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बिरजू हजारी मारा गया । बिरजू मारा गया । अचानक यह बात पूरे गांव में फैल गयी । मैं अपने दरवाजे पर बैठा स्थानीय सांसद के भाई के आवास पर हुए नक्सली हमले के बारे में अखबार में पढ रहा था । मेरे दरवाजे पर काम करने वाले सुरेश ने आकर मुझे बताया कि बिरजू हजारी मारा गया । अचानक बिरजू का नाम मेरे मानस पटल पर आने लगा । मुझे याद नहीं आ रहा था । शायद मैं बिरजू को जानता था पर वह विस्मृत हो गया था ।
मैने उससे पूछा – कौन बिरजू । उसने शायद सुना नहीं था। वह अपने काम में लगा रहा । मैने फिर पूछा – कौन बिरजू । उसने बताया कि आपको बिरजू के बारे में नहीं पता । मैने कहा नहीं । उसने कहा कि मैं अपने बिरजू की बात कर रहा हूं । मैने अब अखबार मोड कर किनारे पर रख दिया और पूछा – कौन बिरजू । मुझे नहीं याद है । 
उसने कहा – मैं बिरजू हजारी की बात कर रहा हूं जो उतरवारी खेत जोतता था और बाद में किसी कारण वह गांव छोड कर अचानक सपरिवार गायब हो गया था । इतना सुनते ही मेरे मानस पटल में बिरजू की स्मृति हो आयी । मैने कहा – हां हां । सुरेश ने फिर बताया कि वही बिरजू । कल देर रात वह मारा गया । मैने पूछा क्यों ऐसा क्या हुआ था कि वह पुलिस की गोलीबारी में मारा गया । 
उसने कहा मालिक वह नक्सलियों का कमांडर बन गया था । जिले और आस पास के अन्य इलाकों में उसका काफी आतंक था । उसने इलाके में कई समृद्ध लोगों की हत्या भी की थी । पुलिस ने कल देर रात मुठभेड में उसे मार गिराया है । कह कर वह अपने काम में लग गया ।
 बिरजू को लेकर मेरे मन में अीतत के पन्ने खुलने लगे । मैं बहूत छोटा था । लगभग आठ या दस साल का था । करीब 25 साल पहले की बात है तब मैं पांचवी कक्षा में पढता था, जब अंतिम बार उससे मेरी मुलाकात हुई थी। लेकिन बिरजू की अच्छाई और उसकी इमानदारी के बारे में मैं सुनता आ रहा था । इसलिए मेरा मन यह मानने को तैयार नहीं था कि वह नक्सलियों का कमांडर बन गया था और आसपास के कई बडे सवर्ण किसानों की उसने हत्या कर दी थी । इसलिए मैने सुरेश से दो तीन बार जोर देकर पूछा था, क्योंकि मुझे लगा वह किसी और की बात कर रहा है । मेरे सामने बिरजू का हमेशा हंसने वाला चेहरा घूम गया ।
मैं तब पांच साल का था । हमलोग अपने गांव गए थे । अचानक बागमती नदी का बांध टूटने से बाढ का तांडव शुरू हो गया था । हमलोगों को वहीं रूक जाना पडा था जबकि नौकरी होने के कारण पिताजी अकेले शहर लौटे थे । इस बीच मेरी तबियत खराब हो गयी । हमारे घर पर ही रहने वाली मेरी बुआ ने किसी स्थानीय डाक्टर से संपर्क करने के बाद बिरजू को दवाई लाने के लिए कहा था। 
गांव में उस समय कोई दूकान नहीं थी । चारों तरफ बाढ का पानी था । इस बीच हमारे गांव से बाहर निकलने वाले एकमात्र सडक पर बना भी टूट गया था। जिस दरिया पर यह पुल बना था उसको पार करना बडा कठिन काम था कयोंकि पानी के तेज बहाव देखने से ही भयावह लगता था । 
