दीये की फड़फड़ाती लौ मानो जीवन के अंतिम क्षणों का संकेत दे रही थी। तीव्र हवा के झोंकों से दीवार पर टंगा कैलेंडर समय के पन्नों के साथ विचित्र खेल खेल रहा था। मेज़ पर रखी पुरानी पुस्तकों के पन्नों के खुलने-बंद होने से उत्पन्न सरसराहट वातावरण में एक अनजाना भय घोल रही थी। खिड़की का टूटा हुआ काँच मानो निकट आती विपत्ति का संदेशवाहक बन गया हो, और उसी क्षण किल्ली पर टंगे रिश्तों के सभी धागे मानो आपस में उलझकर अपनी बिखरती हुई कहानी कहने लगे थे।
ज़मीन पर बिखरी हुई साँसें, आढे-टेढ़े किस्सों के कुछ हिस्से ज़िंदगी को चुभन दे रहे थे। इसी चुभन को समेटते हुए ईरा ज़ोर से चिल्लाई। मानो, किसी किस्से का कोई हिस्सा चुभ गया था या जबरन चुभा दिया गया था।
ईरा की कमर में काफी अंदर तक काँच जा चुका था। चिल्लाने की कोशिश-मात्र से ही, भीतर की सभी नसें कट रहीं थीं। मदद पुकारती आवाज़, पीड़ा के कारण धीमी होती चली गई। किसी प्रकार की उम्मीद ना दिखने पर वह सीढ़ियों से नीचे उतरने का प्रयास करने लगी, परंतु इस प्रयास-मात्र से ही वह नीचे गिर गई। निचली मंज़िल पर शर्मा जी का फ्लैट था। एक धमाके-सी आवाज़ सुनते ही उनकी छोटी बहु संध्या बाहर आई और ईरा को देखकर दंग रह गई। उसने इरा को सहारा देकर उठाया और सामने के फ्लैट वाली निम्मों काकी को पुकारने लगी।
‘निम्मो काकी, निम्मो काकी जल्दी से बाहर आओ। देखो, ईरा को क्या हो गया है।’
काकी, ईरा की गंभीर हालत देखकर चिंतातुर हो गई। आठ महीने की गर्भवती ईरा की कमर में काफी अंदर तक धसा हुआ काँच का टुकड़ा उसके शरीर से लहू निचोड़ रहा था। काकी ने संध्या को लिफ्ट खोलने को कहा। काफी समय से लिफ्ट बंद होने के कारण लोहे की सलाखों वाला दरवाज़ा ज़ंग खा गया था। उधर ईरा की हालत बिगड़ती जा रही थी। ईरा को संभालते हुए काकी ने संध्या बहु को शर्मा जी की पहियों वाली कुर्सी लाने को कहा। जैसे-तैसे ईरा को उस पर बिठाया और रैम्प से उसे ग्राउंड फ्लोर तक लाया गया। देखने वाले भी दाँतों तले उंगलियाँ दबाए बिना ना रह सके, परंतु मदद के लिए कोई भी हाथ आगे नहीं आया। बड़ी मुश्किल से पास वाले सिविल अस्पताल तक ईरा को पहुँचाया गया। डॉक्टरों ने यह कहकर ईरा को दाखिल करने से मना कर दिया कि ‘यह एक पुलिस केस है और बिना पुलिस के, वे ईरा को दाखिल नहीं कर सकते।’
‘आप इलाज शुरू करो डॉक्टर साहब। हम पुलिस को खबर कर देंगे। इस बच्ची को बचा लीजिए बस। मैं आपके आगे हाथ जोड़कर विनती करती हूँ।’
काकी के जुड़े हुए हाथ और आँखों में आँसुओं का समंदर देख कर डॉक्टर इलाज करने के लिए मान गए। लगभग नौ घंटों तक ईरा ऑपरेशन थिएटर में मौत से जूझती रही। बेहोशी की अवस्था में भी ईरा के समक्ष वही दृश्य बार-बार घूमता रहा। कमरे में दिये की लौ अब उसे बुझती हुई प्रतीत हो रही थी। कैलेंडर के दिन धुंधले होते हुए नज़र आ रहे थे और किल्ली पर टंगे सभी रिश्ते समाप्ति की कगार पर थे।
