Saturday, July 18, 2026
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डॉ. विद्या सिंह का लेख – हिंदी उपन्यास साहित्य में शिवानी का स्थान

उपन्यास आधुनिक गद्य की सर्वाधिक सशक्त, प्राणवान एवं लोकप्रिय विधा है। इसमें चित्रित जीवन स्वाभाविक और यथार्थ होता है। उपन्यासकार वस्तुतः जीवन और जगत को जिस दृष्टि से देखता है, उसी रूप में उसे चित्रित भी करता है। इसमें लेखक का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होता है। शिवानी जी कहती हैं, “मेरा काम यही है- कहानी को ढूंढ़ना किंतु अगाध जलराशि से इस कथामीन को पकड़ने में केवल कल्पना के कांटों से ही काम नहीं चलता, यथार्थ के आटे की गोली भी उतनी ही आवश्यक होती है।” उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान देने वाली विधा है, इसी कारण आधुनिक युग में यह एक जनप्रिय साहित्य विधा है। शिवानी जी का साहित्य उनके जीवन में प्राप्त अनुभव, अध्ययन, चिंतन- मनन का प्रतिफल है। शिवानी जी ने अपनी आंखों से जो देखा- परखा है, वही पाठकों के सम्मुख रखा है। उन्होंने अपने एक संस्मरण में लिखा है, “इतना अवश्य सर उठाकर कह सकती हूं कि, जितना लिखा है, ईमानदारी से लिखा है।”
शिवानी जी स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य की एक लोकप्रिय लेखिका हैं। उन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं को समृद्ध किया है। वह एक साथ कवि, कहानीकार उपन्यासकार, निबंधकार, रिपोर्ताज़ लेखिका, संस्मरणकार, यात्रावर्णनकार आदि कई रूपों में समाज के सामने प्रस्तुत हुई हैं। साथ ही साथ उन्होंने इतिहास, संस्कृति, रेखाचित्र आदि पर भी लेखनी चलाई है। शिवानी जी को विविध भाषाओं का ज्ञान था। जालक संस्मरण में वह कहती हैं, “ईश्वर की असीम अनुकंपा से मुझे बचपन से ही  कतिपय भाषाएं सीखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैंने बांग्ला, गुजराती, हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी में जो ग्रंथ मौलिक रूप में पढ़े, उन्हें जब बाद में अनूदित रूप में पढ़ा तब स्वाभाविक था कि मुझे उनके अनुवाद फीके लगे और यदि आज मेरी कथायात्रा अब तक वैविध्यपूर्ण रही तो इसका कारण भी संभवतः  यही है कि मेरी लेखनी को इन्हीं विविध भाषाओं के ज्ञान ने गतिशील बनाया।”
शिवानी जी की शिक्षा शांतिनिकेतन में और जीवन का अधिकांश समय लखनऊ में व्यतीत हुआ। आपकी मां गुजरात की विदुषी महिला तथा पिता अंग्रेजी के लेखक थे। पहाड़ी पृष्ठभूमि और गुरुदेव टैगोर की शरण में शिक्षा ने शिवानी जी की भाषा और उनके लेखन को बहुआयामी बनाया। बांग्ला साहित्य और संस्कृति का शिवानी जी पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनके लेखन तथा व्यक्तित्व में उदारवादिता और परंपरानिष्ठता का जो अद्भुत मेल है, उसकी जड़ें इसी विविधता पूर्ण जीवन में निहित हैं।
शिवानी जी ने बड़े एवं लघु दोनों प्रकार के उपन्यासों की रचना की है। मायापुरी‘, ‘चौदह फेरे‘, ‘भैरवी‘, ‘कृष्णकली‘, ‘श्मशान चंपा‘, ‘सुरंगमा‘, ‘अतिथिऔर कालिंदीउनके मुख्य बड़े उपन्यास हैं। लघु उपन्यासों में विषकन्या‘, ‘कैंजा‘, ‘रति विलाप‘, ‘स्वयंसिद्धा‘, ‘रथ्या‘, ‘गैंडा‘, ‘माणिक‘, ‘किशुनली‘, ‘कृष्णवेणी‘, ‘चल खुसरो घर आपने‘, ‘तिलपात्र‘, ‘विवर्त‘, ‘तीसरा बेटा‘, ‘पूतोंवाली‘, ‘बदला‘, ‘कस्तूरी मृग‘, और पाथेयमहत्वपूर्ण हैं। 
