चौंतीस साल की अपर्णा के लिए बढ़ती उम्र आफत बनती जा रही थी। झिकझिक तो छब्बीस साल से ही शुरू हो गई थी लेकिन अब साल दर साल प्रश्नों के पहाड़ तले वह दबती जा रही थी। मां की बस एक ही रट थी शादी कर ले। अपर्णा को लगता जिस दिन वह मां के इस लगातार बजते रिकॉर्ड से थक जाएगी और मान जाएगी, तो जो पहला लड़का उसके लिए हां कर देगा मां उस का विवाह उस लड़के से कर देंगी। पिछले बारह साल से उसकी जिंदगी एक निश्चित दिनचर्या पर चल रही थी जैसे घड़ी की सुइयां एक दायरे में घूमती हैं। अलार्म बजते ठीक उस समय उठो जिस समय पहले दिन उठी थी और उससे भी पहले दिन। यंत्र चलित सी दिन पर दिन वही काम करती जाती, कई बार तो ध्यान भी नहीं रहता कि काम किया की नहीं, लेकिन आद्तन वह काम हो चुका होता था। स्कूल में वहीं चालीस पचास बच्चे, वही बातें, वही पाठ, वही सबक। हर साल बच्चों की खेप बदल जाती , ऐसा लगता समुद्र की उठती लहरें ,एक आई फिर दूसरी आई और आती चली गई।वह किनारे खड़ी बस देखती रही।
लंच ब्रेक में वही सब्जी पराठा, जबां कभी-कभी बगावत कर जाती लेकिन पेट बहल जाता। दिल करता कुछ नया बना लें लेकिन दिमाग कह देता क्या आवश्यकता है? काम तो चल रहा है ।तीन चार सह शिक्षिकाऐं आमने सामने बैठी, बोरियत के बोझ तले दबी ,कुछ पल सुस्ताने के नाम पर बैठ जाती, फिर रेस के घोड़े की तरफ भाग दौड़ में तो लगना होता है। कुछ अर्थ हीन , बेकार सी बातें, पतियों का रोना, अपनी अपनी परेशानियां और बीमारियों का बढ़ा चढ़ाकर बखान करना। किसी को कोसना, किसी की इतराहट का मखौल करना, वही सब घिसी पिटी बातें ।वह उनके मध्य बैठी अवश्य होती थी लेकिन कान में बहुत कम पड़ता और जो पड़ भी जाता, कान की नसें दिमाग तक ले जाने का आलस कर जाती। कोई उसको संबोधित करके कुछ कहता तो वह एकदम से चौंक जाती और हां या ना में सिर हिला देती। वे सब औरतें एक कुटिल मुस्कान उसकी तरफ फेंक देती। फिर कोई बुदबुदा देती, ” बेचारी को क्या मजा आएगा घर गृहस्ती की बातों में। उम्र हो गई है लेकिन अभी तक शादी नहीं हुई।”
दूसरी फुसफुसाती, ” उम्र तो निकल गई। अब तो कोई बूढ़ा या दुहेज्जु मिलेगा। ज्यादा नखरे दिखाओ तो यही होता है।” फिर एक दबी हुई हंसी उसे सुनाई देती।ऐसे मौके पर उसके कान आलस छोड़ तुरंत काम पर लग जाते और वह अपनी उदासीनता और गहरी करने की कोशिश करती ।कुछ न महसूस हो ऐसा उपक्रम करती। अपने मन को समझाती , वह खुशनसीब है उसके जिंदगी में ऐसे कोई झमेले नहीं। लेकिन दिल के कोने से आवाज आती , शायद यह झमेले ही खुश रहने का सबब बनते हैं या फिर इन झमेलों की वजह से इन औरतों का दिमाग इतना व्यस्त रहता है कुछ सोचने समझने का समय ही नहीं रहता होगा।
उसकी मां को मोहल्ले भर की औरतों से बतियाने का बहुत शौक था। जिस दिन कोई टोक देती,” इतनी बड़ी कर ली लड़की, ब्याह क्यों नहीं कर देती?” तब अपर्णा के आते ही मां की बड़बड़ाहट शुरू हो जाती। उम्र अपर्णा की बढ़ रही थी बेचैनी मां की बढ़ रही थी। वही प्रश्न बार-बार, ” क्या करेगी सारी जिंदगी? अकेली कैसे कटेगी इतनी बड़ी जिंदगी?” अपना उदाहरण देती, उसके पिता के साथ पच्चीस साल कितनी सुखद जिंदगी काटी थी उन्होंने । अपर्णा को अपने मां-बाप की जिंदगी में सुखद जैसा कभी कुछ नहीं लगा। जब बैठते किसी न किसी बात पर बहस करते, हर वक्त एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहते थे। उसको लगता शादी करके वह एक उबाऊ जिंदगी में से निकल कर दूसरी उबाऊ जिंदगी में प्रवेश कर जाएगी। एक ऐसे अजनबी बंदे को प्रेम करने का नाटक करेगी जिसे वह जानती तक नहीं होंगी। एक-दो साल, सालों की दबी शारीरिक भूख शांत करेंगे फिर साल दर साल एक रिवाज की तरह इस कृत्य को महीने में एक दो बार करेंगे। दोनों मिलकर भविष्य को लेकर योजना बनाएंगे, बच्चे के भविष्य की योजना बनाएंगे ।लेकिन बात करने को कुछ नहीं होगा ।मुंह फेर कर सो जाएंगे ,अजीब निरर्थक बहाने उछाल कर एक दूसरे की तरह,’ सुबह जल्दी उठना है थकान हो रही है।’
उसके दिल में ख्याल आएगा कि उसमें कुछ कमी है तभी उसका पति उसे नजरअंदाज करता है। वह बच्चों की देखभाल में इतनी लगी रहती है, अपनी सुंदरता का ध्यान नहीं रखती है ,पति को समय नहीं देती है, उसका मन ग्लानि से भर जाएगा।वह झुंझलाएगी की क्या-क्या करें? नौकरी, घर का काम, बच्चों की देखभाल, उसको लगेगा कि उसका कोई भी काम ठीक से नहीं हो रहा है,वह अधिक कोशिश करेगी और थकान महसूस करेगी। फिर चिड़चिड़ाहट के सहारे जिंदगी काटने लगेगी ।हर रोज एक ऐसा युद्ध लड़ेगी जिसमें हार निश्चित है। उदासीनता का वास उसके घर और मन में रहने लगेगा ।लेकिन फिर वह अपने मन को समझाएगी, उसको खुश रहना पड़ेगा, उसके बच्चों को उसकी आवश्यकता है। उसके बिना बच्चों की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। लेकिन हकीकत यह होगी कि उसे बच्चों की आवश्यकता होगी ।जब तक छोटे रहेंगे उसके पास एक मकसद होगा जीवन में, लोगों के सामने एक सुखद परिवार की छवि प्रस्तुत करने का।लेकिन असल में कितना अकेलापन और कड़वाहट भरी जिंदगी होगी। और अगर उसका पति किसी और स्त्री के चक्कर में पड़ गया तो वह आदर्श पत्नी की तरह धमकी देगी, अपने आप को खत्म करने की या उसको छोड़ देने की। लेकिन आत्महत्या करने की उसकी हिम्मत नहीं होगी और उस पति को छोड़कर कहां जाएगी? मां के पास? मां के पास फिर वही कभी ना रुकने वाली बातें कान में जहर घोलने लगेंगी। रात दिन वे बोलेंगी,”खुश रहने का एक मौका मिला था, वह भी छोड़ दिया।”शायद पति ही पहली बार मिली धमकी से घबरा जाए लेकिन फिर कुछ सालों बाद किसी और के चक्कर में पड़ जाएगा। पहली बार वह अपनी सारी ताकत लगा चुकी होगी पति को रोकने में। लेकिन दूसरी या तीसरी बार कहां ताकत रह जाएगी पति से लड़ने की ।जैसी जिंदगी चल रही है, उसे लगेगा वैसी ही ठीक है। स्कूल में पढ़ाती रहेगी, आलू की सब्जी परांठे खाती रहेगी, वह किताबें पढ़ती रहेगी जो कभी खत्म नहीं होंगी। टीवी में वह कार्यक्रम देखती रहेगी जो दस साल पहले भी ऐसे ही थे ।बस एक इंतजार में जिंदगी काटती रहेगी शायद जिंदगी में कुछ बेहतर हो जाए या खत्म हो जाए । फिर समझ आएगा चिंता का कोई लाभ नहीं। कुछ नहीं बदलेगा और जैसी है वैसी स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।
 उस दिन मां कुछ अधिक ही बोल गई। उसका सिर भन्ना गया ।अक्सर तो अपना दिमाग सुन्न कर लेती थी लेकिन पहले स्कूल में फिर घर पर, पुराने रिकॉर्ड की तरह वह बोझिल राग सुन उक्ता गई। उसने चिल्लाकर कहा, ” बार-बार एक ही बात बोलती रहती हो, थकती नहीं हो क्या? कोई लड़का है तुम्हारी नजर में, जो मुझसे शादी करने को तैयार हो?”
