Saturday, July 18, 2026
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प्रीतिमा वत्स की कहानी – मौत का उत्सव

रमाकान्त के पिता जग्गू बाबू की लाश आँगन में रखी हुई थी। उनकी असमय मौत से दुखी मुहल्ले के उनके हमउम्र लोग सुबह से एक-एक कर आ रहे थे। काफी नेक दिल और सामाजिक आदमी जो थे जग्गू बाबू।  रमाकान्त की परेशानी का कारण पिता की मौत के साथ-साथ कुछ अलग भी था। रमाकान्त बार-बार कमरे में उठकर जाता है, फेसबुक पर अपनी डाली हुई पोस्ट को देखता है और वापस आ जाता है। एक अजीब सी बेचैनी है उसके चेहरे पर। वह बार-बार यही सोचकर परेशान है कि पिताजी की मौत की खबर पर भी क्यों नही ज्यादा लाइक आ रहे हैं। क्यों नहीं कमेंट बढ़ रहा है जबकि मैं तो हमेशा अपने पेसबुक साथियों के इस प्रकार के पोस्ट पर लाइक और कमेंट करता रहता हूँ। ट्वीटर पर भी कुछ खास लोगों ने प्रतिक्रया नहीं दी है। 
अभी पिछले दिनों शुक्ला जी मरे थे। उनके बेटे ने भी पोस्ट लगाई थी और उसपर 700 के आस-पास लाइक और 400 से भी ज्यादा कमेंट आए थे। जबकि वह तो कोई नामी-गिरामी व्यक्ति भी नहीं थे।मेरे पिताजी तो समाज में इतने प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, खुद मेरे 4800 के आस-पास फेसबुक फ्रेंड हैं फिर भी सुबह से दोपहर होने को आ गया और लाइक 200 के पार नहीं पहुँच सका है।
मन में यही उधेड़-बुन लिए हुए ही रमाकान्त फिर अपने पिताजी की अर्थी के पास आकर बैठ गया। आस-पास के लोगों ने उसका उतरा हुआ और व्यथित चेहरा देखा तो समझ बैठे शायद पिता की असमय मौत से रमाकान्त बहुत दुखी है। सान्तवना में जो जिसे समझ में आता बोलते उसे ढाँढस बँधाते और पीछे बैठ जाते, लेकिन रमाकान्त तो अपनी ही परेशानी में उलझा हुआ था। 
रमाकान्त खुद नहीं समझ पा रहा था के वह किस बात से ज्यादा दुखी है, पिता की मौत से या फेसबुक और ट्वीटर पर ज्यादा कमेंट नहीं आ पाने की वजह से। वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने पिता के मौत की खबर बताना चाह रहा था, जिससे उसे फेसबुक और ट्वीटर के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा सहानुभूति मिल सके।
तभी उसके मन में एक विचार कौंधा क्यों न हम पिताजी की फूलों के हार वाली तस्वीर के साथ पोस्ट लगा दें साथ में पार्थिव शरीर वाला फोटो भी डाल देंगे तो शायद कुछ काम बन जाए। वह तुरत उठा और अपने मोबाईल से पिता के पार्थिव शरीर की तस्वीर लेने लगा। आस-पास बैठे जग्गू बाबू के हमउम्र लोगों ने सोचा शायद यह पितृमोह में पड़कर ऐसा कर रहा है। वे आपस में बात करने लगे,  देखो कितना प्यार करनेवाला बेटा है। भगवान ऐसा बेटा तो हर किसी को दे। तभी दूसरे बुजुर्ग ने कहा, आज जग्गू बाबू की आत्मा भी बेटे का प्यार देखकर धन्य हो रही होगी।
इन सब बातों से परे रमाकान्त फिर अपने कमरे में गए और फटाफट फेसबुक ऑन किया, पिताजी की दोनों तस्वीर अपलोड कर एक भावुक सा शोक संदेश टाइप कर दिया। साथ हीं ट्वीटर का न्यूज भी अपडेट किया। अब जाकर उसके दिल को थोड़ा सा सुकुन महसूस हो रहा था। उसे अब विश्वास हो गया कि इस बार तो शुक्ला जी की लाइक से ज्यादा लाइक जरूर मिल जाएगा मेरे पिताजी को। अब वो थोड़ा निश्चिंत भाव से बाहर आए। उन्हें देखकर मुहल्ले के बुजुर्ग लोग कहने लगे, रमाकान्त बेटा जो होना था सो तो हो गया, अब देर न करो। अपने पिताजी की अंतिम यात्रा में चलो। सुबह से तुम्हें बहुत परेशान देख रहा हूँ तो हमलोगों ने जग्गू बाबू के अंतिम यात्रा की पूरी तैयारी कर दी है। उसने कहा, जी चाचा जी, जैसा आप कहें। और मन ही मन सोचने लगा। मैं फेसबुक और ट्वीटर के लाइक के चक्कर में इस तरह टेंशन में आ गया था कि अंतिम यात्रा की तैयारी भी करनी है, इस तरफ तो ध्यान हीं नहीं गया।
