Monday, May 11, 2026
होमकहानीदीपक शर्मा की कहानी - दांव-पैर

दीपक शर्मा की कहानी – दांव-पैर

 उस दिन दसवीं कक्षा का मेरा आखिरी पर्चा खत्म हुआ था और मैं दोपहर की गाड़ी से मां के पास कस्बापुर वापिस जा रहा था।
                  पिछले महीने से मां और मैं संग- संग न रहे थे।अपनी टाएफ़ड के कारण कस्बापुर के अपने स्कूल से अपना दाखिला भेजने में मैं असमर्थ रहा था और मेरा एक साल बचाने की खातिर लखनऊ में रह रहे मेरे पिता ने एक स्वतंत्र परीक्षार्थी के रूप में मेरा दाखिला लखनऊ से भर दिया था। फलस्वरूप अपनी परीक्षाओं के दौरान मैं अपने पिता के पास इधर  लखनऊ आने के लिए बाध्य रहा था।
                  “तुम्हारी मां के लिए मैं यह साड़ी भेजना चाहती हूं,” पर्चे के बाद जब मैं लौटा तो उषा वशिष्ठ ने मुझे अपने कमरे में बुला लिया। उन्नत गर्भावस्था के अंतर्गत उन दिनों वह अपने दफ़्तर से छुट्टी पर रही।
                  लखनऊ में मेरे पिता अकेले नहीं रहते। पिछले पांच वर्षों से वह उषा वशिष्ठ के साथ रहने लगे हैं। और उस के पड़ोसी मेरे पिता को उस के पति के रूप में मानते हैं।
                  “मां यह रंग नहीं पहनतीं,” उषा वशिष्ठ के भव्य साड़ी – संग्रह के सामने वह धोती एकदम तुच्छ थी। हालांकि मां उस से भी ज़्यादा मामूली धोतियां रखती थीं।
                  “क्यों?” उषा वशिष्ठ के चेहरे पर एक विद्रूप हंसी चली आयी, “इस रंग में क्या खराबी है? इतना प्यारा धानी रंग है…..”
                   “न,” अपने स्वर में मैं दुगुनी दृढ़ता ले आया, “मां इसे न पहनेंगी। उन्हें आप से कुछ न चाहिए…..”
                  “और तुम्हें?”
                  “मुझे भी….. आप से कोई…..कोई मतलब नहीं,”  उषा वशिष्ठ से प्रत्यक्ष तथा एकांतिक बात करने का इस से पहले मुझे एक भी अवसर न मिला था।
                  “फिर मेरे घर में क्या कर रहे हो?”  सद्भावना- प्रदर्शन का उस का नाटक जब विफल रहा तो वह सीधे- सीधे मुकाबले पर उतर आई।
                  “यह घर मेरे पिता का है…..”
                  “वाह!” उस ने अपने हाथ नचाए,   “मालूम है इस घर का किराया किस की तनख्वाह से कटता है?”
                  “क्या हो रहा है?” हल्ला सुन कर मेरे पिता अपनी शिल्पशाला से निकल आए।   
                  घर ही के एक कमरे में वह अपने कैमरे की रील के प्रतिचित्र तैयार करते हैं तथा उन्हें उभारते हैं। उस कमरे में अपेक्षित अंधेरे की व्यवस्था भी है तथा छायाचित्र सम्बंधी पूरी सामग्री भी। अपने दफ़्तर के बाहर वह एक प्रतिष्ठित छायाकार हैं और लखनऊ ही में नहीं, दिल्ली में भी उन के छायाचित्र प्रमुख पत्रिकाओं तथा समाचार- पत्रों में आदर के साथ प्रकाशित किए जाते हैं।
                  “इस से पूछिए,,” उषा वशिष्ठ चिल्लाई, “कहता है इस की मां मेरी खरीदी हुई साड़ी न पहनेंगी…..”
                  “टाल जाओ,” मेरे पिता ने उस की पीठ थपथपा दी, “यह नासमझ है। अभी कुछ नहीं समझता…..”
                  “यह नासमझ नहीं है,” वह फिर चीखी, “यह नासमझ नहीं है। जब तक इस के पर्चे रहे, कैसे एक फ़ाख्ता की मानिंद यह मूक रहा और जैसे ही इस के पर्चे खत्म हुए यह एक गिद्ध की तरह झपटने लगा…..”
                  “टाल जाओ,” मेरे पिता ने चिरौरी की, “टाल जाओ,प्लीज़। इसे स्टेशन छोड़ कर मैं अभी लौटता  हूं……”
