“नींद एक बिल्ली की तरह है, यह आपको तभी आती है जब आप इसे अनदेखा करते हैं।“——गिलियन फ्लिन
उस रात मैं बहुत थककर सोया था। मन प्राण लगाकर, अपनी सारी इंद्रियों को एकाग्र कर, जब किसी काम में यूँ खो जाओ कि देह के भीतर बाहर का फ़र्क़ ख़त्म हो जाए तो ऐसे काम के संपूर्णता तक पहुँच पाने की निश्चिंतता से ओतप्रोत सुख ऐसा ही होता होगा कि पड़ते ही आँख लग जाए और नींद को लाइट ऑफ कर देने की प्रतीक्षा भी नागवार गुज़रे।
इधर पिछले कुछ दिन या कहिये पिछले कुछ महीने, एक विचित्र सी बेचैनी के लिबास में लिपटे हुए यूँ बीते थे कि दिन और रात के बीच की अंतररेखा क्षीण से क्षीणतम होती गई थी। और आज ये उस बेचैनी के सिरे लगने का अवसर था। मेरी दिन रात की सतत व्यस्तता और श्रम का प्रतिफल अब मेरी मेज पर मेरे सामने था। उसी श्रम के बिछौने पर आज मेरी नींद का शिशु सुधीहीन सोया पड़ा था।
उस रोज मैं शाम से ही अपने काम में बेतरह उलझा हुआ था। यूँ भी जब मंजिल नज़दीक हो तो इंसान की गति और जुनून दोनों चरम पर पहुँच जाते हैं, बस मेरी भी कुछ ऐसी ही मनोस्थिति थी। इसलिये पता ही नहीं चला कि शाम का सुरमई रंग कब रात का अंधेरे में बदल गया। पक्षियों के घर लौटने का समय कब का बीत चुका था। उनकी चहचहाहट और चिरौटों की खुशियों भरी चीखें अब शांत हो चली थी। उनमें से कोई राहभूला परिंदा घबराकर किसी को पुकार उठता तो उसकी पुकार उस वातावरण में किसी अलार्म की भांति गूंज उठती थी।
हरियाली के बीचोंबीच बने इस दोमंजिला घर के आसपास बसे वृक्ष भी थककर सो चुके थे। चाँद दुनिया की रखवाली से बेजार हो आगे बढ़ने की तैयारी में था। रात का अंधेरा पूरे वातावरण को अपने आगोश में ले चुका था। दूसरी मंजिल पर बने इस कमरे में अपनी राइटिंग टेबल पर बैठा मैं कुछ ठिठक गया था क्योंकि मैं अंतिम पँक्ति पर अटका हुआ था। अंत तो मैं तय कर चुका था पर क्या लिखूँ, कुछ सूझ नहीं रहा था।
कुछ थमकर एक साँस ली तो मैंने गौर किया कि वह थकान जिसे मैंने करीब आने का कोई अवसर नहीं दिया था, मौका पाकर मुझ पर बेतरह हावी हो चुकी थी पर मैं था कि दो घण्टे से लगातार लिखे जा रहा था। मेरा जुनून मुझ से जो कराए कम है। इन तमाम पिछले दिनों में मेरी पलकों और विचारों के बीच एक रस्साकशी चल रही थी। तो आज पलकें विचारों से अधिक भारी हो चली थीं।
मैंने पेन एक ओर रखकर अंगड़ाई ली तो मेरे उलझे दिमाग और थके हुए जिस्म ने आराम की मांग की जिसे मैं अब और अनसुना नहीं कर सका और बिस्तर पर लुढ़क कर जल्दी ही नींद में खो गया।
मुझे सोये हुए शायद दो घण्टे बीत चुके होंगे कि करवट लेने के दौरान एकाएक मुझे लगा जैसे कोई मुझे घूर रहा है।
मैंने घबराकर अपनी आँखें खोल दीं। सचमुच दो लाल अंगारों की सी आँखें मुझे गुस्से से घूर रही रही थी।
“कौन हो तुम?” कहते हुए मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा।
यूँ आधी रात के बाद मेरे बन्द कमरे में कोई कैसे आ सकता है। मेरी नज़र दरवाजे पर गई तो मैंने देखा दरवाज़ा अब भी यथावत यानी बन्द था। अलबत्ता खिड़की जरूर ठंडी हवा के लिये खुली थी। पर खिड़की से कोई कैसे आ सकता है? वह भी कोई जीता जागता व्यक्ति! मेरा डर, घबराहट और मेरी हैरानी अपने चरम पर थी।
मेरी घबराहट और इस सवाल पर वह मुस्कुराया और इस मुस्कराहट ने उसके चेहरे पर बिछी क्रोध की चादर में मानो एक सुराख कर दिया। एक बात जो मैंने नोट की वह यह कि ये मुस्कराहट सामान्य नहीं थी। इस में सम्मिलित विद्रूपता का भाव मेरे मन में अनचीन्हा सा डर उत्पन्न करने में पूरी तरह कामयाब था, शायद यही उसकी भी मंशा रही होगी।
“मैंने पूछा कौन हो तुम और यहाँ कैसे घुस आये?“
