रमेश पोखरियाल निशंक भारत के वर्तमान शिक्षा मंत्री हैं और हिंदी साहित्य में भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उपन्यास, कहानी, कविता और पत्र विधा में अबतक दर्जन भर से अधिक पुस्तकें लिख चुके हैं। इन दिनों वे कोरोना से संक्रमित हैं और आइसोलेशन में हैं। इसी दौरान हमें ईमेल के माध्यम से उनकी यह कहानी प्राप्त हुई जिसे अपने पाठकों से साझा करते हुए हम उम्मीद करते हैं कि यह कहानी पुरवाई के पाठकों को पसंद आएगी। साथ ही हम यह भी कामना करते हैं कि निशंक जी शीघ्र ही कोरोना को मात देकर पुनः सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हो अपने दायित्वों का निर्वाह करेंगे। – संपादक

अभी-अभी मैं घर में पहुँचा ही था मिन्नी पानी का गिलास लेकर आई और मेरे हाथ में पकड़ा कर उसने मेरे दोनों पैर छूये। 
‘थैंक्यू चाचा जी, मुझे पूरा विश्वास था कि मेरे चाचा सात समुद्र पार से भी जरूर मेरी शादी मे आयेंगे।’ खुशी के मारे मिन्नी चहकती हुये बोली-
‘क्यों नहीं आता आखिर मुझे अपनी लाडली का कन्यादान जो करना है।’ मैंने प्यार  से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। 
कितनी सौम्य और शालीन है यह, साथ में बेहद सुन्दर भी। समय गुजरते देर नहीं लगती। कितनी जल्दी बड़ी हो गई है मिन्नी। पूरे 15 साल बाद देखा है उसे मैंने। 
‘चाचा मैं चाय लेकर आती हूँ, कहते हुये मिन्नी फुदकते हुये चली गई। घर में काफी चहल-पहल थी। कहीं पर मिठाई बनाने के लिये चुल्हे लगाये जा रहे थे तो कहीं पर बहू बेटियों के छोटे-छोटे झुण्ड अरसा के लिये भीगे हुये चावल ओखली में कूट रहे थे तो कहीं पर रोट बनाने के लिये आटा गूथा जा रहा था, तो कहीं पर सिलबट्टे में घुली उड़द की दाल पीसी जा रही थी। 
रोट और अरसा हमारे पहाड़ों में शादी विवाह के शुभ अवसर पर बनाये जाने वाली एक विशिष्ट प्रकार की मिठाई है। एक नन्हीं बालिका थाली में धूप, रोली लेकर घूम-घूम कर सबको टीका लगा रही थी और गुड़, तिल से सबका मुँह मीठा कर रही थी। 
मेहमानों के आने का सिलसिला जारी था। मेरी श्रीमती जी आते ही सीधा काम में हाथ बंटाने घर के अंदर घुस गई थी। 
इन सबके बीच मेरी नजरें शीला भाभी को तलाश रही थी, लेकिन वह मुझे कहीं नजर नहीं आ रही थी। काफी देर हो गई थी तो मेरी व्यग्रता भी बढ़ने लगी। 
‘मिन्नी भाभी कहाँ है दिख नहीं रही कहीं’ चाय लेकर आई मिन्नी से मैने पूछ ही लिया।
‘चाचा जी वह मंगल स्नान का उबटन तैयार करने के लिये समोया लेने खेते में गई हैं। बस आने ही वाली होंगी।’ मिन्नी ने चाय का गिलास मेरे हाथों में पकड़ाते हुये कहा। 
