र से जुड़ जाना साहित्य की स्वीकार्यता को दर्शा रहा है।
आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर अच्छा लगा। आपका बहुत-बहुत आभार
बहुत ही मार्मिक,दिल को छू लेने वाला परिदृश्य छिपा हुआ है पाती में,रमकल्लो एक मेहनती व धैर्यवान पात्र है जो अपने परदेश में रहने वाले पति से क्या शानदार तरीके से ताना भी मार लेती है और अपनी बात भी कह लेती है,रमकल्लो की पाती में सजीवता समाहित है
शानदार लेखनी,बधाई आपको
भाई मोनू पाल जी, पाती पर आपकी प्रतिक्रिया शानदार है। आपने रमकल्लो के द्वारा लिखी पाती के बहाने रचना की सजीवता की बात कह दी है। बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत आभार
अति अद्भुत, पढ़ तो आंखों से रहे थे परंतु ऐसा लग रहा था जैसे हम भी आपकी रचना के पात्र है।अत्यंत जीवंत
बहुत बहुत आभार ऐसी रचना के लिए
भाई नरेन्द्र पाल जी, ग्रामीण जीवन की रचनाएं अपनी सी लगती ही है। हम आपने वह जीवन जिया है। हम सब पात्र ही तो हैं। सुंदर टिप्पणी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई
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रमकल्लो की तीसरी पाती पढ़ी तो गाँव यादों में महकने लगा। मूसलधार बरसात वाले चौमासे याद आ गए और इन्हीं चौमासे के बहाने उस रमकल्लो की याद भी आ गई जो निरी अँगूठा छाप जरूर थी मगर मुँह से कम आँखों से बहुत बोलती थी। भरी बरसात में भीगते हुए छप्पर से चिपकी हुई गलियारे को ओर टकटकी लगाए अपने परदेशी प्रीतम की राह देखती रहती थी। विरह में झुलसती देह पर पानी कीं बूँदें छुन्न होकर सूख जातीं। प्राण के उच्छ्वासों के काले मेघ और गहरा जाते थे। बरसात के दिन-रात बरसते सघन मेघ न शरीर को ठंठक दे पाते न मन को भिंगोते बल्कि और अग्नि पैदा करते, दहकाते थे…
वरिष्ठ कथाकार लखन लाल पाल की कहानी रमकल्लो की पाती जैसी कहानी इसलिए नहीं लिखी जाती है कि वह मनोरंजन करे, ऐसी कहानी इसलिए भी लिखी जाती है कि वह जीवन संस्कृति की संवाहक भी होती है। पथराए अतीत से, स्वर्णिम अतीत से, गदराए व्यतीत से, बीते हुए बौराए हुए समय से वर्तमान की विभीषिकाओं को ध्वस्त करके जीवन को समृद्ध करने वाले सकारात्मक व आह्लादिक तत्वों का संगुंफन करने का भी इंतजाम करती है।
मेरे लिए रमकल्लो एक मिथक बनती जा रही है। उसी मिथक के बहाने वह अपनी पाती में भी स्त्री मन की वेदनाओं को बड़े सलीके से उद्घाटित करती है।
चौमासों में घरपैल घरों से टपकते पानी के चूना से जो भींगे हैं, घासफूस के छप्परों में जो सरोवर हुए हैं, वे बरसात की सुखद वेदना से जरुर रूबरू हुए होंगे। उन्होंने नर से नारायण बनने का सौभाग्य भी प्राप्त किया होगा।
सच में बड़भागिन है तू रमकल्लो!
