देखते ही देखते बादलों ने सूरज को अपनी आगोश में ले लिया। अंधेरा छा गया, बादलों की गर्जन सुनाई देने लगी। घनघोर काली घटा छा गयी। इधर एक घटा शेफाली के मन के भीतर भी छा रही थी, अंधकार बढ़ता ही जा रहा था, अंतर्मन में विचारों के बादल उमड़ घुमड़ रहे थे। वह बहुत देर तक बेखबर सी सोच में डूबी रही। जब तन्द्रा टूटी, बारिश थम चुकी थी। बालकनी में झूले की गति के समान दोलायमान विचारों को विराम देने की कोशिश में उसकी नजर गमले में लगे पौधे की एक पत्ती की नोंक पर लटकी उस आखिरी बून्द पर टिक गयी, जो टपकते टपकते रह गयी थी और अपने जड़त्व और गुरुत्वाकर्षण के बीच संघर्षरत थी।
वह खुद भी तो अपने बीते हुए कल और आने वाले कल के बीच थम से गए आज की डोर पकड़े झूल रही थी। करन उसका कल था, जिसके बीतने पर वह खुद रीत गई थी। उसके मन को अपने प्यार से सींचते हुए रोहन ने रीते कलशों को दौलत के सुकूँ से भर सा दिया था, लेकिन प्यार को पैसा प्रतिस्थापित नहीं कर सका था। यह निर्णय भी खुद शेफाली का ही था। करन और वह दोनों साथ पले, बढ़े, पढ़े और खेले थे। बचपन का साथ युवा होते होते प्यार में बदल गया। कसमें–वादे, प्यार–तकरार, मान–मनुहार यही तो दोनों की जिंदगी थी। सपने तो खूब देखे, लेकिन क्या सपनों से जिंदगी चलती है? शेफाली के घर वाले उसके लिए लड़का देख रहे थे और करन ग्रेजुएशन के बाद अच्छी नौकरी की जुगाड़ के लिए इंटर्नशिप कर रहा था। माता पिता की पसन्द था रोहन, जिसकी चकाचौंध भरी जिंदगी के आगे करन से किये वादे फीके पड़ गए। शेफाली की सहमति से उसका रिश्ता रोहन से तय हो गया।
“देखो करन प्यार से जिन्दगी नहीं चलती, मुझे भूल जाओ। तुम्हें कोई मुझसे भी अच्छी लडक़ी मिल जाएगी।” उसकी बात सुनकर करन एकबारगी टूट गया, लेकिन संस्कारों की विरासत की हिम्मत से अपने सपनों की टूटी किरचें समेटकर अपनी बिखरी ज़िंदगी को सँवारने बहुत दूर चला गया।
शेफाली भी सपनों के नये राजकुमार का हाथ थामे चल पड़ी ज़िंदगी के नये सफर पर। वह हर लम्हा रोहन में करन को तलाशने का असफल प्रयास करती। दौलत की चमक उसके प्यार की प्यास को बुझा नहीं पाई। अब उसे शिद्दत से करन के साथ बिताए पल याद आते। यूँ तो रोहन भी उसका ख्याल रखने का पूरा प्रयास करता, लेकिन उसका धीर गम्भीर व्यवहार करन के प्यार के मुकाबले बौना ही रहा। उसकी ख्वाहिशों का धुआँ बच्चों के ख्वाबों के आसमान में उड़ता रहा और करन की यादें भी उसी आसमान में गुम हो गईं। जब बच्चे भी अपने ख्वाबों और ख्वाहिशों की जंग में मसरूफ हो गए तब वह एकदम खाली हो गई।
ज़िंदगी का काम है, चलते जाना और शेफाली को वक़्त की रफ्तार के साथ दौड़ना बखूबी आता था, सो एक बिल्कुल ही नई दुनिया उसकी मुट्ठी में आ गई, जिसमें विचरते हुए उसके मुरझाए मन में नए एहसास का अंकुर उपजा और सोयी ख्वाहिशों ने अंगड़ाई ली। सोशल मीडिया का नया आभासी संसार उसे लुभाने लगा। उसके मन के एहसास कागज़ पर आकार लेते हुए अजनबियों से तारीफ बटोरने लगे। खुशगवार हवा के झोंके से संचारित ऊर्जा और उत्साह से सराबोर वह उन्मत्त नदी सी बह निकली। एक दिन बेख़याली में उसने फेसबुक पर करन को तलाशा और पहले प्यार की तस्वीर उसकी आँखों के सामने थी। करन न्यू जर्सी में बस गया था। फेस टू फेस जिससे कई बार मिल चुकी थी, उसे फेसबुक पर देख वह रोमांचित हो उठी। उसके परिवार की तस्वीरें देख ईर्ष्या भी हुई, लेकिन खुद को तसल्ली दी कि उसे भी ज़िंदगी ने वह सब कुछ दिया, जो उसने चाहा। अचानक ही इनबॉक्स में करन का मैसेज आया…
“कैसी हो?”
सम्मोहित सी अवस्था में उसने लिखा…
“मैं अच्छी हूँ, आप कौन?”