अपने डर को साहस के पर्दे में ढकते हुए मैंने इस बार भरसक प्रयत्न किया कि मेरी वाणी में दृढ़ता परिलक्षित हो, कंपकंपी नहीं जो इस समय मेरे वजूद पर तारी हो रही थी।
“आप मुझे नहीं जानते?” इस प्रतिप्रश्न के साथ उसके अट्टहास ने कमरे की शांति को तहस-नहस कर दिया और इस बार मैं पूरी तरह हिल गया था। साहस का पर्दा जैसे लीर-लीर हो गया था। मुझे अपनी रीढ़ में सिहरन होती महसूस हुई।
“गौर से देखिये मुझे और कहिये कि आप मुझे नहीं जानते!” मेरे बेहद करीब आकर एक-एक शब्द को चबाते हुए उसने कहा। उसके होंठ उसकी आँखों से विरोधाभास की दिशा में जाकर मुस्कुराये।
मैंने डरते हुए उसकी ओर तनिक ध्यान से देखा। नींद के कारण मिचमिचाती मेरी आँखें अब सजग हो चुकी थीं।
मेरा मस्तिष्क इस समय दो हिस्सों में बँट चुका था। एक हिस्सा कहता था वह मेरे लिए बहुत जाना पहचाना है। इतना अधिक जाना पहचाना जितना कि मैं स्वयं किन्तु मेरे मस्तिष्क का दूसरा हिस्सा कहता था, मैं उसे पहली बार देख रहा था।
भला यह दोनों बातें कैसे संभव हैं? वह भी एक साथ? पर यह सच था कि स्मृति पर खूब जोर देने के बाद भी मैं ऐसी कोई याद नहीं ढूँढ पा रहा था जो इस बात की तस्दीक करे कि मैं इस आदमी से पहले कभी मिला था। तो मैं रात्रि के इस दूसरे पहर इस विचित्र से सवाल से जूझ रहा था कि इतना जाना पहचाना लगने वाला वह अजनबी दरअसल था कौन?
“पहचान लिया न?” कमरे का एक चक्कर लगाकर उसने समीप आकर फिर अपने उसी सवाल को मेरी ओर उछाल दिया।
“नहीं… न तो मैं तुम्हें जानता हूँ और न ही तुमसे कभी मिला हूँ?”
“पक्का?”
“हाँ भाई…एकदम पक्का!” मैंने झुंझलाते हुए दोहराया और सवाल का मुँह उसकी ओर मोड़ दिया।
“चलो अब तुम्हीं बता दो कि तुम आखिर हो कौन?”
“मेरा नाम सुरंजय है… सु रं ज य माधव… मेरी उम्र अठ्ठाइस साल है… और… मैं मुंबई में रहता हूँ। इतना परिचय तो काफ़ी होगा लेखक महोदय!!” उसने मुस्कान ओढ़ते हुए कहा। वही विद्रूपता भरी मुस्कान जो कुछ देर पहले उसके चेहरे पर रेंग रही थी।
मुझे जैसे कई बिच्छुओं ने एक साथ डंक मारा।
“सुरंजय माधव?? क्या बकवास कर रहे हो तुम… तुम… तुम भला सुरंजय कैसे हो सकते हो? सुरंजय तो…”
विस्फारित नेत्रों से उसे घूरते हुए मैंने थूक निगलते हुए मुश्किल से अपनी बात पूरी की।
“लीजिये पानी पीजिये… आपका गला सूख गया है लेखक महोदय…”
उसने टेबल पर रखे पानी के गिलास से कोस्टर हटाते हुए मुझे थमाया तो मैं एक झटके में गिलास गले से उतार गया। सचमुच विस्मय के सैंकड़ों काँटों से बिंधा मेरा गला सूख गया था। मेरी कनपटियों से पसीना चूते हुए मेरे गले पर टपक गया था, मैंने अपने नाईट सूट की आस्तीन से पसीना पोंछते हुए, फिर से दोहराया…
“तुम… सुरंजय… कैसे…?
उसने फिर अट्टहास लगाया। वह झुका और पुनः मेरे समीप आकर मेरी आँखों में झाँकने लगा। इतना समीप कि मेरी आँखों को उसकी गहरी भूरी आँखों के अतिरिक्त कुछ और दिखाई नहीं पड़ रहा था।
“ग़ौर से देखिये मुझे…” किसी विषैले सर्प की सी फुसफुसाहट भरी आवाज़ में वह फुसफुसाया।
वह सचमुच सुरंजय ही था… सुरंजय माधव… वही लंबा कद, घुंघराले बाल, जैतूनी रंगत, निकोटिन की परत से गहराये होंठ और शराब के सुरूर में पगी भूरी आँखें जिनमें उसके व्यक्तित्व की दुष्टता की छाया स्थायी रूप से जगह बना चुकी थी। मैं आपको बता दूँ कि सुरंजय माधव मेरे लिखे जा रहे उपन्यास का एक किरदार था। एक नकारात्मक किरदार। यह उपन्यास मैं पिछले दो साल से लिख रहा था और आज रात मैं इसके अंतिम अध्याय को अधूरा छोड़कर सो गया था, शायद कोई सटीक पँक्ति मिल गई होती तो पूरा हो गया होता। पर इतनी रात को मेरे उपन्यास से निकलकर सुरंजय मेरे सामने किस उद्देश्य से आ खड़ा हुआ था?
