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संगीता कुमारी की कहानी – पुरुष तुम्हें अग्नि परीक्षा देनी होगी

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रामायण देखते हुए गीता ने अपनी उदासी को बिना छिपाये अपना मन हल्का करने के लिये अपने पति से अपने मन की बात करनी चाही, “आज के युग में कितना बदलाव आ गया है? एक सीता थी और एक हमारी बहु! क्या सोचा था! क्या हो गया? चार महीने में कितना कुछ बदल गया!”  वह अपने पति के चेहरे को जबाव की प्रतीक्षा में निहारने लगी। कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद वह फिर बोली, “तुम कुछ कहते क्यों नहीं? 
अब नीरज से चुप रहा नहीं गया। वह ऐसे फट पड़ा जैसे कोई गुब्बारा बहुत ज्यादा हवा भर जाने के बाद अपने आपको रोक नहीं पाता और तेज आवाज के साथ कानों को तकलीफ देता हुआ फूट जाता है। उसने अपनी आँखों पर चढ़ा चश्मा फुर्ती से उतार अपनी अँगुलियों में थामा और बोला, “मैंने तो पहले ही कहा था कि उस लड़की से शादी ना करे मगर तेरा बेटा मेरी सुनता कहाँ है? तुम भी मेरी बात मानती नहीं हो। अब जब सब कुछ बिगड़ गया है तो मेरे सामने बैठकर रोने से क्या फायदा? बात बिगड़ने से पहले मेरी बात मान ली होती तो ये सब ना होता! अब तुम जानो और तुम्हारा बेटा। रोज रोज मेरा दिमाग मत खाया करो। अब भुगतो!”  
गीता चुपचाप रामायण देखती रही या फिर यूँ कहें कि टीवी पर चल रहे रामायण पर केवल नजर थी असल में वह अपने घर की महाभारत में खोई हुई थी; जहाँ महाभारत का कोई पात्र सटीक नहीं बैठता था फिर भी लड़ाई थी।
नीरज और गीता के दो बच्चे हैं। बड़ी बेटी अपने पति के साथ साउथ कोरिया में जॉब करती थी और पिछले आठ वर्षों से वहीं रह रही थी। छोटा बेटा नोएडा की एक बड़ी कम्पनी में नौकरी करता था। 
बात पिछले वर्ष दिसम्बर की है जब चीन के वूहान शहर में फैली कोरोना वायरस की खबर टीवी पर दिखाई जा रही थी। तब गीता ने चिंता करके अपनी बेटी को फोन लगाया और पूरी जानकारी खुलकर ली थी। उस समय उसे पता नहीं था कि एक महीने बाद ही उसे अपनी बेटी को भारत आने के लिये बोलना होगा! 
गीता ने जब को बताया कि उसके भाई की अगले महीने शादी है तब बेटी ने पहले तो थोड़ी नाराजगी दिखायी कि उससे बिना पूछे इतनी जल्दी अचानक भाई की शादी कैसे तय कर लिया। बेटी ने पहले तो मना किया मगर माँ ने उसे सारी बात बता दी जिससे वह भावुक हो गयी। जनवरी अंत में भाई की शादी अटेंड करके वापिस विदेश चली गयी थी। मगर दुबारा कोरोना के कारण मार्च महीने में बेटी अपने पति के साथ वापिस भारत आ गयी। 
दोपहर बारह बजे महाभारत देखते हुए गीता ने भोजन परोसा तब बेटे ने डाईनिंग टेवल पर आने से इंकार कर दिया। उसने अपने कमरे में ही खाना खाने की बात कही। गीता को अब इसकी आदत सी पड़ गयी है।  जब से शोभा चली गयी है तब से यह उदास रहने लगा है। विवाह के बाद डेढ़ माह साथ रहने के बाद होली से दो दिन अपने मायके जो गयी अभी तक वापिस नहीं आयी है। अब तो कोरोना के कारण कोई आ जा भी नहीं सकता! मगर रोहित की शोभा ऐसी है कि कोरोना ना होता तब भी वापिस नहीं आती। अगर उसे वापिस आना ही होता तब वह रोहित के साथ वापिस आ जाती! रोहित ने कितना मनुहार किया कि होली का त्यौहार तुम्हारे मायके में मना लिया है अब वापिस चलो! मगर वह नहीं मानी बल्कि यह कहकर टाल दिया कि तुम वापिस जाओ मैं एक हफ्ते बाद आ जाऊँगी। 
