Friday, April 17, 2026
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सीमा जैन ‘भारत’ की कहानी – नन्ही हथेलियों में

बरखा जी, बहुत अच्छा लगा आपको सुनकर! महादेई माई की महिमा को आपने बड़े मन से प्रस्तुत किया. आपके यह शब्द मैं भूल नहीं पाऊंगा –“हमारे शरीर में 70 प्रतिशत पानी हैl एक तरह से महादेई हमारे भीतर भी है या मैं भी महादेई हूं.” मेरे शब्दों को दोहराते हुए उसने मेरी आंखों में झांका था. बस, एक पल भी नहीं लगा और मैं उसकी आंखों की गहराई में डूब चुकी थी. 
डूबने का कारण उसकी आवाज़ थी या गहरी हरी-भूरी आँखें या उसकी और मेरी एक- सी सोच, पता नहीं क्या था? पर जो भी था, वही पल हमारे प्रेम का कारण बना था. प्रेम, पहली निगाह में ही होता है, यह शाश्वत सत्य है. जब कुछ महीनों के बाद मैंने कुंतल दादा से कहा कि “मुझे गौतम से प्रेम हो गया है! मैं आपको उससे मिलवाना चाहती हूं.” 
“इतनी जल्दी इस रिश्ते को प्रेम का नाम मत दो बेटा!” एक बड़े भाई को अपनी अतिसंवेदनशील बहन की चिंता थी, जो उसकी रग-रग से वाकिफ थे. 
“दादा, गौतम बिलकुल मेरे जैसा है! बहुत समय हो चुका है, उससे मिलते हुए. अब हम…” कहते हुए मैं रुक गई थी. अब मैं दादा को कैसे और कितने किस्से बताती, जब मैंने गौतम को अपने जैसा ही पाया था. लगता था, यह तो लगभग असंभव ही है कि कोई मेरे जैसा ही संवेदनशील हो.
“कल वक्त और सफलता किसमें क्या बदलाव ले आए, हम नहीं सोच सकते है बेटा! आज वह एक पत्रकार है. कल उसकी सफलता उसे कहां ले जाए, कोई नहीं जानता है. याद रखना! सफलता जीवन की सोच और दिशा को बदलने का दम रखती है. उसका पेशा ऐसा है, जिसमें एकदम ऊपर उठने के अवसर बहुत अधिक हैं. शिखर पर पहुंचने के बाद इंसान रूपांतरित हो सकता है.” जब दादा मेरे लिए चिंतित होते तो मुझे बेटा ही कहते हैं. 
गोवावासियों के दिल में महादेई के लिए एक गहरा लगाव है. वो अपने इस मीठे जल के स्त्रोत के प्रवाह को कैसे रोकने दे सकते हैं? चालीस सालों से यह संघर्ष चल रहा है. कर्नाटक सरकार को आज तक बांध नहीं बनाने दिया गया है और आगे भी न बने तो उसके लिए यह हम गोवावासियों का एक सामूहिक प्रयास था. अपने एनजीओ की पूरी ऊर्जा उस समय मैंने महादेई माई पर लगा दी थी.उसी कार्यक्रम में गौतम से पहली बार मिलना हुआ था.
मेरे एनजीओ की इस मुहिम में मुझे प्रशासनिक स्तर पर बहुत सपोर्ट मिला था. सात जून को मीरामार बिच के अंत से पणजी में सांता मोनिका जेट्टी तक की सात किलोमीटर लंबी मानव श्रृंखला बनाकर महादेई, आमची माई से अपना प्रेम प्रकट करना था. सब लोग सफेद या नीले कपड़ों में आए थे. गौतम भी सफेद कपड़ों में आए तो उन्हें देखकर मन पुलक उठा था.ऐसा लगा कि वे भी हमारे ही रंग में रंगे हुए हैं
जिन शब्दों के साथ वह मेरे दिल में उतरे थे, बस उन्हीं की डोर थामकर मैंने शादी के लिए हां कर दी थी. जिस दिन प्रेम का इकरार हुआ था, उसी दिन को हमने शादी के लिए चुना था. आज शादी के सात साल बाद उसी डोर को ऐसा झटका लगा कि लगा, अब यह टूट जायेगी. 