                  अपना सामान उठाने हेतु मैं अपने ‘पार्टीशन’ की ओर बढ़ लिया।
                   यों तो वह घर अच्छा खासा बड़ा था। मेरे पिता की शिल्पशाला के अतिरिक्त उस में तीन और कमरे भी रहे। किंतु अपने ‘पार्टीशन’ के अतिरिक्त मैं दूसरे किसी भी कोने में अधिक समय तक आसन न पा सकता था।  
                  बड़े हालनुमा कमरे के आधे भाग में सोफ़ासेट लगा था तो आधे भाग में फ़्रिज और खाने की मेज़- कुर्सियां। 
                  दूसरा कमरा मेरे पिता और उषा वशिष्ठ का शयनकक्ष था और तीसरा मेरी चार- वर्षीया सौतेली बहन और उस की आया का।  
                  मेरे लिए पिछले बरामदे के पिछले कोने में बने बाथरूम के चार हाथ छोड़कर एक कोना निश्चित किया गया था।और जहां मेरे सोने की चारपाई खत्म होती थी,उस के दो हाथ छोड़ कर लकड़ी की एक ‘ओट’ टिका दी गई थी और उसे ‘पार्टीशन’ का नाम मिल गया था।
                  घर की सभी गतिविधियां ‘पार्टीशन’ के उस पार कार्यान्वित होती थीं। भोजन के समय भी आया मेरी थाली मेरी चारपाई पर छोड़ जाती थी। मेज़ पर खाने का निमंत्रण मुझे कभी न मिला था।
                  “उषा के साथ तुम्हें सावधानी बरतनी चाहिए,” मेरे पिता का दुपहिया जब उस मकान की सड़क पीछे छोड़ आया तो मेरे पिता ने मुझे डांटा, “मालूम है, जिस सरकारी प्रयोगशाला में मैं एक मामूली कर्मचारी हूं,उषा उस में एक वरिष्ठ वैज्ञानिक है। उस की तनख्वाह मुझ से तिगुनी है…..”
                  मैं ने कोई उत्तर न दिया।
                  अपने पिता के क्रोधावेश की धार का फैलाव अपने बचपन में मैं बहुत बार भोग चुका था। तथा उन के सामने मैं अपनी ज़ुबान अपने तालू से कभी पृथक न करता।
                 “तुम उसे अपने पक्ष में रखोगे, तभी फ़ायदे में रहोगे। उस के पास अच्छा पैसा है…..”
                 इस बार भी मैं ने कुछ न कहा।
                 स्टेशन का बाकी रास्ता हम ने एक अनिश्चित चुप्पी में काटा।
                 “जाओ, अपनी टिकट खरीद लाओ,” स्टेशन पहुंचते ही मेरे पिता ने अपनी जेब से अपना बटुआ निकाला : बटुए में सौ- सौ के भी कुछ नोट रहे मगर उन्हों ने मेरे हाथ में केवल पचास का एक नोट थमाया, “इधर मैं तुम्हारे झोले पर नज़र रखे हूं…..”
                 टिकट बयालीस रुपए की थी।
                 “गाड़ी आने में अभी समय है,” दुपहिए से मेरा झोला उठा कर उन्हों ने ज़मीन पर रख दिया, “स्टेशन पर तुम आराम से कुछ खा सकते हो…..”
                 “मेरे पास कुल आठ रुपए बचे हैं,” मैं ने कहा।
                  कस्बापुर से लखनऊ भेजते समय मां ने मेरी जेब में जो एक सौ पचास रुपए जबरन भरे थे, वे सभी रुपए मैं खत्म कर चुका था। उषा वशिष्ठ की आया द्वारा परोसी गई थाली जब-जब मुझे भरपेट संतुष्टि देने में असमर्थ रहती थी, मैं बाज़ार जा कर क्षतिपूर्ति करता रहा था।
                 “और कितने चाहिए?” मेरे पिता ने अपनी जेब से अपना बटुआ दोबारा निकाला।
                 “मैं नहीं जानता,” मैं खिन्न हुआ। 
                  इस बार उन्हों ने दस का एक नोट मेरी ओर बढ़ाया। अपनी सम्पन्नता में मेरी भागीदारी उन्हें स्वीकार्य न थी।
                 “कस्बापुर पहुंचते ही मुझे फ़ोन करना,” और मुझ से आंखें मिलाए बिना ही अपनी दुपहिया उन्हों ने वापिस मोड़ ली।
