Sunday, May 31, 2026
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उषा साहू की कहानी – सोने का संसार

“…..रीमा, क्या तुम सुधीर से बहुत प्यार करती हो…?” सुनते ही रीमा एकदम तमतमा उठी और गुस्से में बोली,  “…राहुल सर, कैसी बातें कर रहे हैं आप, आपकी हिम्मत कैसे हुई, मेरे और सुधीर के प्यार के बारे में ऐसी बातें करने की । … क्या यही पूछने के लिए आपने मुझे रेस्टोरेन्ट में कॉफी पीने के लिए बुलाया था, हाँ मैं सुधीर से बहुत-बहुत प्यार करती हूं,  मैं जा रही हूं, मुझे नहीं पीना कॉफी…” और रीमा बेग उठकर जाने के लिए तैयार हो गई । डॉ. राहुल उसके गुस्से की परवाह किए बिना धैर्यपूर्वक बोले, “…रीमा, बैठ जाओ, मेरी बात ध्यान से सुनो …, तुम सुधीर से प्यार करो, पर बहुत…बहुत…बहुत मत करो, सिर्फ प्यार करो” । डॉ. राहुल की बातों में ‘कुछ’ था, सुनकर, रीमा का गुस्सा थोड़ा शांत हो गया । राहुल सर ने बहुत ही अपनत्व से उसके सर पर हाथ रखा और कहा, “आँसू पोंछ लो रीमा, तुम जैसी बहादुर लड़की पर आँसू शोभा नहीँ देते” फिर सर ने उसे पता नहीं क्या समझाया कि वह उनकी सलाह मानने को तैयार हो गई । 
रीमा झटपट कॉफी खत्म करके बिना राहुल सर को कुछ बोले, वहाँ से निकलने लगी । जाते-जाते उसने सुना, राहुल सर कह रहे थे, “रीमा, मेरी बात पर गौर करना” रीमा ने रेस्टोरेन्ट के बाहर खड़ी अपनी स्कूटी उठाई और दनदनाती हुई घर पहुंच गई । जाकर सीधे पलंग पर लेट गई । ड्रेस बदलने तक का होश नहीं रहा । डॉ.राहुल की बातें उसके दिमाग में द्वंद मचा रही थीं । सुधीर को बहुत…बहुत…बहुत प्यार मत करो… । सुधीर को खूब सारा प्यार कैसे न करे …, सारी दुनिया से लड़कर उसने कॉलेज के प्रोफेसर सुधीर से शादी की है । शादी में रुकावट आने की सबसे बड़ी वजह थी, सुधीर का दाहिने पैर में हल्का से लंब होना, जिससे वे थोड़ा लचक कर चलते हैं । कभी-कभी बैशाखी भी लेना पड़ जाती हैडॉ. राहुल, उसी कॉलेज में, सुधीर के सीनियर हैं । सीनियर होने के साथ वे पारिवारिक मित्र, साथी, दोस्त, रिश्तेदार जो भी कहो, बस वे ही हैं । 
सुधीर और रीमा की शादी करने में डॉ. राहुल का अहम रोल था । रीमा विचारों के तन्तुजाल में उलझती ही जा रही थी । वह समझ ही नहीं पा रही रही, सुधीर को कैसे खुश रखे । आज सुबह की ही तो बात है, दोनों नाश्ते के लिए बैठे, रीमा चाय के कप में चम्मच से शकर घोलने लगी । अचानक पता नहीं सुधीर को क्या हो गया, तमतमाते हुये बोले, “ ..हाँ… हाँ… शकर घोल दो, हो सके तो चम्मच से पिला भी दो …, अपाहिज हूँ न….” और उसी गुस्से में तमतमाते हुये कॉलेज के लिए निकल गए । ये भी नहीं सोचा, मैं गुस्सा होकर जाऊंगा तो रीमा पूरे दिन कितनी परेशान रहेगी । रीमा तो प्यार वश ऐसा करती है, सुधीर उसका गलत ही अर्थ निकालते हैं । वह समझ ही नही पा रही है, आखिर उसका गुनाह क्या है? वे क्यों बिना बात चिल्लाते रहते हैं । रीमा बिस्तर में ही लेटी रही, दिमाग फिर विचारों में उलझ गया। 
पिछले हफ्ते की बात तो वह भुलाए नहीं भुला पा रही । उस दिन शाम को डॉ. राहुल और उनकी पत्नी शोभा घर पर आ गए । चाय पीने के बाद जो गप्पों का सिलसिला शुरू हुआ तो रात के आठ बज गए । राहुल सर हरेक विषय पर बहुत ही गहन जानकारी रखते हैं । चाहे राजनीति हो, देश की समस्याएँ हो, इतिहास हो, कोई भी विषय हो, घंटा आध घंटा लगातार बोल सकते हैं । दुनिया की जागरफ़ी उनकी जबान पर रखी हुई है । सुधीर तो उनका सबसे पसंदीदा विध्यार्थी रहा है । 