हमारे गाँवों में आज भी परम्परायें और रीति रिवाज जिंदा हैं। मंगल स्नान में ‘बान’ देने के लिये स्थानीय जड़ी-बूटियों सरसों के बीज, समोया की जड़े, कच्ची हल्दी, पान के पत्तों आदि को कूट कर उबटन बनाया जाता है। इससे चेहरे का नूर उभर आता है शायद इसीलिये गाँवों में पहले ब्यूटी पार्लर जाने का न तो रिवाज था और न ही जरूरत। 
कुछ ही देर में शीला भाभी की खनकती हुई आवाज मेरे कानों में पड़ी  वह हाथों में ढेर सारे जड़ी-बूटियों के पत्ते और जड़े लेकर दाल पीसती हुई महिलाओं से बतिया रही थी। 
कितने वर्षो बाद आज देख रहा हूँ भाभी को बिल्कुल वहीं अंदाज, वहीं जिन्दादिली आज भी मुझे उनमें दिखलाई दे रहा था। भाभी जहाँ भी खड़ी हो जाती थी वहीं महफिल सज जाती। क्या छोटी, क्या बड़ी। हर उम्र की महिलाओं और लड़कियों की चहेती थी भाभी। 
मैं उठकर कुछ नजदीक चला आया। 
‘भाभी जी वहीं रहेगी या इधर आकर हमें भी दर्शन देकर धन्य करेगी।’ मैंने कहा। 
‘अरे राजू? तू कब पहुँचा।’ मुझ पर नजर पड़ते ही भाभी खिलखिलाते हुये मेरे पास पहुँची। पास पहुँचते ही मैंने भाभी के चरण स्पर्श किये। उन्होंने अपना ममत्व भरा हाथ मेरे सिर पर रखा और फिर मेरे सिर को अपने सीने से लगा लिया। 
भाभी आप तो बिल्कुल वैसी की वैसी ही हैं। कितना कुछ बदल गया इन पन्द्रह वर्षों में लेकिन आप तो बिल्कुल नहीं बदली।’ कुशल क्षेम के बाद मैंने कहा, ‘अरे देख नहीं रहा बाल सफेद हो गये मेरे, दो बेटियों की शादी हो गई। नानी भी बन गई। अब तो बुढ़ापा आ गया और तू कह रहा है कुछ नहीं बदला।’ भाभी ने भी मजाकिया अंदाज में कहा।
सच ही कह रही थी भाभी, समय गुजरने का पता चलता ही कहाँ है। दस वर्ष का रहा होऊँगा मै तब, जब भाभी दुल्हन बनकर इस घर में आई थी। मुझे आज भी याद है, लाल बनारसी साड़ी पहने माथे के बीचों-बीच लम्बी माँग में दमकता हुआ गहरे लाल रंग का सिन्दूर, माथे पर लाल रंग की बिन्दी और आँखों में गहराता काजल लगाये शीला भाभी किसी देवी से कम नहीं लग रही थी। घुटनों तक लटकती लम्बी, मोटी और काली चोटी, नाक में बड़ी सी नथ, गले में गुलोबन्द, चन्द्रहार और हाथों में पौंछी भाभी के सौन्दर्य को मानो चार चाँद लगा रहे थे। तब मैं मंदिर मे देवी माँ दुर्गा की मूर्ति से भाभी की तुलना करता तो भाभी में मुझे साक्षात दुर्गा के ही दर्शन होते। 
हालांकि भाभी के पति खुशहाल भाई मेरे सगे नहीं अपितु चचेरे भाई थे, लेकिन फिर भी हम दोनों परिवारों के मध्य इतनी प्रगाढता थी कि जैसी सगों में भी नहीं होती। भाभी के परिवार में सास, ससुर, जेठ, जेठानी थी, मेरे परिवार में मेरी माँ, छोटी बहिन और दादी थी, तब गाँव में पत्थर की स्लेट वाले तिरछी छत के मकान हुआ करते थे। तब तिबार के खम्ब हमारे कुलीन होने का प्रमाण थे। दादाजी तिवार के एक कोने में आसन जमाये हुये हुक्का गुडगुडाते रहते और वहीं से सारे गाँव की खबर सार रखते। 
