डॉ ममता मेहता का व्यंग्य - गठबंधन 3
  • डॉ. ममता मेहता

“सुनो, जरा 2000 रुपये देना..”
कंघी करते मेरा हाथ रुक गया,  “क्यों ?”
” क्यों क्या ! अरे भई काम है, कुछ खरीदना है..”
“तो ! अभी पिछले हफ्ते ही 5000 रुपये दिये तो थे..”
“दिये थे, तो?”
“तो मतलब ?क्या किया उनका?”
“क्या किया ! अरे पैसे होते ही खर्च करने के लिए हैं, खर्च हो गए.”
“तो मैंने यहाँ कोई टकसाल नहीं खोल रखी ,न पैसे का पेड़ लगा है कि निकाल कर या तोड़ कर तुम्हें देता रहूँ.. नहीं है मेरे पास 2000 रुपये.. हु”
“देखो”  सुमि ने उंगली तानी “अगर तुमने मुझे 2000 नहीं दिये तो ये जो घर के मुखिया के पद पर बैठाने के लिए जो समर्थन दे रखा है न वो वापिस ले लूंगी, यूं ….” सुमि ने चुटकी बजाते हाथ मेरे सामने लहराया..
“”यूं पद से गिर जाओगे धड़ाम, समझे!!”
मैंने भी हाथ हिलाये ,” तुम्हारी इन गीदड़ भभकियों से डरने वाला नहीं हूँ ,तुम समर्थन नहीं दोगी तो क्या बाकियो का समर्थन तो है न मेरे पास, कुछ नहीं होने वाला मेरी कुर्सी को समझी !!”
सुमि ने पैर पटके, मैं बाहर निकल आया..
बाहर बेटे ने हाथ फैलाये,  “पापा मुझे 2000रुपये चाहिए ..”
मैंने भौहे चढ़ाई , “क्यों?”
“क्यों क्या ! आज फ्रेंड्स के साथ प्रोग्राम फिक्स है पैसे लगेंगे.”
तो 500 रुपये ले ले..”
500, 1000 का जमाना गया पापा श्री, अब सीधा 2000 का पत्ता चलता है ,फ़िल्म खाना पीना घूमना पेट्रोल इन सबमें 2000 रुपये से भी ज्यादा लगेंगे पर आप अभी सिर्फ 2000 रुपये ही दे दीजिए “
“नहीं है मेरे पास, खर्च करने का इतना ही शौक है न तो कमा पहले ” मैं आगे बढ़ा
“”माँ…”बिसुरते बेटे ने आवाज लगाई
अंदर से आती उसकी माँ  भुनभुनाई ,” हम से ही गलती हुई बेटा जो इन्हें सत्ता थमाई, पर रुक मैं हूँ न तेरे साथ..”
मैंने गर्दन झटकी ,हॉल में पहुँचा तो माँ ने रोका..
“बेटा जरा 1100 रुपये दे दे , मंदिर में प्रसाद चढ़ाना है..”
मेरे माथे पर बल पड़े ,  “फिर से ! अभी पिछले महीने ही तो प्रसाद चढ़ाया था आपने मंदिर में..””
माँ ने नाक सिकोड़ चश्मा चढ़ाया ,” वाह बेटा अब तू हिसाब लगायेगा कि कब कब क्या क्या किया था, देख बेटा हिंदुत्व की रक्षा करनी है, मंदिरों में दान पुण्य तो करना ही पड़ेगा. ज्यादा बहस मत कर 1100  रुपये दे दे..”
“”तो बैठ के थोड़ी माला वाला जप लो माँ कुछ अच्छे कर्म कर लो, हिंदुत्व की रक्षा वैसे ही हो जायेगी ,,इस तरह मंदिरों में दान करती रही न तो एक दिन मुझे मंदिर के बाहर खड़ा होना पड़ेगा कटोरा लेकर..”
अम्माँ भी सुर खींचने लगी . ..” हाय.हाय इसी दिन के लिए तुझे ये घर सौंपा था, घर की सत्ता सौंपी थी कि तू मुझे ही शिक्षाएं दे ,हज़ार रुपल्ली के लिए मुझे दस बाते सुनाये, मुझसे ही जवाब तलब करे..”