सुधीर की पढ़ने और पढाने की समर्पण की भावना को देखते हुये ही उन्होने उसे पी.एचडी करने का मशविरा दिया और पीएचडी होने के बाद अपने ही कॉलेज में व्याख्याता के रूप में नियुक्त करवा दिया । अब वे दोनों गुरु और शिष्य कम, दोस्त ज्यादा हैं । … राहुल सर ने सुधीर का ऐसा मनोबल वढाया था कि वह पूर्णतया आत्मविश्वास से भरा हुआ इंसान बन गया ।
 …. और जब उसके एरिया की, एक अध्यापिका यानी रीमा ने, एक सेमिनार में राहुल का, अँग्रेजी में एक भाषण सुना, तो उन्हें अपना दिल दे बैठी । पर जब उसने सुधीर से नज़दीकियाँ बढ़ाने की कोशिश की तो, उनकी उदासीनता देखकर निराश हो गई । … वह ये बात जानती थी कि सुधीर भी उसके लिए दिल में जगह रखते हैं, पर पता नहीं क्यों उसे दिल से बाहर आने ही नहीं दे रहे हैं । एक दिन पक्का दिल करके वह राहुल सर के पास पहुँच ही गई । राहुल सर, हर विषय को अच्छाई-बुराई, हानि-लाभ दूरगामी परिणाम देखकर, अच्छी तरह से कसौटी पर कसकर ही जबाव देते हैं । रीमा भी उनके हर सवाल का तसल्ली से जवाब देती रही । अंतत: डॉ. राहुल इस नतीजे पर पहुंचे कि वे रीमा के फादर से बात करेंगे । 
फिर शुरू हो गया समाज का तमाशा, ‘क्या तुम्हें कोई और नहीं मिला, बेटी को अपाहिज को सौंप दिया ……’, 
लड़का देखने में सुंदर है तो क्या हुआ, है तो …. रीमा को इन सब बातों का कुछ असर नहीं हुआ और वह जीत गई । साधारण से कार्यक्रम में शादी हो गई, रीमा के माता-पिता, वे-मन से शादी में शामिल हुए । 
नई-नई शादी का खुमार, सोने के दिन, चांदी की रातें, दो साल कहाँ निकल गए, पता ही नहीं चला । पर आजकल दिन बहुत कठिन हो गए हैं ।  
बातों के दौरान, समाचार सुनने के लिए सुधीर ने टीवी चालू कर दिया । नेशनल न्यूज़ चल रही थी । अन्य समाचारों के साथ न्यूज़ के दौरान बताया गया कि सरकार, विकलांगों के लिए कई नई योजनाएँ बना रही है । ये समाचार सुनते ही सुधीर बुरी तरह भड़क गये । गुस्से में लाल-पीले हो गये, वैसे ही गुस्से में बोले, ”… हूँ सरकार विकलांगों के लिए कई नई योजनाएँ बनाएगी… लानत है, जो सरकार स्वयं पंगु है,  दूसरों के सहारे चल रही है, वह क्या करेगी, सिर्फ योजनाएँ बनाने के… । विकलांग किस बात में कम हैं, तुम्हारे आगे भीख तो नहीं मांग रहे हैं …..” ।  बोलते – बोलते सुधीर बुरी तरह हाँफने लगे, टीवी को खा जाने वाली नजरों से देखने लगे । उनके इस अप्रत्याशित व्यवहार के कोई भी तैयार नहीं था । रीमा ने उठकर टीवी बंद कर दिया और सुधीर के कंधे पर हाथ रखकर बोली, “… सुधीर क्या हो गया अचानक आपको ?” सुधीर ने रीमा का हाथ बुरी तरह से झटक दिया और बोले, “… जाओ, अपना काम करो…”  । राहुल सर भी उठकर खड़े हो गए और बोले,  “…सुधीर बोलो तो सही, मैं हूँ तुम्हारे साथ …” । सुधीर ने उनको भी अपमानित कर दिया और कहने लगे, “….