 मां चौक गई, बहुत दिनों बाद अपर्णा ने जवाब दिया था। कुछ सोचते हुए बोली, ” तू हां करें तो इधर उधर बात करूं। मोहल्ले की स्त्रियां बताने को तैयार रहती हैं।” केवल मां को खामोश और व्यस्त रखने के लिए उसने कहा, ” तुम पहले भी कई बार कोशिश कर चुकी हो। एक बार और कर लो ,कोई फायदा नहीं होगा।”
 मां ने बात पलटने के उद्देश्य से कहा, ” ऊपर किराएदार ने इस महीने के पैसे नहीं दिए। एक बार जाकर उसे बोल दे। बड़ा अजीब लड़का है तीन दिन से ऊपर से उतरा ही नहीं। नहीं तो मैं ही उसे टोक देती। छः महीने हो गए हैं उसे रहते हुए।साल पूरा होते ही उसे खाली करने को कह देंगे। और किसी ढंग के दंपति को मकान किराए पर देंगे।”
 अपर्णा ने एक दो बार ही देखा था उस लड़के को। अजीब अस्तव्यस्त सा रहता है, खोया खोया सा। उम्र में भी उससे छोटा होगा, कोई तीस के आसपास का। बेमन से सीढ़ियां चढ़कर ऊपर गई, कुछ देर मां की बातों से छुटकारा मिलेगा। दरवाजा खुला था, संगीत की आवाज कमरे में से आ रही थी। उसने दरवाजा खटखटाया लेकिन कोई जवाब नहीं मिला तो कमरे की तरफ बढ़ गई। उसने इतना फैला हुआ कमरा कभी भी, किसी का नहीं देखा था। लगता था जैसे अलमारियों का इस्तेमाल वर्जित था यहां।
[धनंजय कोई पेंटिंग बनाने में इतनी तन्मयता से लगा हुआ था उसे ज्ञात ही नहीं हुआ अपर्णा दस मिनट से खड़ी है। उसको इस अव्यवस्थित स्थिति में सुकून सा लगा। सारे दिन व्यवस्थित रहने से भी क्या मिलता है ? उसकी इच्छा हुई अपनी किताब लाकर वह भी वहीं एक कोने में बैठ जाए और संगीत के बावजूद फैली खामोशी में खो जाए। एक कमरे में दो इंसान चुपचाप अपने अपने काम में लगे रहे तो…?
 धनंजय ने नजरें उठाकर उसकी तरफ देखा फिर आश्चर्य से पूछा, ” आप कब से खड़ी है? और मुझे बुलवा लिया होता, मैं नीचे आ जाता।” उसको ध्यान ही नहीं आया वह वहां क्यों आई थी? वह सकपका गई।
 धनंजय उसके बोलने का इंतजार किए बिना ही बोला, ” आइए अंदर आकर बैठिए न।”
अपर्णा सकुचाते हुए बोली, ” कहां?” धनंजय ने लापरवाही से कमरे में चारों तरफ निगाह डाली और एक कुर्सी पर रखे तौलिए और कपड़ों को उठाकर पलंग की तरफ फेंक दिए। फिर उसे बैठने का इशारा किया। अपर्णा को लगा यह तरीका भी सही है जीने का। जब जिस कोने की आवश्यकता हो खाली करो और इस्तेमाल कर लो। वह बैठते हुए बोली, ” मां कह रही थी इस महीने का किराया नहीं दिया आपने।” धनंजय आश्चर्य से बोला, ” अच्छा नहीं दिया क्या?” पलंग पर पड़े सामान में से उसने किसी तरह अपना वॉलेट ढूंढा, सारे पैसे निकालकर गिने,वे कुल मिलाकर किराए जितने थे। बस एक सौ का नोट अतिरिक्त था‌। उसने किराए के पैसे अपर्णा की तरफ बढ़ा दिए। अर्पणा ने पैसे लेते हुए कहा, ” कम है तो बाद में दे देना। खाने का सामान लाने के लिए भी तो चाहिए होंगे?” वह लापरवाही से बोला, ” कोई परेशानी नहीं ,एक ब्रेड़ लाता हूं। दो-तीन दिन का काम आराम से चल जाता है। सामने दुकान से चाय लेकर उसके साथ खा लेता हूं।”