इस पूरी दुनिया में मैं अकेला वह इंसान था जो जानता था कि वह कितना दुष्ट था क्योंकि मैं स्वयं उसका रचयिता था। मैं उसकी दुष्टता की सीमा से भी वाकिफ़ था इसलिये अब मेरे डर ने स्थायी रूप से मुझे अपनी गिरफ्त में ले लिया था।
“क्या चाहते हो तुम मुझसे? मैंने स्वर को यथासंभव दृढ़ और कटु बनाते हुए उससे पूछा।
“मैं क्या चाहता हूँ? क्या इसकी कोई गुंजाइश आपने छोड़ी है? आपने मुझे पूरी तरह बर्बाद कर दिया।“
“मैंने? वो… वो… कैसे?
“क्या आप नहीं जानते?“
“नहीं!“
“आप ही ने मुझे गढ़ा है।“
“तो?“
“तो मेरे हर अच्छे बुरे कृत्य के जिम्मेदार भी आप ही हो।“
“क्यों?“
“क्योंकि लेखक भी किसी छोटे मोटे ईश्वर से कम नहीं होता लेखक जी। जैसे ईश्वर अपने पात्रों को गढ़ता है, उनके कर्मों को निर्धारित करता है, ऐसे ही तुमने मुझे गढ़ा और मेरे खाते में तमाम कुकर्म भी जोड़ दिये।“
“मैं किसी ईश्वर को नहीं जानता या मानता!“
“जाने दीजिये ईश्वर को, नियति ही सही किंतु मेरे जन्म, कृत्यों, प्रारब्ध और अंत के उत्तरदायी तो आप ही हैं। है न लेखक महोदय?“
“हाँ हूँ! तो?” ईश्वर के समकक्ष रखे जाने की बात ने मुझे किंचित साहस से भर दिया था। मैं भूल गया था कि सुरंजय मेरे समक्ष किन तेवरों के साथ प्रकट हुआ था।
“तो भला ये बुरा अंत मैं अकेले क्यों भोगूँ?” वह कुटिलता भरी हँसी हँसा। रात के उस पहर में उस अँधेरे माहौल में उसकी हँसी की गूंज से मैं सिहर उठा पर अपनी कमजोरी मैं उसके सामने प्रदर्शित करने से बच रहा था। यूँ भी उसके इरादे मुझे कुछ नेक नहीं लग रहे थे।
वैसे सच तो ये था कि मैं उसकी बात को कुछ कुछ समझ रहा था। मैं उसकी शिकायत से इतना भी अनभिज्ञ नहीं था जितना मैं जता रहा था क्योंकि उसके भूत, वर्तमान और भविष्य का जिम्मेदार सचमुच मैं ही था, यदि वह साक्षात् मेरे उपन्यास का पात्र सुरंजन था जैसा कि उसने अभी दावा किया था।
“मैंने तुम्हें कैसे बर्बाद किया?” सब जानते बूझते हुए भी मैं यह निरुद्देश्य प्रश्न उसकी ओर उछाल कर बात को उसी बिंदु पर ले गया, जहाँ बात कुछ समय पूर्व थी क्योंकि मैं अभी तक इस असमंजस से उभर नहीं पाया था जो इस स्थिति यानी मेरे पात्र के अकस्मात प्रकटन से उपजा था।
“ठीक वैसे ही जैसे आपने अविरल और मीमांसा को आबाद कर दिया। वे दोनों प्रेमी हैं और मैं केवल उनके रास्ते का रोड़ा! क्यों लेखक जी, मैं भी तो मीमांसा से प्रेम करता हूँ तब मैं खलनायक क्यों?“
“क्योंकि मीमांसा तुमसे नहीं अविरल से प्रेम करती है।“
“क्योंकि आपने ऐसा लिखा। आपके पात्र आपकी कलम के ग़ुलाम हैं। कठपुतलियों की भाँति वे आपके द्वारा चयनित या रचित जीवन जीते हैं। आपने चाहा इसलिये अविरल का प्रेम, प्रेम है और मेरा प्रेम वासना? क्यों भला? ये आपकी करतूत है कि आपने मुझे बुरा और खलनायक बना दिया।“
“वो तो तुम हो ही।” मैंने निगाहें चुराते हुए कहा। अगले पल कनखियों से देखा तो मुझे उसकी शोला उगलती आँखों में नमी महसूस हुई। क्या वह मीमांसा को खो देने की पीड़ा थी? या कि उसके व्यक्तित्व को बुराई का पर्याय बना देने के प्रति उसके मन का हाहाकार।
अविरल और मीमांसा मेरे उपन्यास के नायक नायिका थे। हर नायक की तरह सारी अच्छाइयों से भरे आदर्श व्यक्तित्व, जबकि इसके ठीक उलट दुनिया भर की तमाम नकारात्मकता को जुटाकर मैंने सुरंजन का किरदार गढ़ा था।