बावजूद इसके बिरजू ने पानी के तेज बहाव के बीच आपने जान की बाजी लगा दी । उसने नदी पार किया और उन दवाओं को लेकर लौटा जिनकी मुझे उस समय आवश्यकता थी । 
उस दिन से बिरजू से मेरा परिचय शुरू हो गया । उसके चार छोटे छोेटे बच्चे थे । वे सब मेरे साथ मेरे दरवाजे पर खेलते थे । खास तौर से उसका बेटा छठु जो लगभग मेरी ही उम्र का था । हालांकि उसका असली नाम सिकंदर है । मैं जब भी गांव जाता तो बिरजू के बच्चों के साथ, खास तौर से छठु के साथ खेलता था । गांव में या आस पास जब भी मेला लगता तो बिरजू मुझे अपने कंधे पर बिठा कर मेले में घुमाने ले जाया करता था । 
मैं पिताजी से अक्सर शिकायत करता कि बिरजू मुझे मालिक नहीं कहता है । मुझे खुश करने के लिए पिताजी बिरजू से कहते कि यह तुम्हारी शिकायत कर रहा है कि तुम इसे मालिक नहीं कहते हो और फिर दोनों आपस में हंस पडते । इस पर बिरजू मुझे चिढाने के अंदाज में बार बार मालिक कह कर संबोधित करने लगा था।
दरअसल, बिरजू का संबध हमारे परिवार के साथ नौकर मालिक की तरह नहीं था । वह भले ही काम करने वाला था, लेकिन हमारे परिवार के सदस्य की भांति रहता था। उसके साथ न तो मेरे पिताजी ने और न ही उनके भाईयों ने कभी नौकरों की तरह व्यवहार  किया । बिरजू का काम हमारे दरवाजे पर ही था । झाडू लगाना, बैल और भैंस की देखभाल करना बदले में वह उतरवारी खेत जोतता था । न केवल होली और छठ के अवसर पर, बल्कि अन्य मौकों पर भी पिताजी बिरजू और उसके परिवार के अन्य सदस्यों के लिए कपडे एवं मिठाईयां लाते थे और यह उसे मिलने वाले पारिश्रमिक से इतर होता था । इससे हमारे यहां काम करने वाले अन्य लोगों के मन में जलन होती थी । इसी जलन के कारण उनलोगों ने बिरजू को मैनेजर साहब कहना शुरू कर दिया था ।
मां की आवाज से मेरी तंद्रा टूटी । मां ने चाय के लिए आवाज लगायी थी । पहले मैने चाय पीने से मना कर दिया और बिरजू के बारे में उनसे पूछा । वह कुछ भी बता पाने में असमर्थ थीं । मैने मां को बताया कि बिरजू मारा गया है । मैं थाने जा रहा हूं । मेरी मां ने मुझे वहां जाने से रोका । और कहा कि पुलिस का मामला है । तुमको क्या जरूरत है । मेरा मन नहीं माना । मैने उन्हें कहा कि जाना तो पडेगा । शायद मुझे रोकने के लिए उन्होंने कहा कि पिताजी नाराज होंगे । मैने कहा मैं देख कर आता हूं और बिरजू के बारे में भी पता कर लूंगा । यह बोल कर मैं तैयार होकर थाने के लिए निकल गया । 
मैं गांव में निकला । लोगों की बातें सुनी । पता चला कि कल देर रात पुलिस मुठभेड में वह मारा गया है, और थाने में उसकी लाश अब भी पडी है क्योंकि कोई उसे लेने वाला नहीं है। मैने गांव के कुछ लोगों से उसके बारे में बातचीत की तो उनलोगों ने उसके बारे में कोई बात करने से मना कर दिया । 
मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कैसे हो गया और वह पुलिस मुठभेड में कैसे मारा गया। सवाल मन में उठा कि क्या वह सचमुच नक्सलियों का एरिया कमांडर बन गया था । मेरी बेचैनी बढ गयी थी । 
