प्रतिदिन सवा तीन लाख से ऊपर कोविड के मरीज़, 5 दिन में दस लाख नए मरीज़, यह सब समाचार ही तो सुनते हैं हम फिर हम अपनी उम्र देखते है 60 से ऊपर के हो गए बस फिर क्या ; सोचते ही रक्त में एडरनलीन का प्रवाह बढ़ जाता है, पसीने आने लगते हैं घबड़ाहट और डर से हालत खराब हो जाती है, गीता में दूसरे अध्याय में तीसरे श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को क्लीव कहते हैं 
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।
पूरी गीता इस भय को भगाने का पाठ है यह दोष कैसे दूर हो यह अर्जुन का प्रश्न है और भगवान गीता ज्ञान देकर उसे भयमुक्त कर कर्म करने को प्रेरित करते हैं।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।2.7।।
आईये हम क्लीव न बनें । हौसला रखें। अरे हम साठ से ऊपर वालों ने तो बहुत कठिनाई के दिन देखे हैं, 1962, 1965 और 1971 के भयावह युद्ध देखे हैं;  दुर्भिक्ष देखा है, जिसे हमने मिलजुल कर लड़ा था। तब के प्रधान मंत्री के आह्वाहन से हमने एक वक्त का उपवास मंज़ूर किया था। कितनी महामारियों का सामना किया है, हैज़ा, प्लेग से लोगों को मरते देखा है फिर भी हम किंचित विचलित नहीं हुए, डटे रहे । माना यह कठोर परीक्षा की घड़ी है, समस्या विकट है, जी हां पहले से भी ज़्यादा विकट है; पर हम लहरों के विपरीत नौका चला कर पार करने वाले लोग हैं।
अवसादित मन लेकर क्यों कायर की भांति खड़ा है
हरा  मुश्किल को तू  तो  सदा  मुश्किलों  से लड़ा है 
भय मानव का सबसे बड़ा शत्रु होता है, कहते भी हैं जो डर गया वो मर गया। भयाक्रांत व्यक्ति में समस्याओं से जूझने की शक्ति समाप्त हो जाती है और जहां थोड़ी सी भी मुश्किल आयी कि वह घुटने टेक देता है। कोरोना के अन्य आंकड़े भी देखिये… इसमे मृत्यु दर एक प्रतिशत से भी कम है और जिन्होंने वैक्सीन ले ली है उन में तो .03 प्रतिशत मात्र है। इससे अधिक लोग तो तम्बाख़ू सेवन से कैंसर में मरते हैं।
हाँ इसके फैलने की गति अति तीव्र है उसे आप और हम ही रोक सकते हैं। बस डॉक्टरों के एवं विशेषज्ञों के दिशा निर्देश का पालन कीजिये। मास्क पहनिए दूरी बनाइये और कोरोना के विषाणु को आइसोलेट कीजिये जैसे माँ काली ने रक्तबीज के रक्त को फैलने से रोका था।
एक बात बताऊं 1918 से 1920 के मध्य स्पेनिश फ़्लू फैला था उस दौर में विश्व भर में 5 करोड़ लोगों की जान गयी ऐसा बताया जाता है। केवल तब के वृहद भारत मे ही डेढ़ करोड़ मौतें हुई थीं। महाकवि महाप्राण निराला जी लिखते है कि बांगरमऊ किनारे गंगा नदी किनारे खड़ा हूँ चारो तरफ धू-धू करती लाशें है। मेरे अज़ीज़ भी चले गए मेरी पत्नी चली गयी मेरी बच्ची चली गयी मेरा युवा भाई चला गया। 
यह भयावह स्थिति थी, जब वह भी चली गयी, सब चीज़ें सामान्य हो गयीं। दुनिया वापस पटरी पर आ गयी। ठीक वैसे ही एक बार फिर दुनिया पटरी पर आ जाएगी,  कोई प्रलय नहीं होने वाली, आप और हम सुरक्षित रहेंगे सिर्फ और सिर्फ सावधानी बरतनी होगी। बुरा वक़्त है पर सब कुछ  बुरा नहीं है। सब कुछ ख़त्म हो गया हो ऐसा नहीं है।
दौर है मुश्किल निकल जाएगा
धीरज   ही  तेरा  तुझे बचाएगा
धीर  वीर  गंभीर   है  न डरा तू
अवसाद में आकर न घबरा तू
संभल  जा,  सब  को संभाल रे
हौसला रख, मत डर से भाग रे
किस्मत  तेरी,  तेरे  साथ  सदा
ये वक्त भी कट  जायगा, बावरे
अंत मे इतना ही कहूंगा भय भगाने का सबसे सरल उपाय है संवाद बनाइये, 1960-70 के दशक के अच्छे फ़िल्मी गाने सुनिये, भजन सुनिये। गीता पढ़िए। मित्रों से ख़ूब बातें कीजिये बस ध्यान रहे उसमें कोरोना का कोई जिक्र नहीं हो।
उमड़  घुमड़  कर  काले  बादल  देख  निराशा के आएंगे
दुख  तो  होगा  ही  जब  अपने   स्वयं  छोड़ चले  जाएंगे
हृदय   होगी   बेचैनी   और    अंधेरा   छाएगा   चक्षु  पर
तब पथ न भूल जाना अपना, करनी होगी पार यह डगर
तिमिर  ढलेगा  दीप  जलेगा  स्वयं  तुम्हारे  अंतस  अंदर।।

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