अर्पणा के मुंह से पता नहीं कैसे निकल गया, ” अच्छा आज खाना नीचे खा लो।” वह चहकता हुआ बोला, ” क्या बनाया है?” वह कुछ सोचते हुए बोली, ” मटर पनीर और आलू गोभी।” वह मुस्कुराते हुए बोला, ” मुंह में पानी आ गया। ठीक है मैं नौ बजे तक आता हूं।” अपर्णा मां को पैसे देते हुए बोली, ” मैं बाजार जा रही हूं कुछ सब्जियां लानी है।” इससे पहले मां कुछ समझ पाती और बोलती,वह घर से बाहर निकल गई।
धनंजय ने सब्जी खाते ही कहा, ” बहुत स्वादिष्ट बनी है, आपके हाथ में स्वाद है।” अपर्णा को सुनकर अच्छा सा लगा। जबान भी तृप्त हो रही थी, जायका बदलने से। मां तुरंत बोली, ” जब इसके पिता थे तब मैं भी ऐसे ही स्वादिष्ट सब्जी बनाती थी। चटकारे लेकर खाते थे। तुझे याद है न अपर्णा?” मां बोलती रही उसे जवाब की आवश्यकता नहीं थी। वे दोनों अपनी-अपनी खामोश दुनिया में चले गए और चुपचाप खाना खाते रहे।
 एक दिन अपर्णा की स्कूल की सहेली नम्रता आई, शाम को उससे मिलने। साल में एक बार मायके आती थी और अपर्णा से मिलने अवश्य आती थी या अपनी जिंदगी के एक साल का लेखा-जोखा अपर्णा के सामने रखने। उसका ढाई साल का बेटा कुछ देर कुर्सी पर चुपचाप बैठा रहा फिर उतरकर ड्राइंग रूम में रखे सामान को छेड़ने लगा। अपर्णा के पास बोलने को कुछ नहीं था लेकिन नम्रता के पास कभी ना खत्म होने वाला पिटारा था, सास-ससुर, ननद, पति, बच्चा…।बच्चा एक बड़े से फूलदान का देख रहा था। अपर्णा का ध्यान भी उस फूलदान पर था, कितना पुराना और बदरंग हो गया था? याद नहीं कभी वह फूलदान वहां नहीं था। फैंक क्यों नहीं दिया अभी तक? नम्रता अपनी मुस्कुराहट को छुपाते हुए बनावटी गुस्से से बोल रही थी, ” बहुत शैतान हो गए हैं, कहीं तोड़ न दें?” अपर्णा के मन में बेतुका सा ख्याल आया, टूट गया तो स्थान खाली हो जाएगा। फिर एक कुर्सी वहां लाकर रख देगी और कुछ कपड़े व तौलिया लाकर उस पर रख देगी। उसे स्वयं की सोच पर हंसी आ गई। नम्रता को लगा वह उसके बेटे को देख कर हंस रही है।वह मुस्कुराते हुए बोली, ” जीवन में कितनी भी परेशानी हो, बच्चों की शैतानी देखकर हंसी आ ही जाती है। तू क्यों नहीं कर लेती शादी।”
 अपर्णा को लगा सही कह रही है, क्यों नहीं शादी कर लेती? इतने लड़के कतार लगाकर खड़े हैं, वही पागल है। उसने नम्रता से पूछा, ” किससे?”