                  अनायास ही मुझे कस्बापुर का स्टेशन याद हो आया। जब मां मुझे लखनऊ की गाड़ी में बिठाने आयी थीं। जब तक मेरी गाड़ी उन की आंखों से ओझल न हुई थी, वह प्लेटफार्म पर मेरी निगाह में बराबर बनी रहीं थीं। तिस पर पांच घंटे की अवधि वाली मेरी यात्रा के लिए जो छः परांठे और भरवां करेले उन्हों ने मेरे सामान के साथ बांधे थे, गृह- विरह के लिए वे पर्याप्त से भी अधिक रहे थे।
                   कस्बापुर में हमारा घर सीढ़ियों के बाद पड़ता था।
                   सीढ़ियों पर पग धरते ही मेरी रुलाई छूट ली।
                   देर तक रो लेने के बाद ही मैं दरवाज़े पर दस्तक दे पाया।
                  “आओ,आओ,” मुझे देखते ही मां खुशी से हांफ़ने लगी— दमे की वह पुरानी मरीज़ हैं— “पहले खाना लाऊं क्या?”
                  वह पहले से दुबली लग रहीं थीं। बहुत दुबली। रात का खाना वह ज़रूर छोड़ देती रहीं होंगी।
                  “खाना मैं बाद में खाऊंगा,”  मां का हाथ थाम कर मैं तख्त तक ले गया, “पहले तुम से एक बात कहनी है। बहुत ज़रूरी…..”
                  “बताओ।बताओ,” मां हंसी।
                   “तुम्हें अब चुप नहीं बैठना चाहिए,” मैं फट पड़ा, “वहां वह औरत दूसरी बार मां बनने जा रही है…..”
                  “तुम परेशान मत होओ,” मां की हांफ़ बढ़ ली, “मैं यहां आराम से हूं। अपना कमाती हूं। अपना खाती हूं…..”
                  कस्बापुर के एक प्राइमरी स्कूल में मां एक अध्यापिका हैं—- बारह सौ रुपये माहवार पर।
                  “वे दोनों भी कमा रहे हैं और उन की मिली- जुली कमाई तुम्हारी कमाई से पंद्रह गुणा ज़्यादा है…..”
                 “ज़्यादा है तो रहे। मुझे यहां आराम है। पूरा आराम है…..”
                 “यह सरासर अन्याय है,” मैं अड़ गया, “अलग होने का कष्ट हम झेलें और अलग होने का सुख पिता जी लूटें…..”
                 “क्या वह सुखी हैं? बहुत सुखी हैं?” मां का चेहरा मलिन पड़ गया।
                 “हैं तो। वह औरत उन्हें बहुत भाव देती है।  सब कुछ उन्हें उपलब्ध करवाती है : महंगे से महंगे कैमरे। महंगे से महंगे कपड़े। महंगे से महंगे जूते। महंगे से महंगे पकवान…..”
                “और वह? वह भी उसे भाव देते हैं?”
                 “देते हैं। बहुत भाव देते हैं।तुम से आए- दिन झगड़ा करते थे। उस से कभी झगड़ा नहीं करते। तुम्हें छोटी सी छोटी बात पर भी पीट देते थे, उसे बड़ी से बड़ी बात पर भी दुलारा करते हैं…..”
                 “जानते हो? वह पहले मुझ से भी झगड़ा नहीं करते थे। मुझ से झगड़े तो बाद में शुरू हुए….. जब हाथ उन के कैमरों के लिए तंग पड़ने लगा…..”
                 “मैं कुछ नहीं जानता,” सोलह वर्ष की अपनी उस उम्र में मुझे मां के अतीत के स्थान पर अपने भविष्य की चिंता करनी अधिक प्रासंगिक लगी, “ पिता जी की शिकायत अब कचहरी में पहुंच जानी चाहिए। सरकारी नौकरी करते हैं और दो पत्नियां रखे हैं…..”
                 “नहीं,” मां तख्त से उठ खड़ी हुई, “इस समय कचहरी जाएंगे तो तुम्हारी पढ़ाई अधूरी रह जाएगी।तुम्हारा खर्चा बंद हो जाएगा…..”
                  “दो सौ रुपल्ली महीने की खातिर पिताजी का कच्चा चिट्ठा कचहरी में न खोला जाए? सिर्फ़ दो सौ रुपल्ली की खातिर?”     पिछले पांच वर्षों से मेरे पिता मेरे नाम दो सौ रुपए महीना भेज रहे थे। 
