रात का समय था, यही कोई नौ – साढ़े नौ का। यह कोई बहुत गहरी रात नहीं थी, कि सन्नाटा पसर जाए। पर इन दिनों रात तो क्या  दिन में भी सड़कों पर विरानगी छायी रहती है।
डिक्शनरी में रहे होंगे लेकिन लोक डाउन, क्वारंटिन, आइसोलेशन जैसे कुछ शब्द नये की तरह इन दिनों ज्यादा ही प्रचलित हैं।
वह अकेला था सड़क पर। रात थी लेकिन सड़क की बत्ती की रौशनी चारों ओर थी। रंग से सांवला और कद – काठी से दुबला और लगभग वजन शून्य वह ठीक से चल भी नहीं पा रहा था,  लगा कि शराब पीये घूम रहा है। फिर याद आया लॉक डाउन में सब बंद है। ठीक से न चल पाने का “शराबी” कारण पिघल कर बह चुका था।
कोशिश करके उसने खुद को मंदिर की तरफ धकेला। मंदिर के कपाट बंद है, आज से नहीं पिछले बीस दिन से बंद है। मंदिर की तरफ देखते वह कुछ देर खड़ा रहा। वह कुछ बुदबुदाया और आवाज को ‘पहुंच गई’ मानकर,  अपने को सम्हालते वह आगे बढ़ गया।
हमारे घर के सामने वह फिर रुका। ‘भूखा होगा बेचारा’ श्रीमती ने कहा और छत से नीचे उतरकर खाना निकालने चली गयी।
वह फिर आगे बढ़ गया।  सीढियां चढ़ते हुए तालाब तक पहुंच गया। चौरे पर बैठा, कुछ देर सोया भी। नीचे उतरकर दूसरे मंदिर की तरफ बढ़ गया। इस बार वह बुदबुदाया नहीं। आवाज भीतर ही टूट कर बिखर गई थी।
श्रीमती खाना लेकर आ गई थी और मैं खाना लिए खड़ा था। वह हमारे घर के सामने था। मैने आवाज लगाकर पूछा – खाना
खाओगे?
वह हमें देखता खड़ा रहा और  देखते देखते ही आगे निकल गया।
‘भूख लगी होगी तो वापिस आयेगा’,  हम दोनों ने सोचा और कुछ देर वहीं खड़े रहे।
उसे नहीं आना था, वह नहीं आया।
‘कहीं किनारे खड़ा होगा’  ऐसा विचार कर मैं थोडा आगे बढ़ा। आस पास वह कहीं नहीं दिखाई दिया।
वह भूखा तो था, पर शायद भोजन का नहीं,  किन्हीं अपनों के द्वारा छोड दिये जाने से उपजे निपट अकेलेपन का। रूम के भीतर आदमी को अकेला छोड़ देना ‘क्वारंटिन’ करना होता है। अपनों से मिले इस अकेलेपन के कारण  वह भीड़ भरी दुनिया में ‘क्वारंटिन’ था।
वह इस अकेलेपन के खत्म होने के इंतजार में सुनसान सड़क पर भटक रहा था। वह रिंग रोड तक पहुंच चुका था। वह जहां खड़ा था, वहां एक द्वार बना हुआ था,  जिस पर लिखा था –
“ममतामयी मां दंतेश्वरी आपकी मनोकामना पूर्ण करें।”

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.