 नम्रता उसकी तरफ कुछ देर देखती रही ,तोल रही थी बोले की न बोले। फिर बोलना ही उचित समझा, ” देख तुझमें ऐसी कोई कमी नहीं है जो कोई लड़का तुझ से शादी करने से मना करें। देखने में सही है, अच्छी खासी नौकरी है, अपना मकान है। कोई भी शादी कर लेता।”
अपर्णा को भी लगा शादी के लायक सारे गुण उसमें थे। फिर कहां चूक हो गई? नम्रता फुसफुसा कर बोली, ” सच बताऊं, एक तो कोई भी लड़का दहेज में इतनी बोलने वाली सास को कभी पसंद नहीं कर सकता।”
अपर्णा को सांत्वना सी मिली, उसकी शादी न होने का कारण वह नहीं उसकी मां थी। और मां की बातों से उसे लगने लगा था वह शादी के लायक नहीं है। नम्रता दरवाजे की तरह देखते हुए बोल रही थी, ” कईं बार लगता था आंटी ही नहीं चाहती थी तेरी शादी हो। उनकी जिंदगी आराम से कट रही है, तेरी शादी हो जाती तो वह बिल्कुल अकेली पड़ जाती । क्या पता दमाद से पटती की नहीं।”
अपर्णा ने इस नजर से कभी नहीं सोचा था। मां को हर लड़के में कोई न कोई कमी नजर आ ही जाती थी और बात आगे नहीं बढ़ पाती थी। इतने में मां भी ड्राइंग रूम में आ गई और नम्रता को देखते ही बोले, ” अरे तू कब आई? अपर्णा इसके लिए अभी तक चाय नहीं बनाई?जा चाय और कुछ खाने को ले आना।”अपर्णा नम्रता के सामने और बैठना भी नहीं चाहती थी। और न जाने उसकी जिंदगी के कौन से रहस्य उजागर हो जाए।
 अब सामने पड़ने पर धनंजय मुस्कुरा कर उसका अभिवादन करते हुए जाता। उसकी बेफिक्री अपर्णा को अच्छी लगती । अपर्णा का कई बार मन करता उससे बात करने का, लेकिन शुरुआत नहीं कर पाती। एक दिन मां कीर्तन में गई हुई थी, शाम हो रही थी। मौसम सुहावना था वह बाहर बगीचे में कुर्सी डालकर बैठी थी। किताब हाथ में थी लेकिन निगाह आसमान में घर को लौटते पंछियों और हवा में लहराते पत्तों पर थी । तभी धनंजय कहीं बाहर से आया और उसको अकेला देख दूसरी कुर्सी पर बैठ गया। कुछ देर उसे देखता रहा, वह असहज होने लगी।। वह बोली, ” ऐसे क्या देख रहे?”
वह बिना नजरें हटाएं बोला ,” आपको देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई सुरंग हो बहुत गहरी, जिसका कोई ओर छोर नहीं।” उसे उसकी यह व्याख्या कुछ अजीब लगी लेकिन अपने जीवन का सटीक विश्लेषण लगा। फिर भी मुंह से निकला, ” क्या मतलब?”
वह हड़बड़ा गया, जैसे यह कहना नहीं चाहता था लेकिन मुंह से पता नहीं कैसे निकल गया?
वह बोला, ” किसी को भी देखो तो उसके लिए मन में एक दूसरी छवि बनती है। जैसे इस बूढ़े बरगद को देखो तो लगता है कोई बुजुर्ग खड़ा है, दुनिया भर के बोझ से लदा ,थका हुआ। मुक्ति चाहता है, लेकिन अपने आश्रितों को मायूस नहीं करना चाहता इसलिए जिए जा रहा है।”
 वह मन ही मन हंसी, ऐसे ख्याल तो उसके मन में भी आते हैं ।हर पेड़ पौधे को उसने भी नाम दे रखा है। जब बाहर बैठती थी मन ही मन उन से बातें करती थी। वह धनंजय के बारे में सब कुछ जानना चाहती थी।वह विचारमग्न हो गई, ऐसा एक ही प्रश्न करना चाहती थी जिसके उत्तर में धनंजय अपनी जिंदगी का संपूर्ण सत्य उसके सामने रख दें। लेकिन धनंजय को उठता देख उसने तुरंत पूछ लिया, “आप जिंदगी में करना क्या चाहते हैं?”उसने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, “जीना।”
 उसने बुझे हुए शब्दों में कहा, “जी तो सभी रहें हैं।”
 वह कुर्सी पर आराम से बैठते हुए बोला, ” सांस लेना जीना नहीं है, जीवन महसूस करना जीना है।”
वह फिर बोली, ” कुछ लक्ष्य तो होगा, इतनी अच्छी पेंटिंग करते हैं, पेंटर बनना चाहते हैं क्या?”