                  “यह तय हो चुका है तुम्हारी दसवीं पूरी होते ही तुम्हारा खर्चा दुगुना कर दिया जाएगा…..अभी तुम चुप रहो…..”
                  “चुप रहूं और आंसू बहाऊं?” मैं उबल पड़ा, “चुप रहूं और अपना कलेजा पक जाने दूं? क्यों चुप रहूं? मैं अब चुप नहीं रह सकता।मैं अब चुप न रहूंगा। जब तक पिताजी की नयी खुशहाली मेरी आंख से ओझल रही, तुम्हारी और अपनी बदहाली मुझे साफ़ दिखाई नहीं दी। मगर अब चुप नहीं रहा जाएगा मुझ से…..”
                   “देखो, कचहरी जाने से हमें नुकसान होगा।बहुत बड़ा नुकसान होगा।अभी कस्बापुर में लोग नहीं जानते हम अकेले हो गए हैं। वे यही समझते हैं तुम्हारे पिता की नौकरी ही उन्हें लखनऊ में रखे हुए है…..”
                  “नहीं। अपनी पाल हमें खुद लगानी और उतारनी चाहिए। बस। भिखारियों की मानिंद लंगर पर मंडराने से कोई फ़ायदा नहीं। कचहरी तो हमें अब जाना ही है…..अपने लिए…..न्याय के लिए…..आन के लिए…..आत्म- रक्षा के लिए…..”
                    कस्बापुर के इंटर कालेज में दाखिले के समय जब मुझ से लखनऊ के परीक्षा- केंद्र का प्रमाणपत्र मांगा गया तो मुझे एक बार फिर लखनऊ जाना पड़ा।
                    संयोगवश कचहरी के सम्मन मेरे पिता को मेरी उपस्थिति में मिले।
                   “तुम्हारी मां का दिमाग खराब हो गया है। मुझे कानून सिखा रही है।कहती है एक समय पर दो पत्नियां रखना कानून के विरुद्ध है…..”
                  “ठीक ही तो कह रही है,” अपने कमरे में अपने नवजात बेटे के साथ आराम कर रही उषा वशिष्ठ हमारे पास चली आई, “कितनी  बार कहा है मैं ने तुम से, उसे तलाक दे डालो, वह कभी भी हमें जगत- भर में उछाल सकती है। मगर तुम्हारे कान में एक बार भी जूं रेंगी क्या?”
                  “तलाक क्या खैरात में मिलता है?” मेरे पिता चिल्लाए—अपने पांच साल पहले वाले अंदाज़ में—-  “हरजाने में अपनी पहली पत्नी को कोई रकम नहीं देनी पड़ती क्या?”
                  “रकम कैसी? उस की बीमारी को आधार बना कर उस से पीछा छुड़ाना कौन मुश्किल काम होगा?”
                  “दमे को तलाक का आधार बनाना असंभव है,” मेरे पिता भभके।
                  “क्या बकते हो तुम?” उषा वशिष्ठ ने अपने हाथ नचाए, “कचहरी में कुछ भी साबित किया जा सकता है…..”
                  “क्या बोली तू?” मेरे पिता ने पूरे ज़ोर से उषा वशिष्ठ की गाल पर एक थप्पड़ मारा।
                  उसी अपने पुराने अंदाज़ में।
                  अपनी हंसी छिपाने मैं अपने ‘पार्टीशन’ में जा छिपा।
                   मैं नहीं जानता मेरे दांव- पैर अपना विश्रांति – ग्रह कब ग्रहण करेंगे किंतु कचहरी की पेशियों के समय अपने पिता का उतरा हुआ चेहरा देख कर मेरा कलेजा हर बार बांसों उछलता है…..
                   बल्लियों उछलता है…..
दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
हिंसाभास, दुर्ग-भेद, रण-मार्ग, आपद-धर्म, रथ-क्षोभ, तल-घर, परख-काल, उत्तर-जीवी, घोड़ा एक पैर, बवंडर, दूसरे दौर में, लचीले फीते, आतिशी शीशा, चाबुक सवार, अनचीता, ऊँची बोली, बाँकी, स्पर्श रेखाएँ आदि कहानी-संग्रह प्रकाशित. संपर्क - [email protected]
RELATED ARTICLES

