Tuesday, June 16, 2026
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रेनू मंडल की कहानी – ऊँचा कद

चार महीने बीत चुके थे बल्कि दस दिन ऊपर हो गए थे किंतु बड़े भैया की ओर से अभी तक कोई खबर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएंगे। यह कोई पहली बार नहीं था कि बड़े भैया ने ऐसा किया हो। हर बार उनका ऐसा ही रवैया रहता है। जब भी पापा को रखने की उनकी बारी आती है, वह समस्याओं से गुजरने लगते हैं। कभी भाभी की तबीयत खराब हो जाती है। कभी ऑफिस का काम बढ़ जाता है और उनकी छुट्टी कैंसिल हो जाती है। विवश होकर मुझे ही पापा को छोड़ने मुंबई जाना पड़ता है। हमेशा की तरह इस बार भी पापा की जाने की इच्छा नहीं थी किंतु मैंने इस और ध्यान नहीं दिया और उनका और अपना मुंबई का रिजर्वेशन करवा लिया। दिल्ली मुंबई राजधानी एक्सप्रेस अपने टाइम पर थी। सेकिंड एसी की नीचे की बर्थ पर पापा को बैठा कर सामने की बर्थ पर मैं भी बैठ गया। साथ वाली सीट पर एक सज्जन पहले से विराजमान थे। बाकी बर्थ खाली थीं। कुछ ही देर में ट्रेन चल पड़ी। अपनी जेब से मोबाइल निकाल मैं देख रहा था। तभी कानों से पापा का स्वर टकराया,   “मुन्ना, कुछ दिन तो तू भी रहेगा ना मुंबई में। मेरा दिल लगा रहेगा और प्रतीक को भी अच्छा लगेगा।” 
पापा के स्वर की आद्रता पर तो मेरा ध्यान गया नहीं,  मन ही मन खीज अवश्य उठा। कितनी बार समझाया है पापा को कि मुझे मुन्ना ना कहा करें। रजत पुकार करें। अब मैं इतनी ऊंची पोस्ट पर आसीन एक प्रशासनिक अधिकारी हूं। समाज में मेरा एक अलग रुतबा है। ऊंचा कद है। मान सम्मान है। बगल की सीट पर बैठा व्यक्ति मुन्ना सुनकर मुझे एक सामान्य सा व्यक्ति समझ रहा होगा।  प्रकट में मैं तनिक जोर से बोला,   “पापा, परसों मेरी गवर्नर के साथ मीटिंग है। मैं मुंबई में कैसे रुक सकता हूं?  
पापा के चेहरे पर निराशा की बदलियां छा गईं। मैं उनसे कुछ कहता,  तभी मेरा मोबाइल बज उठा। रितु का फोन था। रुंधे स्वर में वह कह रही थी,   “पापा ठीक से बैठ गए ना।” 
“हां हां,  बैठ गए हैं। गाड़ी भी चल पड़ी है।” “देखो,  पापा का ख्याल रखना। रात में मेडिसिन दे देना। भाभी को भी सब अच्छी तरह समझा कर आना। पापा को वहां कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए।” 
“नहीं होगी।”  मैंने फोन काट दिया। 
“रितु का फोन था ना, मेरी चिंता कर रही होगी।”  पापा के चेहरे पर वात्सल्य उभर आया था। 
रात में खाना खाकर पापा सो गए। थोड़ी देर में गाड़ी कोटा स्टेशन पर रुकी और यात्रियों के शोरगुल से हड़कंप सा मच गया। तभी कंपार्टमेंट का दरवाजा खोलकर जो व्यक्ति अंदर आया, उसे देख मुझे बेहद आश्चर्य हुआ। मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि रमाशंकर से इस तरह ट्रेन में मुलाकात होगी। 