जीवन-मृत्यु के इस युद्ध में ईरा ने विजय तो प्राप्त कर ली परंतु वह जीत कर भी हार गई। वह अपना बच्चा और शरीर, दोनों खो चुकी थी। ईरा को दो सप्ताह तक अस्पताल में ही रखा गया। डिस्चार्ज वाले दिन निम्मो काकी को यह खबर सुनाई गई कि ‘ईरा अब कभी उठ नहीं पाएगी। सीढ़ियों से गिरने के कारण उसकी रीढ़ की हड्डी पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है। ईरा को घर लाया गया। खुद को असहाय पाकर ईरा ने सवालों की झड़ी लगा दी।
‘कड़वा है, परंतु सच्च है ईरा।’
जीने का एकमात्र सहारा भी उससे छिन गया था। ईरा को अपना जीवन शून्य होता दिखाई दिया।
‘मैं जानती हूँ ईरा, जीवन में बहुत दुःख-तकलीफों से जूझी हो तुम। हर बार की तरह, इस कठिन परीक्षा में भी तुम्हें खरा उतरना है, मेरी बच्ची। एक बात हमेशा याद रखना ईरा ‘इंसान तब तक नहीं हारता जब तक वह खुद को हारा हुआ ना मान ले।’ मैं ये बातें केवल तुम्हें दिलासा देने के लिए नहीं कह रही हूँ, बल्कि विश्वास है तुम पर। खुद को टूटने मत देना अन्यथा कोई तुम्हें जोड़ नहीं पाएगा, तुम खुद भी नहीं।, क्योंकि बिखरा हुआ फिर भी समेटा जा सकता है, परंतु टूटा हुआ कभी जोड़ा नहीं जा सकता।’
हादसे वाले दिन ईरा के घर पर कोई नहीं था। सवाल यह उठता है कि यदि सब घर से बाहर थे तो ईरा को काँच किसने मारा? सुनने में यह भी आया कि ईरा के पति जयदेव ने अपना फ्लैट ईरा और अपने होने वाले बच्चे के नाम कर दिया था और परिवार वालों ने इसी लालच में ये काण्ड करवाया है। उसके ससुर और देवर का नाम भी सामने आया परंतु कड़ी छान-बीन के बाद भी पुलिस विभाग अपराधी को ढूँढने में असमर्थ रहा। शक के आधार पर जो सुई ससुर और देवर पर निशाना लगाए बैठी थी ईरा के बयान से वह भी हट गई।
इस काण्ड को हुए एक साल बीत चुका था। ईरा के ससुराल वालों का व्यवहार उसके लिए बेटी से कम नहीं था। ससुराल वालों के लिए लिया गया फैसला ईरा को सही लगने लगा। पुलिस को केस बंद करने के लिए कह दिया गया, जिससे बहुत चेहरों पर तसल्ली की मुस्कान दिखने लगी। “अधिकतर रिश्ते एक नकाब ओढ़े रखते हैं और इस नकाब के पीछे का कपटी चेहरा हमारी अक्षमता पर हँसने के लिए हमेशा बेताब रहता है। कागजी फूलों की तरह इनकी ऊपरी परत सुंदर तो होती है परंतु भीतर से खाली होते हैं।”
‘क्या आवश्यकता थी केस वापस लेने की। चलते रहने देती तो अपराधी के मन में डर बना रहता। अब वह खुलेआम घूमेगा। तुमने बहुत बड़ी गलती की ईरा।’
‘काकी, मेरा परिवार मेरे साथ है। और अब मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह अपराधी कौन था? और उसे पकड़कर मिलेगा भी क्या? ना तो मेरा बच्चा मुझे मिल सकता है और ना ही इस बेजान शरीर में जान आ सकती है।’
‘ऐसी हालत में सब मुँह मोड़ लेते हैं, ईरा। तुम्हारे ससुराल वालों ने तुम्हें संभाल लिया यह अच्छी बात है, लेकिन अपराधी का भी तो पता चलना चाहिए।’