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य में लेखिकाओं का स्थान महत्वपूर्ण है। शिवानी, महादेवी वर्मा, मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा, मृदुला गर्ग, प्रभा खेतान, कृष्णा सोबती, चित्रा मुद्गल, मेहरुन्निसा परवेज, मंजुल भगत, मैत्रेयी पुष्पा आदि लेखिकाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी साहित्य का नाम रोशन किया है।
शिवानी जी के प्रायः सभी उपन्यास नारी जीवन की गाथा हैं। आपने पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक आदि अनेक क्षेत्रों में नारी समस्या, उसके संघर्ष तथा योगदान को चित्रित किया है। मायापुरीउपन्यास में संयुक्त परिवार की समस्या प्रस्तुत की गई है। उपन्यास का पुरुष पात्र सतीश विवाह के बाद पत्नी सविता को लेकर अपने कार्यस्थल पर चला जाता है। उसके इस व्यवहार को देखकर महरी बताशो कहती है, “बिटिया तुम्हारे भैया ने तो अम्मा जी की ओर से आंखें ही बंद कर ली हैं। ऐसा भी क्या बहू का दुलार कि प्राण रहते ही अम्मा जी को पिंडदान दे दिया।” पूतों वालीऔर तीसरा बेटामें भी यही समस्या है। परिवार टूटने के बहुत से कारण होते हैं, जिन पर शिवानी जी ने अपने उपन्यासों में लेखनी चलाई है।
दांपत्य जीवन जितना सुखी होता है, उतना ही परिवार भी सुखी और संतुष्ट होता है। स्वस्थ दांपत्य ही आगे चलकर स्वस्थ समाज का निर्माण करता है। आधुनिक युग में इस पवित्र संस्कार में भी कुछ त्रुटियों का समावेश हो गया है, जिसके कारण दांपत्य जीवन की समस्याएं खड़ी हुई हैं। शिवानी जी ने दांपत्य जीवन के विषाक्त वातावरण के लिए पत्नी एवं पति दोनों को जिम्मेदार ठहराया है। सुरंगमाउपन्यास में सुरंगमा ने अपनी मां लक्ष्मी को देखा, जो जीवन पर्यंत अपने पति से प्रताड़ित रहीं। इस पारिवारिक वातावरण का दुष्प्रभाव सुरंगमा पर पड़ता है। अपनी ज़िंदगी का सबसे अहम फैसला वह स्वयं करती है और अपनी सहेली से कहती है, “बुरा मान गई मीरा! पर मैं मन ही मन निश्चय कर चुकी हूं कि कभी विवाह करने की मूर्खता नहीं करूंगी। तुझे तो पता ही है कि मेरी मां की असामयिक मृत्यु का कारण ही उनका विवाह था। दूध की जली मां ने भले ही मट्ठा फूंक- फूंक कर न पिया हो, मैं तो पी ही सकती हूं।” कभी-कभी पत्नी का स्वभाव उसकी अदूरदर्शिता तथा आभूषण प्रेम भी दांपत्य जीवन में कटुता लाता है। भैरवीउपन्यास में रुक्मणि आधुनिक फैशन परस्त स्वच्छंद नारी है, जिसकी श्रृंगारप्रियता बढ़ती उम्र के साथ-साथ निर्लज्जता से बढ़ती जाती है। उसके पति गजानन कुछ करने की कोशिश करते हैं तो पत्नी तीखे शब्दों में उन्हें जवाब देती है, “बाप दादों ने पैसा खर्च किया होता तो तुम्हारा दिल भी बड़ा होता।” चौदह फेरेके कर्नल की पत्नी नंदी पति की उपेक्षा पा‌कर घर छोड़कर चली जाती है। नारी के अहम एवं शंकालु स्वभाव के कारण कालिंदीउपन्यास में कुलभूषण का दांपत्य जीवन भी कलह पूर्ण बना रहता है। भैरवीउपन्यास में शंकालु स्वभाव के कारण पति-पत्नी में प्रेम के स्थान पर बैर भावना घुस जाती है। राजेश्वरी का वृद्ध शंकालु पति पत्नी पर शंका करता है। दुकान जाते समय भी उसे ताले में बंद करके जाता है। इसी शंका के कारण संतान को भी वह निर्मल चित्त से ग्रहण नहीं कर पाता और बार-बार अपनी पत्नी को आशंका की दृष्टि से देखता रहता है। पति के ऐसे स्वभाव के कारण राजेश्वरी का जीवन छिन्न- भिन्न हो जाता है। 