शाम के समय हम अपने बगीचे में थे. मानव एक पौधे की पत्तियों को तोड़कर उनसे खेलने लगा. मैंने उसे ऐसा करने से मना किया पर वह नहीं माना. जब मैं उस पर चिल्ला उठी तो गौतम ने मुझसे कहा “बरखा, तुम यह क्या कर रही हो? मानव को कैसे डांट रही हो? बच्चे पर ऐसे कौन चिल्लाता है?”
“देखो, गौतम मानव कैसे पत्तियों और फूलों को तोड़कर फेंक रहा है! यह बहुत जिद्दी होता जा रहा है, बिलकुल भी कहना नहीं मानता है. यह इसका हर दिन का खेल हो गया है!”
“अपने गार्डन में मेरे बेटे का जो मन कहे, वो करे! उसे अपने ढंग से खेलने दो न! दो- चार पत्तियों के टूट जाने से इस गार्डन में क्या कमी आ जायेगी?” दो बेडरूम के फ्लैट से एक बंगले तक का रास्ता हमने तय किया था और इस रास्ते में गौतम बहुत बदल चुका था
“गौतम, इनमें भी जान है! यह इसे समझना चाहिए! पानी की बर्बादी पर इसे रोक नहीं सकते हैं. कोको को सताए, उसकी पूंछ पर पैर रखकर उसे परेशान करे, पानी पीते या खाते हुए उसके बर्तन हटा दे, यह सब क्या है गौतम? पर तुम कहते हो कि यह खेल रहा है. तितलियों को पकड़ कर मार दे या एक दिन में एक पेंसिल शार्प करके खत्म कर दे, तुम्हें सब ठीक लगता है! गौतम, तुम्हारी शह से यह गैर-जिम्मेदार हो रहा है.
“यार, छोटे बच्चे पर कौन इतनी पाबंदियां लगाता है? अब हम अपने बेटे को प्यार से…”
“इसे प्यार नहीं, प्यार में बिगाड़ना…”
“बरखा, छोड़ो यार! मैं अपने बेटे को…”
“तुम्हारा नहीं, हमारा बेटा…”
“ठीक है, हमारा! हमारा बेटा, वैसा ही पलेगा जैसा मैं…”
“फिर मुझे सोचना होगा कि मैं क्या चाहती हूं. यहां बात सिर्फ मैं की नहीं हो सकती है…”
“मतलब?”
“मतलब, तुम शायद भूल चुके हो कि हमारे मिलने का कारण महादेई मां थी. मैं आज भी प्रकृति और पर्यावरण के लिए उतनी ही जिम्मेदार हूं, जितनी कल थी. तुम शायद बदल रहे हो! अपनी संतान और पर्यावरण को बचाना ही मेरी जिम्मेदारी …”
“बरखा, कैसी बातें कर रही हो तुम? संतान को बचाना माने क्या? एक छोटी- सी बात को कितना तूल दे रही हो?”
“अपने बेटे के भविष्य और इसके भविष्य के लिए यह पृथ्वी, इन दोनों को नहीं सहेजा तो क्या किया? सब अपने ही हाथों से नष्ट होते देखना बहुत पीड़ादायक…” कहते हुए मेरी आँखें भर आईं थीं
“बच्चे की मस्ती में तुम्हें क्या नष्ट होते हुए दिख रहा है? मैं नहीं समझ पाऊंगा! तुम अपना काम आज भी पूरी शिद्दत से कर रही हो न? मैं भी तुम्हें जितना दे सकता हूं, कवरेज दे ही देता हूं!” कहते हुए गौतम, मानव का हाथ पकड़कर आगे बढ़ गए थे. ठीक ही हुआ कि वह आगे बढ़ गए क्योंकि समझाने से कोई नहीं समझता है, जब तक कि समझ उसके भीतर न पनपे. 