एक समय रमाशंकर मेरा पड़ोसी और सहपाठी था। हम दोनों के बीच मित्रता कम और मार्क्स को लेकर प्रतिस्पर्धा अधिक रहती थी। हम दोनों ही मेहनती और बुद्धिमान थे किंतु न जाने क्या बात थी कि मैं चाहे कितना भी परिश्रम क्यों न कर लूं, बाजी सदैव रमाशंकर के हाथ लगती थी। शायद मेरी ही एकाग्रता में कमी थी। कुछ समय पश्चात पापा ने शहर के पाॅश एरिया में मकान बनवा लिया। मैंने काॅलेज चेंज कर लिया और इस तरह रमाशंकर और मेरा साथ छूट गया। 
दो माह पूर्व एक सुबह मैं अपने ऑफिस पहुंचा। कॉरिडोर में मुझसे मिलने के लिए काफी लोग बैठे हुए थे। बिना उनकी ओर नज़र उठाए मैं अपने केबिन की ओर बढ़ रहा था। यकायक एक व्यक्ति मेरे समक्ष आया और प्रसन्नता के अतिरेक में मेरे गले लग गया। 
“रजत यार, तू कितना बड़ा आदमी बन गया। पहचाना मुझे?  मैं रमाशंकर।” 
मैं सकपका गया। फीकी सी मुस्कुराहट मेरे चेहरे पर आकर विलुप्त हो गई। इतने लोगों के सम्मुख उसका अनौपचारिक व्यवहार मुझे खल रहा था। वह भी शायद मेरे मनोभावों को ताड़ गया था। तभी तो एक लंबी प्रतीक्षा के उपरांत जब वह मेरे केबिन में दाखिल हुआ तो समझ चुका था कि वह अपने सहपाठी से नहीं बल्कि एक प्रशासनिक अधिकारी से मिल रहा था। उसका मुझे सर कहना मेरे अहं को संतुष्ट कर गया। यह जानकर कि वह बिजली विभाग में महज एक क्लर्क है,  जो मेरे समक्ष अपना तबादला रुकवाने की गुजारिश लेकर आया है, मेरा सीना अभिमान से चौड़ा हो गया। कॉलेज के प्रिंसिपल और टीचर्स तो क्या, मेरे सभी कलीग्स भी यही कहते थे कि एक दिन रमाशंकर बहुत बड़ा आदमी बनेगा। हुंह, आज मैं कहां से कहां पहुंच गया और वह..…
पिछली स्मृतियों को पीछे धकेल मैं वर्तमान में पहुंचा तो देखा रमाशंकर  ने अपनी वृद्ध मां को साईड की सीट पर लिटा दिया और स्वयं उनके करीब बैठ गया। एक उड़ती सी नज़र उस पर डाल मैंने न्यूज़पेपर पर आंखें गड़ा दीं। 
तभी रमाशंकर बोला,   “नमस्ते सर। मैंने तो देखा ही नहीं कि आप बैठे हुए हैं।” 
मैंने नम्र स्वर में पूछा,   “कैसे हो रमाशंकर?  
“ठीक हूं सर।” 
“कोटा कैसे आना हुआ? 
“छोटी बुआ की बेटी की शादी में आया था। अब मुंबई जा रहा हूं। शायद आपको याद हो, मेरा एक छोटा भाई था।” 
“छोटा भाई? हां याद आया, क्या नाम था उसका?  मैंने स्मृति पर जोर डालने का उपक्रम किया जबकि मुझे अच्छी तरह याद था कि उसका नाम देवेश था। 
“सर, आप इतने ऊंचे पद पर हैं। आए दिन हजारों लोगों से मिलते हैं। आपको कहां याद होगा। देवेश नाम है उसका सर।” 
पता नहीं उसने मुझ पर व्यंग्य किया था या साधारण रूप से कहा था फिर भी मेरी गर्दन कुछ तन सी गई। उस पर एहसान सा लादते हुए मैं बोला,  “ देखो रमाशंकर, यह मेरा ऑफिस नहीं है इसलिए सर कहना बंद करो और मुझे मेरे नाम से पुकारो। हां तो तुम क्या बता रहे थे, देवेश मुंबई में है?” 
