Saturday, May 9, 2026
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लखनलाल पाल की कहानी – पेंशन

“झून्नो दाई चरन छुअत।” झुन्नो के कानों में आवाज पड़ी तो उसने पीछे मुड़कर देखा। गनेसा उसके सामने खड़ा था। उसने झुककर झुन्नो के पैर छू लिए। झुन्नो ने आंखों पर हाथ की छतरी लगाकर पूछा, “कौन? गनेसा है का?”
” हओ दाई।”
” कब आया तू?”
” कल आया था।”
झुन्नो गनेसा को आश्चर्य से देख रही थी। कितना बदल गया है यह। पहले फटे-चीथड़ों में लिपटा सरपंच की भैंसें चराता था। एक फुरफुरिया में जाड़ा काट देता था। महतारी गनेसा की हालत पर हींसती, “लौंडा के पास उन्हा तक नहियां, ऐसे ही जड़ात रहत।” समय की बात है, आज कैसा डटा-फटा है। जीन्स-शर्ट, आंखों में चश्मा लगाए लगता ही नहीं है कि यह इसी गांव का है, बिल्कुल अन्जान लगने लगा है। सब रुपयों की माया है। हाथ पैसा आए से आदमी की रौनक बदल जाती है। कोई सोचता भी न था कि गनेसा का कायाकल्प हो सकता है।
” बाई (अम्मा) को कुछ लाया है?”
“हां दाई, उनके लिए बढ़िया धोती-ब्लाउस खरीद लाया हूं।”
“चलो, ठीक है बेटा।” झुन्नो उसको निहारती हुई बोली, “बेटा, बाई ने बहुत भुगतो।”
“अब आराम करने के दिन आ गए दाई।” गनेसा मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ गया।
झुन्नो ने गनेसा की अम्मा की हालत देखी है। उसके पास खेती-बाड़ी नहीं थी, मजदूरी करके पेट पालती थी। अपने कुनबे का पालन-पोषण कैसे किया, मैं जानती हूं। उसके पति को न जाने क्या हो गया था कि, जरा सी मेहनत से उसके पेट की तकलीफ बढ़ जाती थी। लोग पैसे देते हैं, तो काम भी करवाते हैं। उन्हें किसी के दु:ख-तकलीफों से क्या लेना-देना।
                    
बच्चे कब तक भूखे रहते? भूखे पेट बच्चे जब दूसरों के मुंह की ओर देखते तो मां का कलेजा फटने लगता। बच्चों की खातिर वह मजदूरी करने लगी। गांव में रोज-ब-रोज मजदूरी तो मिलती नहीं थी। इसी से वह लोगों के घर जाकर अनाज, दाल छांट-बीन आती। इसके एवज में लोग कुछ रोटियां उसके हाथ पर रख देते । खुद भूखी रहती पर बच्चों को रोटियां खिलाती थी।
                     
गनेसा पांचवी कक्षा तक ही पढ़ पाया था। घर की हालत ऐसी थी कि न पहनने को कपड़े और ना कॉपी-किताबें। अध्यापक रोज कपड़ों के लिए टोकते, नोटबुक न होने से पीटते। बच्चा था, कहां तक पिटता?  पिटने की भी सीमा होती है। उसने पढ़ाई से विद्रोह कर दिया था। माता-पिता चाहे जिस स्थिति में हों पर बेटे को पढ़ा-लिखाकर अफ़सर बनाने का ख़्वाब ज़रूर देखते हैं। आर्थिक स्थिति दयनीय होने पर भी उसने बेटे को पढ़ाना चाहा, पर वह न पढ़ा। मां-बाप ने पीटकर स्कूल भेजने की कोशिश की पर हठी बालक टस से मस न हुआ। वह स्कूल न गया तो गया ही नहीं।
                       