मैं भी क्या करता, यही दस्तूर है। नायक अच्छाई के उच्चतम शिखर पर स्थित एक महामानव होता है और खलनायक बुराइयों का पतित पुतला। ऐसे ही कहानियाँ गढ़ते हुए हम नायक को अधिक अच्छा और खलनायक को बुराई के चरम पर पहुँचाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री करते हैं। पर इस नजरिए से तो कभी सोचा ही नहीं था कि किसी भी नायक की अच्छाइयाँ अलक्षित और छुपी हुई रह जाएं यदि खलनायक की बुराइयों के अंधेरा न हो जिनमें जुगनू की भांति चमक उठता है नायक का किरदार।
पर आज वो हुआ जो इससे पूर्व किसी लेखक के साथ न हुआ होगा कि जिसे मैंने गढ़ा था, आज वही खलनायक मेरे समक्ष खड़ा अपने नहीं मेरे कर्मों का हिसाब मांग रहा था।
“मैं अगर दुष्ट हूँ, बुरा हूँ, खलनायक हूँ तो इसके जिम्मेदार केवल और केवल आप हैं।“
“पर ऐसा ही होता आया है सुरंजय।“
“क्या होता आया है लेखक महोदय? यही न कि नायक सरल है, बहादुर है, नीतिसम्मत है और न्याय की मूर्ति है जबकि खलनायक स्वार्थी है, दुष्ट है, क्रूर, अहंकारी, चालाक, अन्यायपूर्ण और अनैतिक है!! मैं पूछता हूँ तमाम खलनायकों की ओर से कि ये सब चारित्रिक विशेषताएँ तो कम या अधिक मात्रा में हर व्यक्ति में पायी जाती हैं। तब चरित्र गढ़ते हुए उसके अतिरेक का शिकार क्यों हो जाते हैं पात्र? क्या कोई पात्र अधिक अच्छा और कम बुरे या अधिक बुरा और कम अच्छे के अनुपात से नहीं गढ़ा जा सकता?” सुरंजन के शब्दों से टपकता रोष मुझे ग्लानि से भर दे इससे पहले ही मैंने उसे टोक दिया।
“पर तुम समझते क्यों नहीं कि कहानी की मांग के हिसाब से गढ़े जाते हैं पात्र।“
“और क्या है आपके उपन्यास की कहानी की मांग कि अविरल को मीमांसा मिले और सुरंजय को बदनामियों के अंधेरे जबकि दोनों मीमांसा से उतना ही प्रेम करते हैं।“
“पर मीमांसा तो किसी एक को ही चाह सकती है सुरंजय…“
“और वह व्यक्ति अविरल है…क्यों लेखक जी?“
“हाँ!“
“क्योंकि मीमांसा सुरंजय को आपकी दी गई दृष्टि से देखती है, आपकी समझ से समझती है और आपकी कसौटी पर परखती है। एक बार आप उसे मुक्त करते अपने इस पूर्वाग्रहपूर्ण व्यवहार से तो आज अविरल की जगह मैं होता क्योंकि मैं उसे अविरल से भी अधिक प्रेम करता हूँ। किंतु आपने तो अविरल को उठाने के लिये मुझे हर दृष्टि में निकृष्ट बना दिया। जानते हैं आप लेखक जी, आपके ये नायक बल्कि दुनिया भर के नायक, जो भी, जितना भी हासिल करते हैं न, हमारी विफलता की कीमत पर हासिल करते हैं क्योंकि इनकी हर कामयाबी की नींव में हमारी इच्छाएँ, उम्मीदें और सपने दबे होते हैं। एक खलनायक के चरित्र के मृत शरीर पर हर नायक अपनी आदर्श दुनिया बसाता है।“
एक ही साँस में वह लगतार बोलता चला गया। उसके शब्द मानों उसकी जिह्वा के अग्रभाग पर बैठे थे और उसके रोष के वाणों पर सवार होकर मेरी दिशा में बढ़ते चले आ रहे थे।
उसके स्वर में कटुता और कलुष्य से अधिक अब पीड़ा का अनुभव हो रहा था मुझे। जिस ग्लानि से मैं बचना चाह रहा था मैं उसमें आधा डूब चुका था। पूरा न डूब जाऊँ इसके लिये मैंने अपनी गर्दन को एक जुम्बिश दी और झटक दी सुरंजय की तमाम शिकायतें।
“देखो सुरंजय, मेरी बात को समझने की कोशिश करो। वैसे भी मैं अब कुछ नहीं कर सकता। कर सकता तो अवश्य करता।“
“आप कर सकते हैं?“
“क्या?“
“बदल दीजिये मेरा जीवन।“
“क्या बदल दूँ? तुम्हारा तात्पर्य क्या है?
