Wednesday, March 25, 2026
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डॉ. गरिमा भाटी की लघुकथा – वो फूलों-सी महकती एक लड़की

वो फूलोंसी महकती एक लड़की
लेकिन उसकी ज़िंदगी की सच्चाई उस महक से बिल्कुल अलग थी।
इन दिनों उसकी मजबूरी थी कि वह ऐसे व्यक्ति के साथ रहे, जिसके शरीर से ही नहीं, उसकी आत्मा से भी एक अजीबसी सड़ांध आती थी। यह सड़ांध केवल गंध नहीं थी, बल्कि एक ऐसा वातावरण था जिसमें उसका मन, उसका अस्तित्व धीरेधीरे घुटने लगता था।
जब भी वह आदमी अपने बदबू से भरे शरीर के साथ उसे छूता, तो उसे ऐसा लगता जैसे वह गंध उसके अपने शरीर में भी उतर आई हो। वह स्पर्श प्रेम का नहीं, एक बोझ का एहसास देता था। और उसका चुम्बनजो अक्सर उसकी इच्छा के विरुद्ध होता, उसे भीतर तक जड़वत कर देता। जैसे किसी ने उसकी चेतना को ही थाम लिया हो।
वह कईकई घंटों तक चुप बैठी रहती। अपने ही शरीर से आती उस गंध के साथ खुद को धीरेधीरे सड़ते हुए महसूस करती। कभीकभी उसकी आँखों से आँसू बिना आवाज़ के बहते रहते। वह रोती भी थीलंबे समय तक, बिना किसी के जाने।
जब उस गंध को सह पाना उसके लिए असंभव हो जाता, तो वह उठकर बाथरूम चली जाती। देर तक पानी के नीचे खड़ी रहती, जैसे पानी केवल उसके शरीर को नहीं, बल्कि उस एहसास को भी धो देगा जो उसकी आत्मा पर चिपक गया था।
उसकी ड्रेसिंग टेबल पर महँगे इत्र की कई शीशियाँ सजी रहती थीं। जाने कितने तरह के इत्र, पाउडर और खुशबुएँ वह अपने ऊपर लगा लेती, जैसे किसी अदृश्य सड़ांध को ढँकने की कोशिश कर रही हो। वह चाहती थी कि दुनिया को कभी पता चले कि उसके भीतर क्या सड़ रहा है।
लोग जब उसके पास से गुजरते तो कहते,
कितनी महकती हैजैसे फूलों की खुशबू हो।
उन्हें सचमुच वही दिखाई देता था।
एक फूलसी महकती लड़की।
लेकिन उन फूलों के नीचे छिपी हुई सड़ांध
वह केवल वही देख पाती थी।
डॉ. गरिमा भाटी
फ़रीदाबाद, हरियाणा
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