क्या मैंने पर्यावरण के लिए जो काम किया, वह कवरेज के लिए था? उसमें प्रचार- प्रसार की इच्छा हमेशा रही है पर उसके पीछे सोच तो जनजागरण की ही रही हैl क्या यह वही इंसान है जिससे मैंने प्यार किया था? 
यही वह इंसान है, जो मेरी आंख के पानी को देख थम गया था? जिसका हाथ पकड़ कर चलते हुए मुझे लगा था कि मैं बादलों पर चल रही हूं? आज उसीके साथ रहते हुए, अपने बेटे की ऊंगली थामे लग रहा है कि मैं जमीन में धस रही हूंl मेरे पैर अपनी पकड़ को ही खो रहे हैं
कल जिस संवेदना से भरे हुए पत्रकार से मैंने प्यार किया था, वह कहां छूट गया? क्यों सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए मानवीय मूल्य नीचे ही छूट जाते हैं? क्या उनमें ताकत नहीं होती ऊपर चढ़ने की? जीवन के मूल्यों से ज्यादा ताकतवर क्या कुछ है? 
मानवीय मूल्य, ज़मीन से जुड़े होते हैं क्या इसलिए वे ऊपर नहीं उठ पाते हैं? उनका जीवन जमीन से ही जुड़ा होता है इसीलिए महान व्यक्तियों के लिए कहा जाता है कि वे सफलता के शिखर पर पहुंच कर भी जमीन से जुड़े रहेl ऐसी सफलता किस काम की जिसमें इंसान अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारे और उसे दर्द का एहसास भी नहीं हो? 
पैर काटकर ऊपर उठ जाने से क्या दर्द का एहसास खतम हो जाता है? या कटे पैरों पर सफलता के, दौलत और शोहरत के निर्जीव पैर लग जाते हैं? जो संवेदनाओं से अनजान होते हैं? तभी किसीको पछाड़कर, धोखा देकर आगे बढ़ना आसान होता है.
निर्जीव पैर किसी का दर्द कैसे महसूस कर सकते हैं? एक निर्णय मन में उठा और मैंने कैब बुक कर लीl। मैं अपने आप में खोई हुई थी कि गौतम का फोन आया “बरखा, रात हो गई है अंदर आओ! खाना खा लो! मानव तुम्हारे बगैर खाना नहीं खा रहा है!”
“तुम खाना खा लो, मैं दादा के पास जा रही हूं!” कैब में बैठते हुए मैंने अपना फोन स्विच ऑफ कर दिया थाl आज पहली बार यह खयाल करने का मन नहीं हुआ कि मानव मेरे बगैर कैसे रहेगा? गौतम अकेले घर को कैसे सम्हालेगा? 
चिंता एक ही थी कि मैं इस मरे हुए मन के साथ नहीं जी पाऊंगी. हां, जो मेरे भीतर पनप चुका था, उसका क्या करूं? एक कुंतल दादा ही हैं, जिनसे कम बोलने पर वे ज्यादा समझ जाते हैं. आज वो सब याद आ रहा था जिसके कारण मैं गौतम को अपने जैसा ही समझने लगी थी
जब जमीन पर पसरी घायल डाली को उसने रुककर पेड़ के सहारे खड़ा किया था तो उसके साथ मेरे पैर ही नहीं, मन भी ठिठक गया था. कितने लोग उस डाली को कुचलकर आगे बढ़ चुके थे, जिसे गौतम ने हटाया था. वह समंदर किनारे जूते हाथ में लेकर ही चलता था। पूछने पर वह बोला “किसी केकड़े की मौत की जिम्मेदारी मैं नहीं लेना चाहता हूं.यह उनकी और कौवों के बीच की लड़ाई है.” 
उस दिन पहली बार मैंने झटपट रेत में घुसते हुए केंकड़ों को ध्यान से देखा था.बस एक पल की ही तो बात है, जब कोई केकड़ा किसी का भोजन या हमारे जूते का शिकार हो जाए.
उस दिन मैंने गौतम से कहा था कि “तुम्हारी बात तो बहुत सही है, तो क्या अब मैं भी जूते उठाकर चलूं?” 