शोभा का आना तो दूर वह अब फोन भी नहीं उठाती है। ऐसा लगता है रोहित के सपनों का खुबसूरत घरौंदा धीरे धीरे उजड़ रहा है। 
अठ्ठाईस वर्षीय रोहित खुबसूरत मध्यम आकार का सरल सहज व्यक्तित्व का धनी है। अपने माता पिता का लाडला सिर्फ छोटे होने के कारण ही नहीं रहा बल्कि इसलिये भी रहा क्योंकि उसकी छत्तीस वर्षीय बहन जो कि दस वर्ष पहले अपनी मर्जी से शादी करके दो वर्ष बाद विदेश चली गयी थी। नौकरी लगने के बाद से वह बहुत ज्यादा मनमौजी करने लगी थी। कभी भी कोई भी कार्य माँ पिता से पूछकर नहीं करती थी।
माँ तो फिर भी सरल स्वभाव की थी मगर पिताजी अनुशासित थे। बहन का स्वभाव पिता से बिलकुल विपरीत था। कॉर्परेट  जगत की दुनिया उसे बहुत लुभाने लगी थी। देर रात शराब सिगरेट की पार्टी अटेंड करने के बाद देर रात नशे की हालत में उसका घर वापिस आना पिताजी के लिये असहनीय होने लगा था। पिताजी में किसी भी प्रकार का व्यसन नहीं था। एक दिन जब पिताजी की सहनीय क्षमता ने जबाव दे दिया तब उन्होंने बिना परवाह किये की बेटी है; सपष्ट जबाव दे दिया। 
पिताजी ने बहन से कहा, “तुम्हें हमने इसलिये पढ़ाया लिखाया नहीं है कि तुम आत्मनिर्भर बनकर इस प्रकार देर रात लड़कों के साथ शराब सिगरेट का सेवन करती फिरो। छोटे छोटे कपड़े पहनकर समाज की दूषित नजरों को आमत्रंण देती रहो। अगर तुम सुधर नहीं सकती तो अपना ठिकाना कहीं दूसरी जगह देख लो। क्योंकि जब तक तुम्हारा विवाह नहीं हो जाता तब तक तुम्हें सभ्य तरीके से इस घर में रहना होगा।
विवाह के बाद तुम जानो तुम्हारा पति जाने। सुबह जब नशा उतर जाये तब होश में जबाव दे देना।“ अगले दिन बहन होश में तो आयी मगर उसके दिमाग में चढ़ी आत्मनिर्भरता का नशा उसे पिताजी के सामने माफी माँगने नहीं दे रहा था। वह दो दिन बाद ही अपने प्रेमी के साथ उसके फ्लैट में रहने चली गयी। कुछ माह बाद उसी से उसने परिवार को बताये बिना शादी कर ली। 
बड़ी बहन के जाने के बाद माँ पिता दुखी रहने लग गये थे। उन्हें लगने लगा था कि जब बेटी अपनी मनमानी कर सकती है तब रोहित से क्या उम्मीद की जाये! हालाँकि बहन ने सदैव अपने छोटे भाई को प्यार किया था। दूर रहने के बाद भी भाई और माँ से फोन के सहारे जुड़ी रही। रोहित के हाथ में टाइटन की सुंदर घड़ी उसकी बहन ने अपनी नौकरी लगते ही सबसे पहले गिफ्ट की थी। हालाँकि बहाना यह था कि रोहित दसवीं में प्रथम आया था। 
बहन के इस स्वाभाव से माँ पिता रोहित पर विशेष ध्यान रखने लगे। रोहित तो आज्ञाकारी सुलझा हुआ बेटा था ही मगर अपने अभिवावक के सचेत रहने के कारण और भी अधिक समझदार हो गया था। रोहित अपने माँ पिता को तनिक भी दुखी नहीं देख सकता था। यही कारण रहा कि वह कॉर्परेट जगत में रहते हुए भी अपने सभी मित्रों में सबसे अलग जाना जाता था। अपने कार्य में लिप्त रहने वाला रोहित कभी किसी लड़की की तरफ दोस्ती से ज्यादा कोई विचार अपने मन में आने नहीं देता था। खुबसूरत होने के कारण कई बार उसे प्रोपोजल भी मिले मगर उसने झूठ बोलकर की वह एंगेज्ड है; ठुकरा दिया। 