‘मुझे उम्मीद थी कि तू मिन्नी की शादी में आयेगा जरूर’ भाभी ने मेरा हाथ पकड़ कर आंगन के कोने में बनी मुंडेर पर बिछे कम्बल पर बिठाते हुये कहा। 
‘हाँ भाभी, रीमा और सोनी की शादी में तो नहीं आ पाया था, पर हमारी ये छुटकी कब इतनी जवान हो गई यकीन ही नहीं आ रहा’ मैंने भाभी से कहा-
‘हाँ सब समय की बात है। मिन्नी को तो दूसरा जन्म तूने ही दिया वर्ना आज ये दिन कहाँ से देखते हम’ गुजरे समय के उन संघर्षों को याद कर भाभी की आँखे नम हो गई थी। 
‘आप तो बहुत भाग्यशाली है भाभी। ईश्वर ने आपको आपके संघर्षों का फल दिया है।’ मैंने भावुक होकर भाभी से कहा।
सचमुच में भाभी ने बहुत ही संघर्ष किया है, अपने जीवन में। यों भी पहाड़ की नारी का जीवन कितना कष्टकर होता है, लेकिन भाभी ने तो खुद अपने परिवार की प्रताड़ना भी सही लेकिन कभी उफ तक नहीं किया।
रोज सुबह चार बजे उठना, मुँह अंधेरे ही शौच इत्यादि से निबटकर जानवरों को घास डालना। रसोई और चुल्हे को मिट्टी से लेप कर तब सबके लिये चाय बनाना, धारे से दिनभर के लिये पानी भर कर घर लाना और जाकर खुद चाय का एक घूंट पीना। फिर सारे परिवार के कलेवा के लिये सब्जी रोटी तैयार करके सूर्य की पहली किरण निकलने से पूर्व ही दरांती रस्सी लेकर जानवरों के लिये घास या जलाऊ लकड़ी के लिये निकल जाना। 
हालांकि पहाड़ की सभी बहू-बेटियों की यहीं दिनचर्या है। सुबह चार बजे मुर्गे के कूकडू कू के साथ जब वे शुरू होती हैं तो फिर देर रात भोजन के पश्चात बरतन इत्यादि धोने के बाद ही उनको बिस्तर नसीब हो पाता है। 
यह सब करने के बाद भी शीला भाभी को हमेशा ताई जी की खरी-खोटी सुनने को मिलती थी। बात-बात में नुक्स निकालना और फिर गाली करते हुये मायके वालों तक की पूजा करना ताई जी का नित्यक्रम या, यूं तो घर में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी बावजूद इसके ताई जी भाभी को भरपेट खाना तक नहीं देती थी। सब कुछ जानते बूझते भी भैया खामोश बने रहते जबकि शीला भाभी हमेशा खुश ही दिखती। 
भाभी से मेरी जुगलबंदी बहुत ही अच्छी थी। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण सबसे अधिक प्यार मुझे ही मिलता और सबसे अधिक डाँट भी, लेकिन एक शीला भाभी ही थी जिन्होंने मुझे कभी डाँटा नहीं शायद वो मेरे मन को समझती थी। 
एक दिन मैंने देखा कि भाभी की तबियत खराब है वह जोर-जोर से उबकाईयाँ ले रही थी और मारे थकान के निढाल सी पड़ी थी। घर के किसी सदस्य को भी इसकी चिन्ता नहीं थी उल्टा ताई जी मेरी माँ और दादी से खुशी-खुशी कह रही थी- ‘बहू माँ बनने वाली है।’
मैंने भगवान का शुक्रिया अदा किया, वर्ना मैं तो डर ही गया था। फिर मैंने माँ को बोलते सुना-
‘दीदी बहू को खाना तो भरपेट दे दिया करो, वर्ना उसके होने वाले बच्चे पर असर पड़ेगा।’