“हां, चाहो तो, तुम्हारे जूते मैं उठा लूंगा!” 
उसकी बात सुनकर मैंने बच्चों की तरह जूते उतार दिए.जूते हाथ में उठाकर चलने वाली मेरी अनकही कश्मकश को समझने वाले मेरे साथी ने झुककर जब मेरे जूते उठाए थे तो मेरा मन उसकी ओर पूरी तरह से झुक गया था. मेरी आंखों में पानी भर आया था जिसे उसने देख लिया, पर कहा कुछ नहीं था. आंसुओं को ध्वनि की जरूरत भी कब हुई है? यह खारा पानी ही तो जीवन की डोर है.
एक पल को ठहरी हुई उसकी आंखों में देखते ही, मैंने सब सुन लिया था। मौन, प्रेम को अनंत गहराई दे देता है, यह उस दिन महसूस किया थाl उसके हाथ को पकड़कर चलते हुए उस दिन लगा कि मेरे पैर रेत पर नहीं, बादलों पर पड़ रहे हों! 
इच्छा हुई थी कि यहीं ठहर जाऊं और उसे एक लंबे आलिंगन में बांध लूंl सागर किनारे की भीड़ में मैं ऐसा नहीं कर पाई थी पर उन पलों को याद करके मैंने उसे अनगिनत बार बाहों में भरा था. हम प्रेमियों के जीवन में प्रेम के पल जितने होते हैं न, उससे ज्यादा उनकी यादों के पल होते हैं इसीलिए कहा जाता है कि प्रेमी प्रेम में डूबे हुए रहते हैं
एक दिन मेरे जुड़े में फूल सजाते हुए उसने शरारत से कहा था कि “यह सब चुने हैं, तोड़े नहीं हैं!” उस दिन फूलों की महक मेरे तन ही नहीं, मन को भी महका गई थी। कितनी यादें और कितनी बातें हैं. 
कैसे इस इंसान को याद दिलाऊं कि यह कितना बदल चुका है. दादा ने सच ही कहा था कि इंसान का मन बदलते हुए देर नहीं लगती हैl और सफलता कैसे इंसान को रंग बदलने की ताकत दे देती है, यह मैं हर दिन, हर पल देख ही रही हूं
माता- पिता को तो मैंने तीन साल की उम्र में ही खो दिया थाl कुंतल दादा के साथ बचपन और जवानी सीमित पैसों और उनके प्यार से लबालब भरी हुई बीती थी. गौतम के साथ जब नए जीवन की शुरुआत की तब भी प्रेम ही अथाह था, पैसे तो बस जरूरतों को ही पूरा कर पाते थे.
हमारे जीवन की नाव डगमगाने लगी जब उसमें पैसों की बारिश का पानी भरने लगा था. तब से ही गौतम बदलने लगा. मैं सब देख- समझ रही थी पर खामोश थी.आज लगा अब नहीं बोला तो कब बोल पाऊंगी? गाड़ी दादा के घर की ओर बढ़ रही थी और मेरा मन आधा आगे और आधा पीछे छूटता जा रहा था.
मानव ने जैसे ही सुना की मां गौतम मामा के पास गई है तो वह मचल उठा.
मुझे भी मां के पास जाना है!”
“हम कल चलेंगे!” कहते हुए गौतम ने उसे उस शाम तो बहला दिया पर अगली सुबह उसे स्कूल भेजना तो उससे भी ज्यादा मुश्किल काम रहा.बरखा के रहते गौतम कई बार मानव को नहला देता था, पर उसे आज पता चला कि मानव को जगाना, वॉशरूम भेजना, नहलाना, दूध पिलाना, टिफिन तैयार करना और यह सब करते हुए उसने देखा कि जूते और मोजे तो मिले ही नहीं. उस दिन इतना थक कर भी वह मानव को स्कूल नहीं भेज पाया था.