माँ बोलती रही मैं बिना कुछ जवाब दिये बाहर निकल गया..बाहर माया बुआ खड़ी थी, वो भी बोली ..”आते समय कुछ फल मेवे और नमकीन लेते आना कल मंडल वाली मेरी सहेलियां आने वाली है. “
मैंने कंधे उचकाये , “आज मेरी एक जरूरी मीटिंग है मैं नहीं ला पाऊंगा ,आप उन्हें किसी और दिन बुला लेना,,””
“”अरे, किसी और दिन कैसे , मेरा नम्बर कल का ही है कल नहीं हो पाया तो मेरी फजीती हो जायेगी… तू कुछ भी कर मेरी सहेलियां कल ही आएंगी..””
“” तो खुद जाकर ले आओ जो चाहिए वो…””
मैं घर से निकल गया ,,पीछे बुआ की बड़बड़ चलती रही ,,
 उफ्फ.. घर हाथ में क्या लिया जैसे आफत मोल ले ली ,,सबको लग रहा है मेरे पास अलादीन का चिराग है जिसे घिसूंगा और मनचाहे काम करवा लूंगा.  .ऑफिस का व्यस्त दिन  मीटिंग्स,टार्गेट्स, प्रेजेंटेशन, विदेशी डेलिगेशन से मुलाकात,कल के काम की टेंशन और घर पे उठने वाली समस्याओं पर विचार करते मैं घर पहुँचा…
घर पे मीटिंग चल रही थी.. अम्माँ, बुआ,सुमि, बेटा ,पापा, भाई, अविनाश व उसकी बीबी सुगन्धा सभी सर जोड़े मंत्रणा में लगे थे ..मुझे देखकर मंत्रणा रुक गई. जूते खोलते हुए मैंने पूछा..””आज सब एक साथ एक जूट… किस बात को लेकर विचार विमर्श चल रहा है, कोई प्रोग्राम है क्या ?””
सुमि बोली  “आप ही को लेकर विचार विमर्श चल रहा है. आपको कुर्सी से हटाने का प्रोग्राम है.. आप घर चलाने और सम्हालने में असमर्थ साबित हो रहे हैं..”
अम्माँ बोली , “”और नहीं तो क्या , सत्ता हाथ में आते ही ये तो तानाशाह बनने लगा ,,हर छोटी छोटी बात के लिए इसका मुँह देखो..अरे इससे तो जब मेरे हाथ में घर था तब अच्छा था ..मजाल है किसी को किसी बात के लिए मन मारना पड़ा हो..इतनी अच्छी तरह से व्यवस्था सम्हाल रखी थी मैंने ..ये तेरी बीबी को ही लगी थी कि घर मेरे हाथ में हो मेरे हाथ में हो…और देख लो दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर ले गया कुर्सी…. मतलब रोटी. “”
सुमि ने विरोध किया, “”अम्माँ सारा दोष मुझे मत दो,आपकी तबीयत,हालत और उम्र रही क्या घर सम्हालने की..कभी घुटने में दर्द, कभी कमर में, कभी बी.पी.हाई, कभी शुगर हाई ..बताओ खुद को सम्हालती या घर..”
अम्माँ ने हाथ नचाये ,,  “उम्र की तो बात ही मत कर बहू, 80 –85साल तक यहां के लोग कुर्सियां सम्हाल लेते हैं, मैं तो अभी 65 की भी नहीं हुई हूँ ..फिर घर चलाना कौन इतना मुश्किल है.. मैं तो कहती हूँ अभी भी मुझे समर्थन दे दो फिर देखो इस घर का विकास..””
पापा बोले,  “तो मैं कौनसा अभी इतना बूढ़ा हो गया हूँ कि घर नहीं चला सकता .तुम सब मुझे समर्थन दो फिर देखो मैं कैसे घर को आगे लेकर जाता हूँ..”
अम्माँ ने बात काटी ,  “घर आगे नहीं पीछे जाएगा..सारे दिन दोस्तों के साथ गुलछर्रे उड़ायेंगे, हम घर में गुलाम बन के इनका हुकुम बजाते रहेंगे…क्यो माया बीबी आप क्या कहती हो..”
माया जीजी जो कब से अवसर की ताक में थी बोली,
” देखो,समर्थन तो हम तुम कहो जिसे दे देंगे मिल जुल कर एक हो जायेंगे पर बात ये है कि घर तो हम भी अच्छे से चला सकते हैं. तुमने देखा नहीं तुम्हारे जीजाजी का घर हम कितनी अच्छी तरह चलाये..भैंस की जगह घर में हाथी बंधवा दिया था कस्बे भर में हमारी कुशलता की चर्चा थी..”