‘अरे तू तो ऐसी बात कर रही है मानो हमने तो बच्चे जने ही नहीं, मुझे भी नहीं दिया था मेरी बुढ़िया ने, कोदे की वासी तिवासी रोटी चबाकर दिन गुजारे हैं मैंने’ माँ की बात सुनते ही ताई माँ पर बिफर गई थी- ‘इसे तो गेहूँ की रोटी चाहिये, आसानी से मिल रहा है न, इसलिये दिमाग चढ़े हुये हैं इसके।’ 
माँ चुप्प हो गई थी, ताई अपने सास के दम्भ और रूतवे को किसी भी प्रकार कम नहीं होने देना चाहती थी इसीलिये बात-बात में बेचारी भाभी को गाली देती रहती थी। माँ के यह सहानुभूति के शब्द खुद माँ पर तो भारी पड़े ही, लेकिन भाभी को इसकी सजा जिस रूप में मिली उसकी मैं कल्पना भी नहीं कर साकता था। 
‘खबरदार, मेरी बहू के कान भरे तो, मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।’ ताई जी ने माँ को डपट दिया था। सिर्फ इतना ही होता तो कोई बात नहीं। शाम को जैसे ही भाई साहब घर के आंगन में पहुँचे तो छूटते ही ताई ने बाण छोड़ दिया। 
‘तेरी बहू तो अब हमारा बदनाम भी करने लगी है कि हम इसे खाना नहीं देते।’
फिर क्या था, भाई शराब पिये हुये थे, उस रात क्रूरता का जो पहला अध्याय शुरू हुआ वो आये दिन घटित होने लगा। माँ बचाव करने गई तो ताई बोल उठी- ‘खबरदार देहरी से ऊपर पाँव न रखना, यह हमारे परिवार का मामला है।’
फिर माँ चुपचाप मुझे खींचते हुये घर ले आई। भाभी की मर्मान्तक चीखें मेरे कलेजे को चीरती रही, लेकिन मैं मजबूर था कुछ कर भी नहीं सकता था। 
एक दिन मुझे पता चला कि भाभी ने बेटी को जन्म दिया है, तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मैं दौड़ते हुये भाभी के घर गया तो देखता कि ताई जी कमरे के बाहर से भाभी जी को अनाप-शनाप बोले जा रही थी। छज्जे पर ताऊजी मुँह लटकाये बैठे थे। ताई जी की बड़बड़ाहट से मुझे पता चला कि उन्हें बेटी नहीं बेटा चाहिये था। 
मैं अंदर कमरे में गया तो भाभी छोटी सी गुड़िया को गोद में लिये रो रही थी। मुझे समझ में नहीं आया कि लड़की होने का दोष भाभी जी को क्यों दिया जा रहा था। माँ तो कहती है कि लड़की या लड़का होना भगवान जी की देन है, जब माँ यह बात समझती है तो ताई क्यों नहीं। 
दो साल बाद एक बार फिर भाभी ने एक और सन्तान को जन्म दिया। वह भी लड़की ही थी। बस अब तो भाभी जी पर जुल्म भी बढ़ गये। भाई शराब पीकर आये दिन मारपीट तो करते ही, लेकिन अब तो ताई जी ने भी भाभी को मारना पीटना शुरू कर दिया था। दिन भर भाभी कोल्हू के बैल की तरह जुती रहती, घर, जंगल और खेतों में काम करती, लेकिन रात को बच्चियों के जगने से ठीक से नींद भी नहीं ले पाती। 
मुझे भाभी का यूं अकेले कमरे में, खेतो और गौशाला में छुप-छुप कर रोना द्रवित करता। इतने वर्षों में यह बात मेरी समझ में नही आई कि आखिर भाभी इतना कुछ सहती क्यों है ? 