तुम्हारी पाती पढ़ता हूँ तो मुझे गुजरे हुए चौमासे की काली रातों की मूसलधार बरसातें याद करता हूँ तो फुरहरी छूट पड़ती है, शरीर में एक अजीब सिहरन कुलाँचें भरने लगती है…
मुझे लगता है रमकल्लो की पाती स्त्री वेदनाओं का अमूर्त दस्तावेज है। गांव- गँबई की, पौर छप्पर की, खेत खलिहान की, तालाब नदी पोखर की, बरगद, पीपल, आम की, गैल-गली की चिंता करती हुई स्त्री केवल अपना सुख नहीं देखती है। वह दूसरों के सुख की भी कामना करती है। यह कार्य केवल एक स्त्री ही कर सकती है। गाँव के ऊबड़खाबड़ खरंजे के गड्ढों को ठीक कराने की चिंता वह केवल अपने लिए ही नहीं करती बल्कि पूरे टोला, मोहल्ला और गाँव घर के लिए करती है। “ऊबड़खाबड़ रास्ते में काउ कौ गोड़ौ न टूट जाय” इस प्रकार का भाव, परोपकारिता की भावना गाँव की स्त्री के मन में भीतर तक बैठी हुई है। वह दूसरों के सुख में सुख ढूंढते है अपने पहाड़ों से दुखों को दरकिनार करते हुए…
लोकजीवन के बारह मासों में चौमासे अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। गाँव के पुराने दिनों का चौमासा याद आते ही मन सरावोर होने लगता है। गाँव की वो मूसलाधार बरसात जिसे देखते ही वाह ! करने को तो मन करता है, मगर आह ! निकल जाती है। चारों ओर पानी ही पानी। कच्चे घपरैलों से तर-तर झरता पानी, आँगन में पानी, औसारे में चुवना (टपके) का पानी। गलियारे में पानी, चौखाटे में पानी। बखरी और मढ़ा में पानी। ताल-तलैया में लबालव पानी। खेत-खलिहान, मैदान सभी जगहों पर पानी-पानी। नीचे पानी ऊपर पानी।
“जित देखूँ तित पानी ही पानी।”
आकाश में घिरे भयंकर काले बादल कई दिनों से कोहराम मचाए हुए हैं। गाँव चारों ओर पानी ही पानी। भादों की काली अँधियारी रात का अँधेरा साँय- साँय कर रहा है।हाथ को हाथ नहीं सूझे ऐसी कृष्णपक्षी रात। मूसलाधार पानी साँझ से ही बरसे जा रहा है। मानो बदरा फट गये हों। झप्पर तर-तर है। पौर में कींच मची है। औसारे में तलैया बन गयी है। बरसा की ठंडी फुहारें नागिन की तरह फूँफकार-सी दाह दे रहीं हैं। गाँव को नदिया ने घेर रखा है। चारों ओर पानी ही पानी है। ऐसी वीभत्स रात में पोर-पोर विरहाग्नि से दहकती विरहिणी रमकल्लो की मनोदशा पागली-सी हो रही है। वह अपनी पाती में पति को मीठा उलाहना देते हुए लिखती है –
………..”मैंने सोचा था कि चौमासे में तुम आ जाओगे पर तुम आए ही नहीं, वहीं छाकर रह गए। बरसात तो वहाँ भी होती होगी। ऐसी बरसात में काम-धाम थोड़े लगता होगा। तुम्हें किसी की फिकर थोड़े है। मैं ही पागल हूँ, जो दिन-रात तुम्हारी याद में सीझती रहती हूँ। अब तुम्हीं बताओ, मैं किससे कहूँ कि घर का चूना सुधार दे। मेरा तो दिमाग कहा नहीं कर रहा। बस रोना आ रहा है।
प्राननाथ, मैं तुमसे नाराज हूँ। हाँ, सच कह रही हूँ। तुम मुझे बेशऊर न समझा करो। मैं तुम्हारी आदत जानती हूँ। जैसे-तैसे मैं इस मुसीबत से पिंड छुड़ा लूँगी पर तुम ध्यान रखना, मैं समझा रही हूँ।”………
भारतीय नारी का यह स्वरूप मन को उद्वेलित करता है। संवेदनाओं की आग को हवा देता है।आत्म सौंदर्य को घनीभूत करता है।
धन्य है रमकल्लो! अजब है उसकी पाती!! गजब है कथाकार लखन लाल पाल!!!