सुगन्धा सुमि दोनोँ मुँह दबा कर हंसी,  ” हाँ बुआ ,ये और बात है कि वो हाथी पत्थर का था जिसे आप दुधारू भैंस के बदले खरीद लाई थीं…”
बुआ ने आँखे तरेरी, “चुप रहो दोनोँ ज्यादा खी खी करने की जरूरत नहीं. एक बार घर हमें चलाने दो फिर पता चलेगा कि हम कितनी होशियार हैं..”
बेटा बोला , “पर बुआ कुर्सी तो तभी मिलेगी न जब समर्थन मिलेगा मैं भी समर्थन तभी दूंगा जब मुझे घर सम्हालने दोगे. एक मौका मुझे भी दिया जाये..”
मैंने कहा,  ” वाह बेटा, ये मुँह और मसूर की दाल, पहले अपनी बाइक ढंग से चला ले जिसके पेट्रोल के पैसे मैं दे रहा हूँ फिर घर चलाना. दूसरों की कमाई पर घर  नहीं चलते..”
बेटा माँ की तरफ पलटा….””माँ !”
सुमि भड़की, ” आप तो चुप ही रहो,आपको कुर्सी सौंप कर तो हम उलझ कर रह गए हैं.. इस जी एस टी ने तो कबाड़ा कर दिया हमारा..”
मैं चकराया , “जी एस टी ! मैंने कौनसा जी एस टी लगाया तुम लोगों पर..उल्टा मैं तुम्हारे आये दिनों  के खर्चे रूपी टैक्स भर भर कर परेशान हूँ..”
सुमि ने मुँह बनाया , ” जी एस टी मतलब ‘गलती से टीका ‘ ये जो गलती से हमने तुम्हारा राज्याभिषेक कर दिया है न उस गलती की सजा भुगत रहे हैं.. और कौनसा टैक्स चुका रहे हैं आप ? ये तो घर की हमारी जरूरतें हैं और आपकी जिम्मेदारी जिसे पूरा करना आप का कर्तव्य है..”
बेटा बीच में कूदा ,” सही कह रही है मम्मा और आप ये
जिम्मेदारी नहीं सम्हाल पा रहे हैं तो घर मैं सम्हालूँगा .”
इतनी देर से चुप बैठी सुगन्धा बोली , “बेटा तुम न पहले छोटी छोटी जिम्मेदारियां उठाना सीखो फिर घर की जिम्मेदारी उठाना..ठीक है, तब तक ये काम मैं करूँगी..”
बेटे ने सीना फुलाया ,, “डोंट अंडर एस्टिमेट द पॉवर ऑफ द यंग बॉय ,”” आज का युवा जिम्मेदारी उठाने में सक्षम है, सचेत है, जागरूक है ,जाग चुका है…..”
उसका चाचा बीच में ही बोला , ” हां और अब वो मोबाइल उठायेगा और सोचेगा कि आज का 2 जी बी डेटा कैसे खर्च करूँ ..जा बेटा पहले तू मोबाइल उठा फिर घर की जिम्मेदारी उठाना तब तक घर मैं सम्हाल लूँगा .”
अम्माँ बोली , ” तू अपना ऑफिस और अपनी बीबी सम्हाल घर मैं सम्हालूँगी..”
बुआ बोली, ” भाभी आप खुद को सम्हालो घर मैं सम्हालूँगी “
पापा बोले ,”” तू अपना हाथी चला ,घर मैं चला लूंगा..”
सुमि बोली , “” पापा ,आप अपना क्लब और अपने दोस्त सम्हालिये, घर मैं देख लूंगी..”
बेटा बोला , “” मम्मा आप अपनी किट्टी, और टी वी सीरियल सम्हालिए घर मैं सम्हालूँगा..”
सुगन्धा आगे आई , ” बेटे जी आप अपनी बाइक और गर्ल फ्रेंड सम्हालिए घर मैं सम्हाल लूंगी..”
अब चिल्लपों मच गई मैं. मैं ..मैं ही बनूँगा घर का मुखिया , मैं ही बनूँगी घर की महारानी…. ‘सबका सपना पद हो अपना ‘  मैंने जोर से कहा , “जब आपका डिसाइड हो जाये, जब आप एकजुट हो जाये, गठजोड़ सही ढंग से जुड़ जाये, तब सोचेंगे.. फ़िलहाल तो घर मेरे ही पास रहेगा वो भी मेरे ही तरीके से ..और शायद अगले कई सालों तक भी …मैं गुनगुनाता चला अंदर…” यहाँ के हम सिकंदर चाहे तो रखे ..……””

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