आज का समय होता तो वह जरूर पढ़ जाता क्योंकि सरकार की ओर से मुफ़्त काॅपी-किताबें, कपड़ा-भोजन आदि दिया जाता है। लेकिन गनेसा के लिए देर हो चुकी थी।
                       
अभी वह छोटा था, कुछ करने लायक तो था नहीं। मां सोचती थी कि यहां-वहां फालतू घूमने से अच्छा है, कुछ करे। उसने गनेसा को सरपंच के यहां काम पर लगा दिया। वह दिन भर उनकी भैंसें चराता और शाम को रोटियां लेकर घर लौट आता।
                    
जब आदमी का समय ख़राब आता है, तो वह एक हाथ जोड़ता दो हाथ टूट जाता है। गनेसा की मां जो कुछ कमाती, वह पति की बीमारी की भेंट चढ़ जाता। घर में और कुछ था नहीं जिसे बेच-खरचकर उसकी दवा कराती।
                   
कुछ दिनों से गनेसा सरपंच की भैंसें चराने में अटर-मटर करने लगा था। एक-दो दिन भैंसें ऐसे ही खूंटे से बंधी रही, गनेसा उन्हें चराने न ले गया। महतरिया ने खूब समझाया पर बागी तेवरों का गनेसा अपनी जगह से न हिला। सरपंच समझ गया था कि इसके पेट में दाने पड़ने लगे हैं, इसीसे उछल-कूद मचा रहा है। उसने उनकी तरफ़ से हाथ खींच लिए। फिर रोटी के लाले पड़ने लगे। हफ़्ते में दो-एक दिन मजदूरी मिलती थी, शेष दिन ऐसे ही घर में बैठे रहो।
                       
गनेसा चौदह-पन्द्रह साल का हो गया था। उसकी दाढ़ी-मूंछों में कालापन झलकने लगा था। उसकी समझ भी बढ़ गई थी। उसे एहसास होने लगा था कि गांव में कुछ होने वाला नहीं है। वह अब बाहर जाने की सोचने लगा। इसी गांव के कुछ लोग बाहर निकल गए हैं। वहां वे खूब कमा-खा रहे हैं। यही बातें उसे कुरेदती थी।
                         
सरपंच को आभास हो गया था कि यह लड़का अब टिकने वाला नहीं है। उसकी भैंसें कौन चराएगा? उल्टे को सीधा और सीधे को उल्टा न कर पाया तो सरपंच किस बात का? उसने गनेसा की मां को प्रलोभन दिया कि लड़का हमारी भैंसें चराता रहेगा तो मैं तेरी पेंशन बनवा दूंगा।
                        
गनेसा की मां सरपंच के प्रस्ताव से गदगद हो उठी। कृतज्ञतावश उसने सरपंच को दीनबंधु से नवाज दिया। गनेसा की मां ने बेटे को बहला-फुसलाकर भैंसें चराने के लिए राजी कर लिया था।
                     
गनेसा की अम्मा की खुशी देखते बनती थी। वह सरपंच को असीस रही थी। आज उसके हाथ खरे-खरे नोट आ गए थे। इन नोटों को पाकर उसके पैर धरती पर नहीं रुक रहे थे। हवा में उड़ती गनेसा की अम्मा, झुन्नो को रास्ते में मिल गई। उसके सिर पर रखी बोरी को लक्ष्य करके झुन्नो ने पूछा, “क्या लाई री?”
    
“पिसिया(गेहूं) खरीद लाई काकी। घर में खाने को एक दाना तक नहीं था।” वह उछाह से भरी बोली, “नंबरदार कक्का साजे हैं।” उसने बोरी सिर से उतारकर ज़मीन पर रख ली, “उन्होंने तोल से ज्यादा पिसिया डाल दी।”
    
झुन्नो उसके उल्लास को देख रही थी।
“कितनी है?”
“आठ पसेरी है।” वह चहकी, “काकी पिंसन मिल गई थी सो पिसिया खरीद ली।”
            