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मैं एक पत्रकार के रूप में नौकरी करता था और देश की राजधानी में रहता था । इस कारण मुझे गांव जाने का मौका नहीं मिला था, मैं छुट्टियों में आता था जो शहर से ही लौट जाता था, क्योंकि मां पिताजी वहीं रहते हैं।  इस बार मैं दिल्ली से सीधा गांव गया था क्योंकि वे लोग गांव में ही थे । आठ सालों बाद कल रात ही गांव आया था ।
मेरे गांव से लगभग पांच किलोमीटर दूर पताही गांव में थाना है । मुझे वहां जाने में लगभग आधा घंटा लगा । थाने पहुंचा तो देखा कि सैकडों लोगों की भीड लगी है । लोग बिरजू की लाश को देखने के लिए वहां मौजूद हैं । मैने भी बिरजू की लाश देखी । उसका वही काला लेकिन मासूम और मुस्कराता चेहरा । खून से लथपथ शरीर । चेहरे को छोड कर शरीर का कोई ऐसा हिस्सा नहीं जहां गोली न लगी हो । 
मैने थाना प्रमुख तथा पुलिस निरीक्षक एस के झा से मुलाकात कर पूछताछ की । झा ने मुझसे पूछा कि तुम कौन हो । मैने कहा कि मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या घटना हुई है, आपने इतना बडा कारनामा किया है तो हर आदमी इस बारे में जानना चाहेेगा । आप बताईये। पुलिस निरीक्षक तमतमा उठा । उसने मुझे कहा जेंटिलमैन, चुपचाप अपने घर जाईये वरना इसका साथी होने के आरोप में मैं आपको अंदर बंद कर दूंगा । मैने जोर से कहा यही तो आपलोग करते आ रहे हैं, और यही कारण है कि अपराध कम होने की बजाए बढता ही जाता है । अगर आपलोग सही तरीके से काम करें तो इस तरह की कोई घटना ही नहीं हो ।  
फिलहाल मुझे इस घटना के बारे में विस्तार से बताइये कि मुठभेड कैसे, कब और कहां हुआ । कहते हुए मैने अपना परिचय पत्र दिखाया । 
पुलिस अधिकारी परिचय पत्र देखते ही नरम पड गए और उन्होंने कहा आईये मैं आपको सब बताता हूं । फिर झा ने बताया कि यह एक चरमपंथी संगठन का एरिया कमांडर था । इसके नाम का इलाके में आतंक था । कई संपन्न और सवर्ण किसानों की हत्या कर चुका था। इसके तमाम कारनामों की फाइलें जिले के विभिन्न थाने में रखा है । अभी दो दिन पहले स्थानीय सांसद के भाई के घर हुए हमले में यह पुलिस को वांछित था । 
झा ने बताया कि कल रात पुलिस गश्त दल के साथ मुठभेड में वह मारा गया है । बिरजू महमदा गांव का रहने वाला था। इसकी पत्नी और बच्चे भी हैं लेकिन वह दूसरे गांव में हैं । जिसके बारे में पुलिस को जानकारी नहीं है । इसके बाद मैने पुलिस निरीक्षक से कई सवाल किये । मेरे सवालों का जवाब देने में उसके पसीने छूट गए । साफ जाहिर था कि इसे फर्जी मुठभेड में मारा गया था। इसके बाद मैने और जरूरी जानकारी ली और वापस घर लौट आया । 
मैने ये बातें आपनी मां को बतायी और कहा कि मुझे इसके परिवार से मिलना है लेकिन पता नहीं वह कहां हैं । बाद में मेरी मां ने बताया कि बहुत साल पहले गांव के एक संपन्न किसान ने उसे गांव छोडने पर मजबूर कर दिया था । उसके बारे में इसके अलावा मेरी मां को भी जानकारी नहीं थी ।         