“हां रजत, उसने वहां मकान खरीदा है। दो दिन पश्चात उसका गृह प्रवेश है। चार-पांच दिन वहां रहकर मैं और अम्मा दिल्ली लौट आएंगे।” 
“इस उम्र में इन्हें इतना घुमा रहे हो?”
“अम्मा की आने की बहुत इच्छा थी। इंसान की उम्र भले ही बढ़ जाए, इच्छाएं तो नहीं मरती ना।” 
“हां यह तो है। पिताजी कैसे हैं? 
“पिताजी का दो वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया था। अम्मा यह दुख झेल नहीं पाईं और उन्हें हार्ट अटैक पड़ गया था। बस तभी से वह बीमार रहती हैं। अब तो अल्जाइमर भी बढ़ गया है।” 
“तब तो उन्हें संभालना मुश्किल होता होगा। क्या करते हो? छः छः महीने दोनों भाई रखते होंगे।”  ऐसा पूछ कर मैं शायद अपने मन को तसल्ली दे रहा था। 
आशा के विपरीत रमाशंकर बोला,   “नहीं नहीं रजत, मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता। अम्मा शुरू से दिल्ली में रही हैं। उनका कहीं और मन लगना मुश्किल है। मैं नहीं चाहता, इस उम्र में उनकी स्थिति पेंडुलम जैसी हो जाए। कभी इधर तो कभी उधर। कितनी पीड़ा होगी उन्हें यह देखकर, कि पिताजी के जाते ही उनका कोई घर ही नहीं रहा। वह हम पर बोझ हैं।” 
मैं मुस्कुराया,   “रमाशंकर, इंसान को थोड़ा व्यावहारिक भी होना चाहिए। जीवन में सिर्फ भावुकता से काम नहीं चलता है। अक्सर इंसान दायित्व उठाते उठाते थक जाता है और तब ये विचार मन को उद्वेलित करने लगते हैं कि अकेले हम ही क्यों मां-बाप की सेवा करें? दूसरा क्यों ना करे? 
“पता नहीं रजत, मैं जरा पुराने विचारों का इंसान हूं। मेरा तो यह मानना है कि हर इंसान की करनी उसके साथ है। कोई भी काम मुश्किल तभी लगता है, जब उसे बोझ समझकर किया जाए। मां-बाप क्या कभी अपने बच्चों को बोझ समझते हैं? आधे अधूरे कर्तव्यों में कभी आस्था नहीं होती रजत। मात्र औपचारिकता होती है और सबसे बड़ी बात, जाने अनजाने हमारे कर्म ही तो संस्कार बनकर हमारे बच्चों के द्वारा हमारे सम्मुख आते हैं। समय रहते यह छोटी सी बात इंसान की समझ में आ जाए तो उसका बुढ़ापा भी संवर जाए।”
मुझे ऐसा लगा मानो रमाशंकर ने मेरे मुख पर तमाचा जड़ दिया हो। मैं निःशब्द मौन सोने का उपक्रम करने लगा किंतु नींद मेरी आंखों से अब कोसों दूर हो चुकी थी। रमाशंकर की बातें मेरे दिलो दिमाग में हथौड़े बजा रही थीं। इतने वर्षों से संचित किया हुआ अभिमान पल भर में चूर-चूर हो गया था। प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी के लिए इतनी मोटी मोटी किताबें पढ़ता रहा किंतु पापा के मन की संवेदनाओं को, उनके हृदय की पीड़ा को नहीं पढ़ सका। क्या इतना बड़ा मुकाम मैंने सिर्फ अपनी मेहनत के बल पर पाया है? नहीं, इसके पीछे पापा मम्मी की वर्षों की तपस्या निहित है। आखिर उन्होंने ही तो मेरी आंखों को सपने देखने सिखाए। जीवन में कुछ कर दिखाने की प्रेरणा दी। रात्रि में जब मैं देर तक पढ़ता था तो पापा भी मेरे साथ जागते थे कि कहीं मुझे नींद ना आ जाए। मेरे इस लक्ष्य को हासिल करने में पापा हर कदम पर मेरे साथ रहे और आज जब पापा को मेरे साथ की जरूरत है तो मैं व्यावहारिकता का सहारा ले रहा हूं। 