नहीं चाहिए किसी का साथ, मैं अकेले ही जी लूँगा …” राहुल सर की धर्म पत्नी बेचारी शोभा जी तो थर-थर कांपने लगी । घर में एकदम सन्नाटा छा गया । थोड़ी देर बाद जब सुधीर थोड़े शांत हुये तो राहुल सर घर जाने की तैयारी करने लगे और बोले, “सुधीर हम लोग जा रहे हैं, कुछ जरूरी हो तो फोन कर लेना …”। सुधीर लापरवाही से बोले, “जाओ…जाओ, कर देंगे फोन…” राहुल सर और उनकी पत्नी चुपचाप वहाँ से निकल गये। अब तो सुधीर का रोज-रोज का ही नाटक होने लगा । उस दिन डिनर के पहले रीमा ने, सूप का बोल टेबिल पर रखा और उसके पैरों पर नेपकिन रखने लगी । सुधीर आँखें तरेरते हुये बोले, “…पैर से अपाहिज हूँ, हाथ से नहीं, सूप कपड़ों पर नहीं गिराऊंगा…” कहते हुए उन्होने नेपकिन जमीन पर फेंक दिया । जैसे ही रीमा ने पानी की बोतल से गिलास में पानी भरा तो फिर चिल्लाने लगे, “मेरे हाथ टूटे नहीं है, मैं पानी ले सकता हूँ, ज्यादा नाटक मत करो …” रीमा आख़िर करे तो क्या करे । सुधीर एक दिन वगैर गुस्सा किए बिना नहीं रहते । गुस्सा भी कोई ऐसा वैसा नहीं । अब तो यह रोज का ही किस्सा  हो गया । रीमा कपड़े पहनने में उनकी मदद करती तो उसे दूर झटक देते और कहते, “…ज्यादा नाटक मत करो, मेरे ऊपर दया करने की जरूरत नहीं है, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो…” । क्या करे बेचारी रीमा… कुछ समझ में नहीँ आ रहा था । एक दिन सुधीर का अच्छा-सा मूड देखकर उनके बालों में हाथ फेरते हुये रीमा बोली, “…सुधीर आखिर आप चाहते क्या हैं, क्यों छोटी-छोटी बातों में नाराज हो जाते हैं ?”  सुधीर का ‘अच्छा मूड’ एकदम बिगड़ गया, रीमा को अपने से दूर करते हुये बोले, “…जाकर अपना काम करो, मुझे परेशान मत करो”।  
रीमा जाए तो जाए कहाँ । माँ-बाप को कुछ बता नहीँ सकती, उनकी इच्छा के विरुद्ध शादी की है । दूसरा कोई है नहीँ, क्या करे । कुछ क्षणों में ही पिछले दो वर्षों का सफ़र कर आई । रीमा विचारों में ऐसी उलझी कि न तो नींद ही आई, न ही वह पूरी तरह से जागी ही थी । 
घड़ी पर नजर गई, बाप रे ! पाँच बज गए, सुधीर के आने का टाइम हो गया । रीमा शाम के नाश्ते की और चाय की तैयारी करने के लिए किचिन में गई । उसे याद आया, राहुल सर ने उसे ‘कुछ’ समझाया था, रीमा को वह याद आ गया और होंठों पर हल्की-सी मुस्कराहट आ गई । वह किचन से बाहर आ गई । 
जैसे ही सुधीर ने बेल बजाई, रोज जहां वह भागकर दरवाजा खोलने के लिए जाती है, आज आराम से धीरे-धीरे गई । सुधीर आते ही गुस्से में बोले, “कितना टाइम लगती हो, दरवाजा खोलने में…”  “अरे बाबा, बात कर रही थी किसी से… चिल्लाने के क्या जरूरत है ?” आज रीमा ने, न उसके जूते-मौजे खोले और न ही पानी का गिलास दिया । गिलास और बोतल टेबिल पर रख दिये और फोन पर बात करने लगी । वह कनखियों से सब देख रही थी । जैसे ही सुधीर ने गिलास में पानी लेकर मुंह को लगाया, रीमा उसके पास आकर बैठ गई और बोली, “सुधीर मुझे भी एक गिलास पानी दो न, बहुत प्यास लग रही है…” उस समय पर सुधीर के मुंह पर बिलकुल गुस्से के भाव नहीं थे । दोनों कॉलेज की, यहाँ-वहाँ की बातें करते रहे । पता ही नहीं चला, कब सात बज गए । “बाप रे ! डिनर का टाइम हो गया, और मैंने अभी तक सोचा भी नहीं हैं क्या बनाना है, सुधीर आप जाओ नहाने, मैं किचिन में जाती हूँ” । 
बाथरूम में टोवेल, साबुन, भरी हुई बाल्टी सभी कुछ तैयार रहता है । आज भी सब कुछ था, पर बाल्टी भरी हुई नहीं थी । सुधीर वहीं से चिल्लाया, “रीमा बाल्टी में पानी नहीं है” । रीमा ने कुछ जबाव नहीं दिया, चुपचाप सुनती रही । सुधीर ने जब दुवारा आवाज लगाई तो रीमा हाथ में चम्मच लिए किचन से बाहर आई और बोली, “…अरे तो भर लो न बाबा बाल्टी, देख रहे हो न मैं किचिन में हूँ, वैसे ही आज खाना के लिए देर हो गई है” । सुधीर आज्ञाकारी बच्चों की तरह बोले, “… हाँ भर लूँगा, जाओ किचिन में …” रीमा ने देखा, सुधीर जरा भी गुस्से में नहीं थे ।डिनर के लिए, पराँठे, भिंडी की सब्जी, पुलाव और रायता था । टेबिल पर खाना रखने के बाद रीमा  बोली, “…सुधीर प्लीज खाना परोसो न प्लेट में, बहुत जोर से भूंख लग रही है, मैं पानी की बोतल लेकर आ रही हूँ …” । सुधीर बिना कुछ बोले, दोनों प्लेट में खाना परोसने लगे ।
दूसरे दिन, सुधीर जैसे ही ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगे, आदतानुसार वहीं से चिल्लाने लगे, “….रीमा तुम्हें कपड़ों के मेचिंग की जरा भी समझ नहीं है …. ये कौन-से कलर की टाइ निकली है, ब्लू शर्ट पर…” रीमा भागकर वहाँ नहीँ आई, वहीं से बोली, “…. निकाल लो न दूसरी टाई, इतनी सारी टाई तो रखीं हैं …, मैं आपका टिफिन लगा रही हूँ…,मौजे भी निकाल लेना, मैं निकालना भूल गई…” सुधीर ने कुछ जवाब नहीँ दिया । सुधीर के कॉलेज जाने के बाद, रीमा ने फुर्सत की सांस ली । 
बस इसी तरह कुछ दिन निकल गए । अचानक उसे लगा, उसका मन इतना हल्का-हल्का क्यों लग रहा है, उसने तो कुछ किया ही नहीँ है, बस राहुल सर की बात पर जरा – सा ध्यान ही तो दिया है । इतनी छोटी – छोटी सी बातों से सुधीर में इतना परिवर्तन कैसे आ गया ? और…और अब तो वे हंसने भी लगे हैं । पहले तो वे हाथ में कोई भारी-भरकम किताब लेकर बिस्तर में जाते और पढते-पढ़ते ही सो जाते थे, अब वे बिस्तर में मुझसे देर तक बातें करते रहते हैं । पता नहीँ क्यों आज रीमा का मन गाने को कर रहा था, वह गुनगुनाने लगी, “आज मदहोश हुआ जाय रे… मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन….., बिना ही बात मुस्कराइए रे मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन….” 
और अंतत: आज रीमा ने राहुल सर को फोन लगा ही दिया । राहुल सर ने भी प्रसन्नता व्यक्त की और कहा, रीमा मैं तुमसे कहता था न, राहुल को बहुत … बहुत…. बहुत प्यार मत करो, सिर्फ प्यार करो । उनका कोई भी पर्सनल काम मत करो, उन्हें स्वयं करने दो । उन्हें जरा भी उनकी कमी महसूस मत होने दो” “जी सर” सर फिर बोले, “मैंने बड़ी मुश्किल से सुधीर के अंदर इतना आत्म विश्वास पैदा किया है, छोटी-मोटी बातों से उसे डिगने मत दो । फिर देखना कैसा सोने का संसार बन जायेगा तुम्हारा  …और हाँ अभी तुम्हारी ड्यूटी खत्म नहीँ हुई है, तुम्हें ज़िंदगी भर इसी बात पर अडिग रहना है” । “जी सर” । 
उस दिन तो कमाल ही हो गया । रीमा ने शिकायत भरे लहजे में कहा, “…सुधीर तुम्हें तो जरा भी मेरी चिंता नहीँ है…” रीमा की तरफ देखे बिना ही वे बोले, “अरे क्या हो गया, हमारी चिंतामणी को…” “…दो-तीन दिनों से मेरी तबीयत ही ठीक नहीँ है, पता नहीँ शायद गर्मी की वजह से, चक्कर भी आ रहे हैं, न कुछ खाने का मन करता …”  सुधीर दाढ़ी बना रहे थे, उन्होने रीमा की तरफ देखा तो रीमा की शरारती आँखों ने और कातिल मुस्कराहट ने पता नहीँ क्या कह दिया, कि उन्होने रीमा को गोद में उठा लिया, और चुंबनों की बरसात कर दी । वह तो भूल ही गया कि वह उसमें कुछ कमी है, या उसके पैर में लंप है । रीमा का चेहरा साबुन-साबुन हो गया । रीमा उनसे नजरें चुराते हुये बोली, “अरे बाबा मुंह तो धो लो,…  मेरे पूरे चेहरे पर साबुन लगा दिया” सुधीर बोले, “…अरे छोड़ यार, मेरा चेहरा, तेरा चेहरा…” । रीमा, सुधीर से आँखें ही नहीँ मिला पा रही थी । सुधीर ने रीमा को गोद से उतारा और बाहों में समेटते हुये बोले, “रीमु तुमने मुझे ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी दी है, याद रखना मेरी अनमोल अमानत तुम्हारे पास है, उसका ख्याल रखना…” । रीमा लजाते हुये बोली, “अरे बाबा….अब तुम्हारा ख्याल रखूँ या तुम्हारी अमानत का…” सुधीर शरारत भरे अंदाज में बोले, “… मेरे अमानत का ही रख लो, वैसे भी आजकल तुम मेरा ख्याल रखती ही कहाँ हो…”? 
“अब मैं तुम्हारा कोई ख्याल नहीं रखने वाली, खुद रखो, मैं सिर्फ़ तुम्हारी अमानत का ही ख्याल रखूंगी” 
“हाँ बाबा तुम्हारी हर बात मंजूर है, तुमने तो मेरा सोने का संसार सजा दिया । थैंक्स रीमु ।


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3 टिप्पणी

  1. अति हमेशा ही विनाश का कारण बनता है। चाहे प्यार हो या दुश्मनी, खाना हो या अति खाना, यह नियम सब के लिए एक समान है। पौधों को प्यार से ज्यादा जल सींच जाए तो जड़ सड़ने लगते हैं, ज्यादा बारिश से भी ज्जन जीवन अस्तव्यस्त। आपकी कहानी ने हद को बताया है। कोई भी हद सब के लिए बराबर। बधाई उषा जी सुंदर कहानी के लिए।

  2. उषा साहू की कहानी ‘सोने का संसार’ एक तरह की विकलांग विमर्श की कहानी है। अंग में विकार के साथ साथ सुधीर के स्वभाव में भी विकार था। इस विकार को राहुल सर की एक बात ने दूर कर दिया। ऐसा प्रतीत होता है जैसे लेखिका एक मनोचिकित्सक है। मनोविकार को पहचानना और मरीज पर प्रयोग करना यह काम चिकित्सक ही कर सकता है।
    दूसरी बात मैं ये मानता हूं कि पुरुष चाहे जैसा हो, उसमें नैसर्गिक पुरुष दंभ होता ही है। वह कभी नहीं मानता है कि स्त्री उससे आगे है। भले ही उसमें कितनी भी कमी क्यों न हो। आफिस में पति-पत्नी एक साथ काम करते हैं। अगर पत्नी उससे ऊंचे पद पर है तो वह उसे सहन नहीं करता है। इस कहानी में भी सुधीर केवल इसलिए अपनी पत्नी से खीझता है कि उसे लगता है कि विकलांग की वजह से पत्नी उस पर दया दिखा रही है । यह कहानी मानव मन की हलचल को रेखांकित करती है। लेखिका को बधाई।

  3. आपकी कहानी अच्छी लगी ऊषा जी! कहानी विकलांगता को लेकर मनोवैज्ञानिक धरातल पर लिखी गई है।
    यद्यपि रीमा प्रेम वश ही सुधीर का ध्यान रखती थी लेकिन सुधीर की हीन भावना ही थी उसकी अपनी विकलांगता को लेकर, और उसे ऐसा लगता था कि उस पर दया दिखाई जा रही है। एक शारीरिक कमी के कारण सुधीर का चिड़चिड़ापन और क्रोध रीमा के लिए परेशानी का कारण बन गया। ऐसा कई लोगों में देखा गया है।
    अंततः राहुल सर की समझाइश काम आई। और स्थितियाँ परिवर्तित हुईं।
    एक सकारात्मक कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ।

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