खेत में और दरवाजे पर काम करने वालों के साथ हमारे परिवार का यह रवैया गांव के कुछ गणमान्य लोगों को पसंद नहीं था। अक्सर वह पिताजी पर आक्षेप करते कि आप ब्राह्मण होकर इन नीच जाति के लोगों को सह देकर सिर चढा दिया हैं । यह आपके साथ साथ हमारे लिए भी घातक है । खास कर गांव के एक संपन्न तथा जमीन और पैसे में हमारी हैसियत से कहीं आगे शिबू बाबू कहा करते थे कि आप खुद तो सपरिवार बाहर रहते हैं और गांव आने पर इन नीच जातियों को सिर चढा जाते हैं ।  शिबू बाबू गांव के एक दबंग किसान थे । गांव के अधिकतर लोग उनसे भय खाते थे । गांव के कुछ गरीब गुरबे तो उनके कभी न खत्म होने वाले कर्ज के कर्जदार हो गए थे । 
मैने बिरजू के बारे में पता करने की कोशिश की पर किसी ने नहीं बताया । मैं गांव के जिस बुजुर्ग से पूछता वह मेरे उपर नाराज हो जाते कि उसके बारे में बात करने की कोई जरूरत नहीं है । फिर मुझे याद आया कि उसका एक दोस्त है दिनेश । यद्यपि वह दलित नहीं था फिर भी दोनों में गाढी दोस्ती थी । दिनेश मेरे ताउजी के यहां काम करता था । मैं उसके घर चला गया । जैसे ही मैं उसके दरवाजे पर गया, गांव में यह बात फैल गयी कि मैने ब्राह्मणों की नाक कटवा दी । मैने दिनेश को बुलाया और उससे बातचीत की  । उसने ना नूकुर करते हुए बताना शुरू किया –
लगभग 15 साल पहले शिबू बाबू के साथ बिरजू ने प्याज की खेती की थी । ऐन वक्त पर फसल खराब हो गयी । बहुत ही होशियारी से शिबू बाबू ने अपना हिस्सा मुनाफे के साथ कमा लिया और घाटा बिरजू के मत्थे मढ दिया था । उसकी दिन ब दिन होती खास्ता हालत को वह और बदतर होते देखना चाहते थे क्योंकि उनकी नजर बिरजू की पत्नी फूलो पर थी । फूलो देखने में आकर्षक थी । कई बार शिबू बाबू ने उसे कई तरह की प्रलोभन देने की कोशिश की थी लेकिन फूलो उनके झांसे में नहीं आ सकी । 
एक दिन रात के वक्त मौका पा कर शिबू बाबू नशे की हालत में उसके घर में घुस गए । बिरजू खलिहान में फसल की रखवाली कर रहा था । दिन भर की थकावट से चूर होकर फूलो घर में बेसूध पडी थी । शिबू बाबू ने फुलो को सोया पा कर उसके साथ छेडछाड करने लगे । वह उठ बैठी और धडकते दिल से कहा मालिक आप यह क्या कर रहे हैं।                                
शिबू बाबू ने कहा मेरी बात मान, तेरी सारी तकलीफ दूर कर दूंगा और कर्ज भी माफ कर दूंगा । इतना कहते हुए उन्होंने 100 का एक नोट निकाल कर उसके हाथ में रख दिया। फूलो ने इधर उधर नजर घुमाई । शिबू बाबू ने उसका हाथ पकड कर अपनी ओर खींचने की कोशिश की । 
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इस पर उसने पास पडे एक शीशे के बोतल से जोरदार प्रहार उनके सिर पर कर दिया । अचानक हुए इस प्रहार से तिलमिलाये शिबू बाबू ने उसे अपनी ओर और तेजी से खीचने की कोशिश की । इस पर उसने बोतल से दनादन वार कर दिया । चोट खाये शिबू बाबू ने फूलो को धक्का देकर उसे गंदी गालियां देते हुए बाहर निकल गए ।