आज पहली बार गौतम को लगा कि यह सारे काम बरखा कितनी सहजता से कर लेती थी. वह भी अपने एनजीओ और डांस क्लास के साथ. एक औरत घर और बाहर कितना कुछ कर लेती हैl क्या हम उसकी कद्र करते हैं? यह सवाल उसने अपने आप से किया थाl क्या हम उसकी सोच को सम्मान देते हैं? या सफलता और दौलत के नशे में सब भूल जाते हैं?!
गौतम ने जब भी बरखा को फोन लगाया उसका फोन बंद ही था और कुंतल दादा ने उसका फोन उठाया ही नहींl आज पांचवे दिन तो मानव अपनी मां की याद में सिसकने लगा.
“मुझे मां के पास जाना हैl”
“वह हम दोनों से नाराज़ है!”
“क्यों?”
“हम उनका कहना नहीं मानते हैं!”
“मैंने क्या नहीं माना?”
“तुम कोको को तंग करते हो!”
“मैं तो उसके साथ खेलता हूंl”
“नहीं बेटा, किसी को दुख देकर हम कैसे खुश हो सकते हैं?! मां तुमको मना करती थी न!”
“हां, पर आप तो मेरी साइड लेते थे!” 
मानव ने बड़े प्यार से कहा, जिसे सुनकर गौतम आश्चर्य से भर गया कि उसकी शह को छोटा बच्चा कैसे पकड़ लेता हैl
“फिर तो मैंने भी गलती की नl तुम बगीचे में पत्तियां तोड़ते हो!”
“उससे क्या हुआ?”
“पेड़ जिंदा हैंl उनको दर्द होता हैl”
“दर्द कैसे होगा? वो बोल नहीं सकते हैं?”
“जो बढ़ते हैं वो सब जिंदा हैं, चाहे बोल नहीं सकते हों… तुम्हारी मां से मेरी दोस्ती पक्की हो गई थी, जब मैंने उनके बालों में चुने हुए फूल लगाए थेl”
“चुने हुए माने सिलेक्ट किए हुए?” मानव ने मासूमियत से पूछा था
“नहीं बेटे, जो ज़मीन पर गिर जाते हैं जिन्हें हम तोड़ते नहीं हैं.” उसके भोलेपन पर वह मुस्कुरा उठा था. गौतम को लगा कि अनजाने ही उसने मानव के भीतर की संवेदना को बुरी तरह से प्रभावित कर दिया है. जो बात उसके लिए सिर्फ उसके बेटे के प्रति प्रेम थी, वो आज उसे अमानवीयता की ओर धकेल रही है. बरखा की बात सही ही थी.
आज यह बच्चा कोको को प्यार से सहला भी सकता थाl पौधों को पानी दे सकता था या किसी तितली को देख कर खुश होता मगर उसे पकड़ कर मार कैसे सकता है? इसके मन में संवेदना का संचार होना था. उसकी जगह यह कैसा हो रहा है? एक बच्चे का संस्कारवान होना ज्यादा जरूरी है. मैं और बरखा भी तो अभावों के बाद भी अपनी मंजिल पा ही गए फिर थोड़ी दौलत और शोहरत मिल जाने पर मैं कैसा होता जा रहा हूं? 
जब बरखा अपने दादा के पास पहुंची तो अपने आपको रोक नहीं पाईl उनको देखकर उसकी आंखों में आसूं आ गए. दादा ने उसे छूकर पूछा “क्या हुआ बेटा? घर में सब ठीक तो है?”
“कुछ भी ठीक नहीं है! सब बिखर रहा है! गौतम की दौलत की चमक में सब धुंधला रहा है! दादा, यदि मैं अपने बच्चे को संस्कार ही नहीं दे पाई तो यह सफलता किस काम की?” 
“थोड़ा रुको बरखा! किसी भी रिश्ते के लिए किसी निर्णय तक पहुंचने से पहले थोड़ा रुकना चाहिए! यह मैंने कल भी कहा था और आज भी कहता हूंl निर्णय लेने की गति जितनी धीमी होगी, रिश्ते उतने पैर जमाकर चल सकेंगे!”