3 टिप्पणी

  1. दीपक शर्मा जी की कहानी दाँव-पैर पढ़ी। दाँव- पेच तो बहुत सुना है परंतु दाँव-पैर पहली बार सुना। अत्यंत सुगठित कहानी है ।पिता का चरित्र थोड़ा और खुलता तो अच्छा लगता, यद्यपि इतनी जानकारी तो मिलती ही है कि पहली पत्नी से उनका लगाव टूटा नहीं है। बेटे की मां के प्रति फ़िक्र उचित ही है। दीपक शर्मा जी को हार्दिक बधाई।

  2. https://www.thepurvai.com/story-by-deepak-sharma-41/

    दीपक दीदी

    आपकी कहानी पढ़ी। यह कहानी आत्मकथात्मक रूप में लिखी गई एक किशोर बालक के मनोवैज्ञानिक धरातल पर संवेदनाओं के विचलन, माता-पिता के बिखरे प्रेम के बंदरबाँट और कटुता की कहानी है।
    बच्चों को माता और पिता दोनों की ही, और दोनों से ही प्यार की अपेक्षा होती है। एक संपूर्ण परिवार ही दायित्वों का निर्वहन भली-भाँति कर सकता है।
    बच्चे जो देखते हैं बच्चे जो देखते हैं वही सीखते हैं और वही महसूस भी करते हैं।