शिबू बाबू के मन में इस अपमान का गहरा आघात लगा । इसके लिए वह बिरजू को सबक सिखाने की राह चुनी । सबसे पहले उन्होंने प्याज का बकाया मांगा । इसके बाद बिरजू ने फूस का घर बनाने के लिए पहले से जो कर्ज उनसे लिया था उसकी भी मांग की । बिरजू अचानक इस मांग के लिए तैयार नहीं था । रात वाली घटना की जानकारी उसे नहीं थी । उसने कहा मालिक इतनी जल्दी मैं कैसे दे सकता हूं । शिबू बाबू ने कहा कि जहां से भी लाओ मुझे मेरा पैसा वापस चाहिए ।
दिनेश ने कहा जो रोज कमा कर खाता हो वह अचानक पच्चीस हजार रुपये कैसे चुका सकता है । पूरी कोशिश की । उसकी कोशिश बेकार गयी । शिबू बाबू ने अगले दिन पंचायत बिठाई और उनके दबाव में पंचायत ने बिरजू को एक महीने के भीतर रकम चुकाने का फरमान जारी कर दिया । धीरे धीरे एक महीने का वक्त गुजरने लगा । इस बीच जमानत के तौर पर छठू उनके यहां काम करने लगा ।
उसने फिर बताया कि एक महीने का वक्त बीत जाने के बाद जो कुछ हुआ और भी शर्मनाक था । मालिक और छोटे मालिक: मेरे ताउजी और पिताजीः सहित गांव के कुछ अन्य लोगों के विरोधों के बावजूद बिरजू का घर, जमीन बर्तन और अन्य सामान नीलाम कर दिया गया । फिर भी कर्ज चुकता नहीं हुआ तो शिबू बाबू ने सरेआम कहा कि बिरजू मैं तुम्हारा बकाया कर्ज माफ कर दूंगा अगर तुम फूलो को आज से मेरे घर काम करने भेज दिया करो । 
इस पर पंचायत ने कुछ भी नहीं कहा लेकिन बिरजू ने मना कर दिया । बाद में यह फैसला किया गया कि बाकी के कर्ज के बदले छठु के स्थान पर बिरजू की 13 वर्ष की बेटी नन्हकी शिबू बाबू के यहां काम करेगी। पंचायत के बाद बिरजू के परिवार का खाना छोटे मालिक के यहां हुआ और रात को वह अचानक बिना किसी को बताये गांव छोड सपरिवार कहीं चला गया । नन्हकी शिबू बाबू के यहां रह गयी । 
शिबू बाबू ने नन्हकी के साथ जो किया वह मैं आपको बता नहीं सकता । किशोरावस्था से ही वह रोज कुचली जाने लगी । वह आ कर मेरी पत्नी को इस बारे में बताती थी लेकिन मैं कुछ नहीं कर सकता था । करीब तीन चार महीने के बाद बिरजू सात आठ लोगों के साथ एक गाडी में आया तथा बिना कुछ बोले और किये नन्हकी को उठा ले गया । इसके बाद शिबू बाबू ने थाने में रिपोर्ट करा दी । 
उनकी राजनीतिक पहुंच और पैसे के जोर ने बिरजू को नक्सलियों का एरिया कमांडर बना दिया था । इसके बाद से इलाके में होने वाली हर छोटी बडी घटना की पुलिस फाइल में बिरजू का नाम आने लगा था । पुलिस ने बाद में उस पर ईनाम भी घोषित कर दिया था । हालांकि उसकी तस्वीर पुलिस के पास नहीं थी ।