खैर मुहल्लेवालों की मदद से जग्गू बाबू की अंतिम यात्रा निकली और श्मशान घाट को चली।
अब रमाकान्त का मन अपने दूसरे पोस्ट को एक बार देखने के लिए बेचैन हो रहा था लेकिन वह बगैर घर लौटे अपने पोस्ट को देख नहीं सकता था। किसी तरह अपने पिताजी का अंतिम संस्कार करके जब वह घर लौटा तो शाम के सात बज चुके थे। जल्दी-जल्दी स्नान करके अपने कमरे में पहुँचा और फेसबुक पर अपना पेज खोला वहाँ पर लाइक और कमेंट का ताँता लगा हुआ था 800 से ज्यादा लाइक और 600 कमेंट आ चुके थे। यही हाल ट्वीटर पर भी था। यह देख उसको असीम शान्ति का अनुभव हो रहा था। मातम से भरे इस घर में भी उसे उत्सव का अहसास हो रहा था। उसने आवाज लगाकर अपनी पत्नी कावेरी को बुलाया।
सुबह से मातम मनाने के लिए आनेवाले लोगों की आव-भगत करते-करते और पिताजी के जाने के गम में रोते-रोते थक चुकी कावेरी जब कमरे में आई तो रमाकान्त बाबू ने बड़ी अकड़ के साथ सुनाया, जानती हो हमारे बाबूजी ने फेसबुक और ट्वीटर पर तो सबको पीछे छोड़ दिया। उस शुक्ला जी से भी ज्यादा लाइक और कमेंट मिला है उनके फोटो और शोक संदेश को। 
उसकी पत्नी ने जब यह सुना तो गुस्से में भरकर रमाकान्त की तरफ थोड़ी देर तक देखती रही और बोली, पिताजी की मौत का दुख नहीं हो रहा है तो न सही। थोड़ी सी शरम हीं कर लो। कैसे बच्चे हो तुम उनके जो उनके जाने से दुखी होने की बजाय उनकी मौत की तस्वीर पर लाइक बटोर कर खुश हो रहे हो। 
इतना कहकर कावेरी बेहद दुखी होती हुई कमरे से बाहर चली गई। पत्नी के कमरे से जाते हीं रमाकान्त को एक झटका सा लगा। अब जाकर उसे समझ में आ रहा था कि वह सुबह से क्या कर रहा था और आज उसने क्या खो दिया है। वह खुद अपने पिताजी की मौत पर दुखी होने की बजाय उनकी मौत का उत्सव हीं तो मना रहा था। अकेले कमरे में वह फफक-फफक कर रोने लगा और खुद से जोर-जोर से बात करने लगा, अरे मूर्ख किस का उत्सव मना रहा है रे…….आज तो तू अनाथ हो गया है।
प्रीतिमा वत्स
N-207, Officer City-1,
Rajnagar Extension,
Ghaziabad-201017, Uttar Pradesh.
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1 टिप्पणी

  1. प्रीतिमा जी!

    आप की कहानी पढ़ी।

    लाइक और कमेंट आज मोबाइल की सबसे बड़ी भूख है।और ऐसी, कि मृत्यु के शोक में भी यह भूख साथ नहीं छोड़ती।

    रमाकान्त के पिता की असामयिक मौत लगभग सभी के बड़े दुख का कारण था।
    रमाकान्त के लिए भी था किन्तु उसका ध्यान मोबाइल पर था कि लाइक कमेंट क्यों नहीं आ रहे।
    लेकिन पत्नी समझदार थी जब उसने कहा,”थोड़ी सी शरम ही कर लो।कैसे बच्चे हो तुम जो उनके जाने से दुखी होने के बजाय उनकी मौत की तस्वीर पर लाइक बटोर कर खुश हो रहे हो!”
    तब उसका दिमाग सचेत होता है और वह रो पड़ता है।
    शीशे का आपका काफी अच्छा है।
    वर्तमान पर अच्छा व सही कटाक्ष। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह दुरुपयोग दुखद है।
    बधाई आपको।

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