“मैं करन… पहचाना नहीं…?”
“ओह! तुम…? आखिर इतने सालों बाद तुमने मुझे ढूँढ़ ही लिया।” करन की तरफ से पहल होने से शेफाली खुश थी।
“शेफाली! मेरे फोटो पर तुम्हारे लाइक के नोटिफिकेशन ने मुझे तुम तक पहुँचने में मदद की।” वह करन के शब्दों में छुपी उसकी मुस्कुराहट को महसूस करते हुए झेंप सी गई। करन की प्रोफाइल फोटो देखते हुए गफलत में उसने लाइक कर दिया था शायद।
धीरे–धीरे बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो शेफाली की दुनिया एक बार फिर बदल गई। वह हमेशा से जैसे इन्ही पलों के इंतज़ार में थी, सोचती थी कि “काश! कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन…” रोहन उसकी खुशी के लिए खुद को व्यस्त करता रहा और शेफाली भी भौतिकता को ही खुशी का पर्याय समझती रही। जब किटी पार्टी में उसके डायमंड सेट की तारीफ होती, वह फूलकर कुप्पा हो जाती। जीवन में रिक्तता आने के बाद उसने एक बार रोहन से कहा भी कि “बस अब और नहीं… अब तुम मेरे साथ भी रहो और पास भी…” लेकिन रोहन के लिए यह आसान नहीं था। उम्र के इस पड़ाव पर दौलत से ज्यादा सुकूँ की जरूरत होती है। सोच बदलने के साथ शेफाली खुद भी बदल रही थी। करन के मुँह से उसकी तारीफ में निकला एक शब्द भी उसे दीवाना बनाने को काफी था। इतना सम्मोहन तो उसने किशोरावस्था में भी महसूस नहीं किया था। उसके अंदर प्यार का दफन हो चुका सागर करन की बातों से हिलोरे मारने लगा था और वह खुद ही खुद से शर्माने लगी थी। पहले प्यार की दूसरी पारी इतनी खूबसूरत थी कि वह उसमें डूबती चली गई।
इतने सालों तक वह पति में प्रेमी को तलाशती रही। वह प्रेमिका ही बनी रहना चाहती थी, किन्तु पत्नी बनने के साथ ही बहू, भाभी, मामी और चाची जैसे कितने ही रिश्तों में बंध गयी थी। फिर माँ बनते ही जिम्मेदारियों और कर्तव्य की लंबी फेहरिस्त सामने थी। गुजरते वक़्त के साथ फेहरिस्त छोटी होती गयी और वह खाली होती गयी। इतने सालों में कभी खुद के लिए सोचा ही नहीं, शायद अभी भी नहीं सोचती किन्तु करन ने धीरे से उसकी ख्वाहिशों के बंद किवाड़ पर दस्तक दी और उसने दरवाजा पूरा खोल दिया। बच्चे जब हॉस्टल गए थे, उन्हें कितनी हिदायतें दीं थी उसने, पर वह खुद ही उन वर्जनाओं को तोड़ना चाह रही है। करन का मैसेज आया कि वह एक महीने के लिए भारत में है और शेफाली से मिलना चाहता है। वह पसोपेश में थी। दिमाग रोहन के पक्ष में और दिल करन की ओर खिंचा जा रहा था… दिल और दिमाग की जंग जारी थी। क्या करे और क्या न करे? बारिश की बूँदों ने दग्ध हृदय को कुछ राहत दी।
इंसानी फितरत है कि जो मिल जाता है वह आम हो जाता है। खास की फितरत काश में ही है। करन के नज़दीक बैठी शेफाली महसूस कर रही थी कि उसका फैसला गलत था। आज करन के पास दौलत और शोहरत की कमी नहीं है। काश कि वे ज़िंदगी को रिवाइंड कर पाते। उसके मन की बात जुबाँ पर आ ही गई। हौले से मुस्कुराकर करन उसका हाथ थामकर सहलाने लगा। दोनों बहुत देर तक समुद्र किनारे बैठकर दूर क्षितिज में निहारते रहे। सूर्यास्त हो गया। पानी की लहरें तन–मन भिगो रही थीं। करन के कंधे पर सिर टिकाए वह उसकी गर्म साँसों को महसूस कर रही थी। दग्ध हृदय अधरों के रसपान को व्याकुल हो नज़दीक आने लगे, शेफाली की धड़कन तेज़ हो गई और अचानक उसे चेहरे पर तीव्र गर्मी महसूस हुई। जब ताप बर्दाश्त के बाहर हो गया, उसने अचकचाकर आँखें खोल दीं। रोहन उठ चुका था और करन कहीं नहीं था। खिड़की से आती सूर्यकनियों की उजली धूप और उसके उष्ण तन मन की तपिश ही उसे झुलसा रही थी। सुबह का सपना सच होता है, यह सोचकर वह मुस्कुराई और गुनगुनाते हुए बाथरूम में घुस गई। धीरे धीरे सरकते हुए दिन के दूसरे छोर पर उसके इंतज़ार की इंतेहा होनी थी।