ईरा अपने ससुराल के मोह में इस कदर अंधी हो चुकी थी कि आँखों के सामने घट रही सच्चाइयाँ भी उसे दिखाई नहीं दे रही थीं। वह लगातार उन्हीं लोगों पर अपना स्नेह और विश्वास लुटाती जा रही थी। तभी समय ने एक बार फिर अपना पासा फेंका। कानूनी कागज़ों पर एक बेजान अंगूठे की छाप लगवा ली गई और उसी रात उस निर्जीव शरीर का मुँह बंद कर उसे कूड़े के ढेर के नीचे दबा दिया गया। निम्मों काकी और संध्या को यह कहकर टाल दिया गया कि ईरा के मायके वाले अब उसकी देखभाल की ज़िम्मेदारी अपने हाथों में लेना चाहते हैं।
हर कहानी का एक आरंभ होता है और एक अंत भी, लेकिन कुछ किस्से कहानी के समाप्त हो जाने के बाद भी मन के किसी कोने में जीवित रहते हैं और लंबे समय तक अपना एहसास कराते रहते हैं।
ईरा कई दिनों तक उसी कूड़े के ढेर में सड़ती रही। कीड़े-मकौड़े उसके शरीर को नोच-नोचकर अपना पेट भरते रहे। घरों से इकट्ठा किए गए कूड़े के साथ सफाईकर्मी मल-मूत्र भी उसी ढेर में डाल देता। देखते ही देखते कूड़े की परतें उसके बेजान शरीर पर जमती चली गईं और वह शरीर धीरे-धीरे उस गंदगी के नीचे, और नीचे दबता चला गया। उस सड़ांध के बीच भी ईरा अपने रिश्तों की गंध को पहचान रही थी—उन रिश्तों की, जिन पर उसने कभी आँख मूँदकर विश्वास किया था। अब जीवन से उसका मोह पूरी तरह समाप्त हो चुका था। जीवन के अंत की कामना उसकी हर साँस के साथ बाहर निकल रही थी।
लगभग एक सप्ताह बाद…
कूड़ा फेंकने आए लाल बाबू को कीड़ों से भरा एक पाँव दिखाई दिया। कूड़ा हटाने पर उन्हें कीड़े-मकौड़े, मक्खियों से सना एक लावारिस, शरीर मिला। लाल बाबू ने उस शरीर में कुछ साँसों को महसूस किया और अस्पताल ले जाने का प्रबंध किया। जहाँ से भी स्ट्रेचर गुज़रता, सभी के हाथ मुँह तक पहुँच जाते। ‘छी.. छी..।’, ‘मुझे तो उलटी आ रही है।’, ‘कितनी बदबू आ रही है।’, ‘ये तो टट्टी से भरी हुई है।’, ‘मैंने अपने जीवन में इससे बदबूदार कुछ नहीं देखा।’ – जैसे वाक्य सुनाई देने लगे। ईरा की हालत को देखकर डॉक्टर भी घबरा गए। ईरा को जीवित बताते हुए उसे ऑपरेशन थिएटर के अंदर ले जाया गया। डॉक्टरों की पूरी टीम को जल्दी इकठ्ठा करने के लिए हाई एमरजेंसी वाला सायरन बजाया गया।
कीड़े-मकौड़ों ने पूरे शरीर पर अपना अधिकार जमा लिया था। शरीर में बहुत अंदर तक धसे हुए कीड़ों को चिमटी की सहायता से बाहर निकाला जा रहा था। कुछ तो जोंक की तरह चमड़ी के साथ ऐसे चिपके हुए थे कि चमड़ी से अलग करने पर, चमड़ी का उतना भाग ही साथ निकल आता। पूरे शरीर में बड़े-बड़े छेद हो चुके थे, जिनका उपचार डॉक्टरों को असंभव लग रहा था। शरीर की अधिकतर नसें कट चुकी थीं। पूरे शरीर में केवल कुछ साँसें ही शेष थीं, जिन्होंने ईरा को जीवित रखा हुआ था।
छह माह के डॉक्टरी इलाज के बाद ईरा को थोड़ी सुध आई। आँखों सहित पूरा शरीर पट्टियों से बंधा हुआ था।
‘आँखें खोलने की कोशिश करो।’ डॉक्टर ने आँखों पर से पट्टी को हटाते हुए कहा।
आँखों के परदे थोड़े-से खुले और फिर बंद हो गए। फिर से एक कोशिश ने इस बार उन्हें थोडा और खोला।
‘कुछ बोलना चाहती हो?’