डॉ० रामशंकर भारती
भारती जी, आपने तो रमकल्लो की व्यथा-कथा को अंदर तक आत्मसात कर लिया है और उसके सुख-दुख में बराबर के साझीदार होकर सब कुछ महसूस करा दिया है। रमकल्लो की ऐसी स्थिति का मूल्यांकन वही कर सकता है जो इन परिस्थितियों से गुजर चुका हो। बढ़िया समीक्षा लिखने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार
लखनलाल जी,
इस बार तो बारिश की मारी और मुसीबतों से भरी रमकल्लो की पाती ने तो रुला ही दिया। बारिश अपने साथ कई विपत्तियां भी छप्पर फाड़ के ले आई।
एक मुसीबत हो तो और बात लेकिन यहाँ तो इस बार बारिश की वजह से रमकल्लो के जीवन में कीचड़ ही कीचड़ हो रही है।
खपरैल से लेकर भैंसिया की चिंता, छप्पर से टपर-टपर पानी टपकने से घर का पुखरिया जैसा हो जाना, रपटन में फिसल कर हाथ-पैर टूट जाने की चिंता, रोहू लला के सहारे छप्पर की मरम्मत की चिंता और महँगाई की मार सो अलग से। समस्याओं से भरी इस जिंदगी से वह अकेली ही जूझ रही है। कभी न खत्म होने वाली रमकल्लो की इन व्यथाओं से हम सभी परिचित हो चुके हैं। अंतहीन समस्याओं में उसका जीवन फँसा है। ऊपर से प्राननाथ से दूरी बनी है उसकी मजबूरी। फिर भी पति को हर बात बताना है जरूरी।
कैसा भी हो मौसम
सूखा, गीला या बरसाती
मन को विंहल कर देती है
रमकल्लो की पाती।
यह जीवन रहा सदा से
एक सुख-दुख की बाती
हम हाल जान पाते हैं
जब आ जाती है पाती।
रमकल्लो को प्राननाथ की
चिंता और याद सताती
मन की बातें कहने को भी
किसी और के पास न जाती।
उमर से ज्यादा है समझदार
तो जो भी है जीवनसाथी
उससे ही करती बातें साझा
जब मन में न बात समाती।
इस बार तो रमकल्लो अपने प्राननाथ को धमकी दिये बिना न रह सकी। अकेले वह क्या करे? ‘एक अकेला चना भाड़ नही फोड़ सकता’ वाली बात। उसकी जिंदगी मुसीबतों की एक किताब बनी जा रही है। डर है कि इतनी परेशानियों से परेशान होकर रामकल्लो कहीं किसी और के साथ भाग न जाये। और प्राननाथ देखते ही रह जायें। और हम बाकी दास्तान सुनने से बंचित रह जायें।
इतनी विचलित कर देने वाली रमकल्लो की तीसरी पाती पढ़वाने के लिये आपका अनेकों धन्यवाद।
-शन्नो अग्रवाल
शन्नो जी रमकल्लो के अन्त:करण को विस्तार देती यह विस्तृत समीक्षा उसके पोर-पोर का आकलन कर देती है। इन प्रतिक्रियाओं को मैं सहेजकर रख रहा हूं। आपकी प्रतिक्रिया रचना के हर आयाम को उद्घाटित करती है। ऐसी प्रतिक्रियाएं जब रचना पर मिलती हैं तो हौसला बढ़ता है।
शन्नो जी आपका बहुत बहुत आभार
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रमकल्लो की तीसरी पाती पढ़ी तो गाँव यादों में महकने लगा। मूसलधार बरसात वाले चौमासे याद आ गए और इन्हीं चौमासे के बहाने उस रमकल्लो की याद भी आ गई जो निरी अँगूठा छाप जरूर थी मगर मुँह से कम आँखों से बहुत बोलती थी। भरी बरसात में भीगते हुए छप्पर से चिपकी हुई गलियारे को ओर टकटकी लगाए अपने परदेशी प्रीतम की राह देखती रहती थी। विरह में झुलसती देह पर पानी कीं बूँदें छुन्न होकर सूख जातीं। प्राण के उच्छ्वासों के काले मेघ और गहरा जाते थे। बरसात के दिन-रात बरसते सघन मेघ न शरीर को ठंठक दे पाते न मन को भिंगोते बल्कि और अग्नि पैदा करते, दहकाते थे…
वरिष्ठ कथाकार लखन लाल पाल की कहानी रमकल्लो की पाती जैसी कहानी इसलिए नहीं लिखी जाती है कि वह मनोरंजन करे, ऐसी कहानी इसलिए भी लिखी जाती है कि वह जीवन संस्कृति की संवाहक भी होती है। पथराए अतीत से, स्वर्णिम अतीत से, गदराए व्यतीत से, बीते हुए बौराए हुए समय से वर्तमान की विभीषिकाओं को ध्वस्त करके जीवन को समृद्ध करने वाले सकारात्मक व आह्लादिक तत्वों का संगुंफन करने का भी इंतजाम करती है।
मेरे लिए रमकल्लो एक मिथक बनती जा रही है। उसी मिथक के बहाने वह अपनी पाती में भी स्त्री मन की वेदनाओं को बड़े सलीके से उद्घाटित करती है।
चौमासों में घरपैल घरों से टपकते पानी के चूना से जो भींगे हैं, घासफूस के छप्परों में जो सरोवर हुए हैं, वे बरसात की सुखद वेदना से जरुर रूबरू हुए होंगे। उन्होंने नर से नारायण बनने का सौभाग्य भी प्राप्त किया होगा।
सच में बड़भागिन है तू रमकल्लो!
