Monday, June 17, 2024
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सीता रामम : बहुत अरसे बाद प्रेम ने श्रद्धा का शिखर छुआ है, जिसका समर्पण देख पत्थर हृदय भी द्रवित हो जाए

अरसे बाद एक ऐसी फ़िल्म देखी जिसे देखते हुए पूरे समय होंठो पर एक प्यारी मुस्कुराहट, आंखों में नमी और धड़कता दिल, अब क्या होगा, कौन है, और हर बीस मिनट बाद आश्चर्य से खुलता मूंह, और अंत में एक सिसकी, लेकिन उस सिसकी में भी एक बहता हुआ सा सुख है, दुःख है भी, लेकिन नायिका का समर्पण देख, नायक की अच्छाई देख मन दोनों के प्यार के लिए श्रद्धा से भर जाता है, और भर जाता है मन किसी भीनी सी सुगंध से, मदिर मदिर बहता प्रेम, जो नहीं होकर भी इतना प्रत्यक्ष है कि अभी छू लें, बस भाव ही तो चाहिए किसी को अनुभूत करने में, उसकी अनुपस्थिति उपस्थिति से अधिक जीवंत है, वह है, साथ है।
इधर बहुत अरसे बाद प्रेम को का देहातीत रूप, प्लूटोनिक लव देखने को मिला, इधर बहुत अरसे बाद प्रेम ने श्रद्धा का शिखर छुआ है, जिसका समर्पण देख पत्थर हृदय भी द्रवित हो जाए।
देह के विमर्शों ने देह और प्रेम को एक मान लिया  था , उस विचार से  एक झटके में दूर करती प्रेम कहानी, हौले से कहती है, केवल देह ही प्रेम नहीं है।
धीरे से कान में फुसफुसाती है, मदिर मदिर बहती गंध है प्रेम दो इंसानों के बीच, नर मादा के बीच बहता  वासना की दुर्गंध से भरा गन्दा नाला प्रेम नहीं होता। नायक नायिका दोनों इतने प्यारे मासूम कि लगे बस देखते ही जाएं ।

मासूम हरकतें, अजीब हालातों में जागा प्रेम, अनजानी शरारती चुहल, काश्मीर से हैदराबाद का रहस्य, लंदन में पाकिस्तान की लड़की उसकी भारत यात्रा और एक के बाद एक खुलते रहस्य ।
काश्मीर है, पाकिस्तान है, आतंकवाद है, हिंदू मुस्लिम है, सेना है ।
लेकिन इन सबसे ऊपर सबमें मुनष्य हैं, अच्छे बुरे, बुरे भी ऐसे नहीं कि अपनी गलती न देख सकें, कुंठित हो और हिंसक हो जाएं, परिस्थितियों के बीच भी मानवता को बचाता सेना अधिकारी है, कोई अच्छा, कोई थोड़ा बुरा, लेकिन सब इंसान हैं और अपने किए पर उन्हें अपराध बोध भी होता है, स्वार्थ है, ईर्ष्या है, अहंकार है, झूठ है, लेकिन इन सबसे ऊपर प्रेम है, प्रेम देश के लिए, प्रेम मनुष्यता के लिए, प्रेम अपने लिए, धर्म जाति से परे अच्छाई बुराई का चित्रण है, विट्टी संवाद हैं, उद्देश्यपूर्ण हास्य है, मासूमियत है, सुन्दर प्रतीक हैं, और हां खूबसूरत वेशभूषा है।
हर इंसान अपने और बेहतर होने की तलाश में है, सुमधुर गीत हैं, सुन्दर छायांकन है, नायिका के सच से अंजान भोला नायक, नायिका भी भोली है, मजबूर है लेकिन मजबूत है ।
नायक भी कमज़ोर कहां, जो सदा दूसरों के लिए अपना आप न्यौछावर कर दे वह कमज़ोर कैसे हुआ!
नायक नायिका का अटूट, निश्चल प्रेम है, देश के लिए सबकुछ न्यौछावर करने का जज़्बा है, परिस्थितिजन्य त्रासदी है, किंतु उस त्रासदी में रूदन नहीं है, उस पीड़ा में कुंठा नहीं है, दुःख जमी हुई बर्फ सा है, जिसे आत्मा के ताप से पिघला दें तो शीतल जल मिलता है, नायिका अपनी यादों के अलाव से पिघलाती रहती है दुःख और पाती रहती है शीतलता, मानों वह दुःख ही अब औषधी हो चला हो। उस अलाव का प्रचुर ईंधन है उसके पास।नायक के पास भी यादों का अलाव है, जिसे सुलगाए रखता है वो और पाता है गर्माहट, जो उसे ज़िंदा रख सके।
प्रेम अपने शिखर पर उत्सव हो जाता है, पूजा हो जाता है, समाधि हो जाता है। यहां वही हुआ है, जिसकी उच्चता के साक्षी बहुत से लोग हैं, लेकिन असहाय हैं।
साथी साथ हो या नहीं, वह सदा साथ होता है, उसके साथ बिताए पलों की याद में उसी तरह जीता है कोई, जैसा उसके साथ होनेपर जीता।

खुलते रहस्य हैं, बढ़ती बैचैनी है, एक कसक सी, एक कांटा सा चुभा रहता है, रिसता है अंत तक, और अंत में एक ठंडी सांस, जैसे दर्शक भी असहाय है और अपनी असहायता से व्यथित भी, ये नहीं होना था का भाव गहरा जाता है।
लेकिन अजीब बात फ़िल्म आपको समृद्ध करती है, आप भरे भरे से लगते हैं, अच्छाई सच्चाई पर आपका भरोसा मजबूत होता है ।
अच्छाई सबकुछ खोकर भी संपन्नता की अनुभूति देती है, और बुराई सबकुछ पाकर भी विपन्नता से मुक्त नहीं होती।
कभी असली चंदन मला है आपने हथेलियों पर, हाथ पर मले चंदन की देर तक ठहरने वाली महक है यह फ़िल्म, अगरबत्ती की तरह, धूप की तरह धीरे धीरे पूरे वातावरण को महकाने वाली कहानी, आखिर में मन में एक बात आई, प्रेम अपने पीछे यह मदिर गंध  ही तो छोड़ जाता है, जिसे याद करते ही महक उठे हरसिंगार या गमक उठे मोगरा या कि छलक जाए चांदनी, या कि बरस पड़े बादल मिट्टी पर, या बजने लगे मन का सितार, कि नाचने लगे पूरी कायनात, कि जैसे लहरों का संगीत, कि जैसे बर्फ में इंद्रधनुष, कि जैसे रेगिस्तान में तितलियां, बस यही तो प्रेम है जो याद आने मात्र से महका दे पूरा वजूद। प्रेम अपने पीछे साहस, संतुष्टि, सार्थकता, स्थिरता, संतोष छोड़ जाता है।
कहा है ना किसी ने प्यार इंसान को बहुत अच्छा बना देता है, बस यही…हां, वासना अपने पीछे कुंठा, अवसाद, अधीरता, अपराध बोध, हिंसा छोड़ जाती है, अब तय करना है कि बेशर्म रंग या अश्लीलता, कुंठाओ पर अपना समय बर्बाद करना है कि सीता रामम जैसी एक खूबसूरत फ़िल्म पर बात करनी है ।
Choice is yours…
कुछ भला भला सा, भोला भोला सा, प्यारा प्यारा सा देखना हो तो यह देखिए, पूरी फ़िल्म में नायक नायिका की मासूम मुस्कुराहट देर तक आपके जेहन में न ठहरी रहे तो कहियेगा।
बॉलीवुड कुछ सीखो कंटेंट क्या होता है, कब तक घिसी पिटी कहानियों और देह के माध्यम से चलोगे…
शायद
दिशा दक्षिण से ही मिलेगी…!
डॉ. गरिमा संजय दुबे
डॉ. गरिमा संजय दुबे
सहायक प्राध्यापक , अंग्रेजी साहित्य , बचपन से पठन पाठन , लेखन में रूचि , गत 8 वर्षों से लेखन में सक्रीय , कई कहानियाँ , व्यंग्य , कवितायें व लघुकथा , समसामयिक लेख , समीक्षा नईदुनिया, जागरण , पत्रिका , हरिभूमि , दैनिक भास्कर , फेमिना , अहा ज़िन्दगी, आदि पात्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। संपर्क - garima.dubey108@gmail.com
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