आज मौसम बहुत खुशगवार था। उसका मन वैसे ही करन के प्यार की फुहार से सराबोर था। उससे रूबरू होने के इंतज़ार में एक एक लम्हा उसे काफी लंबा लग रहा था। झील पर तैरते बोट क्लब में जब उसने एंट्री ली तो दूर से ही कोने की टेबल पर बैठे करन ने हाथ हिलाकर स्वागत किया। दोनों टेबल पर आमने सामने बैठे एक दूसरे को चुपचाप चोर नज़र से निहारते रहे। सालों का फासला आभासी दुनिया में जिस तत्परता से मुखर हो खो सा गया था, वास्तविकता में दोनों के बीच मौन सा पसरा था। टाइटैनिक की रिंगटोन ने ध्यान भंग किया। करन की पत्नी का फोन था… “यस हनी! मैं शेफ… मेरा मतलब… कि… तुम जानती हो न… शेफुद्दीन मेरा बचपन का दोस्त… बस उसी से मिलने आया हूँ, घर पहुँचकर कॉल करूँगा। ओके… ”
“हे हे… शेफू क्या है न कि मेघा को हमारा पास्ट पता है, अभी इंडिया नहीं आयी है। तुम्हारा नाम सुनकर खामखाँ ऊलजलूल सोचती, बस इसीलिए थोड़ा सा झूठ…”
“कोई बात नहीं…” प्रत्यक्ष में यही बोलकर शेफाली मन ही मन सोचने लगी… ‘क्या हर पुरूष दोहरे चरित्र को जीता है? फिर त्रिया चरित्र पर इतनी किस्सागोई क्यों…? मैं भी तो रोहन की नज़रों में अच्छी बनी रहते हुए करन को वक़्त दे रही थी? पर मैंने रोहन से भी झूठ नहीं बोला, फिर…? फोटो में तो मेघा सुलझी हुई लगती है, इस उम्र में भी ऐसी सोच… ह्म्म्म…’ उसने विचारों को परे धकेलने की कोशिश की। इतनी मुश्किल से तो जिंदगी दोबारा करन को उसके नज़दीक लाई है, क्या ये पल यूँ ही जाया हो जाएंगे? लेकिन करन ने तो दूर जाना ही नहीं चाहा था, उसी ने रोहन से शादी के लिए… उफ्फ… रोहन का ख्याल आते ही वह घर जाने को बेचैन हो उठी।
कॉफी के खाली मग में चम्मच की धुन अब कर्कश लग रही थी। एक वक्त था, जब इसकी मधुरता में खोकर वे घण्टों गुज़ार देते थे। फेसबुक पर पुराने दिनों को याद करते हुए भी वक़्त का पता ही नहीं चला कभी… आज भी सुबह से जितनी बेकरारी थी, उसका लेशमात्र भी नहीं बचा था। दोनों ने ऑनलाइन इतनी बातें कर ली थीं कि ऑफ़लाइन कुछ बचा ही नहीं।
“न जी भर के देखा, न कुछ बात की
बड़ी आरजू थी मुलाकात की…” शब्द कानों में गुंजायमान हो उठे और घर लौटते हुए शेफाली ने खुद से एक वादा किया कि अपने निजी जीवन को आभासी दुनिया में नहीं खोने देगी। उसने फेसबुक पर करन को अनफ़्रेंड कर दिया। वह जान चुकी थी कि कुछ ख्वाबों और ख्यालों को कभी हकीकत में नहीं बदलना चाहिए।
वाह!! बेहद शानदार भावपूर्ण कहानी। वास्तविक जिंदगी और आभासी जिंदगी की हकीकत का सटीक खाका खींचा है आपने वंदना जी।
साधुवाद!!
वंदना जी की कहानी अन्त तक आते आते मेरी पसंदीदा कहानी बन गई।
धन्यवाद सन्ध्या जी…
अहा!खूबसूरत कहानी!
कहानी का अंत लाजवाब है, बहुत बधाई हो
कहानी का अंत लाजवाब है,बहुत बधाई
जी आभार
Wow!! Very emotional story. Vandana mam , you have drawn an accurate outline of the reality of real life and virtual life.
बहुत सुंदर रचना.. मैम
जिंदगी का यू टर्न कहानी अच्छी लगी वंदना जी! एक कहावत है- देर आयद, दुरुस्त आयद। सही वक्त पर सही निर्णय लेना ही बुद्धिमत्ता है। फेसबुक की यह उलझने जीवन के लिए कभी-कभी तकलीफ भी बन जाती हैं।या तो मन स्मृतियों से परेशान रहता है, वर्तमान से दुखी और अतीत के लिए परेशान, और फिर कभी एक ही पल में एक ही छोटी सी घटना, वाक्य या बात सारी स्मृतियों को धूमिल करके नया रास्ता दिखा देती हैं। एक सकारात्मक कहानी के लिए आपको बहुत- बहुत बधाइयाँ।
धन्यवाद दीदी
धन्यवाद दीदी