 धनंजय सोचता हुआ बोला, ” चालीस पचास साल तक एक ही काम करते रहो तो उसमें निपुण हो जाओगे। और लोगों से बेहतर करने लगोगे तो लोग तारीफ करेंगे, मान देंगे। वह सफलता है, भले ही उसे बार-बार करते हुए तुम्हारा दम घुटने लगे।” वह समझने की कोशिश करते हुए बोली, ” तुम एक साथ बहुत कुछ करना चाहते हो?” वह कंधे उचका कर बोला, ” सब कुछ करना चाहता हूं, लेकिन मजबूरी है जीवन तो एक ही मिला है।”
 वह सोचते हुए बोली, ” कुछ समझ नहीं आ रहा, अब तक की अपनी जिंदगी के बारे में कुछ बताओ।”
 वह हंसते हुए बोला, ” अच्छा तुम जिज्ञासु भी हो। मुझे लगा था इधर से उधर बैठने वाली काठ की गुड़िया हो। फिर कभी बताऊंगा। वैसे मेरे पास ज्यादा समय नहीं है ,एक दो महीने ही हैं। जो जानना है जल्दी करना। तुम्हारी मां आ रही है, सोचेगी उसकी नन्ही सी गुड़िया को बिगाड़ दिया।” और वह चला गया ।
उसको धनंजय का आखरी वाक्य बड़ा अजीब लगा, कुछ चुभा भी।
मां धनंजय को जाते हुए देख बोली, ” यह लफंगा यहां क्या कर रहा था? इससे दूर रहो।”
 उसने मां से पूछा, ” क्या खराबी है उसमें?” मां तेज आवाज में बोली, ” तुझे दिखाई नहीं देता कुंवारा है, आवारा है। किसी ने बात करते देख लिया तो बदनाम हो जाएगी तू। वह तो उस समय कोई किराएदार नहीं मिल रहा था और पैसे की जरूरत थी तो उसे रख लिया था।”
 वह मां से बहस नहीं करना चाहती थी, अंदर चली गई, खाना बनाने। तीन-चार दिन हो गए थे वह दिमाग से धनंजय की बातें नहीं निकाल पा रही थी।उसका मन कर रहा था वह धनंजय से और बात करें , उसकी जिंदगी की फिलॉसफी को सुनें। उसने कुछ मीठा बनाया और एक कटोरी में डाल कर ऊपर जाने लगी। मां ने एकदम से टोका, ” कोई जरूरत नहीं है उसको कुछ देने की, उससे मेलजोल बढ़ाना ठीक नहीं।”
 हमेशा वह मां की बात मान जाती थी लेकिन उस दिन अनसुना कर दिया। धनंजय कहीं गया हुआ होगा, दरवाजे की कुंडी लगी थी। कायदे से अपर्णा को वापस आ जाना चाहिए था लेकिन वह कुंडी खोल कर अंदर चली गई। कमरा पहले की तरह फैला हुआ था और एक तरफ कैनवास एक के बाद एक रखे हुए थे। उस दिन जब वह कमरे में आई थी तब धनंजय रात में आसमान का चित्र बना रहा था और अपर्णा को लगा था जैसे वह अपनी बालकनी के बाहर का दृश्य देख रही थी। फिर लगा आसमां तो सब जगह एक जैसे ही दिखते हैं। वह पेंटिंग पूरी हो गई थी और आसमान को निहारती उसमें एक स्त्री का साया था। दूसरे कैनवास को देख वह दंग रह गई। उसमें वह बैठी थी आसमान को निहारते हुए। शाम की लालिमा में उड़ते पंछी बेहद खूबसूरत लग रहे थे। उसके चेहरे पर पेंटिंग में अजीब सा सुकून था।
 तीसरी पेंटिंग को पलटा तो उसमें वह सलाखों के पीछे थी। आंखों में सूनापन था। वह पेंटिंग को बहुत देर तक देखती रही । तभी महसूस हुआ धनंजय उसके पीछे आकर खड़ा हो गया है। वह घबराकर पलटी तो उससे टकरा गई। उसे संभालने के लिए धनंजय ने उसकी दोनों बाहें पकड़ ली। वह एकटक उसकी आंखों में देख रहा था जैसे उसकी रूह में उतरना चाहता हो। वह असहज हो रही थी और उसके सामने से हटने की कोशिश करने लगी। लेकिन धनंजय की पकड़ और मजबूत हो गई। उसने अपनी आंखें उसके चेहरे पर गड़ाते हुए कहा, ” किस बात से इतना डरती हो कि कैद कर रखा है अपने आप को?”