“दादा, अब रुकने और समझने को बचा ही क्या है? गौतम ने मानव को भी अपने जैसा ही…”
“तुम्हारे यहां आने से उसे सोचने का मौका मिलेगा…”
“उसके पास सोचने की इच्छा ही…”
“बरखा!” दादा की आवाज़ में एक आदेश था, जिसका मतलब था कि शब्दों को अब विराम की जरूरत हैl बरखा ने एक पल दादा की आंखों में देखा और अपने शब्दों को विराम दे दिया. पिछले पांच दिनों में उसने दादा से कोई बात नहीं कीl उसे लगा अब कहने का नहीं, सोचने का समय है
क्या मैं ठीक कर रही हूं? क्या एक पिता अपने बच्चे को लाड़- प्यार नहीं कर सकता है? क्या सात साल के बच्चे से इतने अनुशासन की उम्मीद ठीक है? 
यही सब सोचते हुए उसे याद आया कि उसके एनजीओ की शुरुआत ऐसी ही एक घटना से हुए थी जिसमें उसने अपनी डांस क्लास के बच्चों को पानी और बिजली की बचत के बारे में समझाया था. उसी दिन उसे लगा था कि बच्चों को बचपन से ही पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाना जरूरी है. उनकी लापरवाही का कारण उनके संस्कार की कमी है.
तो फिर उसने यही सब मानव को सिखाना चाहा तो क्या गलत किया? मैं गलत नहीं थी. इस निष्कर्ष ने उसे शांति दी. आज सुबह उसने सोचा कि वह दादा को बताएगी कि उसने क्या सोचा है. इतने में बाहर गाड़ी रुकने की आवाज़ ने उसे चौंका दियाl मानव भागता हुआ उसके पास आया और उसने उसे बाहों में भर लिया. उसे चूमते हुए वह सब कुछ भूल गई थीl मानव भी सहमा- सा उससे लिपटा हुआ था
गौतम चुपचाप एक ओर खड़ा थाl किसी को ध्यान ही नहीं था कि क्या कहना है. इस उदासी को तोड़ते हुए कुंतल दादा ने ही कहा “अरे, मानव अपने मामा से बात नहीं करोगे?”
“नहीं!” कहते हुए उसने बरखा को दोनों हाथों से कस कर पकड़ लिया.
“आराम से मिल लो अपनी मां से फिर हमसे बात कर लेना!” कहकर उन्होंने मानव के सर पर हाथ फेरा और कहा “बाद में पीछे आंगन में चिड़िया के बच्चों को देखना..”
“क्या? चिड़िया के बच्चे? अभी चलो न!” कहते हुए वह बरखा की गोदी से उतर गया
“बरखा, हम पीछे से आते हैं तब तक तुम खाना लगा दो!” कहते हुए कुंतल आगे बढ़ गए. वे चाहते थे कि यह तीनों एक दूसरे के महत्व को अच्छी तरह से समझ लें! इन पांच दिनों में उन्होंने क्या महसूस किया है? उसी पर उनका निर्णय टीका है. पर उस निर्णय को पूरा समय मिल जाए, कोई हड़बड़ी न हो! यही उनकी इच्छा थीl मानव भी बरखा के साथ रसोई में चला गया.
“बरखा, तुम अपना कोई निर्णय दो उसके पहले मुझे कुछ कहना है.”
बरखा ने बड़ी हिम्मत के साथ कहा कि “बोलो!” अब वह पूरी तरह से तैयार थी जीवन के इस फैसले को सुनने के लिए.
“बरखा, मानव को एक जिम्मेदार इंसान बनाना जरूरी है.हमारे बच्चे के संस्कार या उसकी संवेदनशीलता ही हमारी दौतल है.इसे दौलत से तौलना बहुत बड़ी भूल होगी.” कहते हुए उसने आज फिर बरखा की आंखों में झांका.उसकी आंखों में एक विस्मय था और वह शायद गौतम को समझने की कोशिश कर रही थी.
“बरखा, मानव को स्कूल भेजना कितना बड़ा काम है यह मुझे इन पांच दिनों में समझ में आ गया. पहले दिन तो मैं उसे स्कूल भेज ही नहीं पाया…”
“क्यों?”