विधवा समस्या स्त्री जीवन की बहुत बड़ी समस्या है। पुराने समय में  विधवाओं को आर्थिक, सामाजिक सभी दृष्टियों से जीवन जीना दूभर हो जाता था। श्मशानचंपा उपन्यास में विधवा भगवती कहने के लिए जिंदा है। वह अधमरे की तरह अपना जीवन बिताती है। वह भाई के घर रहती है पर भाभी उसे सताने में कोई कसर नहीं छोड़ती।
स्त्री की तमाम समस्याओं के साथ ही साथ शिवानी जी ने वृद्ध जनों की समस्या भी उठाई है। अपनी संस्कृति में कहा जाता है कि माता-पिता के पैरों के नीचे जन्नत होती है परंतु बढ़ती आकांक्षाओं ने आज परिवार का स्वरूप बिगाड़ कर रख दिया है, विशेषकर नई पीढ़ी का अपने घर परिवार से उदासीन रहना और सिर्फ़ स्वार्थ पूर्ति की खातिर जुड़ना, अपवाद स्वरूप दिखाई देने वाली बात न रहकर घर-घर की भयावह सच्चाई बन चुकी है। इसके पीछे वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था भी उत्तरदायी है। श्मशानचंपा में वृद्ध माता-पिता जब अपने पुत्र को अपनी बीमारी और परेशानी से भरा पत्र भेजते हैं तो धरणीधर उसे हंसी में टाल पत्र को पत्नी भगवती की ओर फेंक कर कहता है, “एकदम सठिया गए हैं, बाबू…” वृद्ध माता-पिता की संतप्त आत्मा शाप देती है “कुलांगार जितना कष्ट, जितनी ज्वाला तूने मुझे दी है, उसका द्विगुण तू पाएगा। यही संसार का नियम है।”
अत्यंत प्राचीन काल में दहेज की समस्या नहीं थी। वैदिक संस्कृति में स्त्रियों का स्थान ऊंचा था। वे अपनी इच्छा अनुसार अपना पति पसंद कर सकती थीं। आज दहेज को विवाह की एक अनिवार्य शर्त बना दिया गया है। दहेज कन्या पक्ष के शोषण का माध्यम बन गया है। कहीं यह नगद धनराशि के रूप में है, कहीं आभूषणों के रूप में, कहीं मकान के रूप में, कहीं लड़के की पढ़ाई के खर्च के रूप में, तो कहीं दहेज जगह- जमीन, मोटर कार, स्कूटर या अन्य रूप में लिया जाता है। दहेज प्रथा इतनी प्रबल हो गई है कि उसके विरोध में लोगों में आवाज उठाने की भी शक्ति नहीं रही है।       
शिवानी जी के उपन्यासों की नारियां आदर्श विचारों वाली हैं, दहेज प्रथा की विरोधी हैं, परोपकारी हैं तथा अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सचेत हैं। 
प्राचीन काल से भारतीय नारी का कार्य क्षेत्र घर परिवार रहा है। परिवार का पालन पोषण करना और प्रत्येक प्राणी के विकास में सहायक होना ही नारी का प्रमुख उद्देश्य रहा है। परिवार के लिए अर्थ का प्रबंध करना पुरुष का काम रहा है। वैसे भी भारतीय समाज आरंभ से ही पितृ प्रधान कुटुंब व्यवस्था में रहा है इसलिए पिता के संचालन पर पूरे परिवार को निर्भर होना पड़ता था। आगे चलकर नारी पूर्णतया पुरुष पर अवलंबित रहने लगी। फलस्वरुप पुरुष ने अपने अहम के कारण उसे दासी समझ लिया। समाज में उचित स्थान न पाकर नारी पतित और पथभ्रष्ट होने लगी। नारी को पतित बनाने वाले मुख्य कारण थे आर्थिक अभाव, सामाजिक दबाव तथा नैतिकता की कठोर व्यवस्था आदि। सामंती सभ्यता में धनी