कहते हैं ना! ‘दूध का जला भी छाछ फूँक फूँककर पीता है।‘ वही हाल रोहित के माँ पिता उसके लिये लड़की देखने में कर रहे थे। उन्हें गाँव की घरेलू, बेशक कम पढ़ी लिखी हो मगर सभ्य लड़की की तलाश थी। तीन वर्षों तक अनेक रिश्ते छाँटने के बाद आगरा की एक घरेलू बी.ए पढ़ी लड़की को पसंद किया। पच्चीस वर्षीय  शोभा दिखने में बहुत साधारण थी। दो बहनों में वह बड़ी थी। छोटी बहन फैशन डिजाईनर का कोर्स कर रही थी जो कि इससे पांच वर्ष छोटी थी। ज्यादातर डिजाईन शोभा ही उसे बनाकर दे दिया करती थी जिससे उसका काम आसान हो जाता था। 
दिसम्बर माह २०२० आगरा शहर शोभा को पसंद करने रोहित ही आया था। दोनों परिवार शादी की तारीख जल्द से जल्द देखने में लग गये थे। रोहित की शोभा से फोन पर खूब बातें होने लगी। रोहित के सरल स्वभाव के कारण शोभा उसे बहुत पसंद करने लगी। शोभा ने बातों बातों में खुलकर रोहित से अपना अतीत बता दिया। उसने बताया कि कॉलेज के दिनों में बस से आते जाते रोज एक ही सीट पर साथ साथ बैठते गपियाते एक लड़के को वह पसंद करने लगी थी।
वह उसे दो वर्षों तक साथ घूमाता रहा फिर एक दिन अचानक ना जाने कहाँ गायब हो गया। उसकी छोटी बहन ने उसका रोना देखकर घर में सबको बता दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि वह घर में बिठा दी गयी। जिसका उसे दुख है। वह शादी के बाद आजाद परिंदा बनना चाहती है। फैशन डिजाईनर का कोर्स करके अपना बुटिक खोलना चाहती है। दिन भर घर में रहकर घर गृहस्थी के चपड़ों में पड़कर घरेलू महिला नहीं बल्कि आत्मनिर्भर बनना चाहती है। रोहित ने चुपचाप उसके मन की बातें सुन लीं। 
रोहित समझदार लड़का था। वह किसी भी प्रकार का मतभेद विवाह उपरांत नहीं रखना चाहता था। उसे शोभा के पूर्व प्रेमी से उसके सम्बंध की बात बुरी नहीं लगी मगर उसका जबरदस्ती का आत्मनिर्भर बनकर घर गृहस्थी से दूर भागना थोड़ा बुरा लगा। रोहित अपने माता पिता का अंधभक्त था। उसके विवाह के बाद उन्हें कोई दिक्कत ना आये इस कारण उसने शोभा के मन की बात उन्हें समझने के लिये बता दिया। 
नीरजऔर गीता बेटे के मुख से शोभा की बातें जानकर स्तब्ध रह गये। उन्होंने बेटे से कहा कि वह उसे साफ इंकार कर दे कि वह नौकरी नहीं करेगी। हमें दहेज नहीं चाहिये ना हमें ज्यादा धन की चाह है। घर में उसके अलावा तीन लोग ही तो हैं। मेरी पैंशन और तुम्हारी तनख्याह काफी है। इसमें दो पैसे बचाये भी जा सकते हैं। हमारा घर भी अपना ही है कोई किराये का तो है नहीं। तुम्हारी माँ बूढ़ी हो गयी है। बीमार रहती है। 
रोहित ने फोन पर उसे विवाह के बाद नौकरी करने की मनाही दे दी। उसने साफ कहा, “मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ मगर अपने माता पिता को भी कम प्यार नहीं करता।“  
शोभा ने साफ साफ कह दिया, “मैं अपने घरवालों को तुमसे विवाह करने के लिये मना नहीं कर सकती इसलिये बेहतर है कि तुम रिश्ता तोड़ दो। ताकि मेरी राह आसान हो जाये।“ रोहित के लिये सहन करना मुश्किल हो रहा था क्योंकि उसने अपने जीवन में पहली बार किसी लड़की को चाहा था। अब यह दुविधा में फंस गया था। रोहित ने यह बात भी अपने माता पिता को बता दी ताकि वो समझ सकें। 
यह सब सुनने के बाद रोहित के पिता नीरज ने शोभा के माता पिता से स्पष्ट बात की। शोभा के घरवाले अपनी बेटी के इस रवैये से दुखी हो गये। उन्होंने स्थिति को सम्भालते हुए नीरज और गीता से अपनी बेटी को नादान बताते हुए माफी मांगी। उनका कहना था कि आजकल के बच्चे कुछ का कुछ नादानी में कह देते हैं जिसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं है। आप जैसा कहोगे बेटी वैसा ही करेगी; वैसे ही रहेगी। 
मगर नीरज का अनुभव कर रहा था कि यह सब केवल बातें हैं। लड़की मेरे बेटे को शादी के लिये मना कर चुकी है तब यह रिश्ता कहीं जी का जंजाल ना पड़ जाये। 
नीरज ने रोहित को समझाया, “देखो बेटा हम बूढ़े हो चुके हैं। शोभा ने विवाह करने के लिये तुम्हारे समक्ष  शर्त रख दी है। जिसे तुम्हारे ना मानने पर उसने तुम्हें ठुकरा दिया है। अब वह स्वेच्छा से नहीं बल्कि अपने माता के दबाव में आकर तुमसे शादी करने को तैयार हो रही है। अगर ऐसा ना होता तो वह उस दिन के बाद तुमसे अवश्य बात करती! मैं देख सुन रहा हूँ कि तुम उसे बार बार फोन लगाते हो और वह फोन काट देती है। ऐसा है कि नहीं? शोभा से दुबारा तुम्हारी कोई बात हुई है?” 
रोहित ने अपने पिता को साफ साफ बता दिया, “मुझसे शादी के लिये इंकार करने के बाद से वह अब मेरा फोन नहीं उठाती है। अब मुझे नहीं पता कि वह मुझसे शादी करना चाहती है भी या नहीं? मगर मैं उसे दिल दे बैठा हूँ।“  
यह सुनकर द्रवित ह्रदय पिता ने रोहित के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “मेरी कड़वी मगर सही बात का बुरा मत मानना। वह ना तो तुमसे प्यार करती है ना ही तुम्हारी इज्जत करती है। उसके लिये विवाह एक सौदा है जिसके माध्यम से वह अपनी अतृप्त इच्छाओं के मार्ग खोलना चाहती है। मेरी बात मानो एक बार उससे उसके परिवार वालों के सामने स्पष्ट बात कर लो ताकि सब कुशल मंगल हो।“ 
रोहित अपने पिता की बात मान आगरा गया और सबके सामने खुलकर शोभा को उसके मन की बात रखने को बोला। मगर शोभा से ज्यादा उसके परिवार के सभी सदस्य रोहित को समझाते रहे कि शोभा घरेलू आज्ञाकारी बेटी है। तुम्हारी माँ को बेटी से भी ज्यादा प्यार देगी। हम गरीब हैं मगर इज्जतदार हैं। मगर रोहित का मन शोभा के मन की जानने को बेताब था। भोजन के समय अकेला पाकर रोहित ने धीरे से  फुसफुसाकर शोभा से पूछ ही लिया, “सच सच बता दो। तुम किसी दबाव में तो मुझसे शादी करना नहीं चाहती?” शोभा ने भी धीरे से सिर्फ इतना कहा, “ऐसी कोई बात नहीं है।“ कहकर वह शर्माते हुए आगे चली गयी। रोहित को लगा सब ठीक है। वैसे भी चाहतों को अपने पक्ष का अधिक ख्याल रहता है। सब कुछ ठीक हो जायेगा अति विश्वास रहता है। 
शोभा के माता पिता सगाई और विवाह की दिनांक निकाल चुके थे। मगर नीरज अपने बेटे का विवाह शोभा से नहीं करना चाहते थे। माँ बेटे का मन देख रही थी। सपनों में खोये बेटे के मन को जान रही थी। वह सब जानते हुए भी अपने मन की बात अपने पति के समान स्पष्टतया अपने बेटे से नहीं कह रही थी। 