“बहुत काम होते हैं यार, मैं तो चकरघिन्नी बन गया और इस सबके बाद जूते ही नहीं दिखे!”
“वह तो मानव की टेबल के साइड में…” अब बरखा भी मुस्कुरा उठी थीl उसने सोचा ही नहीं था कि मानव को स्कूल भेजना भी एक काम होगा. जो काम एक मां बड़ी आसानी से कर लेती है वह पिता के लिए एक चुनौती हो सकता है.
“घर और बच्चे को सम्हालना आसान नहीं है. यदि यह सब करके भी एक मां अपने बच्चे को संस्कार न दे सके तो यह सोच पूरी तरह से गलत है! हमारी लापरवाहियों का भुगतान यह पृथ्वी और हमारे बच्चे सबको करना…”
अब शब्द बरखा के कानों में नहीं जा रहे थे, कान तो आंखों के साथ मिल चुके थे और अब सिर्फ धुंधलापन था.अचानक मानव की आवाज़ से बरखा अपने धुंधलेपन से बाहर आई.
“मां, देखो मैंने यह फूल चुने हैं तोड़े नहीं हैंl” कहते हुए जब मानव ने हरसिंगार के फूलों से भरी हुई अपनी नन्ही हथिलियों को आगे किया तो बरखा ने झुककर मानव की हथेलियों को चूम लिया और घुटनों के बल बैठकर उसे बाहों में भर लियाl वह सिसक उठी. पास खड़ी चार आंखों में पानी भर आयाl वही पानी, जो महादेई माई में है या जो हम सब में भी रमता है.

सीमा जैन ‘भारत’
ग्वालियर – 11
संपर्क – [email protected]
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1 टिप्पणी

  1. *सीमा जैन ‘भारत’ की कहानी – नन्हीं हथेलियों में*

    सीमा जी!

    आपकी कहानी पढ़ी। बहुत अच्छी लगी।कई दृष्टिकोण से यह कहानी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है।हम पर्यावरण की दृष्टि से देखें, चाहे हम नदी बचाओ की दृष्टि से देखें, चाहे हम बच्चों में बचपन से ही संस्कार डालने की दृष्टि से देंखें या फिर अपने-अपने अहम् को छोड़कर पति-पत्नी के बीच में एक सार्थक विचारणीय समझ के साथ, एक दूसरे की बातों को समझने की दृष्टि से देखें, एक दूसरे की कद्र करने की दृष्टि से देखें या फिर किसी भी कठोर निर्णय को दृढ़ता पूर्वक लेते समय,जिसके कारण एक परिवार अलग होने की स्थिति में आ जाए, एक वैचारिक सकारात्मक समझ के साथ परिवार टूटने से बचाने का निर्णय लेने की क्षमता की तरह देखें;…… हर तरह से यह कहानी बहुत महत्वपूर्ण है।
    एक बहुत बड़ी बात जो इसके शीर्षक के विषय में कहना चाहेंगे वो यह है कि आपने शीर्षक में *’भारत*’ को कॉमाज़ में लिखा है। इसका अर्थ है कि आप ‘भारत’ पर विशेष जोर डाल रही हैं।यह विशेष अर्थ को प्रतिभाषित करता है कि इस कहानी में जो कहा जा रहा है वह देश के लिए कितना अधिक आवश्यक है साथ ही *” ‘भारत’ की कहानी – नन्हीं हथेलियों में* इसमें बीच में लगे हुए योजक चिन्ह में जो अनकहा लिखना शेष रह गया है ,उसे भी समझना होगा।

    हम नहीं जानते कि यह लेखिका की स्वयं की कहानी है या कि फिर किसी प्रेरणा से लिखी गई है पर पढ़ के यह पता चला कि यह बेहद महत्वपूर्ण है।
    यह कहानी यह बताना चाह रही है कि वास्तव में –
    1– वर्तमान में देश की महत्वपूर्ण आवश्यकताएँ क्या-क्या हैं?