दो वर्ष पूर्व की स्मृति मन पर दस्तक दे रही थी। सीवियर  हार्ट अटैक पड़ने के बाद मम्मी बीमार रहने लगी थीं। एक शाम ऑफिस से लौट कर मैं पापा मम्मी के बेडरूम में जा रहा था, तभी अंदर से आई आवाज़ से मेरे पांव रुक गए। 
मम्मी, पापा से कह रही थीं,  “इस दुनिया में जो आया है, वह जाएगा भी। कोई पहले तो कोई बाद में। इतने इंटेलेक्चुअल होते हुए भी आप इस सच्चाई से मुंह मोड़ना चाह रहे हैं।” 
“मैं क्या करूं पूजा? तुम्हारे बिना अपने अस्तित्व की कल्पना भी मेरे लिए कठिन है। कभी सोचा है तुमने कि तुम्हारे बाद मेरा क्या होगा?  पापा का कंठ अवरुद्ध हो गया था किंतु मम्मी तनिक भी विचलित नहीं हुईं और शांत स्वर में बोली थीं,  “आपकी तरफ से तो मैं पूरी तरह निश्चिंत हूं। रजत और रितु आपका बहुत ख्याल रखेंगे। यह एक मां के अंतरमन की आवाज है। उसका विश्वास है, जो कभी गलत नहीं हो सकता।” इस घटना के पांच दिन बाद ही मम्मी चली गई थीं। कितने टूट गए थे पापा। बिल्कुल अकेले पड़ गए थे। उनके अकेलेपन की पीड़ा को मुझसे अधिक मेरी पत्नी रितु ने समझा। यूं भी वह पापा के दोस्त की बेटी थी और बचपन से पापा से दिल से जुड़ी हुई थी। उसने कभी नहीं चाहा, पापा को अपने से दूर करना किंतु मेरा मानना था कि कोरी भावुकता में लिए गए फैसले अक्सर गलत साबित होते हैं। इंसान को प्रैक्टिकल एप्रोच से काम लेना चाहिए। अकेले मैं ही क्यों पापा का दायित्व उठाऊं? दोनों बड़े भाई क्यों ना उठाएं जबकि पापा ने तीनों को बराबर का स्नेह दिया। पढ़ाया लिखाया तो दायित्व भी तीनों का बराबर होना चाहिए। छः माह बाद मम्मी की बरसी पर यह जानते हुए भी कि दोनों बड़े भाई पापा को अपने साथ रखना नहीं चाहते, मैंने यह फैसला किया था कि हम तीनों बेटे चार-चार महीने पापा को रखेंगे। पापा को जब इस बात का पता चला तो कितनी बेबसी उभर आई थी उनके चेहरे पर। चेहरे की झुर्रियां और गहरा गई थीं। उम्र मानों दस वर्ष आगे सरक गई थी। सारी उम्र पापा की दिल्ली में गुजरी थी। सभी दोस्त और रिश्तेदार यहीं पर थे जिनके सहारे उनका वक्त कुछ अच्छा बीत सकता था किन्तु……
सोचते सोचते मैंने एक गहरी निश्वास ली। आंखों से बह रहे पश्चाताप के आंसू पूरी रात मेरा तकिया भिगोते रहे। उफ.. यह क्या कर दिया मैंने?  पापा को तो असहनीय पीड़ा पहुंचाई ही, मम्मी के विश्वास को भी खंडित कर दिया। आज वह जहां कहीं भी होंगी, पापा की स्थिति पर उनकी आत्मा अवश्य कलप रही होगी। क्या वह कभी मुझे क्षमा कर पाएंगी। 
रात में कई बार अम्मा का रमाशंकर को आवाज़ देना और हर बार उसका चेहरे पर बिना शिकन लाए उठना मुझे आत्म विश्लेषण के लिए विवश कर रहा था। उसे देख मुझे एहसास हो रहा था कि इंसानियत और बड़प्पन हैसियत की मोहताज नहीं होती। वह तो दिल में होती है। 