वर्ग द्वारा वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहन दिया गया। धीरे-धीरे इसने व्यवसाय का रूप धारण कर लिया। पैसे के लिए लड़कियों का अपहरण और बहला-फुसला कर उन्हें गुमराह भी किया जाने लगा। विधवाओं को भी लांछित होने पर बड़ी संख्या में इन्हीं कोठों पर शरण मिलती थी। शिवानी जी ने वेश्याओं के जीवन को देखा परखा अवश्य है। उन्होंने आज की नारी के आक्रोश को व्यक्त करते हुए रथ्या उपन्यास में लिखा है, “कब खुलेंगे पुरुष वेश्याओं के बाजार! वेश्या भी नारी है। उसके मन में भी प्रेमी के लिए त्याग की भावना होती है और वह प्रेम के लिए त्याग करती भी है। वेश्याएं भी सफल गृहिणी बन सकती हैं। इसका चित्रांकन शिवानी जी ने श्मशान चंपा उपन्यास में किया है। इस उपन्यास में उन्होंने अंगूरी नामक वेश्या का चित्रण किया है।  शिवानी जी के अन्य उपन्यासों कृष्णकली‘, ‘रथ्या‘, ‘चौदह फेरे‘, ‘करिए छिमाआदि उपन्यासों में भी वेश्या समस्या पर लेखनी चलाई गई है।
प्राचीन काल में एक पुरुष की अनेक पत्नियां हुआ करती थीं। जब पत्नी की मृत्यु होती तो पुरुष को दूसरा विवाह करने का अधिकार था लेकिन पति की मृत्यु हो जाने पर पत्नी पुनर्विवाह नहीं कर सकती थी। इतिहास गवाह है कि बिना संतति पति की मृत्यु हो जाने पर कुल को आगे बढ़ाने के लिए पत्नी को देवर के साथ यौन संबंध स्थापित कर संतान की प्राप्ति करनी होती थी। उस समय सती प्रथा भी प्रचलित थी। समाज में विधवा का कोई मान सम्मान नहीं था। उस समय की विधवाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। आधुनिक युग की विधवा नारी का स्थान ऊंचा है उसका मान सम्मान बढ़ गया है, कारण है शिक्षा। शिक्षा पाकर आज नारी प्रत्येक क्षेत्र में अपना स्थान मजबूत कर चुकी है। शिवानी जी ने अपने उपन्यासों में विधवा समस्या का चित्रण करके उसे आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी है। श्मशान चंपाउपन्यास की नायिका, डॉक्टर चंपा की मां भगवती विधवा है। पति धरनीधर ने अपनी गिरती आर्थिक स्थिति को हमेशा गोपनीय ही रखा था अतः उनकी मृत्यु के उपरांत भगवती को ज्ञात हुआ कि न फंड में रुपया है और न बैंक में। मायापुरीउपन्यास की नायिका शोभा की मां दुर्गा है। पति के असमय मृत्यु के कारण वह विधवा हो जाती है, बेसहारा हो जाती है। भैरवीउपन्यास की राजराजेश्वरी एक जवान विधवा है। रथ्याउपन्यास की नायिका अनसूया विधवा है। अनसूया के ससुर भी विधुर हैं। अनसूया का विवाह पागल मिर्गी वाले पुरुष से होता है। एक दिन अनसूया को उठाकर वह छत की मुंडेर पर जा पहुंचता है उसके ससुर उसे छुड़ाने का प्रयास करते हैं। अनसूया उससे छूट जाती है किंतु उतने ऊपर से गिरकर उसके पति की मृत्यु हो जाती है। उसका ससुर विधुर है, इधर अनसूया विधवा हो जाती है। लोग कहते हैं जानबूझकर रड़ुए बूढ़े ने पागल लड़के को छत से धकेल दिया जिससे उम्र भर सुंदरी जवान बहू के साथ गुलछर्रे उड़ा सके; पूरी जायदाद भी तो लिख दी है पाटन की पटरानी के नाम। तर्पणउपन्यास में शिवानी ने विधवा विवाह की ओर संकेत किया है। प्रमुख रूप से स्त्री की अन्य समस्याओं के साथ ही शिवानी जी ने समाज में व्याप्त तमाम कुरीतियों पर भी लेखनी चलाई है। हिंदू समाज में अभी भी अछूतों को अत्यंत हेय दृष्टि से देखा जाता है। अछूत आर्थिक दृष्टि से प्राय: निर्धन होते हैं। उच्च वर्ग के लोग उनकी इस निर्धनता का अनुचित लाभ उठाकर उन पर तरह-तरह के अत्याचार करते हैं। शिवानी जी ने दलितों पर होते हुए अत्याचार का वर्णन चौदह फेरेऔर विवर्तउपन्यास में किया है। राजनीतिक समस्याओं पर भी शिवानी जी की दृष्टि गई है। 