 वह घबराकर बोली, ” छोड़ो मुझे।” धनंजय हंसता हुआ बोला, ” ठीक है छोड़ देता हूं, लेकिन भागना मत।बैठ जाओ आराम से।”
 अपर्णा की सांस फूल रही थी, ऐसे हांफ रही थी न जाने कहां से दौड़ कर आई हो। दुपट्टे से पसीना पोछते हुए वह वहां पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गई। कमरा कुछ संगवाया हुआ लग रहा था। धनंजय हंसते हुए बोला, ” तुमसे कुछ सलीका सीखने की कोशिश कर रहा था। लेकिन पता नहीं कुछ भी स्थाई नहीं रहता मेरे साथ, आदतें भी नहीं।”
 वह उसके चेहरे की बेफिक्री को देखते हुए बोली, ” दो महीने का समय है तुम्हारे पास, इसका क्या मतलब?”
 वह कटोरी में रखा मीठा खाते हुए बोला, ” दो महीने बाद मैं यहां से चला जाऊंगा। एक एग्जीबिशन में अपनी पेंटिंग रखूंगा, जितनी बिक जाएगी पैसे लेकर निकल जाऊंगा।” वह आश्चर्य से बोली, ” कहां?”
 धनंजय उसके चेहरे को ध्यान से देखते हुए बोला, ” पता नहीं, ऐसे ही किसी भी दिशा में निकल जाऊंगा। जो स्थान या वहां का परिवेश मन को भाएगा ठहर जाऊंगा।दो साल पहले एक कंसर्ट में किसी को ड्रम बजाते सुना। अच्छा लगा उसके साथ हो गया। उनके स्टेज को सजाता और वे मुझे ड्रम बजाना सिखाते। एक साल तक बहुत अच्छा लगा। फिर छोड़ कर चल दिया। एक गांव में लोगों को चाक पर बर्तन बनाते देखा तो वहीं ठहर गया। बहुत सारे टेढ़े मेढे बर्तन बनाएं। उन्हें मन चाहे रंग दिए।एक दिन यहां से गुजर रहा था तो तुम्हें बालकनी में खड़े आसमान को निहारते देखा। बस यहां रुक गया। क्यों हर समय आसमान को देखती रहती हो?”
 अचानक उछाले गए इस प्रश्न से वह अचकचा गई। कुछ जवाब नहीं सूझा,” पता नहीं।”
धनंजय अभी भी उसके चेहरे के हाव भाव को देख रहा था।
” तुम पंछियों की तरह आसमान में बिना मकसद के उड़ना चाहती हो। लेकिन अपने आप को पेड़ की तरह जमीन में धंसा रखा है।”
 अपर्णा को कुछ अजीब लगा वह उसके कारण ठहर गया था। वह बोली, ” मुझे नहीं पता था आप मुझे इतनी क्लोजली ओब्जर्व करते हैं।”
 वह गंभीरता से बोला, ” अपने में ही डूबी रहती हो या आसमान ताकती रहती हो। आसपास देखो तो कुछ दिखाई देगा। चलो मेरे साथ चलो, दुनिया दिखाऊंगा।” वह कांप गई यह सुनकर, एकदम उठकर नीचे चली गई।
अर्पणा को अपने आप पर गुस्सा आ रहा था। क्यों उससे मिलने गई? जब भी मिलती है, उसके दिलो दिमाग में हलचल मच जाती है। एक छवि दिमाग में उभर जाती, वह खेत खलियानों में बेपरवाह घूम रही है। न उठने का समय न किसी की बात सुनने की मजबूरी। वह अपने मन में उठ रहे इस तूफान को रोकने के लिए जबरदस्ती कुछ न कुछ काम करने लगती । लेकिन हठी मन न जाने क्या-क्या कल्पना करने लगता। उसकी बेचैनी मां से छुपी नहीं रही। वह बड़बड़ाने लेगी,” पहले ही कहा था उस लड़के से दूर रहो। फुसलाने की कोशिश तो करेगा ही।यह घर कब्जे में आ जाएगा, तो जो किराया देता है वह भी बच जाएगा।”
वह आश्चर्य से मां की तरफ देखने लगी। यह सब बातें कहां से आ गई? लेकिन यह सब बातें तो आएंगी ही, एक अनजान स्त्री पुरुष के बीच में विवाह के अलावा और क्या संबंध हो सकता है?”