इसी पेंशन को बताने के लिए वह उतावली थी। न कोई उसे टोक रहा था और न पूछ रहा था। काकी ने उसकी मुराद पूरी कर दी। इस उपलब्धि को बताने के लिए वह बेचैन थी।
          
झुन्नो सोच में पड़ गई। इसके घर में किसको पेंशन मिल रही है और किस बात की? उसने अपनी अक्ल दौडा़ई पर किसी निष्कर्ष पर न पहुंच सकी।
               
झुन्नो थक हारकर बोली, “काए री! काहे की पेंशन मिल गई? खसम मलेटरी में हो गया क्या?”
                
उसके वक्तव्य को दरकिनार करते हुए वह आनंद विभोर होकर बोली, “विधवा पिंसन के पैसा आ गए काकी। कल ही तो निकाले हैं।”
“विधवा पेंशन।” काकी की आंखें सिकुड़ गई, “तेरे घर में कौन विधवा बैठी है?”
“काकी, मुझे मिली है।”
“तेरा खसम कब मर गया री।” झुन्नो क्रोध में फूंसी।
“क्या करूं काकी, इनका पेट पिरात रहत, पता नईं क्या हो गया है। मेहनत मजदूरी नहीं कर पाते हैं। सरपंच जू से काम मांगने गई थी, काम तो न मिला, उन्होंने विधवा पिंसन बंधवा दी।” वह खुशी से लबरेज थी, “छै महीने की इकट्ठी पिंसन आ गई। एक हजार सरपंच जू ने लेलिए, आठ सौ मेरे हाथ में है। अबकी बार से वे रुपए न लेंगे, सारे रुपए मेरे होंगे। वे मेरे रुपए कौन लेते काकी! पर अफसरों को भी तो खिलाना-पिलाना पड़ता है। सरपंच जू अपनी गांठ से थोड़े रुपए लगाते।”
                     
झुन्नो और गनेसा की अम्मा के स्तर में बहुत अंतर था फिर भी गनेसा की अम्मा अपने आप से संतुष्ट थी। झुन्नो का मन चंचल हो रहा था, इसलिए वह हिचकोले खा रही थी। इसी ऊहापोह में उसने कहा, “ऐसा ही था तो उन्हीं के यहां काम पर न लग जाती। इससे ज्यादा रुपए तो वही दे देते।
  
“काकी मैं तो खूब काम करती पर लड़ाई-झगड़ा कहां नहीं होता है, सबके घर में होता। सरपंच जू लड़ाई-झगड़ा से दूर रहत। सरपंचिन कछु शक्की स्वभाव की है। वह बोली, “काकी मेरे लिए यही बहुत है। साल-छै महीने में कुछ रकम तो हाथ में आ जाया करेगी।”
                      
काकी को जैसे सन्निपात दब गया हो। यह क्या कह रही है? ऐसा तो वह पहली बार देख-सुन रही है। चंद रुपयों की खातिर इसने यह बाना पहन लिया। अरे पहन लिया था तो चुप रहती। यह तो उरै-उरै बता रही है।
                   
झुन्नो से रहा न गया। वह गनेसा की मां को डांटते हुए बोली, “काए री ! जिंदा खसम को मारकर विधवा का परपंच रच लिया।”
“काकी भूख विधवा-सधवा नईं दिखत। ये सारे चोंचले तो भरे पेट वालों के हैं। हमारे जिन्नगी में विधवा-सधवा की लछमन रेखा कहां है?”
“सरपंच ने तुझे यह भी सिखा दिया?”
“काकी, सरपंच जू ये बातें कैसें जान सकत। यह तो वही जान सकत जिसने भोगा है।”
झुन्नो उसके मुख की ओर एकटक देख रही थी। गनेसा की मां की नाक की पुंगरिया बार-बार हिल जाती थी। चेहरे की रक्तिम आभा उस पुंगरिया पर पड़ती तो वह चमक उठती थी। काकी के दिमागु में अनगिनत भाव घुमड़ने लगे। इन भावों ने शब्दों का रूप ग्रहण कर लिया, “सरकार ने तुझे विधवा कैसे मान लिया?”
“कुछ नहीं काकी, मैंने वहां जाकर पांवन के मीना-बिछिया उतार लिए थे और हाथों में रबड़ की दो-दो चूड़ियां डाल ली थीं। बस बंध गई पिंसन। घर आकर फिर पहन लिए मीना-बिछिया।”
                    