शिवानी जी की संवेदना का विस्तार अत्यंत व्यापक है। अपने साहित्य- सृजन के उद्देश्य के संबंध में शिवानी जी स्वयं कहती हैं, “मेरे साहित्य- सृजन का मुख्य उद्देश्य यह रहा है कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में फैली अराजकता, भ्रष्टाचार, अनाचार, कुरीतियों एवं विसंगतियों को आम जनता जाने और समझे। ऐसा साहित्य रचा जाए जो जन-साधारण को भी ऊपर उठाए। साहित्य आदर्शोन्मुखी एवं वास्तविक हो, जिससे जन- समुदाय का कल्याण हो।”
शिवानी जी के निकट रहीं वरिष्ठ साहित्यकार पद्मा सचदेव के अनुसार, उनके उपन्यास ऐसे हैं जिन्हें पढकर यह एहसास होता था कि वे खत्म ही न हों। उपन्यास का कोई भी अंश उसकी कहानी में पूरी तरह डुबो देता था। उन्होंने कहा, ”शिवानी भारतवर्ष के हिंदी साहित्य के इतिहास का बहुत प्यारा पन्ना थीं। अपने समकालीन साहित्यकारों की तुलना में वह काफ़ी सहज और सादगी से भरी थीं। उनका साहित्य के क्षेत्र में योगदान बड़ा है पर फिर भी हिंदी जगत ने उन्हें पूरा सम्मान नहीं दिया जिसकी वह हकदार रहीं।उम्मीद की जानी चाहिए कि समय के साथ-साथ उनके उपन्यासों का महत्व हिंदी साहित्य समाज समझेगा और शिवानी जी को अग्रणी स्थान प्राप्त होगा।
डॉ. विद्या सिंह
पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी
एम.के.पी.(पी.जी.) कॉलेज, देहरादून
विद्या सिंह
विद्या सिंह
कविता, कहानी, समीक्षा स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।'चंद्रिका बाबू की गुमटी' कहानी संग्रह तथा नरेश मेहता का साहित्य एक अनुशीलन समीक्षात्मक पुस्तक प्रकाशित। विभिन्न संकलन में सहयोगी लेखन। पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष एमकेपी कॉलेज देहरादून।
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2 टिप्पणी

  1. प्रिय विद्या जी आपने महान लेखिका शिवानी जी के लेखन पर एक वृहद दृष्टि समग्र रूप से डाली है उनके पिता अंग्रेजी के लेखक एवं वे स्वयं शांति निकेतन में उनकी शिक्षा का प्रभाव उनके लेखन में आया है, शिवानी के साहित्य में समाज, देश को उन्नति प्रदान करने का प्रयास दिखाई देता है उनका स्वयं का कहना है की लेखक का साहित्य समाज की संस्कृति और मूल्यों के संवर्धन करने वाला यथार्थ धरातल पर लिखा होना चाहिए
    शिवानी जी ने स्त्रियों की विभिन्न समस्याओं पर अपनी कलम चलाई है चाहे विधवा, पारितक्य,या समाज से अलग जीवन जीती वेश्याएं हो , स्त्रियों के हर तरह के शोषण जीवन पर उन्होंने कहानी उपन्यास लिखे हैं
    यह बात सही है कि उन्हें उनके लेखन के अनुसार पुरस्कार नहीं मिल पाया, फिर भी साहित्य में शिवानी एक आला दर्जे की साहित्यकार के रूप में अंकित हैं
    प्रियविद्या जी आपने शिवानी जी पर उत्तम समग्र लेख लिखा है साधुवाद ।

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