“यही कि मीमांसा को मेरी ज़िंदगी में लौटा लाइये। केवल मीमांसा ही नहीं मेरी खोई हुई प्रतिष्ठा भी आपको लौटानी होगी। किसी भी व्यक्ति को अपनी ग़लतियों को सुधारने का मौका तो कानून भी देता है। पात्र यदि मनमानी करे तो आप एडिटिंग की कैंची से उसे उसकी राह दिखाते हैं किंतु एक लेखक के पात्र यदि उसकी मनमानी का शिकार हो जाए तो उनकी सुनवाई किस अदालत में होगी? मैं आज आपके इस अन्याय का हिसाब मांगने आया हूँ। जैसे इतिहास विजेताओं का लिखा जाता है वैसे ही कहानी भी केवल नायकों की लिखी जाती है। लेकिन यूँ दुनिया भर की दृष्टि में गिरकर मैं नहीं रह सकता। ये अपमान, ये ताड़ना और बुराई आपके अन्याय का दुष्परिणाम है लेखक जी। मेरे जीवन में जो गरल आपने भर दिया है, उसे आप ही समेट सकते हैं।”
उसकी आवाज़ मानो दर्द का एक समंदर बन गई थी जिसकी लहरें मुझे करुणा के असीम सागर में डूबने पर मजबूर कर रही थीं। उसकी आवाज़ में भरे दर्द से मेरा हृदय कांपकर द्रवित होने ही वाला था कि मुझे ख़याल आया कि मेरा एक भी कमजोर कदम मेरी वर्षों की मेहनत पर पानी फेर सकता है। मैंने अपने तरल मन को समेटा और फिर एक कोशिश की।
“पर मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ सुरंजय?” परेशान होकर मैंने कहा।
“बिलकुल कर सकते हैं आप। मैं बताता हूँ। पहले तो पहले अध्याय पर लौटिये जहाँ आपने मुझे बचपन से जिद्दी और क्रोधी दिखाया है। मेरे इस एंग्री फ़ॉर नो रीजन किरदार को बदल दीजिये।“
उफ्फ! ये तो मेरे पीछे ही पड़ गया था। मैं झुंझला उठा।
“फिर?“
“फिर जाइये तीसरे अध्याय में जहाँ आपने मुझे बुरी संगत में शराबी बना दिया। फिर पाँचवे में जहाँ आपने मीमांसा के सामने मुझे खलनायक और अविरल को नायक बना दिया। फिर छठे और सातवें में जहाँ आपने मुझे साजिशों में लिप्त करते हुए निकृष्ट और निकृष्ट बनने की ओर बढ़ाया। फिर दसवें में जहाँ आपने मुझे शराबी, आवारा, दुष्ट और षड्यंत्रकारी बनाकर मेरे अपनों की दृष्टि में भी गिरा दिया। मेरे लिये सब रास्ते बंद कर दिये।“
“नहीं!! मैं ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता। सुन रहे हो तुम!!“
“आप कर सकते हैं। बल्कि आप ही कर सकते हैं।“
“नहीं! अब कुछ नहीं हो सकता। मेरा उपन्यास बर्बाद हो जाएगा। मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाला! क्यों मेरी वर्षों की मेहनत को मिट्टी में मिला देना चाहते हो तुम?“
“आपकी दो वर्षों की मेहनत और मेरा पूरा जीवन? उसका क्या लेखक महोदय?” फिर से पत्थर को मोम बना देने लायक मार्मिक और भीगे हुए स्वर में उसने गुहार लगाई।
“देखो सुरंजय, तुम केवल एक पात्र हो। तुम्हारे जीवन का अलग से कोई महत्व नहीं।” मैं सचमुच भीग गया था पर मैंने फिर से उसे समझाने की कोशिश की।
“अच्छा! यदि इतना ही महत्वहीन है मेरा जीवन तो बदल दीजिये न। किसी को क्या फर्क पड़ेगा भला!” कुटिल हँसी हँसते हुए उसने मेरी आँखों में आँखें डालकर कहा। विचित्र से विरोधाभास से भरा था उसका चेहरा। उसके होंठों पर व्यंग्यपूर्ण हँसी थी पर उसकी आँखें अपनी नाराज़गी जताने में जरा भी पीछे नहीं थीं।
“मेरा उपन्यास पूरा हो चुका है तुम समझते क्यों नहीं?“
“पर अंत अभी बाकी है लेखक महोदय।“
“अंत?“
“हाँ, उपन्यास का अंत! और मैं उसी अंत को बदलने आया हूँ।”
एक एक शब्द को जमाते हुए उसने कहा। उसकी आवाज़ में जो मजबूती और जिद परिलक्षित हो रही थी उसने मुझे डरा दिया था।
“अंत बदलने के लिये?“
“हाँ, अंत बदलने के लिये। उस अंत को बदलने के लिये जहाँ आप अविरल और मीमांसा के सुखी संसार के सदके में सदा के लिये मुझे गर्क कर देने वाले हो।“