काकी दंग रह गई। क्या कोई सुहागिन ऐसा भी कर सकती है? उसके मुख से पीड़ा भरा अफ़सोस निकला, हाय रे दुर्भाग्य ! एक तरफ तूने धन के अंबार लगा दिए तो दूसरी ओर बिल्कुल खाली पेट।” झुन्नो ने ईश्वर के न्याय पर सख़्त ऐतराज जताया, भगवान! तूने खाली पेट बनाए ही क्यों?”
                                 
लखनलाल पाल
कृष्णा धाम के आगे अजनारी रोड नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश
परिचय – शिक्षा- बी.एस-सी.(गणित),बी.एड, एम.ए (हिन्दी) ,पीएच.डी
साहित्यिक गतिविधियां – हंस, कथादेश, कथाक्रम, लमही, युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा आदि में कहानियां प्रकाशित।
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा, ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास)
कहानी संग्रह – पंच बिरादरी,
मोबाइल नं – 7668715109
Email – [email protected]


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16 टिप्पणी

  1. कथाकार लखनलाल पाल हमारे समय के महत्वपूर्ण कहानीकार हैं।उनकी कहानियों में ग्रामीण जीवन का जीवंत तथा यथार्थ चित्रण देखने को मिलता है।इनकी कई कहानियां हमने पढ़ी हैं।हालांकि कहानीकार को किसी की परम्परा से जोड़ने से एतराज है लेकिन कहना न होगा कि उन्हें रेणु की परम्परा में कहा जाय तो असंगत नहीं होगा।इनकी कहानियों में किस्सागोई और स्वाभाविकता साफ तौर पर दिखलाई पड़ती है।पेंशन कहानी आज के ग्रामीण जीवन का सच है ,जहां आज भी रोजगार के मौके बेहद कम हैं और जो हैं इस अर्ध सामंती समाज के ताकतवर शक्तियों के पास है,जो स्त्रियों और गरीबों के श्रम का कई स्तरों पर शोषण करते हैं।कहना न होगा कि पेंशन कहानी यथार्थवादी कहानी है।रोजगार की तलाश में गांवों से बाहर शहरों में जाने के बाद मजदूरों को सामंती शोषण से कुछ राहत तो मिली है और उनकी स्थितियों में कुछ बदलाव भी आया।यह कहानी अपने निहितार्थ में इन्हीं परिस्थितियों तथा समस्या पर बात करती है ।हालांकि पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूरों का दोहन और शोषण बंद नहीं हो जाता।बल्कि वहां उसका स्वरूप बदल जाता है।यह कहानी मूलतः ग्रामीण जीवन और वहां सामंती अवशेषों के बीच स्त्रियों और गरीबों के शोषण और बेबसी को कहती है।

