शालू बाई रोटी बना रही थी । दरवाज़े पर आवाज़ आयी “नीता क्या कर रही हो “
“लो अम्मा जी फिर आ गईं एक नई कहानी के साथ ।” शालू हंसते हुए बोली ।
नीता ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा ,” आओ अम्मा जी कैसे हो । “
“ वही ढाक के तीन पात ।” अम्मा ने रुआसे होते हुए कहा ।
“ तुम सुखी हो नीत अभी तुम्हारी बहू नहीं आयी । बेटे पलट जाते हैं । बहू का राज चलता है । माँ में दोष नज़र आने लगते हैं । अपने मुँह और इच्छाओं को ताला लगा लो सो अच्छा ।”
“ क्या हुआ अम्मा जी ?आज तो आप कुछ ज़्यादा ही उदास लग रही हैं ।”
“ अब तो उदास रहने की आदत सी हो गई है नीता ।कोई बात करने वाला नहीं । हँसाना हँसना सब भूल गई हूँ ।”
“ आप कोई किट्टी जॉइन कर लो ।”
“ किस मुँह से कहूँ । अब मेरे बेटे की नहीं बहू के पति की कमाई पर जो पल रही हूँ ।”
“ दिल छोटा ना करो , ईश्वर सब ठीक करेंगे ।”
“हाँ ! अब तो उसका ही सहारा है । कुछ देर मंदिर हो आती हूँ तो अच्छा लगता है । वैसे तो मुझे घर में रख रहे हैं यही बड़ी बात है । मेरे स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं। आजकल के बच्चे तो सीधा वृद्धाश्रम का रास्ता दिखा देते हैं।”
“आपने सुबह से कुछ खाया कि नहीं ।” नीता अनायास ही पूछ बैठी। उनकी आँखों में पानी भर आया । धीरे से बोलीं।
“आज घर में डोसा सांभर बना था । बहू ने उबली सब्ज़ी मेरे सामने रखते हुए कहा आपको शूगर है आप तला वाला नहीं खा सकतीं । बेटे ने भी हाँ में हाँ मिलाई । मेरे सामने बैठ कर मजे लेकर खाते रहे । मैंने सब्ज़ी का कटोरा यह कह कर सरका दिया कि मुझे भूख नहीं है और यहाँ चली आयी ।”
“अरे ! शालू वो डोसा मिक्स पड़ा है ना । जल्दी से दो डोसा और चटनी बना ला । सुनकर तो मेरा भी मन डोसा खाने को हो आया ।”
“जी भाभी, अभी बनाती हूँ ।” कहकर कुछ ही समय में शालू डोसा चटनी , दाल लेकर हाज़िर हो गई ।
“गरमा गरम डोस खाओ अम्मा जी और शूगर भूल जाओ । एक डोसा खाने से कुछ नहीं होगा ।” अम्मा जी की आँखों में फिर आंसू थे पर यह दुख के नहीं थे स्नेह भरे आशीर्वाद के आंसू ।

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