ओह इसे कैसे पता कि मैं क्या लिखने वाला हूँ, ये सोचते हुए मैंने फिर से उसे बातों में उलझाने की कोशिश की,
“ठीक है मैं करता हूँ कुछ। अब तुम जाओ सुरंजय।“
“हाहाहा आप मुझे मूर्ख नहीं बना सकते लेखक जी क्योंकि जिस दुष्टता और चालाकी की मिट्टी से आपने मेरी रचना की है वह आपको कभी ये मौका नहीं देगी कि आप मुझे उलझा सकें।”
“तो?“
“तो वो कुछ नहीं। चलिये और खोलिये अपनी पाण्डुलिपि।” एकाएक उसने पिस्तौल जेब से निकलकर मेरी कनपटी पर लगा दी। मेरी कनपटी अब जैसे पसीना उगलने की मशीन बन गई थी। याद आया मैंने ही लिखा था उपन्यास में कि अपनी बुरी संगत की बदौलत सुरंजय अपनी जेब में पिस्तौल रखने लगा था।
“देखो सुरंजय, ये तुम सही नहीं कर रहे हो।” उसे चेताते हुए मैंने आखिरी कोशिश की।
“सही और गलत का विवेक आपने मुझे दिया ही कब मेरे रचयिता।” व्यंग्यपूर्ण लहजे में उसने ताना दिया।
अब मैं पूरी तरह से विवश हो चुका था पर मेरा मन था कि अभी भी उम्मीद का कोई सिरा टटोल रहा था ताकि इस विचित्र परिस्थिति से उबर पाऊँ।
पर मेरा कोई भी प्रयास सफल नहीं हो पा रहा था। उसका हाथ अब भी पिस्तौल पर था और पिस्तौल मेरी कनपटी पर।
“लिक्खो…” उसने गुर्राते हुए पिस्तौल पर दबाव बनाया।
“पर तुम मुझे नहीं मार सकते सुरंजय। तुम मेरे पात्र हो, ये मैं तय करूँगा कि तुम क्या करोगे।“
“और मैं भी यह कह रहा हूँ कि आप वो लिखोगे जो मैंने आपसे कहा। ये मेरी अंतिम चेतावनी है। आप लिखते हैं या नहीं?” वह फिर गुर्राया।
“ठीक है। मैं लिखता हूँ। जरा साँस तो ले लूँ। लिखने में शब्द बिठाने पड़ते हैं सुरंजय और तुम्हारी इस पिस्तौल के डर से मेरे शब्द सहम गए हैं।“
“ठीक है मैं बैठता हूँ। आप लिखिये लेकिन जरा जल्दी। मैं टलने वाला नहीं हूँ। आप तो बखूबी जानते हैं न कि मैं कितना जिद्दी हूँ।” वह सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया। पिस्तौल अब भी मेरी ओर तनी हुई थी।
“हाँ बाबा, लिखता हूँ।“
मैंने आगे बढ़कर मेज के पास रखी कुर्सी को खींचा और बैठकर काँपते हाथों से उपन्यास वाले रजिस्टर को खोलने लगा। मेरे हाथ काँप रहे थे, दिल की धड़कनें बढ़ी हुई थीं पर मेरा दिमाग अभी भी हार मानने को तैयार नहीं था।
मुझे हार मानना कतई पसंद नहीं। आखिर मैं सुरंजय से कैसे हार सकता था। उसी सुरंजय से जो मेरा ही रचा हुआ एक अदना सा पात्र था। मेरी कलम की नोक पर नाचने वाला एक पात्र।
मैंने उसकी ओर देखा। उसका चेहरा स्थिर था किंतु उसकी चौकन्नी आँखें मेरे हाथों की हर हरकत पर लगी थीं।
मैंने रजिस्टर का अंतिम पृष्ठ खोलकर कुछ सोचते हुए एक बार फिर उसकी ओर देखा और जल्दी से एक वाक्य लिख दिया।
“नहींssss धोखेबाज़, तुमने फिर मुझसे दगा किया।” सुरंजय का चेहरा दुःख, पीड़ा और अविश्वास से भर उठा। वह चीखकर मेरी ओर आक्रमक मुद्रा में बढ़ना चाहता था पर उसने यंत्रवत तरीके से पिस्तौल एक और फेंकी, वह बोझिल कदमों से आगे बढ़ा और खिड़की से नीचे कूद गया।
मेरे चेहरे पर खिंची तनाव की लकीरें अब कुछ हल्की हो गई मानो किसी फंदे में फंसी हुई मेरी गरदन अब आज़ाद हो गई हो। मैंने पेशानी से पसीना पौंछा और लंबी सांस लेकर रजिस्टर की ओर देखा।
मैंने रजिस्टर पर उपन्यास की जो अंतिम पँक्ति लिखी थी वह यह थी,
“और अंत में सुरंजय ने अपनी पिस्तौल एक ओर फेंक दी और खिड़की से कूदकर आत्महत्या कर ली।“
अंततः मेरा उपन्यास पूरा हो चुका था। इस बार बिस्तर पर जाने से पहले मैं उसके नीचे “समाप्त” लिखकर उस पर पेपरवेट रखना नहीं भूला।
एक बार फिर एक लेखक जीत गया और खलनायक हार गया। मेरी आँखें सुकून की आमद से बोझिल होने लगीं।
रात भी ,नींद भी, कहानी भी,