  2. *पेंशन : सामंती षड्यंत्रों को बेनकाब करती सशक्त कथा*

    आदरणीय लखनलाल पाल की कहानियों में आम जिंदगी की असली कहानी होती है। अपनी कहानियों में जहाँ वे बिना लाग लपेट के पात्रों के जीते जागते असली चरित्रों को उकेरते हैं, वहीं उनके नाक-नक्श का वर्णन भी कुशल चितेरे की तरह चित्रित कर देते हैं। फिर चाहे गनेसा में आई तरुणाई के प्रतीक काले हो रहे उसके डाढ़ी मूँछ के बाल हों या बातचीत करने में मटकती गनेसा की अम्मा की नाक की पुंगरिया।
    गाँवों में मजदूरों, मजबूरों को रोजमर्रा की जिंदगी में जिन तकलीफों को भोगना पड़ता है, जिन षड्यंत्रों से उनका वास्ता पड़ता है, किस प्रकार से उनका घोषित, अघोषित शोषण होता है, इसकी मुकम्मल पड़ताल *पेंशन* कहानी करती है।
    गाँवों में आज भी जिस तरह मानसिकता है, साहूकारी और सामंती प्रवृत्ति है, तमाम सत्यानाशी हथकंडे हैं, पेंशन कहानी उन सभी छलछंदों के जाल को बहुत बारीकी से परतदरपरत उघाड़ती है।
    एक बात और भी खास है कि इस कहानी में कहीं भी आसानी से यह समझ में नहीं आता है कि लेखक ने यहाँ व्यवस्था पर करारा व्यंग्य भी किया है और प्रहार भी। लेखक अपनी किस्सागोई की बनावट और बुनावट का ऐसा तिलस्म रचता है कि वह सब कुछ कहकर भी दूध धुला सा एक ओर अलग खड़ा हो जाता है।
    रोजमर्रा की भाषा का प्रवाह पेंशन कहानी में बहुत बड़ी ताकत बनकर उभरा है।
    सशक्त कथा के लिए आदरणीय लखनलाल पाल का हार्दिक अभिनंदन।

    डॉ० रामशंकर भारती

  3. भारती जी आपका बहुत बहुत आभार।
    रचना को देखने का आपका दृष्टिकोण अनोखा है। कई बार तो रचना लिखते समय लेखक भी नहीं समझ पाता है कि मैंने जो लिखा है उसको इस तरह से भी देखा जा सकता है। लेकिन एक समीक्षक वह सब देख लेता है जो साहित्य के दायरे में आता है। साहित्य के उद्देश्य को परिभाषित करता है। बढ़िया प्रतिक्रिया दी है भारती जी

  4. वाह! कहानी पढ़कर आनन्द आ गया।
    कहानी सीधी,सरल शब्दों में बहुत कुछ बयान कर रही। पढ़कर मैं अपने गांव के कुछ फ्राड लोगों को आंखों के सामने देखने लगा।उन्हीं में से एक को सामने रखकर कहानी को पढ़ा है। वैसे यह ऐसी कहानी है जिससे गांव से जुड़ा हुआ प्रत्येक व्यक्ति गहरे तक जुड़ाव महसूस करेगा; क्योंकि इसमें जिन समस्याओं को उठाया गया है वो गांवों के जीवन में बहुत सहजता से मिल जाती हैं।
    गांवों में ग़रीबों का आज भी शोषण हो रहा है बस शोषण का तरीका बदल गया है।एक बात मुझे और बहुत अच्छी लगी कि जिस प्रकार से गांव के शब्दों का प्रयोग किया है वो पाठकों को अन्त तक बांधकर रखता है।
    मेरा व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानना है कि कहानी वही उत्कृष्ट श्रेणी की है जिसको पढ़ते समय पाठक दृश्यों की परिकल्पना भी करता चले इस मानक पर कहानी पूर्णरूपेण खरी उतरती है,साथ ही साधारणीकरण भी होता चलता है।
    आदरणीय लखन जी भाईसाहब हमारे गृह जनपद के होने के नाते भाईसाहब से विशेष लगाव है। अस्तु भाईसाहब आपको इस उत्कृष्ट कहानी के सृजन हेतु अशेष शुभकामनाएं।आपने मुझे पढ़ने का अवसर दिया अस्तु खूब आभार।
    ईश्वर आपको सदैव सृजनरत रखते हुए यशस्वी बनायें ऐसी ईश्वर से मङ्गलकामना है।