‘मैं.. कहाँ हूँ?’ बोलने की कोशिश में अधखुले होंठ बोले।
‘तुम अस्पताल में हो। तुम्हारा नाम क्या है और तुम कहाँ की रहने वाली हो? अपने परिवार वालों के बारे में बताओ, ताकि उन्हें सूचना भिजवाई जा सके।’
‘मेरा.. कोई.. परिवार.. नहीं.. है।’ इतना कहते ही आँखों के किनारों से अश्रुधारा बहने लगी।
ईरा ने मरने की इच्छा जताई, जिससे लाल बाबू की अपनी कहानी के कुछ हिस्से दृश्य बनकर सामने आने लगे। लाल बाबू ने ईरा को बहन माना और अपने घर चलने के लिए कहा।
अपने रिश्तों से मिले घावों को ईरा गहराई से अनुभव करने लगी। इस समय किसी भी नए रिश्ते को अपनाने में ईरा एक भय का अनुभव कर रही थी। लाल बाबू के बहुत कहने पर ईरा मान तो गई परंतु मन अभी भी अशांत था। लाल बाबू उसे अपने घर ले गए।
‘चिंता मत करो। यह मेरा घर है। मैं और मेरी धर्मपत्नी यहाँ रहते हैं। कोई औलाद नहीं है हमारी, इसलिए थोडा सूना-सूना सा है।’ लाल बाबू ईरा को व्हीलचेयर पर घर के अंदर लाते हुए बोले।
घर के हर कोने में जैसे जीवन मुस्कुरा रहा था। चारों ओर खिले मुस्कुराते चेहरों की तस्वीरें मानो जीने की प्रेरणा दे रही थीं। दीवारों पर टँगे एक-एक फ्रेम में कैद तस्वीर अपनी अलग कहानी कह रही थी। कोने में रखा ताज़े फूलों से भरा गुलदस्ता अपनी मनमोहक सुगंध से पूरे हॉल को महका रहा था। हॉल की एक ओर सजी बड़ी-सी किताबों की अलमारी जैसे ज्ञान और जीवन में निरंतर आगे बढ़ते रहने का संदेश दे रही थी। वहीं, दूसरे कोने में रंग-बिरंगी मछलियों से भरा एक्वेरियम अपनी शांत, चंचल दुनिया में जैसे हर दुःख और चिंता को भुला देने का निमंत्रण दे रहा था। वहाँ रखी हर वस्तु निर्जीव होकर भी किसी न किसी रूप में जीवंत प्रतीत हो रही थी—मानो वह घर की खामोशियों में भी जीवन का संगीत घोल रही हो।
ईरा इन सभी में कुछ तलाशने लगी कि तभी पहियों की जानी-पहचानी आवाज़ उसके कानों में पड़ी। उसने इधर-उधर नज़र घुमाई। उसके बाईं ओर से एक खूबसूरत चमकता हुआ चेहरा, होठों पर मुस्कराहट सजाए पहियों वाली कुर्सी पर उसके पास आ रहा था। ईरा ये देखकर हक्की-बक्की रह गई। उस शरीर को देखना, उसे खुद का प्रतिबिंब देखने जैसा प्रतीत हो रहा था। अंतर केवल इतना था कि वह एक खिलखिलाता हुआ चेहरा था और ईरा उदास, मुरझाए हुए चेहरे के साथ थी।
‘मेरी पत्नी, करुणा।’
नम आँखों से ईरा ने कई सवालों के साथ लाल बाबू की तरफ देखा।
‘बहुत सारे सवाल तुम्हें परेशान कर रहे होंगे ईरा। अभी थोड़ा आराम कर लो, शाम की चाय पर तुम्हारे सभी सवालों का जवाब दूँगा।’
लाल बाबू ने ईरा को हॉल में रखे दीवान पर लिटाया और आराम करने को कहकर वहाँ से चले गए। नींद उसकी आँखों से जैसे आँख-मिचौली खेल रही थी। कभी पलकों पर उतरती, तो अगले ही क्षण जाने कहाँ खो जाती। पंखे की तेज़, फर्राटेदार हवा धीरे-धीरे उसके थके हुए शरीर को नींद की आगोश में समेट रही थी, लेकिन उसका मस्तिष्क बार-बार उसे यथार्थ के कठोर धरातल पर ला खड़ा करता। जिस स्नेह, अपनत्व और भरोसे की तलाश वह अपनों के बीच करती रही थी, वही आज उसे इन अनजान चेहरों में मिल रहा था। ‘रिश्ता’ शब्द का ख्याल आते ही अब उसका दम घुटने लगता था। जिन रिश्तों को उसने कभी अपनी दुनिया समझा था, उन्हीं ने उसके भीतर रिश्तों के नाम से ही एक गहरी घुटन भर दी थी। आँसुओं ने भी आज उसकी कोई बात नहीं मानी। वे अपनी मनमानी करते हुए पलकों की सीमाएँ तोड़कर बहते चले गए। उन्हें पोंछने के लिए इस समय वहाँ कोई नहीं था। आखिरकार, सूजी हुई आँखें थककर खुद-ब-खुद बंद हो गईं और ईरा नींद की गहरी खामोशी में डूब गई।
चाय पीने का समय हुआ तो करुणा जी ईरा को जगाने आईं। लाल बाबू हाथों में चाय और खाने के लिए नमकीन लेकर हॉल में दाखिल हुए। ईरा को सहारे से उठाया गया और प्याले में से चाय क्वाटर-प्लेट में डालकर ईरा और करुणा जी को पिलाई गई।
‘अब पूछो, क्या सवाल हैं तुम्हारे मन में। तुम्हारे प्रत्येक सवाल के लिए मैं तैयार हूँ।’ लाल बाबू के चहरे पर हलकी-सी मुस्कान आई।
हिचकिचाते हुए ईरा ने करुणा जी की तरफ देखा।
‘यही सोच रही हो ना कि करुणा की ऐसी हालत कैसे हुई?’
ईरा ने हाँ में सिर हिलाया।
‘करुणा और मैं बचपन के दोस्त हैं। कॉलेज में साथ पढ़ते-पढ़ते कब दोस्ती ने प्रेम का रूप ले लिया, पता ही नहीं चला। मगर हमारी जाति अलग थी, इसलिए करुणा के घरवालों ने हमारे रिश्ते को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने करुणा की शादी उसकी ही जाति के अधेड़ उम्र के एक व्यक्ति से कर दी। शादी के बाद का जीवन करुणा के लिए किसी यातना से कम नहीं था। मार-पीट तो जैसे उसकी रोज़मर्रा की नियति बन चुकी थी, लेकिन एक दिन क्रूरता ने सारी सीमाएँ लाँघ दीं। उसके शरीर को जलते हुए कोयलों पर तपाया गया। उस भयावह यातना ने करुणा से उसका मानसिक संतुलन, उसकी आवाज़ और धीरे-धीरे उसका अपना शरीर तक छीन लिया। फिर एक रात, उसके परिवार वाले एक अधनंगे, बेसुध शरीर को अँधेरे में चौराहे पर छोड़ गए, और उस दिन मेरी किस्मत में वहाँ से गुजरना लिखा था। मैंने ऐसे दृश्य की कभी कल्पना भी नहीं की थी, लेकिन उस रात वह भयावह यथार्थ बनकर मेरी आँखों के सामने था। भीड़ ने उस अधनंगे शरीर को कपड़े से ढक तो दिया, लेकिन साथ ही सवालों की बौछार ने उसे फिर से नंगा भी कर दिया।’
विपरीत परिस्तिथियों ने उसके लिए बीमारी के द्वार खोल दिए। करुणा का स्वस्थ होना नामुमकिन लग रहा था लेकिन एक वर्ष की लंबी प्रतीक्षा के बाद एक दिन करुणा ने मुझे पुकारा। ‘लाल’ और तब से आज तक ये नाम इस घर में गूँज रहा है।
करुणा को कलम से बेहद प्रेम था। वह बचपन से ही कविता, कहानियाँ लिखा करती थी। बहुत कहता, लेकिन करुणा कभी हिम्मत जुटा ना पाई। फिर एक दिन मैंने उसे लिखते हुए देखा और उस दिन के बाद से करुणा की कलम कभी नहीं रुकी। अब आलम यह है कि आज यह नाम समाज के प्रतिष्ठित नामों के साथ लिया जाता है। तुम भी हारी नहीं हो ईरा, बस विपरीत परिस्थितियों के चलते थोड़ा उदास हो गई हो, थक गई हो। खुद को उन परिस्थितियों के नीचे दबा हुआ महसूस कर रही हो। अपने अंदर की ईरा को जगाओ और उजाले में प्रवेश करो। हमें हारना नहीं है ईरा, बल्कि इन परिस्थितियों का डटकर सामना करना है।
‘क्या सोच रही हो?’