‘भाभी आप क्यों सहती हो इतना?  विरोध् क्यों नहीं करती। आप कुछ दिनों के लिये अपने मायके क्यों नहीं चली जाती ताकि इन लोगों को पता तो चले कि आप कितना काम करती हैं’ एक दिन मैंने भाभी से पूछ ही लिया था। 
मेरे आक्रोश पर भाभी हल्की सी मुस्कुराहट के साथ बोली- ‘राजू, किसका विरोध् करना है आखिर।’ ये मेरा ही तो घर है। अगर मैं भी जवाब दूँ औैर प्रतिकार करूँ तो कलह बढ़ जायेगी। फिर यह घर बिखर जायेगा। मायके मैं इसलिए नहीं जाना चाहती कि उन लोगों को पता न लगे वर्ना माँ पिता का दिल दुखेगा। मेरी वजह से वे परेशान रहेंगे, मुझे तो बस भगवान पर पूरा भरोसा है, एक न एक दिन सब ठीक हो जायेगा। 
लेकिन ठीक कहाँ हो रहा था। ताई जी को तो बस वंश के चिराग की चिन्ता थी। इसलिये वह भाई की दूसरी शादी करवाना चाहती थी, लेकिन गाँव की महिलाओं ने फिलहाल तीसरी संतान होने की प्रतीक्षा करने को कहा। 
ताई रोज देवी-देवताओं से मनोती माँगती, कई संकल्प रखवा दिये थे उन्होंने। बेटा हुआ तो कहीं बकरा चढायेंगी, कहीं चांदी का छत्र, तो कहीं घण्टे-घडियाल चढायेगी, लेकिन भाभी की तीसरी संतान भी बेटी ही हुई।
वह रात आज भी मेरे मनमस्तिष्क में एक डरावने सपने की तरह कैद है।
‘फूट गये खुशहाल की माँ तुम्हारे भाग, इस बार भी बेटी ही हुई है।’ बेटा होने की आस लगाये ताई जी के कानों में दाई के ये शब्द पड़े थे कि उन्होंने दीवार पर अपना सिर पटकना शुरू कर दिया।
‘अरे इस कुलछिनी ने कहीं का नहीं छोड़ा हमें, बेटियों की खान लगा रही है यहाँ। न जाने कहाँ से हमारे पल्ले पड़ गयी यह मनहूस।’ और भी न जाने क्या-क्या बकती रही ताई। भाई भी खूब खरी-खोटी सुनाकर चले गये। ऐसी स्थिति में एक गिलास गर्म चाय तक के लिये तरस गई थी भाभी। कुछ देर बाद रात के तीसरे पहर माँ चुपके से भाभी के लिए हलवा बना कर दे गई तो भाभी फफक कर रो पड़ी। आत्मीयता की भूखी भाभी ने माँ को हाथ जोड़ कर जाने के लिए कहा ताकि कहीं ताई माँ को देख न ले।  
    सुबह पौ फटते ही मेरे कानों में भाभी की चीखने-चिल्लाने की आवाजें पड़ी तो मैं बिस्तर से उछलकर सीधा गौशाला पहुँचा। वहाँ जाकर देखा तो भाभी इधर-ऊधर दौड़ते हुये नवजात बच्ची को ढूँढ रही थी। मुझे न जाने क्यों ताई जी पर शक हुआ और एक अजीब सी आशंका लिये मैंन गाँव के दूसरे किनारे नगरा गधेरा की तरफ दौड़ लगाई। नगरा गधेरे में मृत शिशुओं को दफनाया जाता था। मुझे वहाँ पहुँचते ही बच्ची के रोने की आवाज सुनाई दी। आवाज के सहारे वहाँ पहुँचा तो देखा कि नवजात बच्ची पानी के किनारे एक बड़े पत्थर पर अटकी पड़ी थी। मैंने तुरन्त अपनी कमीज निकाल कर बच्ची को उसमें लपेटा और घर ले आया। अब तो सारे गाँव को ताई के कुकृत्य के बारे में पता लग चुका था। सारे गाँव में ताई की थू-थू होने लगी। 