  5. अखंड बुंदेलखंड के प्रतिष्ठित किसान कथाकार डॉ० लखनपाल पाल जी की कहानी ‘पेंशन’ बुंदेलखंड के गॉंवों में व्याप्त विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षिक समस्याओं को उजागर करते हुए बुंदेलखंडी समाज, संस्कृति और भाषा का जीवंत दस्तावेज पेश करती है। ‘पेंशन’ कहानी में चार मुख्य पात्र हैं – झुन्नो दाई, गनेसा की माँ, गनेसा और सरपंच। इस कहानी में दो गौण पात्र हैं – गनेसा के पिता और सरपंचिन। यह कहानी नायिका प्रधान कहानी है और इसकी कथानायिका है गनेसा की माँ। यह कहानी की पूर्वदीप्ति शैली में लिखी गई है और इसकी भाषा आम बोलचाल की हिन्दी है, बुंदेली के संवाद इसकी सम्प्रेषणीयता की शक्ति को बढ़ाकर इसे अत्यंत प्रभावी कहानी बनाते हैं।

    ‘पेंशन’ कहानी की शुरूआत में बुंदेलखंड की पलायन की समस्या का चित्रण गनेसा के माध्यम से किया गया है। ‘गनेसा’ अपने परिवार की आर्थिक तंगी की बदौलत गाँव से दूर परदेश में मजदूरी करने जाता है और फिर कुछ समय बाद कमाई करके फैशन वाले कपड़े पहने आधुनिक युवा बनकर गॉंव वापिस लौटता है तो वो हमें ‘गोदान’ के ‘गोबर’ की याद दिलाता है। गनेसा और गोबर दोनों का स्वभाव भी एक जैसा ही है – विद्रोही स्वभाव। लेकिन गनेसा की माँ और गोबर की माँ में जमीन-आसमान का अंतर है।

    इस कहानी में भुखमरी और गरीबी की समस्या को प्रमुख रूप से उठाया गया है। गनेसा की माँ अपने बच्चे गनेसा की भूख मिटाने और अपने बीमार पति का इलाज कराने हेतु दिनरात मजदूरी करती है। गरीबी और बदहाल शिक्षा व्यवस्था के कारण गनेसा कक्षा पाँचवी तक ही पढ़ पाया था। उस समय सरकार ‘गरीबी हटाओ’ योजना चला रही थी लेकिन शिक्षा पर उतना ध्यान नहीं दे रही थी। वर्तमान समय में सरकार ‘सबको शिक्षा’ के मिशन पर काम कर रही है इसलिए आज के समय में गनेसा भी पढ़ सकता है। पाँचवी के बाद गनेसा ने पढ़ाई छोड़ दी थी और वह उस समय मेहनत-मजदूरी का काम करने लायक नहीं था तो उसकी माँ ने उसे सरपंच के यहाँ भैंसें चराने के काम पर लगवा दिया था। उसे भैंसें चराने के काम के बदले सिर्फ रोटियाँ ही मिलती थीं…।

    इस कहानी में भ्रष्टाचार की समस्या को सरपंच के कारनामों के माध्यम से उजागर किया गया है। जब युवा गनेसा सरपंच की भैंसें चराने का काम ना करने का मन बनाता है तो सरपंच गनेसा की अशिक्षित और गरीब माँ को पेंशन बंधवाने की लालच देता है तब माँ सरपंच की बात मानकर गनेसा को भैंस चराने हेतु फिर से तैयार कर लेती है। सरपंच अपना वचन निभाता है और गनेसा की माँ की विधवा पेंशन बँधवा देता है। जबकि गनेसा के पिता जीवित थे। गनेसा की माँ के पेंशन के पहली बार एक साथ अट्ठारह सौ रुपए आए तो सरपंच ने उसमें से एक हजार रिश्वत के रूप में ले लिए। आठ सौ रुपए में गनेसा की माँ ने राशन खरीदा। जब झुन्नो दाई ने गनेसा की माँ से पेंशन के बारे में उससे पूँछताछ की तो उसने कहा – “काकी भूख विधवा-सधवा नईं दिखत। ये सारे चोंचले तो भरे पेट वालों के हैं। हमारे जिन्नगी में विधवा-सधवा की लछमन रेखा कहां है?”
    गनेसा की माँ ने बिल्कुल सही जवाब दिया। गरीबी से उबरने हेतु जनता को गनेसा की माँ जैसा बनना चाहिए।