मैने पूछा आपको पता है कि बिरजू का परिवार अभी कहां है । उसने कहा मालिक मैं जानता हूं लेकिन   । मैने सीधे कहा कि अभी चलो मेरे साथ । मुझे उनलोगों से मिलना है । मैं दिनेश को लेकर उसके घर पहूंचा । मुझे देख कर फूलो घबरा गयी । दिनेश कुछ कहना चाह रहा था तो मैने रोक कर फुलो से पूछा, आप मुझे जानती हैं । उसने कहा, नहीं । मैने फिर पूछा आपको बउजाजी के बारे में याद है । उसने विस्मय से कहा हां । मैने कहा मैं वही बउआजी । जब मैं छोटा था तब फुलो मुझे बउआजी कह कर बुलाती थी । इतना सुनते ही वह फूट फूट कर रो पडी । 
फूलो ने दिनेश की बतायी हुई सारी कहानी दुहरायी और बताया कि पंचायत के बाद मालिक ने हमें कहा था कि वह एक सप्ताह में पैसे का वह बंदोबस्त कर देंगे लेकिन बिरजू ने कहा कि जिस मालिक ने हमें इतना कुछ दिया, वह हमारे कारण गांव के पंचायत से विरोध करें यह अच्छा नहीं है और हमने रातों रात गांव छोड दिया । 
उसने कहा कि गांव छोडने के बाद वह अपने मायके चली गयी । वहां से थोडी दूर एक गांव महमदा में बिरजू ने किसी किसान के घर नौकरी कर ली । बिरजू खेतों में काम करता था और वहीं रहता था । मैं भी बहू के साथ कभी कभी वहां हो आती हूं । बेटा पंजाब चला गया है और जालंधर में रहता है । दोनों बेटी की शादी हो चुकी है । नन्हकी को भी बिरजू शिबू बाबू के यहां से ले आया था । उसकी भी शादी हो चुकी है । अभी दो दिन पहले मैं महमदा गयी थी । इस बार अकेले गयी थी क्योंकि शाम तक वापस हो जाना था ।
वहां जाने के बाद मैने देखा कि वह बुखार से तप रहा है । पूछने पर उसने बताया कि दो दिन से तबियत खराब है । मैने कहा कि वह जा कर इलाज करा आये । अभी दो दिन पहले ही स्थानीय सांसद के भाई के घर पर माओवादियों ने हमला कर दिया था और पुलिस लोगों की धर पकड में लग गयी थी । मैने कहा कि देर करने की बजाए जल्दी ही चला जाये और डाक्टर से मिल कर वापस आ जायेगा तो मुझे भी वापस आना है क्योंकि बहू अकेली है ।
वह चला गया । उसे वापस आने में देरी हो गयी । जब वह नहीं लौटा तो मैं यहां आ गयी । फिर उसने कहा कि बउआजी बिरजू तो तीन दिन से कहीं गया भी नहीं था, बुखार से तप रहा था और मेरे कहने से वह डाक्टर के यहां गया था, और अब उसके मरने की सूचना आयी है और जोर जोर से रोने लगी । इस मैने उसे कुछ पैसे दिये और भारी मन से वापस लौट आया।
कल होकर सभी अखबारों में मोटे मोटे अक्षरों में पुलिस अधीक्षक का बयान छपा था सांसद के भाई के आवास पर हमला करने वाला कुख्यात नक्सली बिरजू हजारी कल रात पुलिस मुठभेड में मारा गया । मैने मन ही मन सोचा कि यह सुनियोजित हत्या है और मैं बिरजू को इंसाफ दिला कर रहूंगा ।
शशि रंजन
रासायन शास्त्र में स्नातक करने के बाद पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिप्लोमा तथा स्नातकोत्तर एवं विधि में स्नातक तथा एमएससी :बीटी: करने के बाद संप्रति एक अग्रणी समाचार समिति में बतौर वरिष्ठ संवाददाता कार्यरत। विभिन्न पत्र एवं पत्रिकाओं में लेखों, कहानियों, लघुकथाओं एवं समीक्षाओं का प्रकाशन। संपर्क - srt.scribe@gmail.com

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