प्रिय अंजू जी एक बिल्कुल अलहदा कहानी जिसे पढ़कर बहुत अलग सा महसूस हुआ, कहानी लिखते वक्त लेखक के मन में दिमाग में ,किरदार नाचते रहते हैं जब तक की कृति पूरी ना हो जाए, लेकिन आपकी इस कहानी में लेखिका की कृति का किरदार स्वप्न में सामने जीवंत हो जाता है, जॉ की एक खलनायक का किरदार है, वह उपन्यास की नायिका मीमांसा से उतना ही प्रेम करता है जितना की नायक अविरल करता है
कहानी को पढ़ते-पढ़ते पाठक हाथ प्रभु रह जाता है जब खलनायक अपने अपने संपूर्ण अस्तित्व के साथ बंदूक तानकर लेखक के सर पर हो जाता है अपने किरदार को सकारात्मक रूप देने के लिए, लेखक अपने आप को असहाय महसूस करता है लेकिन लेखक आखिरकार लेखक होता है जिस प्रकार संसार में सभी प्राणियों की डोर ऊपर वाले प्रभु के हाथ में होती है वह जैसा चाहे करने के लिए स्वतंत्र होता है इस प्रकार लेखक भी अपने पात्रों को अपनी परिकल्पना के हिसाब से ही ,कहानी के हिसाब से ही गढ़ने के लिए स्वतंत्र होता है
इसलिए उपन्यास का खलनायक सुरंजय माधव ,लेखक पर हावी होते हुए भी हावी नहीं हो पाता,
सुरनजय के कहने पर की आप मेरे चरित्र को पूरी तरह से बदल दो और मुझे नायिका से मिलान कर दो नहीं तो मैं बंदूक से आपको,,,,लेखक डरते हुए कहता है हां हां लिखता हूं और वह उपन्यास की पांडुलिपि को के अंतिम प्रश्न को खोलकर एक
वाक्य लिखकर कहानी का अंत कर देता है, इसके साथ ही खलनायक पात्र सुरंजय अपने हाथ से पिस्टल फेंक देता है और चीखता हुआ बालकनी से चलांग लगा देता है
लेखक अपने लेख किय कर्म के अधिकार का प्रयोग में करते हुए कहानी का यही अंतिम वाक्य लिखता है की खलनायक सुरंजय अपने हाथ से पिस्तौल फेंक देता है और चीखता हुआ बालकनी से छलांग लगा कर आत्महत्या कर लेता है।
इस प्रकार लेखक की जीत ही होती है ,जो कि स्वाभाविक है क्योंकि हर पात्र की डोर लेखक्के हाथ होती हे,बढ़िया कहानीसाधुवाद प्रिय अंजू जी
बहुत बहुत धन्यवाद कुंती जी। आपने इतनी रुचि से कहानी को न केवल पढ़ा अपितु विस्तार से अपनी प्रतिक्रिया से भी अवगत कराया। किसी भी लेखक के लिये ऐसे पाठकों का होना लेखन की सार्थकता को सिद्ध करता है। बहुत आभार।
एक बिल्कुल ही अलग कहानी, सुन्दर रचना, अन्त तक विस्मयकारी, शानदार
कहानी मैंने सुबह ही पढ ली थी परन्तु कहानी मुझे इतनी अच्छी लगी की मैं इस कहानी को दुबारा पढ़ रही हूं। कहानी ने शुरू से लेकर अंत तक बांधे रखा। शब्द भाव व कहानी का ताना बाना बहुत ही कमाल की बुनाई की है आपने। इतनी सुन्दर कहानी के लिए आपको साधुवाद।
बनाए जा बिगाड़े जा… हम तेरे चिराग हैं जलाए जा बुझाए जा । अंजू जी आपकी सुंदर कहानी लेखक के रूपक में ईश्वर और उसके अन्याय को प्रदर्शित करती है । किसी को अच्छा बना देना और किसी को बुरा बना देना, ताकि ये दुनिया चलती रहे । ये ईश्वरीय खेल है । जो दुनिया चलाने के लिए जरूरी भी है । सबको मोक्ष मिल जाए तो दुनिया तो उसी पल खत्म हो जाएगी । हम असहाय मानव किसी ईश्वरीय सत्ता के आगे चिल्लाते हैं, “मेरे साथ ही ऐसा क्यों?” पर अंत कहाँ बदलता है ।
लेखक भी एक रचनाकार है । पात्रों का जीवन उसके हाथ में है । उपन्यास लिखना है तो किसी को बुरा बनाना है । पात्र के जिरह के बाद भी अंत वही जो लेखक ने चाहा ।
सुंदर कथानक और किसी अदृश्य लेखनी से कर्म दंड भोगते हम पात्रों की पीड़ा की आहट इस कहानी में मैं सुन रही हूँ ।
बधाई
@Vandna Vajpeyi जी, वेबसाइट पर आपकी टिप्पणी भी पढ़ी। आपसे हमेशा बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिलती है। सच कहूँ तो आप जैसी पाठक और दोस्त नसीब से मिलते हैं।बहुत आभार
https://www.thepurvai.com/story-by-anju-sharma-3/
बिल्कुल नये कलेवर की कहानी है आपकी अंजू जी!