    लखनलाल जी को समसामयिक समस्याओं – गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, पलायन, भ्रष्टाचार और प्रशासन की नाकामी को चित्रित करती सशक्त कहानी ‘पेंशन’ लिखने हेतु और इस कहानी को पुरवाई के संपादक तेजेंद्र शर्मा जी को भौत-भौत बधाई।

    ©️ किसान गिरजाशंकर कुशवाहा ‘कुशराज’
    (युवा आलोचक)
    १७/११/२०२४, झाँसी

  6. आदरणीय लखन लाल पाल जी द्वारा रचित कहानी पेंशन पढ़ी , चूंकि श्री पाल जी भी ग्रामीण क्षेत्र से आते है , अतः उनकी कहानियों में वास्तविक ग्रामीण परिवेश के दर्शन होते है । चाहे वो बात भाषा शैली की हो , या पात्रों के नामकरण की ।
    इनके साधारण पात्र भी असाधारण शिक्षा सहज में ही दे देते है ।
    इस प्रकार यह कहानी एक ग्रामीण परिवेश में एक साधारण महिला किस प्रकार की सामाजिक समस्याओं का सामना करती है । किस प्रकार गांव के कुछ ऊँची जाति के लोग किस प्रकार की सामाजिक संरचना स्थापित करते है ।
    किस प्रकार एक महिला जब समाज मे उपेक्षित होती है , तो वह सामाजिक मर्यादाओ को भूलकर लाभ सरकारी योजनाओं का लाभ पाने हेतु स्वांग रचती है । यह इस कहानी में दर्शाया गया है ।
    कहानी की भाषा पूरी तरह बुंदेली है ,कही कही कुछ शब्दों को समझने के लिए प्रयास करना पड़ता है ।
    मुंशी प्रेमचंद की तरह ही श्री पाल जी आधुनिक समय मे समाज के निचले – तबके ,दबे – कुचले लोगो की भाषा बनकर उभरे है ।
    हमको आशा है , हम लोगो की साहित्यिक यात्रा आपके साथ यू ही लगातार चलती रहे , और आप साहित्य के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करे ।
    जय हिंद

    • Rishabh Khare जी, आपने कहानी के मर्म को समझा और अपनी प्रतिक्रिया दी, इसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद। आपको बुंदेली के कुछ शब्दों के अर्थ को समझने का प्रयास करना पड़ा, फिर भी आपने समझ लिया। यह बड़ी बात है। पुनः आपको धन्यवाद

  7. शैली मैडम जी आपने कहानी पढ़ी और उस पर इतनी अच्छी टिप्पणी की, इसके लिए आपको बहुत बहुत आभार