अचानक मुझे एहसास हुआ मेरे और रमाशंकर के बीच आज भी प्रतिस्पर्धा जारी है। इंसानियत की प्रतिस्पर्धा, जिसमें आज भी वह मुझसे बाजी मार ले गया था। पद भले ही मेरा बड़ा था किंतु रमाशंकर का कद मुझसे बहुत ऊंचा था।
गाड़ी मुंबई सेंट्रल पर रुकी तो मैं रमाशंकर के करीब पहुंचा। उसके दोनों हाथ थाम मैं भावुक स्वर में बोला,   “रमाशंकर,  मेरे दोस्त,  चलता हूं मैं।  सारी ज़िंदगी यह सफर मुझे याद रहेगा।”   कहने के साथ ही मैंने उसे गले लगा लिया। आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी से वह मुझे देख रहा था।  
मैं बोला,  “ वादा करो, अपनी फैमिली को लेकर मेरे घर अवश्य आओगे।” 
“आऊंगा क्यों नहीं? आखिर इतने वर्षों बाद मुझे मेरा दोस्त मिला है,”   खुशी से उसकी आवाज कांप रही थी। 
अटैची उठाए पापा के साथ मैं नीचे उतर गया। स्टेशन के बाहर मैंने टैक्सी पकड़ी और ड्राइवर से एयरपोर्ट चलने को कहा। पापा हैरत से बोले,   “एयरपोर्ट क्यों? भावुक होकर मैं पापा के गले लग गया और रुंधे कंठ से बोला ,  “पापा,  मुझे माफ कर दीजिए, हम वापस दिल्ली जा रहे हैं। अब आप हमेशा वहीं अपने घर में रहेंगे।” 
पापा की आंखें नम हो आईं और चेहरा खुशी से खिल उठा।  “जुग जुग जियो मेरे बच्चे,”  वह बुदबुदाए।
कुछ पल के लिए उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं फिर चेहरा उठा कर आकाश की ओर देखा। मुझे ऐसा लगा, मानो वह मम्मी से कह रहे हों, देर से ही सही तुम्हारा विश्वास सही निकला।
रेनू मंडल
बी– 30, गंगासागर कॉलोनी
नियर गंगानगर, मवाना रोड
मेरठ–250001(उत्तर प्रदेश)
मो नंबर-  9719201761
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5 टिप्पणी

  1. सच कहें तो इस कहानी के लिए कुछ भी कहने को शब्द नहीं आँखों में आंसू हैं। मन गहरे तक भीग गया । काश हर बच्चे अपने माता-पिता के लिए इस तरह सोच पाएँ।
    एक बेहतरीन कहानी के लिए आपका चाहिए दिल से शुक्रिया रेणु जी!

  2. नीलिमा जी आप जैसी साहित्यकार की इस प्रतिक्रिया ने मेरी लेखनी को बल दिया है। लिखना सार्थक हुआ। आपका तहे दिल से बहुत बहुत आभार शुक्रिया

  3. अहा
    वाह वाह वाह
    कहते हैं कि साहित्यकार समाज को दिशा देने का काम करता है जिसमें आप इस कथा के द्वारा शत प्रतिशत सफल हुई हैं।आज ऐसी कथाओं की आवश्यकता है समाज को।हर घर में वरिष्ठजनों की उपेक्षा ने वृद्धों को अवसाद में धकेल दिया है।

  4. बहुत ही खूबसूरत व मार्मिक कहानी है। कहानी पढ़ते हुए पाठक कथानक में पूरी तरह डूब जाता है। रेनू जी की सशक्त लेखनी में पाठकों के हृदय को आंदोलित कर देने की ताकत है। आज के सामाजिक ढांचे में अधिकतर घरों के बुजूर्गों की स्थिति बहुत दयनीय हो रही है। हार्दिक बधाई रेनू जी।

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