जब सगाई की अंगूठी पहनायी जा रही थी तब किसी को भी अहसास नहीं था कि शोभा जैसी बिलकुल सीधी साधी दिखने वाली साधारण लड़की के मन में क्या चल रहा है! तीन दिनों में ही सगाई, लगन व शादी हो गयी। टवेंटी टवेंटी का जमाना है। सब कुछ बहुत तेजी से होता है। 
विवाह के बाद पहली रात रोहित सजे कमरे में प्रवेश करते ही अवाक रह गया। बिस्तर पर शोभा नहीं थी। वह तो बाथरूम में किसी से बात कर रही थी। रोहित ने सुनने का प्रयास किया तब केवल स्पष्ट हँसी और अस्पष्ट शब्द सुनाई दे रहे थे। रोहित एक तरफ कुर्सी पर बैठकर प्रतीक्षा करता रहा। करीब आधे घंटे बाद वह बाथरूम से बाहर निकली और बैफिक्री अंदाज में रोहित के करीब रखी दूसरी कुर्सी पर बैठ गयी।
रोहित ने देखा उसने घुटनों से थोड़ी नीचे तक की कैफ्री और छोटी सी टी शर्ट पहन रखी थी जिसमें से कमर का कुछ हिस्सा दिखाई दे रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या पूछे? क्या कहे? वह अवाक स्तब्ध उसे एकटक देखता रहा। उसने देखा कि उसने सारे भारी गहने उतार दिये थे। उसे देखकर लग ही नहीं रहा कि यह वही लड़की है जिसे एक घंटे पहले उसकी चचेरी ममेरी आदि बहनों ने सजाकर कमरे में भेजा था। और वह उसके रूप को पाने के लिये बेसब्री से कमरे की ओर ताक रहा था। 
वह यह सब सोच ही रहा था कि शोभा ने उसका हाथ दबाते हुए कहा, “मैं सोने जा रही हूँ। प्लीज मुझे परेशान मत करना।“ और वह कुर्सी से उठकर बिस्तर पर बिखरे फूलों को एक तरफ हटाकर करवट लेकर सो गयी। 
विवाह के बाद सारे रिश्तेदारों का जाना लगा रहा। सब तीन दिनों तक व्यस्त रहे। जब सारे रिश्तेदार चले गये तब घर में चार सदस्य रह गये। रोहित को लगा शायद अब सब ठीक हो जायेगा। मगर वह उसके बाद भी हर रात वह करवट लेकर सो जाती। अब तो वह कमरे से बाहर भी माँ पिता जी के सामने छोटे छोटे कपड़े पहनकर घूमने लगी। रोहित को अपनी गलती का अहसास होने लगा; फिर भी आशा बनाये हुए था कि शायद सब ठीक हो जायेगा। वह ऑफिस जाता तब तक वह सोयी रहती। उसकी माँ वैसे ही घर सारा काम काज करती जैसे वह उसके विवाह से पहले करती थी। पिता शांत रहने लगे।
रोहित और माँ से भी कम बात करने लगे। ड्राइंग रूम में टीवी देखते रहते मगर जैसे ही बहु निकर टीशर्ट पहनकर बाहर आती नजरें झुकाये अपने कमरे में चले जाते और किताब पढ़ने लगते। माँ ने शोभा को एक दो बार टोका भी था कि ऐसे कपड़े अपने कमरे तक ही पहने मगर वह नहीं मानी। समझदार माँ ने अपनी इज्जत अपने हाथ रखी। माँ के हिस्से में एक और व्यक्ति का कार्य बढ़ गया था जिसे वह किसी से नहीं कह सकती थी। 
एक माह गुजरने के बाद एक दिन जब रोहित ने उससे पूछ ही लिया कि तुम क्या चाहती हो? सच सच बता दो! तब वह बोली, ”मैं कोई गलती तो नहीं कर रही हूँ। चुपचाप अपने आपमें रहती हूँ यह भी आपको बर्दाश्त नहीं। आपकी बहन के बारे में मुझे सब पता है। उससे तो मैं बहुत अच्छी हूँ। अगर आपको मुझसे नहीं मेरे जिस्म से प्यार है तो आप अपनी मन की कर सकते हैं।“ और यह कहकर वह अपने कपड़े उतारने लगी। रोहित ने शीघ्रता से उसका हाथ यह कहकर रोक दिया, “मुझे तुमसे प्यार है। तुमको जिस दिन मुझसे प्यार होगा उस दिन ही हमारा मिलन होगा।“ 