  8. कथाकार लखनलाल पाल हमारे समय के महत्वपूर्ण कहानीकार हैं।उनकी कहानियों में ग्रामीण जीवन का जीवंत तथा यथार्थ चित्रण देखने को मिलता है।इनकी कई कहानियां हमने पढ़ी हैं।हालांकि कहानीकार को किसी की परम्परा से जोड़ने से एतराज है लेकिन कहना न होगा कि उन्हें रेणु की परम्परा में कहा जाय तो असंगत नहीं होगा।इनकी कहानियों में किस्सागोई और स्वाभाविकता साफ तौर पर दिखलाई पड़ती है।पेंशन कहानी आज के ग्रामीण जीवन का सच है ,जहां आज भी रोजगार के मौके बेहद कम हैं और जो हैं इस अर्ध सामंती समाज के ताकतवर शक्तियों के पास है,जो स्त्रियों और गरीबों के श्रम का कई स्तरों पर शोषण करते हैं।कहना न होगा कि पेंशन कहानी यथार्थवादी कहानी है।रोजगार की तलाश में गांवों से बाहर शहरों में जाने के बाद मजदूरों को सामंती शोषण से कुछ राहत तो मिली है और उनकी स्थितियों में कुछ बदलाव भी आया।यह कहानी अपने निहितार्थ में इन्हीं परिस्थितियों तथा समस्या पर बात करती है ।हालांकि पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूरों का दोहन और शोषण बंद नहीं हो जाता।बल्कि वहां उसका स्वरूप बदल जाता है।यह कहानी मूलतः ग्रामीण जीवन और वहां सामंती अवशेषों के बीच स्त्रियों और गरीबों के शोषण और बेबसी को कहती है।

  9. आशु जी, पेंशन कहानी पर आपने बढ़िया समीक्षा की है। कहानी लिखने के उद्देश्य की सफलता तभी है जब पाठक या समीक्षक उस पर अपनी राय देते हैं। उस लिखे पर अपनी प्रतिक्रिया की मुहर लगाते हैं। आपका बहुत बहुत शुक्रिया आशु जी।

  10. कुशराज जी पेंशन कहानी की बढ़िया समीक्षा करने के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद। आपने कहानी को पढ़ा ही नहीं बल्कि पढ़कर उसके रेशे रेशे की जांच पड़ताल की है। कहीं कुछ तो नहीं छूट पाया है। जब समीक्षक उस लिखे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं तो लेखक का हौसला बढ़ता है। लिखने का उद्देश्य सफल हो जाता है, और लेखन का भी कि हमने जिस विषय पर कहानी लिखी है क्या वह स्वीकार्य है ? किस स्तर पर? जमीनी स्तर पर या काल्पनिक स्तर पर?
    जहां सामाजिक ताना-बाना टूटता है वहीं से कहानी का जन्मना शुरू हो जाता है। लेखन का मुख्य उद्देश्य तो उस ताने-बाने को ठीक करना होता है, लेकिन यह ठीक होना हमेशा दुखदाई होता है लेकिन कला उस दुखद विषय को आनंद की ओर ले जाता है।साथ ही समाज की विषमता को भी उजागर कर देता है।

  11. आशुतोष जी आपकी समीक्षा से आश्वस्त हूं कि जो कहानी रची है वह समाज की एक कड़वी सच्चाई है। यह एक जगह की बात नहीं है। हर जगह की बात है। कहानी पढ़ते समय उसके पात्र पाठक के आसपास घूमते दिखाई देना लेखन की सफलता है। बढ़िया टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद

  12. इस देश की निम्नतम इकाई गांव गलियारों में अभावों के बीच सांस लेती संघर्षपूर्ण जिन्दगी के कड़वे यथार्थ को उद्घटित करती कहानी। ऐसी कहानी वही लिख सकता है जिसने अपना जीवन ऐसे ही परिवेश के इर्दगिर्द जिया हो एवं पेट भरने की जद्दोजहद में जूझते लोगों की पीड़ा को आत्मीयता से महसूस किया हो। अपने परिवार के लिए रोजीरोटी जुटाने में संघर्षरत भोली भाली बूढ़ी महिला की कहानी के माध्यम से लेखक ने बहुआयामी दृष्टिकोण से समाज की विभिन्न सच्चाइयों, समस्याओं, विडम्बनाओं को बड़ी सूक्ष्मता के साथ अनावरित किया है।

  13. राहुल चौरसिया जी, सारगर्भित समीक्षा के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद

  14. राहुल चौरसिया जी, सारगर्भित समीक्षा के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद । आपकी समीक्षा से मन प्रसन्न हो गया।

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