मां का बोलना चालू था, ” बहुत चालाक लड़का है। उम्र में तुझसे छोटा है। स्वयं कागज रंगता रहेगा और तू कमा कमा कर खिलाती रहेगी। उसकी जिंदगी आराम से कट जाएगी।”
 वह मां की तरफ देखे बिना बोली, ” वह एक जगह ज्यादा समय नहीं टिकता। यहां से भी दो-तीन महीने में चला जाएगा।” मां ने राहत की सांस लेते हो कहा, ” अच्छा, फिर तो बढ़िया है। उससे पिंड़ छूटेगा।” अर्पणा ने भी राहत की सांस ली। फिलहाल उसका भी मां से पिंड छूट गया था।
एक दिन धनंजय से फिर सामना हो गया। देखते ही बोला, “लगता है यह जन्म तो सोचने में ही बिता देना है तुमने।जो कुछ करोगी अगले जन्म में ही करोगी।”
वह झेंपते हुए बोली, ” इसमें सोचने का क्या है? मैं नौकरी और मां को छोड़कर तुम्हारी तरह बेमतलब नहीं विचरण कर सकती।”
वह जोर देकर बोला, ” नौकरी से इस्तीफा दे दो और तुम्हारी मां के हाथ पैर चलते हैं। अपने लायक वे काम कर सकती हैं। तुम्हारे साथ रहकर उनके शरीर को जंग लगता जा रहा है। नहीं है अपने आप पर भरोसा तो छः महीने की छुट्टी ले लो। नहीं अच्छा लगे तो फिर अपने कैद खाने में आ जाना।”
अपर्णा फिर भी आश्वस्त नहीं हुई।” लोग क्या कहेंगे?”
 वह सिर झटकते हुए बोला, ” अभी जो कहते हैं वह कहने से तुम ने रोक दिया क्या? सोती सुंदरी, चलती फिरती लाश कहते हैं। फिर कहने लगेंगे बेलगाम घोड़ी या आसमान में उड़ती छोटी सी चिड़िया।” तभी मां को आता देख वह खिसक लिया। अपर्णा की तरफ शंकित निगाह से देखते हुए मां बोली, ” जब मैं आसपास नहीं होती तभी बात करता है तुझसे। क्या कह रहा था?”
 अपर्णा आसमान की तरफ देखते हुए बोली, ” अपने साथ चलने को कह रहा है।” मां चौंकते हुए बोली, ” कहां?” अपर्णा अभी भी आसमान को देख रही थी।” पता नहीं कहीं भी।”
 मां का चेहरा तमतमा गया। तेज आवाज में बोली, ” पागल है, वह खुद तो आवारा है। तुझे भी गुमराह कर रहा है। उसके बारे में हम जानते ही क्या है?”
 लेकिन अपर्णा को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसे लग रहा था वह नदियों का पानी बन बह रही है, आसमान में बादल बन उड़ रही है। कभी तितली बन फूलों पर बैठ रही है तो कभी मोर बन जंगल में नाच रही है। मां उसे झंझोड़ते हुए बोली, ” अगर उसने तुझे मार दिया तो?”
 वह चौंकते हुए बोली, ” मार देने दो, अभी कौन सा जिंदा हूं। कुछ पल जी का मर भी गई तो क्या फर्क पड़ेगा?”
मां चिंतित स्वर में बोली, ” शादी की बात की उसने ?”
अपर्णा ने मां की आंखों में आंखें डालते हुए कहा, ” नहीं कोई बंधन नहीं।” फिर मां का हाथ पकड़ते हुए बोली,” एक बार मुझे अपने हिस्से का आसमान छू लेने दे मां।”
 मां खामोशी से पुत्री की ओर देखती रही।

1 टिप्पणी

  1. आज की शहराती, कामकाजी और अविवाहित युवती और कला जीवी युवक की बहुत ही मार्मिक कहानी. सहज संवेद्य. आज का जीवन ऐसा ही है. इस समस्या को बहुत ही जोरदार तरीके से उठाने के लिए बधाई.

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