‘आपकी बात सुनकर निम्मो काकी की याद आ गई। आपकी बात सही है, परंतु मुझमें ऐसी को प्रतिभा नहीं है।’
“हम अपने जन्म के साथ ही अपने भीतर एक अनमोल प्रतिभा लेकर आते हैं। आवश्यकता केवल उसे पहचानने, निखारने और निरंतर अभ्यास से उसे अपनी शक्ति बनाने की है। अपने भीतर छिपी उस प्रतिभा की आहट सबसे पहले हमें ही सुनाई देती है। आज नहीं तो कल, तुम्हें अपने अस्तित्व से जुड़े इस प्रश्न का उत्तर अवश्य मिलेगा। अपनी साँसों पर अपनी पहचान की मोहर स्वयं लगाओ, क्योंकि यदि तुमने अपने जीवन की दिशा स्वयं तय नहीं की, तो तुम्हारी साँसों पर अधिकार जमाने और उन्हें तुमसे छीन लेने के लिए दुनिया में बहुत लोग बैठे हैं।
काफी दिनों तक ईरा सोचती रही। अचानक उसे स्मरण हुआ कि निम्मो काकी कहा करती थी कि ‘ईरा तुम तो साक्षात् अन्नपूर्णा हो। इतना स्वादिष्ट खाना मैंने अपने जीवन में कभी नहीं खाया।’ यही सोचते-सोचते ईरा के समक्ष एक और प्रश्न खड़ा हुआ कि इस नाम-मात्र जान के साथ वह काम कैसे कर पाएगी। बहुत सोचने के बाद ईरा ने लाल बाबू से बात करना सही समझा।
‘तुम व्यंजन बनाने के नए-नए तरीकों को एक पुस्तक रूप दे सकती हो ईरा।’
‘परंतु इतना पैसा कहाँ से आएगा?’
‘तुम उस बात की चिंता मत करो। मैं एक ऐसी संस्था को जानता हूँ, जो हमारी मदद कर सकती है।’
लाल बाबू ने ईरा का मनोबल पुन: खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हर रोज़ ईरा एक व्यंजन का ब्यौरा लाल बाबू को देती और लाल बाबू उसे कागज़ पर उतारते। कुछ ही महीनों में ईरा की पहली पुस्तक तैयार हो गई। पुस्तक विमोचन हुआ और एक गुमनाम नाम हाथों-हाथ बिकने लगा।
‘मैं कुछ कहना चाहती हूँ।’ विमोचन समारोह में ईरा ने अपनी इच्छा व्यक्त की।
ईरा के आगे माईक किया गया।
गहरी साँस भरते हुए—
‘ईरा’—एक गुमशुदा चेहरा, एक गुमनाम नाम… एक ऐसी स्त्री, जिसे अपनों ने ही उपेक्षा के अँधेरे में धकेल दिया। स्त्री होने की सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है कि वह एक ‘स्त्री’ है। उसके जन्म के साथ ही उसके लिए परिवार और समाज की बनाई हुई मर्यादाओं की एक लंबी सूची तैयार कर दी जाती है। उन नियमों के भीतर जीना उसकी नियति बना दिया जाता है और उन दायरों से बाहर सोच लेना उसका अपराध। शिक्षा, स्वतंत्रता, सम्मान और समानता जैसे शब्द उसके हिस्से में अक्सर केवल शब्द बनकर रह जाते हैं। इसके विपरीत सहनशीलता, करुणा, स्नेह, ममता, कोमलता और त्याग जैसे तमाम शब्द उसके माथे पर ताज की तरह सजा दिए जाते हैं। वह इस ताज का भार ढोते-ढोते भीतर ही भीतर घुटती रहती है, मगर उफ़ तक करने की इजाज़त उसे नहीं होती। वह आसमान की ओर देख सकती है, मगर अपनी उड़ान के बारे में सोच नहीं सकती। मायका उसे यह कहकर विदा कर देता है — ‘ससुराल ही तुम्हारा अपना घर है।’