शोभा की माँ का गीता के पास फोन आया कि होली में बेटी दामाद को भेज दीजिये। गीता ने बेटा बहु को भेज दिया मगर क्या पता था कि होली के बाद इतना फीका और कड़वा जी हो जायेगा। बेटा होली के दूसरे दिन दोपहर जब अकेला आया तो नीरज और गीता दोनों को अच्छा नहीं लगा।  मगर शाम होते होते जब शोभा ने विडियो कॉलिंग करके बुरा भला बोलने लगी तब ये तीनों माँ पिता बेटा आश्चर्य से आँखें फाड़कर सबको देखते रह गये। इकलौती बहुत को गीता ने बहुत सारे जेवर चढ़ाये थे। गीता के ध्यान में आया कि बहु सारे गहने जेवर लेकर होली में मायके गयी थी। 
विडियो में सब टकटकी लगाकर देख रहे थे कि शोभा अपनी साड़ी के पल्लू से आँसू पौंछते हुए अपने परिवार वालों के साथ बैठकर रो रोकर कह रही थी, “तुम तीनों ने जो मेरे साथ अत्याचार किया है उसका बदला मैं लेकर रहूँगी। डेढ़ माह तक मुझे ये लोग सताते रहे हैं। सास मेरा पका खाना उठाकर कुत्ते को डाल देती थी और मुझसे दुबारा पकाने को कहती थी। ये पति के नाम पर दाग है।
हर दूसरे दिन अपने माँ बाप के कहने पर मुझे मारने के लिये दौड़ पड़ता था। सुबहसे लेकर रात तक पूरा घर का काम करवाते रहते थे। मुझे नौकरानी से बही बुरी स्थिति में रखा है। अब मैं तुम्हारे यहाँ कभी नहीं आऊँगी। दहेज का आरोप सहोगे तब ही तुम सब सुधरोगे।“ शोभा के घरवालों को देखकर लग रहा था कि वो सभी शोभा के व्यवहार से आश्चर्य हैं मगर बेटी को झुठलाना नहीं चाहते। विडियो कॉलिंग में सभी चुप थे केवल शोभा के झूठे आँसू चीख रहे थे। 
लॉकडाउन के कारण कोई घर से बाहर नहीं निकल सकता! रोहित नौकरी पर जा नहीं रहा है। गीता ने अपने स्तर पर शोभा की माँ से विनती की कि वह अपनी बेटी को समझाये और प्रेमपूर्वक रोहित से बात करे।  मगर गीता ने पाया कि शोभा अपने घरवालों को अपने आसुँओं से भिगो चुकी है। सब उसकी बातों में आ गये हैं। वह जिद करके बैठी है कि रोहित अपने माँ पिता को छोड़ उसके साथ अलग घर लेकर रहेगा तब ही वह रोहित के पास वापिस जायेगी। अगर रोहित ऐसा नहीं करेगा तो वह तालाक लेकर खर्चा मागेंगी। 
रोहित अपने माता पिता को छोड़ नहीं सकता और पत्नी उनके साथ रहेगी नहीं। नीरज और गीता ने अपने बेटे का सुख देखते हुए उसे यह भी कहा, “बेटा अगर तेरा जी करे तो तू बहुन के साथ दूसरे घर में रह ले। हमारी खुशी तेरे सुख में ही है।“ रोहित ने साफ मना कर दिया कि मैं उसके साथ अकेले नहीं रहूँगा। उसे मुझसे पहले आप दोनों को अपनाना होगा। अगर वह यह मानती है तो मैं कुवाँरा हूँ; कुँवारा रह लूँगा मगर ऐसी त्रिया चरित्र स्त्री के लिये आप दोनों को नहीं छोडूँगा।   
आज रामायण में दिखाया जा रहा है कि सीता रावण वध के बाद अपने पति राम के पास अग्नि देव से वापिस श्रीराम के पास आ रही है। राम का अटूट विश्वास सीता के प्रति है। सीता की पवित्रता और समर्पण राम के प्रति अद्धभुत है। रामायण का यह भावुक दृश्य देखकर रोहित मन मन ही अपने आपसे कहता है कि आज के इस कलयुग में पुरुष तुम्हें अग्नि परीक्षा देना होगा!…

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