पढ़कर ठगे से रह गये। पढ़ने के बाद यही सोचते रहे कि इस कहानी को कहानियों की किस श्रेणी में रखा जाए?
पर यह कल्पना भी बुरी नहीं।
संभवत: इस कहानी का आधार मनोवैज्ञानिक है।
कहानी को पढ़कर एक बात और दिमाग में रही कि ईश्वर भी इस संसार का रचयिता है पर अच्छा और बुरा बनाना उसके हाथ में नहीं। वह मुट्ठी में बंद कर भेजता है भाग्य , अपना भाग्य हमें स्वयं बनाना पड़ता है। किंतु फिर भी अगर नियति सत्य है तो हम सब भी उस लेखक के रचे हुए पात्र हैं।ईश्वर से शिकायत का अधिकार तो बनता है। प्रतीकात्मकता में यह बात सोची समझी स्कीम की तरह लग सकती है। वह ईश्वर की स्कीम लेखक भी ईश्वर से काम नहीं।
उपन्यास लेखन लंबा समय लेता है। बहुत सोचना विचारना पड़ता है, तन्मयता चाहिये होती है, एकाग्रता चाहिये होती है, उसमें अनेक प्रसंग होते हैं। एक मुख्य कथा के साथ-साथ अनेक कथाएँ चलती हैं। और उन कथाओं को अंत तक ले जाते हुए एक सूत्र में पिरोना होता हो होता है।खलनायक की खलनायकी अगर नायक से अधिक प्रभावशाली हो जाती है तो चिंतन में विक्षिप्तता स्वाभाविक है। उपन्यास प्रभावशाली बन सके इसके लिए अंत का प्रभावशाली होना बहुत महत्वपूर्ण होता है। अंत को प्रभावशाली बनाने के लिए हम भी 6-7 महीनों से अटके पड़े हैं ।
कहानी में लेखक का हार्ट फेल नहीं हुआ यह बड़ी बात है हमें तो खुद घबराहट हो गई एक पल जैसे कोई हमारे सामने आकर खड़ा हो गया हो 3D पिक्चर की तरह कि चश्मा लगा कर देख रहे हैं और मुक्का सीधे अपने चेहरे पर आता दिखे और चीख निकल जाए।
कहानी में लिखा है प्रारंभ में की कितना प्रयास किया गया निरंतर।एक लंबी अवधि तक एक ही बात को सोचते रहना, उस पर काम करना,लिखते रहने में बातें निरंतर दिमाग में घूमती रहती हैं। पात्र हमारे अचेतन मन में सक्रिय रहते हैं और शरीर सो जाता है। दिमाग में सब सेव रहता है अतः थकान और मन में अशांति रहती है। बस इसीलिए इस तरह की स्थिति संभावित है।
हमने इस कहानी पर बहुत विचार किया। फिर हमारे दिमाग में यह ख्याल आया कि अगर लेखक कमजोर दिल वाला रहा और उसने इस तरह का लेखन किया, तो कहानी की तरह की स्थिति में तो लेखक का मानसिक संतुलन बिगड़ना भी संभावित है,या एकाएक आँखों के सामने आने पर हार्ट फेल।
शीर्षक काफी सार्थक रहा। रात भी, नींद भी और कहानी भी।
एक बिल्कुल अलग और लाजवाब कहानी के लिए आपको बधाई।
बहुत बहुत धन्यवाद नीलिमा जी। कहानी को जिस तरह आत्मसात करती हैं आप, वह अपने आप में बहुत अद्भुत बात है। इस सुचिंतित विस्तृत प्रतिक्रिया के लिये बहुत आभार
अच्छी कहानी है। खूब शुभकामनाएं अंजूजी
बहुत बहुत शुक्रिया प्रगति जी
लेखक जब ईश्वर हो जाए तो कर्त्तव्य एक झटके से सामने आ राह रोक लेते हैं। हम किरदारों के ख़ुदा जो बन चुके हैं। बहुत बार सुरंजय जैसे चरित्र समाज में अपना स्थान, रुतबा खोना नहीं चाहते … किंतु आपकी कहानी का अंत मेरे मन या कहूं सभी पाठकों का मन का है..!!!
बहुत बहुत बधाई अंजू जी, खूबसूरत कहानी के लिए…!!!
वाहह! एक बहुत ही अलग परिप्रेक्ष्य में लिखी गई रहस्य से परिपूर्ण और रोचक कहानी । बधाई आपको सुन्दर लेखन के लिये।