तुम्हारी पाती पढ़ता हूँ तो मुझे गुजरे हुए चौमासे की काली रातों की मूसलधार बरसातें याद करता हूँ तो फुरहरी छूट पड़ती है, शरीर में एक अजीब सिहरन कुलाँचें भरने लगती है…
मुझे लगता है रमकल्लो की पाती स्त्री वेदनाओं का अमूर्त दस्तावेज है। गांव- गँबई की, पौर छप्पर की, खेत-खलिहान की, तालाब-नदी पोखर की, बरगद, पीपल,आम की, गैल-गली की चिंता करती हुई स्त्री केवल अपना सुख नहीं देखती है। वह दूसरों के सुख की भी कामना करती है। यह कार्य केवल एक स्त्री ही कर सकती है। गाँव के ऊबड़खाबड़ खरंजे के गड्ढों को ठीक कराने की चिंता वह केवल अपने लिए ही नहीं करती बल्कि पूरे टोला, मोहल्ला और गाँव घर के लिए करती है। “ऊबड़खाबड़ रास्ते में काउ कौ गोड़ौ न टूट जाय” इस प्रकार का भाव, परोपकारिता की भावना गाँव की स्त्री के मन में भीतर तक बैठी हुई है। वह दूसरों के सुख में अपना सुख ढूँढ लेती है अपने पहाड़ों से दुखों को दरकिनार करते हुए…
लोकजीवन के बारह मासों में चौमासे अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। गाँव के पुराने दिनों का चौमासा याद आते ही मन सरावोर होने लगता है। गाँव की वो मूसलाधार बरसात जिसे देखते ही वाह ! करने को तो मन करता है, मगर आह ! निकल जाती है। चारों ओर पानी ही पानी। कच्चे घपरैलों से तर-तर झरता पानी, आँगन में पानी, औसारे में चुवना (टपके) का पानी। गलियारे में पानी, चौखाटे में पानी। बखरी और मढ़ा में पानी। ताल-तलैया में लबालव पानी। खेत-खलिहान, मैदान सभी जगहों पर पानी-पानी। नीचे पानी ऊपर पानी।
“जित देखूँ तित पानी ही पानी।”
आकाश में घिरे भयंकर काले बादल कई दिनों से कोहराम मचाए हुए हैं। गाँव चारों ओर पानी ही पानी। भादों की काली अँधियारी रात का अँधेरा साँय- साँय कर रहा है।हाथ को हाथ नहीं सूझे ऐसी कृष्णपक्षी रात। मूसलाधार पानी साँझ से ही बरसे जा रहा है। मानो बदरा फट गये हों। झप्पर तर-तर है। पौर में कींच मची है। औसारे में तलैया बन गयी है। बरसा की ठंडी फुहारें नागिन की तरह फूँफकार-सी दाह दे रहीं हैं। गाँव को नदिया ने घेर रखा है। चारों ओर पानी ही पानी है। ऐसी वीभत्स रात में पोर-पोर विरहाग्नि से दहकती विरहिणी रमकल्लो की मनोदशा पागली-सी हो रही है। वह अपनी पाती में पति को मीठा उलाहना देते हुए लिखती है –
………..”मैंने सोचा था कि चौमासे में तुम आ जाओगे पर तुम आए ही नहीं, वहीं छाकर रह गए। बरसात तो वहाँ भी होती होगी। ऐसी बरसात में काम-धाम थोड़े लगता होगा। तुम्हें किसी की फिकर थोड़े है। मैं ही पागल हूँ, जो दिन-रात तुम्हारी याद में सीझती रहती हूँ। अब तुम्हीं बताओ, मैं किससे कहूँ कि घर का चूना सुधार दे। मेरा तो दिमाग कहा नहीं कर रहा। बस रोना आ रहा है।
प्राननाथ, मैं तुमसे नाराज हूँ। हाँ, सच कह रही हूँ। तुम मुझे बेशऊर न समझा करो। मैं तुम्हारी आदत जानती हूँ। जैसे-तैसे मैं इस मुसीबत से पिंड छुड़ा लूँगी पर तुम ध्यान रखना, मैं समझा रही हूँ।”………
भारतीय नारी का यह स्वरूप मन को उद्वेलित करता है। संवेदनाओं की आग को हवा देता है।आत्म सौंदर्य को घनीभूत करता है।
धन्य है रमकल्लो! अजब है उसकी पाती!! गजब है कथाकार लखन लाल पाल!!!
डॉ० रामशंकर भारती
भारती जी, आपने तो रमकल्लो की व्यथा-कथा को अंदर तक आत्मसात कर लिया है और उसके सुख-दुख में बराबर के साझीदार होकर सब कुछ महसूस करा दिया है। रमकल्लो की ऐसी स्थिति का मूल्यांकन वही कर सकता है जो इन परिस्थितियों से गुजर चुका हो। बढ़िया समीक्षा लिखने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार