उक्त-अनुक्त (सॉनेट)
ऊहूँ,न,नहीं व्यक्त करूँगी अपनी परिधि
ऊहूँ… न.. नहीं आऊँगी संग तुम्हारे,देने
तुच्छ कामनाओं को…पूर्णता व प्रविधि
अर्थहीन संभावनाओं का अपराध लेने।
तुम हो एकांत द्वीप के अहंमन्य सम्राट
हाँ..तुम्हारी कल्पना से जो गंध आती है
उससे मैं होती हूँ रुद्ध..रुद्ध होता कपाट
अनुक्त शब्दों में…व्यथा भी भर जाती है।
मैं नहीं होती तुम्हारे प्रश्न वाण से क्षताक्त
अट्टहास तुम्हारा जब गूँजता है नभ पर
हृदय उतनी ही घृणा से होता है विषाक्त
ध्वस्त करती हूँ इस ग्रह का मिथ्या गह्वर।
आः!!! अब सर्वांग मेरा हो रहा अग्निमय
उः!!! शेष हो कराल नृत्य..अंतिम प्रलय।
मृत्यु कलिका (सॉनेट)
मैं अर्ध रात्रि की मौनता में रुदन करती हूँ
ऊषा की कोमल किरणों में अश्रु भरती हूँ
सिराओं को दैहिक उत्ताप से कर वाष्पित
विस्मृत करती हूँ अनेक शब्द अपरिचित।
सरिसृप सा जीवन चलता रहा मंदर पर्यंत
रौद्र में जर्जर..श्रावण में बहा नीर अत्यंत
अस्त होता रहा नित्य परिवाद में वह स्वप्न
जो दृगंबु में झर गया, शेष था प्रथित प्रश्न।
निरुत्तर समाधि के पुष्प भी युगों से नीरव
कौन कहेगा कथा इनकी..क्या था जनरव
मैं भी मौन हो जाऊँगी..मौन होगा विषाद
कल न होगा ऐ,मृत्यु कलिका! यह दुर्वाद।
आ,लेकर आ! मृत्यु कलिका संध्या प्रदीप
तू भी रहेगी शृंगार में..मैं भी रहूँगी समीप ।

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