और ससुराल उसे यह कहकर ठुकरा देता है — ‘तुम तो पराई हो।’ आख़िर उसका अपना घर है कौन-सा? दायरों में रहकर जिए तो संस्कारी, और उन दायरों से बाहर निकलने की कोशिश करे तो बददिमाग, स्वार्थी, चरित्रहीन जैसे तमगे पलभर में उसके गले में डाल दिए जाते हैं। वह उम्रभर दूसरों की अपेक्षाओं के हिसाब से मिली हुई उस ‘उठाई हुई ज़िंदगी’ को ढोती रहती है—जिसे जीने का अधिकार तो उसे मिला, मगर अपनी शर्तों पर जीने की आज़ादी कभी नहीं मिली।
आख़िरी साँसें गिन रही थी मैं, जब लाल बाबू ने मुझे कूड़े के ढेर से उठाया था। मैं यह तो नहीं जानती कि ज़िंदगी आखिर होती क्या है, लेकिन अब इतना ज़रूर जान गई हूँ कि मौत क्या होती है।
साँस लेते हुए मल-मूत्र का नाक और मुँह के रास्ते भीतर उतरना… शरीर पर गंदगी की मोटी परत जम जाना… शरीर के भीतर कीड़ों का रेंगते हुए घुस जाना… और हर पल इस इंतज़ार में बीतना कि अगली साँस आएगी भी या नहीं। यह कह देना बहुत आसान है कि ‘एक लड़की कूड़े के ढेर में पाई गई’, लेकिन उसी ढेर के पास रुकना नामंज़ूर होता है सभी को। क्योंकि वहाँ सिर्फ़ एक शरीर नहीं पड़ा था—वहाँ किसी की पूरी ज़िंदगी, उसके रिश्ते, उसकी उम्मीदें और उसके साथ हुए अन्याय की कहानी सड़ रही थी। मृत्यु ने मुझे बहुत करीब से देखा है। फिर पता नहीं उसके मन में क्या आया कि वो मुझे वहीँ छोड़ गई। मैं नहीं जानती कि उस परीक्षा में मैं पास हुई या फेल, लेकिन इतना अवश्य जानती हूँ कि आज मैं उस ‘उठाई हुई ज़िंदगी’ के अहसास से हमेशा के लिए मुक्त हो गई हूँ। पहली बार मुझे अनुभव हो रहा है कि मेरी ज़िंदगी किसी की दया पर नहीं, बल्कि मेरी अपनी है।
“ख़्वाहिशों का मंज़िल से परिचय होना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि अधूरी ख़्वाहिशें अक्सर दुःख का कारण बन जाती हैं। ज़िंदगी जियो तो कुछ इस तरह कि तुम्हारे जीने से ज़िंदगी भी मुस्कुरा उठे।”
- डॉ. शिवानी कोहली आनंद
गल्गोटियास विश्वविद्यालय, जनसंचार एवं मीडिया विभाग में सहायक प्राध्यापक (अतिथि संकाय) के पद पर कार्यरत। सामूहिक हित का दीप जले: मन की बात, निशंक का रचना संसार: देश के उस पार, लालित्य ललित के 21 व्यंग्य, कथा साहित्य और अनुवाद, भाषा पत्रिका में – तकनीकी साहित्य का अनुवाद: समस्याएँ एवं समाधान एवं अन्य पुस्तकें प्रकाशित। फ्रीलांस अनुवादक सहित मीडिया लेखन के लिए विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्य
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