बस उसी दिन से भाभी ने अपनी तीनों बच्चियों को साथ लेकर चूल्हा अलग कर लिया। ताई अब भी भाभी को गाली-गलौज करने से बाज नहीं आती थी। एक दिन ताई भाभी के कमरे के बाहर ही उसे बुरा-भला कहते हुए बड़बड़ा रही थी कि अचानक ही उसका मुँह टेडा हो गया और आवाज हलक में ही गलबलाने लगी, फिर ऊपर से नीचे तक ताई का एक अंग सुन्न हो गया और वह किसी कटे पेड़ की तरह धडाम से जमीन पर गिर गई। आकर भाभी ने ही उसे सम्भाला। गाँव के लोग चारपाई पर उसे जिला अस्पताल लाये। एक महीने उपचार के बाद डाक्टरों ने उसे घर पर ही इलाज के लिये भेज दिया। 
स्वभाव के अनुसार भाभी ने ही पूरा परिवार सम्भाल लिया। अत्यधिक शराब पीने के कारण भाई के फेफड़े भी कमजोर हो गये, उसने भी खटिया पकड़ ली। ताऊ जी तो पहले से ही बीमार थे, अब तो वे और टूट गये। 
ऐसे में भाभी ने ही परिवार को बस एक डोर से बांधे रखा। भाभी तीनों बच्चियों रीमा, सोनी और मिन्नी की परवरिश खूब मन लगाकर करती थी। वह रोज कहती थी मेरी बेटियाँ बेटों से कम नहीं है।  भाभी ने घर के काम के साथ-साथ छोटी बच्चियों की देखभाल करना, पति की बीमारी में सेवा करना, सास-ससुर की खातिरदारी, खेतों का काम, मवेशियों के लिए घास लाना, जंगल से लकड़ी इत्यादि लाना, बड़े ही धैर्यपूर्वक किये। 
देर से ही सही ताई को अपनी करनी का एहसास हुआ। अब वह भीगी पलकों से निरीह सी एकटक भाभी को निहारती रहती मानों अपनी गलतियों के लिये क्षमा मांग रही हो। ताऊ जी और उनकी दवा का ध्यान भी हर समय रखती। भाभी के व्यवहार में जरा भी इस बात का असर नहीं था कि जिन्होंने उन पर इतना अत्याचार किया आज वे सब उन्हीं पर निर्भर हैं। देखते ही देखते रीमा ने कालेज की पढ़ाई पूरी कर बी.एड. किया और अध्यापिका बन गई। मंझली बेटी ने बी0एससी0 एग्रीकल्चर से करके कृषि के क्षेत्र में स्वरोजगार का काम किया। आज लगभग 25-30 लोगों की आजीविका का केन्द्र है उसका मशरूम उत्पादन केन्द्र। 
सबसे छोटी बेटी मिन्नी एस0आई0 के लिए अभी चयनित हुई। गाँव में रहकर भाभी ने अपनी बच्चियों की पढ़ाई में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। प्रतिभावान उनकी बेटियाँ आज पूरे गाँव और इलाके भर में अपने माता पिता का नाम रोशन कर रही हैं। 
शादी के बाद में विदेश चला गया। इसलिए रीमा और सोनी के ब्याह में नहीं आ सका, लेकिन आज मिन्नी की शादी में आने के लिए मैं बहुत ही उत्साहित था। भाभी ने फोन पर कहा था कि मिन्नी का कन्यादान मुझे करना है। जब मैंने मना किया तो भाभी ने आत्मीय भरे शब्दों में कहा, ‘राजू अगर उस दिन तू नहीं होता तो मिन्नी…….. कहते-कहते ही वो फोन पर रो पड़ी। उनके आग्रह को मैं टाल न सका और चला आया अपने गाँव, अपना धर्म निभाने।
रमेश पोखरियाल 'निशंक' भारत के शिक्षा मंत्री हैं. आप हिंदी साहित्य में भी मजबूत उपस्थिति रखते हैं. उपन्यास, कहानी, कविता, पत्र आदि विधाओं में दर्जन भर से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं. संपर्क - nishank.sahitya@gmail.com

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