    2-भारत का भविष्य किन पर है? और जिन पर है उन बच्चों को किस तरह बचपन से ही संस्कारित करना चाहिये?

    कहानी यह बताती है कि वर्तमान में देश की मूल आवश्यकता पर्यावरण के संरक्षण की है। जल को बचाने की, नदियों की सुरक्षा की है।
    देश का भविष्य वर्तमान में भले ही हम लोगों के हाथ में है लेकिन आने वाला समय जिन बच्चों के हाथ में होगा उन बच्चों को भी बचपन से ही इन विषयों पर जागरूक करके संस्कार में डालना होगा।
    वास्तव में बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं। उन्हें हम जिस तरह से ढालेंगे वे फिर उसी शेप में, उसी आचार- विचार में ढल जाएँगे। इसीलिए बच्चे जब भी पहली बार ही कोई काम गलत करते हैं तभी उन्हें रोकना चाहिये ताकि वह आदत में सम्मिलित ना हो। आदत बन जाने पर छूटने में दिक्कत होती है।
    एक बात जो हमें और महत्वपूर्ण लगी वो यह कि अगर माता-पिता में से कोई भी एक किसी बात के लिए बच्चों को मना करता है, रोकता है यह टोकता है तो बच्चे के सामने ही दूसरे को उसका विरोध कर बच्चे का फेवर नहीं लेना चाहिये। भले ही बाद में अकेले में इस विषय पर बात हो जाये।

    अगली बात परिवार की है, कि रिश्तों को तोड़ने से पहले उन्हें समझने के लिए थोड़ा वक्त देना चाहिये, विचार करना चाहिये। यह बात हमने इस कहानी को पढ़कर सीखी।

    यह कहानी पूरी की पूरी अपने सकारात्मक संदेश के साथ, अपने उद्देश्य तक पहुँचते हुए, कहानीकार की एक उच्चतम और अति आवश्यक सोच को सबके सामने रख, इसके समर्थन में जागरूकता लाने के लिये प्रेरित करती है।

    कुछ कथन जो हमें प्रभावित कर गए, उसे यहाँ उद्धृत करना चाहते हैं-
    (एक सोच)
    *प्रेमियों के जीवन में प्रेम के पल जितने होते हैं न, उससे ज्यादा उनकी यादों के पल होते हैं इसीलिए कहा जाता है कि प्रेमी प्रेम में डूबे हुए रहते हैंl*
    (बड़े भाई ने अपनी बहन से कहा)
    *“थोड़ा रुको बरखा! किसी भी रिश्ते के लिए किसी निर्णय तक पहुंचने से पहले थोड़ा रुकना चाहिए! यह मैंने कल भी कहा था और आज भी कहता हूंl निर्णय लेने की गति जितनी धीमी होगी, रिश्ते उतने पैर जमाकर चल सकेंगे!”*

    (पिता और पुत्र का वार्तालाप)

    *“मुझे मां के पास जाना हैl”*
    *“वह हम दोनों से नाराज़ है!”*
    *“क्यों?”*
    *“हम उनका कहना नहीं मानते हैं!”*
    *“मैंने क्या नहीं माना?”*
    *“तुम कोको को तंग करते हो!”*
    *“मैं तो उसके साथ खेलता हूंl”*
    *“नहीं बेटा, किसी को दुख देकर हम कैसे खुश हो सकते हैं?! मां तुमको मना करती थी न!”*
    *“हां, पर आप तो मेरी साइड लेते थे!”*
    *मानव ने बड़े प्यार से कहा, जिसे सुनकर गौतम आश्चर्य से भर गया कि उसकी शह को छोटा बच्चा कैसे पकड़ लेता हैl*
    *“फिर तो मैंने भी गलती की नl तुम बगीचे में पत्तियां तोड़ते हो!”*
    आपकी इस बेशकीमती कहानी के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया सीमा जी!
    कहानी की प्रस्तुति के लिये तेजेन्द्र जी का अति विशेष शुक्रिया। पुरवाई का विशेष आभार।

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