    नौकरी के नाम से पिता का दूसरी स्त्री के साथ रहना बेटे को अच्छा नहीं लगता। अपनी माँ की उपेक्षा और पुत्र के प्रति उत्तरदायित्व का अभाव किशोरवय बच्चा दोनों ही समझता है।दसवीं क्लास में पढ़ने वाला बेटा छोटा नहीं होता यह उम्र हार्मोंस परिवर्तन के दौरान अधिक संवेदनशील होती है। पिता के पास जाने पर अपनी मां की गरीबी और भाव में जीती जिंदगी और लखनऊ में ठाठ से रहते पिता; दोनों अंतर को बालक महसूस करता है।
    घर में भी जिस तरह का व्यवहार उसके साथ किया गया उसे उसने पिता के परिपेक्ष्य में ही लेते हुए महसूस किया।सारी चीजें उसे आहत करती रहीं। सबसे ज्यादा दुख उसे इस बात का हुआ कि स्टेशन पर छोड़ने जाते हुए पिता के बटुए में 100-100 के नोट भी मौजूद थे लेकिन उन्होंने बेटे और उसकी माँ के लिए देना उचित नहीं समझा। उसके कहने के बावजूद भी उन्होंने अपने बेटे को मात्र ₹10 दिए।
    इस बात से भी उसे तकलीफ हुई गाड़ी में बिठाने के बाद गाड़ी केऔर पिता लौट कर चले गए।
    अपने पिता से प्राप्त यह अपेक्षा उसे बहुत आहत कर गई।
    हर बात पर उसने अपनी माँ के प्रेम को पिताजी के व्यवहार से तौला और पिता उसके प्रति माँ के प्रेम के आसपास भी नजर नहीं आए। यही उपेक्षा नफरत बनकर किशोर मन पर काबिज हो गई।
    जिसका अंत उसकी बगावत के साथ होता है कि सरकारी नौकरी करते हुए दो पत्नियाँ रखे हुए हैं। मां के साथ-साथ बेटे को अपने भी भविष्य की चिंता थी

    *जब तक पिताजी की नई खुशहाली मेरी आँख से ओझल रही, तुम्हारी और अपनी बदहाली मुझे साफ दिखाई नहीं दी। मगर अब चुप नहीं रहा जाएगा मुझसे…..!*

    बच्चों को तभी तक भुलावे में रखा जा सकता है जब तक वह सब कुछ अपनी आँखों से देख नहीं लेता। देख लेने के बाद तुम मुमकिन ही नहीं।
    अंततः कचहरी की पेशी के समय अपने पिता का उतरा चेहरा देखकर उसका कलेजा ठंडक महसूस करता है।
    यह उस किशोर से युवा होते स्वयं के लिये, न्याय के लिए, आन के लिये, आत्मरक्षा के लिये बहुत जरूरी था। आत्मिक संतोष, सुकून और शांति की तरह।
    बहुत ही करुण, अंतर्द्वंद्व से जूझते बालक का स्वयं से युद्ध है यह कहानी दीदी। जो पिता को कचहरी तक पहुँचा कर ही शांति और सुकून महसूस करता है।

    उसकी खुशी की इंतहा है *”हर पेशी पर पिता का उतरा हुआ चेहरा देखकर उसका मन बाँसों उछलता है, बल्लियों उछलता है।*
    वैसे तो इस कहानी की हर पैराग्राफ पर लिखा जा सकता है लेकिन कम लिखे को अधिक समझें।
    बहुत-बहुत बधाई आपको।
    यह कहानी इसलिए भी विशिष्ट है कि यह बहुत सामयिक है, आज इस तरह की घटनाएँ बहुत हो रही है कि बच्चों को छोड़कर माँ या पिता दूसरा घर बसा रहे हैं। छीजते रिश्तों के टूटन की मार्मिक कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

  3. ख़ूबसूरत लिखती हैं आप। मुझसे पहले नीलिमा जी ने आपकी कहानी का विश्लेषण कर उस पर विस्तृत टिप्पणी दे दी है जो कि बिल्कुल सटीक है। परित्यक्त मां की विवशता और किशोर होते बच्चे का पिता के प्रति क्षोभ अच्छी तरह उजागर है। पर कोर्ट से न्याय पाना भी आसान नहीं इसलिये ही औरतें सह जाती हैं अन्याय को।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest