Wednesday, June 17, 2026
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वंदना बाजपेयी की कहानी – सिम्मोमय

घर के दरवाजे पर ऑटो रुका l हम सामान उतारने लगे और बच्चे धींगा-मुश्ती करते हुए वहीं से ज़ोर से  “दादी, दादी!” की पुकार लगाने लगे।  
दरवाजे पर हरे छिलके, रोटी गुड़ चना, से भरी बाल्टी रखी हुई थी। उसे देख हुलसती हुई एक चितकबरी गाय बां बां टेरते हुए चली आ रही थी l अम्मा जी शायद “दादी-दादी” की पुकार से बेखबर उसी के लिए पानी लेने अंदर गई थीं l
उसे देखते ही सुमित के मुँह से अस्फुट से शब्द निकले, “सिम्मो”
सिम्मो…. जिसे घर लाने का सुझाव मैंने ही दिया था।
अम्मा-पिताजी की उम्र को देखते हुए शायद उस समय ऐसा सुझाव देने की हिम्मत मैं ही कर सकती थी l मैं घर का नया सदस्य जो थी, घर की बहु… जिसने मंगलाचार की रस्म के बाद ही घर को अजीब सी निराशा में घिरा पाया था l अगले दिन ही कारण भी पता चला था, बिट्टू जीजी यानी बड़ी ननद की बीमारी का l
भौजाई के स्वागत में, जिसे सबसे आगे खड़ा होना था वो सबसे छिपी खड़ी थी l सुमित ने ही बताया था कि कई सालों से बिट्टू जीजी एक अज्ञात बीमारी से जूझ रही थीं। देश भर के ना जाने कितने डॉक्टरों, वैद्यों, के बाद नीम-हकीमों तक को दिखाया जा चुका था पर बीमारी थी कि ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही थी। उनकी बीमारी ने घर में सभी के मन में एक विषाद राग भर दिया था l जिसका मरीज़ पूरा घर था l
 
उन्हीं दिनों किसी स्वास्थ्य पर आधारित पत्रिका के पन्ने पलटते हुए मैंने देसी नस्ल की श्यामा गाय के दूध के गुणों के बारे में पढ़ा था, जिसका दावा था कि उससे कई बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं। शर्त बस इतनी थी कि गाय शुद्ध चारा खाती हो, कूड़ा न खाती हो। उपाय आसान व् उचित थे, तो लगा बिट्टू जीजी की बीमारी के इलाज के लिए शायद घर में ही एक गाय पाल लेनी चाहिए।
सुमित ने तो शुरू से ही विरोध किया, कैसे होगा? इतना आसांन है क्या? गाय की देखभाल कौन करेगा? उनकी चिंता वाजिब थी, क्योंकि हमें आगरा में रहना था, जहाँ सुमित की नौकरी थी, और अम्माजी, पिताजी और बिट्टू को कानपुर में। पिताजी ६० पार कर चुके थे, और हाल ही में रिटायर हुए थे। अम्मा जी उनसे बस दो बरस छोटी थीं। उम्र से कहीं ज़्यादा बिट्टू जीजी की बीमारी के कारण उनका शरीर अशक्त हो चुका था और गाय पालना बच्चे को पालने से कम कठिन थोड़े ही है। 
पर अम्मा जी और पिताजी को मेरा यह प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा।
 निराशा में आशा का एक जुगनू चमका, क्या पता गाय की सेवा से ही ये चमत्कार संभव हो।  
गाँव के कच्चे घरों से अम्मा जी बचपन से ही गाय को घर में पालने की आदी थीं l मेरे प्रस्ताव से एक बार फिर से उनकी “पुनीत प्रीत” जाग उठी।  
 गाय की बात पर पिताजी आँखों में चमक लाते हुए सुमित को पुराने दिनों की याद दिलाने लगे, “देखो, हम तुम लोगों की तरह नहीं हैं। ना जाने कित्ती गाय पालीं हैं हम लोगन ने गाँव में। भोरे–भोरे सानी करना, गोबर–कंडा करना, सब किया है। पूछो अपनी अम्मा से” पिताजी ने गर्व से अम्मा जी की ओर देखकर कहा।  
अम्मा जी भी भाव विभोर हो कर कहने लगी, “हमहूँ घी, छाछ, मठ्ठा, सब करत रहीं। ऊ याद है ना! जरा सी देर करन पर नंदिनी, कैसन रिसाय जात थी और ऊ देवकी, ऊ तो हमरा दुलार पाए बिना घास चरने को भी नाहीं जात रही, दरवाजे में ही मुँह मारत रही, और ऊ…. ।”
दोनों पूरी तरह रसलीन होकर पुरानी गायों के बारे में बातें करने लगे और मैं उनको बातों में उलझा देख रसोई की ओर खिसक ली।  दोपहर हो गयी थी, अभी थोड़ी देर में चारो तरफ़ से “खाना–खाना” की पुकार शुरू हो जायेगी, तब खाने में किस्से तो परोसे नहीं जा सकते ना!
 
पिताजी ने पहले भी बहुत सारी गायें पाली थीं। गाँव में भी और किदवई नगर के ‘बड़े घर’ में भी, जहाँ पहले सब लोग संयुक्त परिवार में इकट्ठे रहते थे। अब ‘बड़े घर’ में ताऊ जी और उनका परिवार रहता था और दादी–बाबा के ना रहने पर हमारा परिवार गोविंद नगर में आ कर बस गया था, फिर भी उस घर को सम्मान देने के लिए उसे ‘बड़ा घर’ कहा जाता था।  बचपन में घर की गायों का ही दूध पी कर के सब बच्चे बड़े हुए थे। पर गाभिन, बकैनी, हाल की ब्याही, फाटा… जैसी टेर्मिनोलॉज़ी  से मैं ससुराल आ कर ही वाकिफ़ हुई थी। मेरे  पिताजी की नौकरी तबादले वाली थी, दो तीन साल से ज्यादा एक शहर में रुकना होता नहीं था। घर में सामान भी उतना ही रहता था कि इस खानाबदोशी में कोई दिक्कत ना हो। हाँ, माँ अग्रासन जरूर निकालती थी। हरे छिलके के लिए एक बाल्टी रखती थीं, जो सड़क पर घूमती गायें नियत समय पर आ कर खा जाया करतीं।  
गायों को घर में पालने की मेरी जिज्ञासा नई थी।   
अम्मा जी का आदेश था कि, बछिया लायी जाए ताकि उसे शुरू से पालें, एक तो घुल-मिल जल्दी जाएगी दूसरे जब गाभिन होगी तो बिलकुल शुद्ध, सात्विक दूध देगी।  
बछिया की खोज में आस–पास के गाँवों में खबर भिजवाई गयी।
बड़ी बुआ सास के गाँव पडरी से जैसी चाहते थे, वैसी बछिया मिल भी गयी। बुआ का संदेशा आते ही  घर में उसके स्वागत की तैयारियाँ होने लगीं।
पक्के आँगन, जिस पर संगमरमर के टाइल्स लगे थे,  इंटें बिछाई जाने लगी, उनके बीच–बीच में मिट्टी भरी गयी, जिससे उसको खड़े होने में दिक्कत न हो।  चारे-भूसे के लिए बड़े–बड़े ड्रम और चारा-सानी के लिए टब भी आ गए। दो खूबसूरत बाल्टियाँ, पानी पीने के लिए नयी फर्श के पास रख दी गयीं। सुबह-शाम गोबर ले जाकर उपले बनाने के लिए पास के पुरबा में रहने वाली ननकी देवी से भी बात हो गयी।  कुल-मिला कर खूबसूरत बंगले में एक मिनी खटाल बन गयी।  
 
सिम्मो को लेने मैं और सुमित, पिताजी के साथ बड़ी बुआ के गाँव पडरी गए थे। शहर कोलाहल से दूर मीलों लंबे खेत मन को बहुत सुहा रहे थे।  इससे पहले मैंने गाँव को कभी इतने करीब से नहीं देखा था। वहाँ जा कर अहसास हुआ कि शहर के लोग हवा में कितना जहर पीते हैं।  हमारी गाड़ी के आगे बढ़ने के साथ–साथ गाँव की मिट्टी उड़–उड़ कर चेहरे, गालों, माथे पर अपना आशीष अंकित करने लगी। पीछे गाँव के बच्चे गाड़ी को पकड़ कर “हो-हो” करते हुए साथ में दौड़ रहे थे। कच्ची सड़क पर धीमी रफ़्तार से दौड़ती गाड़ियाँ गाँव के बच्चों के मनोरंजन का साधन हुआ करतीं थीं। वो गाड़ियाँ भी रोज कहाँ आती थी, ये तो विशेष मेहमान होतीं, तो बच्चे उस अवसर को कैसे जाने देते।  
बुआ का घर आते ही मैंने सर पर हल्का सा घूँघट कर लिया।  
 घर के आगे बरसों पुराना बरगद का पेड़ लगा हुआ था। उसकी लंबी-लंबी रस्सियों पर बच्चे झूला बना कर झूल रहे थे। वो बूढ़ा बरगद भी घर का एक सदस्य सा हो गया था। ना जाने कितने बच्चे इसकी शाखों पर झूले, झूल–झूल कर बड़े हुए, कितनी बहुएँ घूँघट ओढ़ कर घर आयीं, कितने लोग चार कंधों पर सवार हो कर कभी ना लौटने के लिए चले गए। वह सब का साक्षी रहा है, और अभी भी तो किसी बुजुर्ग की भांति द्वार को छेंक कर खड़ा हुआ है। हर आने जाने वालों की आवभगत अपनी पत्तियाँ हिला-हिला कर करता हुआ। प्रकृति कितना कुछ बोलती है पर हम अनसुना कर के बढ़ जाते हैं।
पिताजी और सुमित बरगद के नीचे पड़ी खाट पर बैठ गए और मैं बुआ के पास आँगन में पड़ी खाट पर।
 मैं पहली बार उससे वहीँ मिली थी। नन्ही बछिया थी तब, प्यार से सर पर हाथ फेरा तो उसने सर झुका लिया। बुआ ने बताया कि, “ये कह रही है कि और प्यार करो”।
 बेजुबान प्राणी भी अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की कितनी तरकीबें निकाल लेते हैं।
  बुआ-सास और पिताजी के साथ हम सब जब उसे ले कर आये, तो थोडा घबराई हुई थी। आखिरकार माँ से बिछुड़ी थी, ट्रक में चढ़ाई गयी थी।  पहले तो चढ़ना ही नहीं चाहती थी, फिर बड़ी जुगत से चढ़ाई गयी। कहाँ जा रही है, उसे तो ये भी पता नहीं होगा। सारे रास्ते गोबर करती रही। पेट तो जरूर मठुला होगा। कई बार अपनी विदाई याद आती रही, और आँखें भरती रहीं।    
घर आकर ट्रक से उतरकर चुपचाप खड़ी हो गयी। आगत भविष्य उसे भी डरा रहा होगा।
 उसके आते ही अम्मा जी ने बड़े प्यार से उसका नामकरण भी कर दिया… “सिम्मो”  
शायद सिम्मो भी प्रेम के इस स्पर्श को पहचान गयी थी, तभी तो उसने अपनी गर्दन अम्मा जी के हाथों में झुका दी थी। एक नए रिश्ते की शुरुआत हो गई थी।  
कुछ दिन बाद हम आगरा लौट आए l
 सिम्मो के आते ही घर के माहौल की सुई नकारात्मक से सकारात्मक की ओर होने लगीं l अब दुख, निराशा और भाग्य को कोसने की जगह अम्मा जी की बातों का केंद्र सिम्मो ही रहती।  उसकी चाल-ढ़ाल, बनक, जिद्द नखरे की बातें करते हुए अम्मा जी ‘हमरी सिम्मो’ करना ना भूलतीं।  इस तरह से दूर रहते हुए भी हम सब की जिंदगी सिम्मोमय हो गई थी l
जब हमारा वापस घर आना हुआ तब तक सिम्मो बड़ी हो चुकी थी। उसके गले में सुंदर घंटियों की छोटी सी माला थी, जो उसके गर्दन हिलाते ही बजने लगती और संगीत की स्वर लहरियाँ हवा में छा जातीं। इस बार हम दोनों उसे अपरिचित लगे, उसने थोडा सींग दिखाने की कोशिश की पर अम्मा जी के साथ बात करते देख आश्वस्त हो गयी। सुमित तो उससे तुरंत हिल-मिल गए पर मुझे उसके बड़े–बड़े सींगों से थोड़ा सा डर लगा।   
मेरा डर देखकर अम्मा जी नें उसकी पीठ पर हाथ फेर कर समझाया, “सिम्मो, देखो भाभी आई हैं,  इनके हाथ से अच्छे से खा लियो, परेशान न करियो” सिम्मो ने उनकी बात सुनकर ‘हाँ’ में ऐसे सिर  हिलाया, जैसे सब सुन लिया हो। 
शायद इसीलिए दोपहर को अजबनियत को छोड़ कर उसने घी गुड लगी छोटी सी रोटी मेरे हाथ से गपच कर खा लीl  
शाम को बाहर खटिया डाल कर बैठने पर अम्मा जी मुझसे कहने लगीं, “देखो हमरी सिम्मो की छवि कितनी न्यारी है। आस– पड़ोस के लोग तारीफ़ करत हैं इसकी बनक की।  आँखे कितनी सुंदर गढ़ी हैं भगवान् ने।”
 
गाय को इस नज़र से मैंने पहले कभी देखा नहीं था पर अम्मा जी के कहने पर ध्यान दिया… वाकई बहुत सुंदर आँखे थी… बोलती हुई सी।  धीरे-धीरे सिम्मो से मेरी दोस्ती हो गयी और मैं उसकी एक–एक गतिविधि को गौर से देखने, समझने और सराहने लगी।  
 
पिताजी सुबह 5 बजे उठ कर उसकी सानी करते l बड़े से टब में भूसा, चोकर, चने का आटा, गुड़ आदि थोड़ी–थोड़ी मात्रा में पानी मिला कर बहुत देर औंटा कर पेस्ट सा बनाते ताकि वो आसानी से खा ले। उसके रहने की जगह पर बार–बार गोबर साफ़ करते ताकि उसे मक्खियाँ ना परेशान करें।  बार-बार बाल्टी भर-भर के पानी पीने को देते। किसी मासूम बच्चे की तरह वो भी पिताजी को देखते ही उठ खड़ी होती। उसकी पुलक बता देती, “अब खाना मिलेगा, अब खाना मिलेगा।”
 
सुबह-शाम का समय सिम्मो के बाहर घूमने जाने का था l ना जाने कौन सी घड़ी उसके दिमाग में फिट थी, कि कांटे के ऊपर काँटा आते ही खड़ी हो जाती।  किसी छोटे बच्चे सी ख़ुशी उसके चेहरे पर साफ़ दिखती…घर की चारदीवारी से निकलकर घूमने जाने को मिलेगा । हाँ ! जाने से पहले एक बार सुनिश्चित कर लेना चाहती कि अम्मा जी को देख ले।  अगर किसी कारणवश वो बाहर ना निकल पातीं तो सिम्मो दरवाजे पर ही खड़ी रहती और हिलाए ना हिलती। घूम-फिर कर जब घर लौट कर आती तो उसका उत्साह देखते ही बनता। गर्दन हिला–हिला कर घंटियाँ बजा–बजा कर बताती कि, “अम्मा हम घूम आये हैं।”
अम्मा जी भी उतना ही चहक कर कहतीं, “हमरी सिम्मो मिल आई है अपनी सहेलियों से” और उसे कौरिया लेतीं, वैसे ही जैसे स्कूल से आये छोटे बच्चों को माँ कौरिया लेती है।  
एक इत्मीनान सा उनके चेहरे पर होता कि सिम्मो उनकी तरह खूँटे से बँधी गाय नहीं है, उसकी अपनी दुनिया है, अपनी सहेलियाँ हैं, जहाँ वो निश्चिंत हो घूमती–फिरती बतियाती है।  
एक दिन थोड़ा देर से घर आई। आकर चुपचाप अपनी जगह बैठ गयी। अम्मा जी को उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र लगा। पास गयीं तो धीरे से उठकर खड़ी हो गयी और अपना एक पैर आगे बढ़ा दिया।  
“उफ़, हे मैया! हे मैया!” कहते हुए अम्मा जी पीछे हटीं।  दरअसल उसके खुर में एक कील आधी गड़ी हुई थी। ताजे घाव से खून रिस रहा था।  अम्मा जी की आवाज सुनकर पिताजी बाहर आये। उन्होंने बड़ी सावधानी से उस कील को निकाला और मरहम-पट्टी की।  
पूरी मरहम-पट्टी के दौरान अम्मा जी जमाने भर को कोसती रहीं, “नास हो ज़माने का, कैसे लोग-बाग़ हैं, रास्ते में इधर–उधर कील छोड़ देत हैं, काँच छोड़ देत हैं। कोई जनावर निकले तो बेचारे के गड़ ही जाए। सबका जल्दी–जल्दी में अपना घर नोटों की गड्डी से भरे का पड़ी है। बेजुबान प्राणियों की चिंता किसी मानुष को नाही है।”
अलबत्ता 33 करोंण देवता जिसकी देह में बसते हों, निजी तौर पर लोग उससे अपने जीवन की समस्याओं के सुलभ निदान से भला क्यों कतराते l
 लिहाजा सिम्मो की वजह से आने वाले लोगों की चहल-पहल बढ़ गई।
किसी को पंडित ने बताया था कि सुबह गाय को रोटी खिलाओ तो बिटिया का ब्याह जल्दी हो जाएगा।  किसी की बीमारी मंगलवार को उसे गुड़ खिलाने से दूर होनी थी । कोई वुधवार को हरा चारा ले कर आता ‘लडके को नौकरी जल्दी मिल जायेगी’ की आस में, तो किसी को सुबह का पहला गोमूत्र चाहिए होता। कितने लोग, कितनी समस्याएँ और उन्हें दूर करने का उपाय सिम्मो के पास। लोग अक्सर कहा करते, “त्रिवेदी जी, बहुत अच्छा किया आपने गाय पाल ली।  हम सब को भी पुन्य करने का मौका मिल जाता है।”
 यूँ ही हमेशा सब को पुन्य करने का अवसर खुश हो कर देने वाली अम्मा जी गोवर्धन पूजा पर ऐंठ जातीं और गोबर लेने के लिए खड़े लोगों को इंकार कर देतीं।  
“आज ना दिए, ई तो हमार लक्ष्मी है, कोई ना दिए। एक दिन पहिले आया करो।”
मान्यता है कि गोवर्धन पूजा के दिन गाय के गोबर में लक्ष्मी जी वास करती है। इसलिए जिसने एक दिन पहले गोबर की व्यवस्था नहीं की होती, उसे उस दिन कहीं से गोबर मिलना मुश्किल हो जाता। बिट्टू जीजी की बीमारी के कारण ध्यान से उतर जाने पर उन्होंने कई बार ‘गोबर संकट’ झेला था। पूजा तो करनी ही थी, तो जैसे-तैसे सड़क से ढूँढ-ढूँढ कर गोबर की व्यवस्था करनी पड़ी थी। पिताजी की डाँट खाई सो अलग। लिहाजा  गोवर्धन के दिन ‘गोबर धन’ नहीं देना है ये बात उनके सिर चढ़कर बैठ गई थी। भय आशंकाओं को जन्म देता ही है।
हम सब के समझाने पर अम्मा का तर्क होता, “पेट के लिए तुम सब घर से इतनी दूर पड़े हो, ऐसे कैसे शगुन-अपशगुन पर ध्यान ना दें।”  
आखिरकार वे समझ जातीं, अलबत्ता बदले में हम सबको ढेरों आशीष देने का टैक्स जरूर वसूलती। लोग बिट्टू जीजी और हम सब को आशीर्वाद के कवच से लैस करके खुशी-खुशी पूजा के लिए गोबर उठा कर ले जाते l 
जीवन की रात में भोर की कुछ किरणें चमकी ही थीं, तभी एक अनहोनी घट गयी। आशा की डोर, जिसे पकड़े हम आगे बढ़ रहे थे, विधाता ने अपना अगला पन्ना इस तरह पलटा की सब कुछ अंधकार में डूब गया। 
एक फोन कॉल ने ज़िंदगी को हिला दिया। बिट्टू जीजी नहीं रहीं। जिन्हें स्वस्थ करने लिए इतने प्रयास हो रहे थे, उन्हें मृत्यु सोते समय जकड़ कर ले गई। हम दौड़ते-भागते कानपुर पहुँचे। 
उनके कमरे में रखी दवाओं की खाई-अधखाई शीशियाँ वैसी ही सलामत रखीं थीं । नई दवाओं नए प्रयोगों का असर जब तक पता चलता मरीज जा चुका था ।  
होनी को कौन टाल सका है।  
जीवन में एक शून्यता सी भर गयीl
दिन-हफ्ते महीने बीतने लगे, पर दुःख से बेसुध पड़ी अम्मा जी को बाहर निकाल पाने में हम लोग असमर्थ थे। समझाते-समझाते हमारी हिम्मत भी टूटने लगी थी। कुछ समय के लिए तो लगा की दर्द का यह झंझावात अकेला नहीं आया है, ये अम्मा जी को भी साथ ही लेकर जाएगा l
जाने वाला अकेला होता है, पर उसके पीछे कितने लोग थोड़ा-थोड़ा मर जाते हैं।  
पर केवल हम ही दुखी नहीं थे l एक और शख्स था जिसकी मूक वेदना हमारी वेदना में शामिल थी l वो सिम्मो थी l तीन दिन तक को उसने भी अन्न-जल को मुँह नहीं लगाया, आँखों से आँसू की अविरल धारा बहाता उसका मौन रुदन हमारे सामूहिक रुदन का साथी था l उसके बाद भी महीनों तक एक तिहाई ही खाती रही l भरे-पूरे बदन वाली सिम्मो कृशकाय होती जा रही थी l
 ये सूचनाएँ खाट पकड़े अम्मा जी को मिलती तो उनका दर्द और बढ़ जाता l हम लोगों से उसका ध्यान रखने की गुहार लगाते हुए वो फिर निराशा की चादर ओढ़ लेतीं।
मगर अम्मा जी दर्द की अंधेरी सुरंग से बाहर निकलीं तो उसकी वजह सिम्मो का इस तरह अन्न –जल त्याग देना ही थी।  सिम्मो का अनशन उनके दर्द पर भारी पड़ा l वे स्वयं उठ कर सिम्मो के पास गईं और दोनों हाथों से उसकी गर्दन कौरिया कर सीने से लगा लिया। अम्मा जी के साथ–साथ सिम्मो के आँसू भी अनवरत बह रहे थे। शब्द रहित, भावनाएँ-भावनाओं को कहती-सुनती रहीं।  
 दुख की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती पर अम्मा जी का मन सिम्मो में, फिर उसके कारण संसार में लौटने लगा।
प्रेम की ये दूसरी पारी मानसून का मेघ नहीं, जिसका इंतजार धरती अपनी प्यास बुझाने के लिए करती है बल्कि पुष्प की वो सुगंध थी, जो सृष्टि को सुवासित करने के लिए ही उमगती थी। जिस रिश्ते में स्वार्थ का बारीक अंश था, अब वो पूरी तरह से निस्वार्थ हो चला था।   
 समय की करवट के साथ सिम्मो ने एक बछिया को जन्म दिया। अम्मा जी ने उसका नाम दीपाली रखा। उदास घर में नन्हे शिशु के आगमन से एक उल्लास की लहर दौड़ गयी।
दीपाली के जी भर दूध  पी लेने के बाद बाकी बचा दूध, मुहल्ले के पीछे बसे पुरवा में गरीब बच्चों में बाँट दिया जाता। घर में एक कटोरी दूध भी इस्तेमाल ना होता। अम्मा जी का सख्त आदेश था कि, “सिम्मो को बिट्टू के लिए, अपने स्वार्थ के लिए लाए थे, जब वह ही नहीं रही तो अब हम अपनी सिम्मो को निस्वार्थ बिटिया समझ के ही पालेंगे,  दूध के लोभ या लालच से नहीं”
अब अम्मा जी की बिट्टू भी सिम्मो में समाहित हो गई थी l
सर्दी के दिन थे। ठंड ना लगे इस लिए सिम्मो के लिए तो खुली छत पर प्लास्टिक की तिरपाल बाँध दी जाती थी। पर दीपाली तो छोटी थी।  नन्हीं जान.. शायद तिरपाल से उसकी सर्दी ना बचे, इसलिए रात को पिताजी के कमरे में ही बाँधी जाती।  सिम्मो को पिताजी पर भरोसा तो था, पर माँ की ममता रात में बीच –बीच में बाँ-बाँ  करके अपने बच्चे को पुकार कर सुनिश्चित कर लेना चाहती कि वह ठीक तो है।  जवाब में दीपाली भी बाँ का नाद करती, जैसे बता रही हो कि, “हाँ माँ मैं ठीक हूँ।” 
पूरी रात बाँ-बाँ की इस जवाबी अन्ताक्षरी में सब सोते–जागते, जागते-सोते रहते।
दीपाली के बाद से सिम्मो कुछ ज्यादा ही सतर्क हो गयी थी। उसके आस–पास घर के सदस्यों के अतरिक्त कोई भी आता तो सिम्मो सींग दिखाकर आगे बढ़ती।  अम्मा जी हँसतीं, “देखो तो हमरी सिम्मों भी मोह-ममता मा जकड़ गई है, कोई छूओ ना सके उसकी संतान को”
परन्तु दीपाली का साथ बहुत कम था। एक दिन अचानक हमें छोड़कर चली ही गयी। उस दिन सिम्मो का बुरा हाल था। गर्दन हिला–हिला कर जैसे रस्सी तोड़ देना चाहती हो, जमीन पर अपनी टाँगे चला–चला कर जैसे भाग कर अपनी बच्ची को अपने सीने से चिपटा लेना चाहती हो।
 अम्मा जी से उसकी ये हालत देखी नहीं जा रही थी। वे सिम्मो के पास गयीं और उसकी गर्दन पर सहलाते हुए बोली, “शांत हो जाओ सिम्मो, शांत हो जाओ।  हमरी नहीं थी, भगवान् जी की थी।  उन्होंने ही दी थी, अब अपनी चीज वापस ले ली” धीर धरो बिटिया” और रोती–बिलखती सिम्मो धीरे-धीरे बिलकुल शांत हो गयी, जैसे उसने सब सुन लिया हो, सब समझ लिया हो।  
अब घर में दो घायल माएँ थीं। एक दूसरे का दर्द समझती, एक दूसरे को सहलातीं, एक दूसरे के ग़मों को बाँटती।  
पहले शाम कुछ घंटे के लिए बाहर जाने वाली सिम्मो का धीरे–धीरे ज्यादा वक्त बाहर बीतने लगा।  शायद अपने दुख से पीछा छुड़ाने का ये उसका तरीका हो l
सृजन अपना विस्तार स्वयं ही खोज लेता है।
सिम्मो का फिर से गाभिन होना पिताजी का काम बढ़ा रहा था। हाथों-पैरों की शक्ति जवाब दे रही थी। वे चाहते थे कि उनके हाथों दम रहते सिम्मो की ज़िम्मेदारी किसी को सौंप दी जाए, कहीं ऐसा ना हो कि सेवा-टहल में में कुछ कमी रह जाए।  वे बार–बार कहते कि, “अब हमारे किये नहीं हो रहा है। इसको बड़ी जिज्जी को दे देते हैं” 
अम्मा जी के लिए ये बात कानों में पिघला सीसा उड़ेलने के बराबर थी, वे तुरंत ही कहती “नहीं–नहीं, ये हमरी बिट्टू की निशानी है। ये कहीं नाहीं जइये”
पिताजी कहीं सिम्मो को गाँव ना भेज दें इस भय से अम्मा जी गोबर सानी का ज्यादातर काम अपने ऊपर ले लिया था। उनका मन जीवन में दोबारा अपनी बिटिया का बिछोह सहने को तैयार ना था l
सिम्मो को कहीं और भेजने/ ना भेजने की बात पर ही अक्सर दोनों में बहस हो जाती। कई बार रात–बिरात हम लोगों के पास फोन पहुँचता, फोन अम्मा जी ही करतीं, सुमित से बात कर वे पक्का कर लेना चाहतीं कि सिम्मो को कहीं जाना ना पड़े। वे बड़बड़ाती जातीं, “बिट्टू की निशानी है। ऐसे कैसे कोई को दे दें?  कोई इंजेक्शन लगवा दो, अब गाभिन ना हो, पर उसकी जिनगी तो हमारे पास ही पार हुइये।”
  सुमित,  अम्मा जी का पक्ष पिताजी को समझाते, “पिताजी, आप ही जिद छोड़ दो।  अम्मा जी बीमार हो जायेंगी।  बिट्टू के बाद से वैसे ही ठीक कहाँ रहती हैं… पहले ही ब्लड प्रेशर की मरीज हैं, और बिगड़ गया तो?”
भोली सिम्मो इन बातों से बेखबर बैठे-बैठे जुगाली किया करती l
उन दिनों पिताजी की तबीयत कुछ ठीक नहीं चल रही थी। हम लोग कानपुर में ही थे। सिम्मो में एक बड़ा परिवर्तन दिख रहा था वो आजकल शांत ही रहती। बाहर भी नहीं जाती थी। ज्यादातर बैठी रहती। बां–बां भी कम ही करती।  भूसा–चारा को मुँह भी ना लगाती।  शुरू में हमें लगा कि पिताजी की बीमारी की वजह से अनमनी सी है, पर एक दिन तो अम्मा जी के दुलार-प्यार पर भी कुछ ख़ास प्रतिक्रिया नहीं दी।  
चिंतातुर अम्मा जी ने पिताजी को आवाज़ लगाई, “देखो, का हो गया है सिम्मो को।  कुछ अजीब सी  दिखत है” 
 पिताजी भी छड़ी पकड़ कर तेज़ी से आये।  हम लोग भी वहाँ पहुँच गए।  पिताजी को देखकर सिम्मो थोड़ी तकलीफ़ के साथ खड़ी हो गयी। उसका पेट फूला हुआ लग रहा था।  
शाम तक घरेलू उपचार करते हुए हम सब सिम्मों की व्यथा से व्यथित रहे।  
सिम्मो इतनी बीमार तो कभी नहीं पड़ी थी।
शाम को डॉक्टर ने सिम्मों का चेकअप करके कहा, “ये बाहर कूड़ा भी खाती है क्या?” 
“अब बाहर तो जाती है, क्या पता क्या खाती है।” पिताजी ने उत्तर दिया ।
“लगता है इसने कूड़े के साथ ढेर सारी पॉलीथीन खायीं है। अक्सर जानवर पॉलीथीन भी निगल जाते हैं, जो कड़क गोला बनाकर पेट के पहले चेंबर में फँस जाती हैं। चेक करने के लिए अस्पताल ले जाना पड़ेगा। अगर ऐसा हुआ, तो आनन-फानन में ऑपरेशन करना पड़ेगा, वर्ना जान बचाना मुश्किल हो जाएगा”
“का मतलब?” अम्मा जी ने बेचैनी से पूछा।
सुमित अम्मा जी को समझाने लगे।  
तुरंत पिताजी सिम्मो को को लेकर अस्पताल चले गए।  
अस्पताल से ही खबर आई कि सिम्मो के पेट से 26 किलो पॉलीथीन निकली हैं। ये सारी उसने सड़क पर पड़े प्लास्टिक बैग्स के रूप में ही निगली थी।  
अम्मा जी क्रोध और अश्रु मिश्रित आवाज में बड़बड़ाये जा रहीं थीं, “सब कूड़ा–करकट पन्नी में भर–भर कर सड़क पर फेंककर जनावर को मारने में लगा है मानुष। पाप करे है पाप, तभी तो इतनी बीमारियाँ बढ़ गयीं हैं।  कमाओ और डॉक्टर को चढ़ाओ, दया-धर्म की कोई जरूरत ही नाहीं। एक दिन धरती को ही खा जहिये और खुद को भी। काहे की पढ़ी-लिखी है ई पीढ़ी, निरी गँवार है, गँवार! इससे तो हम कम पढ़ भले…चार किताबें नहीं पढ़ी पर अपनी धरती मैया को, गाय, बकरी, चिरैया को, पानी को बचावे का हुनर तो जानत रहे… ई लोग तो लील जायेंगे सब कुछ…”
मेरा भी जी रो रहा था।  मैंने अम्मा जी को चुप कराने की कोई कोशिश नहीं की।
 मैं आँखे बंद कर खंबे से सिर टिकाकार खड़ी हो गयी और सोचने लगी कि सिम्मो की जान तो बच गयी पर भोजन के लालच में सड़क पर घूमती आवारा गाएँ व् अन्य जानवर जो पॉलीथीन, निगल लेते हैं, बिना तीमारदार, बिना डॉक्टर, बिना ऑपरेशन के उनकी जान कैसे बचती होगी? वे निरपराध कितनी तकलीफ़ से, कितने कष्ट से मरते होंगें।  मन में एक हूक सी उठी।  कितने स्वार्थी हैं हम।  विकास की दौड़ में हमने विनाश का पूरा इंतज़ाम कर लिया है।  अब गौरैया नहीं दिखती,  कल को शायद…  मैं अपने विचारों में थी कि सुमित व् पिताजी  घर आ गए और मैं चाय बनाने अंदर चली गयी ।
 सिम्मो घर आ गयी।  कुछ दिन बाद स्वस्थ भी हो गयी।  
सिम्मो की चिंता के साथ अपने माता-पिता का गिरता स्वास्थ्य भी सुमित के लिए परेशानी का सबब बना हुआ था l उन्हे पता था कि वृद्धवस्था में अम्मा और पिताजी दोनों इतना परिश्रम नहीं कर पायेंगे। वह जानते थे कि दो वृद्ध लोगों के घर में चोरी-चकारी की घटनाओं से भयाक्रांत पिताजी सिम्मो के काम के लिए किसी लड़के को घर में रखने को तैयार नहीं होंगे और अम्मा जी उसे अपने से दूर पड़री भेजने पर। अंत में उन्होंने उसे शहर की ही किसी गौशाला में देने का मन बनाया।  सेवाधर्मी गोशालाओं के बारे में उन्होंने सुन रखा था l उन्हें लगा कि सिम्मो शहर में ही रहेगी, तो अम्मा जी जब चाहें पिताजी के साथ जा कर देख आयेंगी, चाहे तो हर दूसरे दिन।
दुख हम दोनों को भी अपनी पैरहन में लपेट रहा था,पर दूसरा कोई उपाय सूझ नहीं रहा था।
अम्मा जी को समझाना मुश्किल था पर पॉलीथीन प्रकरण के बाद वे भी डर गईं थीं। सिम्मो घर से ज़्यादा वहाँ आराम से रहेगी, ये आश्वस्ति सुमित से पाकर बेमन से ही सही, अम्मा जी ने भी हाँ कर दी, शर्त बस इतनी थी कि हर शनिवार इतवार उन्हें सिम्मो से मिलाने ले जाया जाए ।  
सुमित ने खुद हामी भरी, तब गोशालाओं की खोज शुरू हुई। अम्मा जी को ज्ञान देने वाले सुमित को ‘अपनी सिम्मो’ के लिए कोई गोशाला उचित नहीं लगी।  कहीं सफाई नहीं, तो कहीं खाने की कमी तो कहीं बीमार गायों के लिए डॉक्टर की व्यवस्था नहीं, कहीं समुचित प्यार नहीं।  ज्यादातर गोशालाएँ भयंकर बीमार अव्यव्स्था से जूझ रहीं थी।  कहीं फंड्स की कमी थी, कहीं सेवा भावना की और कहीं उनका चारा कोई और खा रहा था।
 एक गोशाला में सुमित के सामने ही एक वृद्ध महिला अपनी गाय को देखने आई थी।  अम्मा जी से मिलती शक्ल को देखकर सुमित भी वहीँ ठहर गए।  उनके बेटे ने जब वहाँ के कर्मचारी से गाय के बारे में पूछा तो उसने कहा कि आपकी गाय तो जिस दिन उसे लाये थे उसके चार दिन बाद ही मर गयी थी।  
हथौड़े की तरह ये शब्द उसके साथ-साथ सुमित के सर पर भी लगे l
बेटा जानता था कि उनकी माँ को ये सुन कर बहुत दुःख होगा तो भर आई आँखों को भीतर ही भीतर जज़्ब करते हुए काफ़ी देर तक मिलती–जुलती गाय ढूँढता रहा। असफल होने पर एक गाय को दूर से दिखा कर बोला, “अम्मा वो है अपनी राधा, बीमार है अभी पास जाने से मना किया है।”
माँ ऐनक साफ़ करके देखती रहीं, “नहीं ये राधा नाहीं। गले के पास काला निशान तो दिखाय नहीं रहा है।”
बेटा झुनझुलाया, “मोतियाबिंद है अम्मा तुम्हारी आँखों में, हम का झूठ बोल रहे हैं का?”
माँ इंकार करती रही, “ई राधा नाहीं । “अरे! पास से तो देखन दो”। 
 “वही है अम्मा, वहीं है” कहते हुए बेटा जबरदस्ती वापस ले गया। सुमित का मन भर आया । उन्हें लगा कि वो उस बेटे की जगह और उसकी माँ की जगह अम्मा जी हैं l और सिम्मो…
भविष्य की कल्पना से वह बेहद डर गए।
शाम को घर आकर चुपचाप माथे पर हाथ रख कर कुर्सी पर बैठ गए। पूछने पर, आँखों से आँसू की धाराएँ फूट पड़ीं, “हमारी सिम्मो हम से दूर, इस घर से दूर, इन अव्यवस्थाओं के बीच कैसे रहेगी? वो तो बेजुबान है बोल भी नहीं सकती।  हम लोगों को याद करेगी और कितना बेचैन होगी। कैसे भेज दें उसको? कहाँ भेज दें उसको?”
 मैंने सुमित को पहली बार रोते देखा था।  मेरे भी आँसू  झरने लगे।  तभी पिताजी ने सुमित के कंधे पर हाथ रख कर कहा, “तुम चिंता ना करो, सिम्मो यहीं रहेगी। औलाद माता-पिता पर बोझ थोड़े ही होती हैl जब तक इन बूढ़ी हड्डियों में जान बाकी है, हमारी सिम्मो कहीं नहीं जायेगी” कहते–कहते उनका गला रुंध गया।  
 उन्होंने अम्मा जी की ओर देखा, उनकी आँखों में कृतज्ञता का भाव था ।  
अब सुमित अक्सर छुट्टी के दिन अम्मा–पिताजी के पास कानपुर जाने लगे।  पिताजी का थोड़ा सा भार कम करने के लिए ग्वालटोली से सिम्मो के लिए ख़ास भूसा चूनी और चने का आटा ले आते जिसे सिम्मो बड़े चाव से खाती । आगरा–कानपुर ट्रैक पर थोड़ी थोड़ी खट्टी-मीठी जिंदगी चलने लगी। 
एक बार आगरे में हम दीपावली की खरीदारी करने में व्यस्त थे कि अम्मा जी का फोन आया, “सुमित, सिम्मो तीन दिन से घर नाहीं आई है।  बहुत ढूँढा कहीं मिल ही नाहीं रही है, जी बहुतै घबरा रहा है,…बताओ का करें?”
हम तुरंत कानपुर के लिए निकल पड़े।
अम्मा जी आँगन में उस जगह पर बैठी हुई थीं, जहाँ सिम्मो बाँधी जाती थी। वे कभी खूंटे को छू रहीं थीं, कभी बाल्टी को, कभी उसके टब को।  सिम्मो की जगह खाली देखकर हमारा भी जी भर आया पर हमें अम्मा जी को संभालना था। मैंने अम्मा जी के कंधे पर हाथ रखा तो वे मेरा हाथ पकड़ कर फफक कर रो पड़ीं, “निधि देखो, हमरी सिम्मों की जगह खाली है।  जाने कहाँ चली गयी?  सब ने बहुत ढूँढा… बहुत ढूँढा। मिल ही नाहीं रही है।  वो देखो, रोटी भी जस की तस राखी हैं। ना जाने कहाँ गयी हुईये, कैसी हुईये, कुछ खाई भी हुईये की नाहीं?”
मैंने उन्हें सहारा देकर वहाँ से उठा कर अंदर कमरे में बिठाया।  जितनी देर में मैं उनके लिये पानी लाई सुमित उन्हें सँभालते रहे।  
 
अम्मा जी ने बताया, “करवाचौथ की शाम रहे, हम यहीं तखत पर बैठी पूजा के लिए थाली सजा रही रहै कि सिम्मो बाहर से घूम के आई, सीधे हमरे पास आ के गोदी में मुँह रख दिया।  हमने सर पे हाथ फेर कर उठाया तो का देखे, कि आँखन में आँसू…  हम उससे  बोले “काहे रोय रही हो सिम्मो?” थोड़ा मन डिराय भी गया कि करवाचौथ के दिन काहे रोय रही है? साल भरे का व्रत है, ई तो अपशकुन करे है। हम थोड़ा घुड़की भी दीं, “जाओ सिम्मो, आज के दिन काहे रोय रही हो? हम बात ना करिहे तुमसे। का जाने थे की हमरी सिम्मो… अम्मा जी धोती का पल्ला मुँह पर लगा कर जोर–जोर से रोने लगीं।
खटपट सुन कर पड़ोस की नीता दीदी भी आ गयीं। उन्होंने अम्मा जी को चुप कराते हुए कहा, “चाची रोओ मत, गाय, कुत्ता, बिल्ली, ये सब जानवर साक्षात काल को देख लेते हैं। उसने भी देख लिया तभी तो रो रही थी। चाचा की सब अलाय-बलाय ले कर चली गयी।”
“चली गई” उनकी बात पर अम्मा जी का रुदन कुछ और तेज़ हो गया।
 अचानक ही अम्मा जी आँसू पोछ कर उठीं और बोली, “सिम्मो अहिये… जरूर अहिये।   वो हमसे बिना मिले कहीं नाहीं जहिये… भगवान् के घर भी नाहीं।” बड़बड़ाते हुए वो मंदिर में जाकर बैठ गईं।
तब तक सुमित सिम्मो को ढूँढने निकल चुके थे। भयग्रस्त होते हुए भी हमें किसी अच्छी खबर की आशा थी।
सुमित सुबह से शाम तक सिम्मो को गली–गली ढूँढते रहे। उन्होंने गोविन्द नगर से लेकर पनकी तक और गीता नगर से लेकर नवीन मार्किट तक पूरा कानपुर छान मारा, जो जहाँ बताता कि वहाँ एक गाय देखी है, वे उसी दिशा में स्कूटर घुमा देते और बदहवास नज़रें इधर–उधर उसे ढूँढने लगतीं।
डूबता सूरज भी निराशा ही लेकर आया।
सुमित घर लौट ही रहे थे, तभी किसी ने बताया एक श्यामा गाय अगली गली में घायल पड़ी है।  देख लो कहीं आपकी ना हो।  हज़ार आशंकाएँ ले कर वे उस गली की तरफ मुड़े।  दूर से घायल बेजार एक गाय दिखी।  
वह सिम्मो ही थी।
 “सिम्मो, सिम्मो” कहने पर उसने धीरे से दर्द से व्याकुल आँखें खोली और फिर मूँद ली।
  गली के लोगों ने ही बताया कि इसकी दो सांडों से भिडंत हो गयी थी। काफ़ी देर जूझी, फिर… शायद गर्दन और पैर की हड्डी टूट गयी है।”
“और आप लोगों ने कुछ नहीं किया?” सुमित ने लगभग चिल्लाते हुए पूछा।  
“क्या करते? आवारा सांड हैं।  आस–पास कई लोगों को भी घायल किया है। हमारे बच्चों के लिए भी डर है। नगर महापालिका में शिकायत दर्ज़ करायी पर कुछ हुआ तो नहीं” उन्होंने स्पष्ट किया।
 तंग गलियों और उनमें होने वाले ऐसे हादसों से सुमित नावाकिफ़ नहीं थे।  
तभी दूसरा व्यक्ति बोला, “आपकी गाय को जब सांड घायल कर गए तो हमनें खिलाने की व् पानी देने की बहुत कोशिश की, पर खाया नहीं।”  
“बचेगी नहीं” भीड़ से तीसरा स्वर गूँजा।
सुमित बेचैन हो उठे।  सिम्मो को ले जाने के लिए स्लाइडिंग ठेला मँगाया गया।  उसे बहुत तक्लीफ़ थी।  मुश्किल से लोगों की सहायता से उसे ठेले पर चढ़ाया गया। उसका दर्द सुमित की आँखों से बरस रहा था।  
सिम्मो को घर के बाहर लिटा दिया गया।
अम्मा जी पूजा छोड़ उसे देखने बाहर आयीं।
जी कलछ उठा, हिम्मत कर स्नेह से पगे हाथ सिम्मो की पीठ पर सरके l स्पर्श पा सिम्मो ने एक बार फिर आँख खोली और दर्द का पूरा दस्तावेज़ खुल गया। कराहें मन में ना समाई तो वे वापस आकर अपनी खटिया पर लेट गईं l
जानवरों के बड़े डॉक्टर को बुलाया गया, जिन्होंने स्थिति गंभीर बताते हुए भी वहीँ इलाज शुरू कर दिया।  सिम्मो के इंजेक्शन पर इंजेक्शन लगाए जाने लगे।  
सिम्मो की हालत बिगड़ती जा रही थी।  इधर खटिया पर अम्मा जी अशक्त होती जा रहीं थीं।
एक बार फिर परीक्षा की घड़ी थीl
 वे जोर–जोर से महामृत्युंजय मंत्र का जप रहीं थी और बीच–बीच में, “हमरी सिम्मो को कुछ नहीं हुइये” कहती जा रहीं थीं।
बाहर से “बहुत कष्ट में हैं”, “बहुत कष्ट में है” “मूक प्राणी, कैसे सहेगा” की आवाजें जब अम्मा जी के पास पहुँचती तो उनके मंत्र की आवाज़ और तेज़ हो जाती।
 हम लगातार सिम्मो और अम्मा जी के बीच दौड़ रहे थे।
  अचानक रोती-कलपती अम्मा जी को जाने क्या हुआ कि आँसू पोछ बाहर आ गई।  
सिम्मो ने फिर आँख खोल कर देखा और उसकी आँखों से अविरल धारा बह उठी।  अम्मा जी ने सिम्मो को सहलाते हुए कहा, “सिम्मो, बहुत साथ दीन तुम हम सब का।  बहुत ही स्नेह दीन। अब जाओ, तुम हमरे हर बंधन से मुक्त हो।”
इतना सुनना था कि सिम्मो ने अंतिम साँस ली। 
अम्मा जी वहीं धम्म से बैठ गई। असहाय, निरुपाय, विकल। सुमित सप्रयास उन्हें अंदर ले गए।
और मैं निष्प्राण सिम्मो की देह को अपलक देखती रही… हर पीड़ा से दूर, मौन, शांत, निश्चल… आँखों में आँसू की धाराएँ अभी सूखी नहीं थीं।
तो क्या वह इसी बात का इंतज़ार कर रही थी? इच्छा मृत्यु के वरदान के गौरव से दूर प्रेम में समर्पण की ये कैसी शक्ति थी जिसने यमराज को भी अनुमति लेने के लिए रोक रखा था l
कई बार मैंने इंसानों के ऐसे किस्से सुने थे, जब किसी प्रियजन को ना देख पाने के लिए प्राण अटक जाते हैं। पर इंसान ही अकेला नहीं है जिसके पास इतनी गहन संवेदनाएँ हों? कितनी बार देखा था कि सिम्मो ने अम्मा जी के साथ संवाद स्थापित किया था। कितनी बार उसने उन शब्दों को समझा था या उन भावों को वैसा का वैसा ग्रहण किया था और आज भी महायात्रा से पहले “सिम्मो की जिनगी तो यहीं पार हुइये” कहने वाली अम्मा जी से आज्ञा भी ली।
संवेदनाओं की लिपि हर भाषा में एक है, क्या इंसान क्या पशु!
सिम्मो का विधिवत अंतिम संस्कार हुआ।
 कुछ दिन बाद उसकी खूँटी, आँगन की ईंटे, हटा दी गयीं।  आँगन का वह कोना खाली हो गया और सिम्मो हमारी स्मृतियों में निवास करने लगी।  
सिम्मो की बाल्टी में हरे छिलके व् टब में पानी भर कर मुख्य दरवाजे के बाहर रख दिया जाने लगा । जिसे सड़क पर आती जाती गाएँ खाने लगीं।  
तिवारी चाचा हरा चारा, चार गली छोड़ के बने रहीम काका के खटाल पर जा कर खिलाने लगे। लोग ध्यान से गोवर्धन पूजा से एक दिन पहले गोबर इकट्ठा करने लगे। आस-पास के गौ पूजकों ने पंडितों  द्वारा बताये उपाय के लिए कहीं ना कहीं, कोई न कोई गाय ढूँढ ही लीं।   
पर सड़क पर पड़े कूड़े के ढेर, पॉलिथीन से बीमार, व् काँच, कील से लहू-लुहान होते पशु, अव्यवस्थाओं से जूझती गौशालाएँ, आवारा सांडों से होने वाली दुर्घटनाएँ वैसे ही होती रहीं।  
और अम्मा जी वैसे कहती रहीं, “बौरा गया है मानुस।  एक दिन धरती को भी लील जहिये और खुद को भी।”
तभी खट की आवाज से मेरी तंद्रा टूटीl
अम्मा जी ने बाल्टी रखते हुए शायद सुमित के शब्द सुन लिए थे l वे बोलीं, “इ राधा है सुमित , सिम्मो नाही!
ममता ने भले ही अपने दिल को बहलाना सीख लिया हो, पर अभी भी उनका सिम्मोमय मन किसी को उसका स्थान देने को तैयार ना था l


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19 टिप्पणी

  1. बहुत सुंदर कहानी …इंसान और जानवर के प्रेम को दर्शाती हुई एक शसक्त कहानी जो भावनाओं के साथ ही हमें अपने कर्तव्यों की शिक्षा भी देती है …हार्दिक बधाई

  2. सिम्मो बेहद मार्मिक व संवेदनशील कहानी बहुत दिनों बाद पढ़ने को मिली लेखक व सं पादक दोनों को ढेर सारी शुभकामनाएं

  3. बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति कहानी के तौर पर अपने व्यक्त की है कहानी पढ़ने पढ़ने एक-एक दृश्य आंखों के सामने दर्शित हो रहा था। कहानी के माध्यम से आपने बहुत सारी घटनाओं को व्यक्त किया है मौन खामोशी इंसान और जानवर के प्रति का प्रेम समाज में फैली गंदगी के तौर पर पॉलिथीन के उपयोग को बंद करने वाली बात उसे करने वाले जानवरों की व्यथा किस-किस बातों का हम यहां उल्लेख करें कहानी बहुत अच्छी है जिसके लिए आपको बहुत-बहुतबधाई।

    • डॉ प्रियंका जी, कहानी आपको पसंद आयी, लगा लिखना सार्थक हुआ। बहुत आभार आपका

  4. एक सांस में ही पूरी कथा पढ़ ली।ताना बाना इतनी सुंदरता से बुना गया था कि मुझे अपनी मामी जिनको हम सभी अम्मा कहते थे उनके घर की श्यामा गाय आँखों के समक्ष आ कर खड़ी हो गयी।मेरे पिता जी ने भी गाय पाली यही।
    इस कथा में प्लास्टिक थैलियों के दुष्प्रभाव को प्रमुखता के साथ समाज के समक्ष रखा है।आज मानुष अपने आलस्य को पोषित करने हेतु जानवरों का शत्रु बन गया है।आपको एक सार्थक कहानी लिखने के लिये बधाई।

    • निवेदिता श्री जी कहानी ने आपको आपकी मामी और उनकी श्यामा गाय की याद दिला दी जानकार अच्छा लगा।कहानी आप तक पहुंची लिखना सार्थ हुआ। बहुत आभार आपका

  5. बहुत ही मार्मिक कहानी है वन्दना जी। कई पुरानी यादें जीवंत हो उठीं आपकी कहानी पढ़कर। लगा जैसे महादेवी वर्मा जी के संस्मरणों में अटखेलियां करते जीव जंतुओं में एक और नाम जुड़ गया – सिम्मो। लेकिन अंत तक पहुँचकर सिम्मो के कारुणिक अंत पर मन मनुष्यता की खामियों, स्वार्थ और अत्याचारों से द्रवित हो उठा। मन में सड़क पर कूड़े के ढेर में मुंह मारती गायों की कई छवियाँ कौंध गईं। मनुष्य की एक जरा सी लापवाही पर्यावरण और मूक पशुओं के लिये कितनी घातक सिद्ध होती है ये क्यों नहीं सोचते लोग, कहानी बड़ी ही मार्मिकता से ये सवाल उठाती है। आपको हार्दिक बधाई वन्दना जी।पढ़ते हुए मैं भी सिम्मोमय हो गई ये शब्द सरंचना का ही कमाल है।

    • आपकी प्रतिक्रिया बता रही है की आप सीममोमय हो गयी। दिल की बात दिल तक पहुंची। आप जैसे पाठक मिलना कहानी का सौभाग्य होता है। बहुत आभार और स्नेह

      • आपकी कहानी पढी ।कई स्मृतियाँ मन-पटल पर उभर आईं। हमारे पिता जी को घर में पशु-पालन का बहुत शौक था। बड़ी लगन से बच्चों की तरह उसकी देखभाल करते। उससे संवाद करते थे, लेकिन अंत समय का कारुणिक दृश्य हमें भी रुला जाता था।
        बहत सुंदर कहानी वंदना जी।आपने महादेवी वर्मा की गौरा की भी याद दिला दी।पर्यावरण से जोड़कर इसकी महत्ता को बढ़ा दिया है। बहुत-बहुत बधाई आपको ।

  6. सारी संवेदनाओं को झकझोरने वाली रचना,
    जिसे मनुष्य ही नहीं जानवर भी पहचानता है

  7. वंदना जी ,आपकी कहानी ‘सिम्मोमय’ ने मुझे अपने बचपन के उसे काल में ले जा खड़ा किया, जब मेरी मां मेरे पिताजी घर में गाय रखते थे। जितना स्नेह,वात्सल्यमय वर्णन आपने पालिता और पालक के मध्य किया है वह किसी स्त्री का ममतामय हृदय ही कर सकता है!
    साथ ही अपने छोटे शहरों की एक बड़ी समस्या कीओर भी स्पष्ट रूप से इंगित किया है, यहां अपने पोषित गाय का उदाहरण लिया है परंतु गो- वंश का मांस बिक्री अवैध घोषित करने का सरकारी आदेश भी गोवंश के इस तरह मृत्यु को प्राप्त होने का कारण बन रहा है। पॉलिथीन की थैलियां में बंद हरा भोजन खाने के अतिरिक्त सांडों से घायल होना भी सिम्मी की मृत्यु का कारण बना और ये छुट्टा सांड सरकार की इसी नीति के कारण सड़कों पर आवारा घूम रहे थे।
    आपकी कहानी पढ़ने के बाद इसका सहारा लेकर मैं इस मंच से यह कहना चाहती हूं कि सरकार गौशालाओं पर अधिक ध्यान दे। सड़कों पर आवारा घूमते सांड़ों की समस्या हल करने के लिए गर्भवती गायों के भ्रूण की पहचान गर्भ में ही करवा ले यदि वह ‘नर भ्रूण’ हो तो उसे या तो गर्भ में ही मार दिया जाए अथवा गाय का गर्भपात करा दिया जाए। दूसरा उपाय यह भी हो सकता है कि नर के वीर्य का परीक्षण करके केवल मादा शिशुओं को जन्म देने वाले वीर्य से ही गायों का गर्भाधान कराया जाए।
    बैलों की कृषि कार्य में तो कोई उपयोगिता अब रह नहीं गई है और मांस की बिक्री प्रतिबंधित है ऐसे में कोई बछड़ों को कोई पालना नहीं चाहता और न कसाई ही उन्हें खरीदना चाहता है।वे आवारा इधर-उधर घूमते हैं। इनके कारण सड़कों पर दुर्घटनाएं होती हैं ,लोग घायल होते हैं और आपकी कहानी की भांति दूसरी ‘गाएं ‘भी इनकी हिंसा का शिकार होती हैं।
    इतनी कोमलता और स्नेह भरी कहानी के माध्यम से इस क्रूर समस्या को उठाने के लिए वंदना जी आप बधाई की पात्र हैं।
    कोटिश: साधुवाद

    • प्रिय सरोजिनी जी, आपने अपनी प्रतिक्रिया में बहुत महत्वपूर्ण बातें गूंथ कर एक नई दृष्टि दी । कहानी आपके मन को छू सकी ये जानकर परिश्रम सार्थक हुआ । बहुत आभार

  8. बेहद मर्मस्पर्शी कहानी है वन्दना आपकी। पूरी कहानी पढ़ते हुए एक पल के लिये अपनी जन्मदात्री माँ जिन्हें हम लोग बाई कहते रहे…. याद आ गईं। फिर ससुराल में भी गाय-भैंस रहीं।इन सब दौरों से हम भी गुजरे हैं, इसीलिए यह कहानी हमारे लिये सिर्फ कहानी नहीं बल्कि जीवन की सच्चाई है। श्यामा गाय की महत्ता देखते हुए हमारे ससुर जी भी श्यामा गाय खरीद लाए थे। बछिया ही थी पर खेत से पता नहीं कौन चुरा कर ले गया। बहुत ढूँढा लेकिन नहीं मिली।
    पशुओं में गाय माता तुल्य ही लगती है।और कुत्ता पुत्र तुल्य सेवक।
    चाहे किसी भी प्राणी को पालो,उससे पारिवारिक संवेदनाएँ जुड़ जाती हैं ,उनके सुख-दुख जुड़ जाते हैं ;बिल्कुल घर के सदस्य की तरह।
    पन्नियों को लेकर सिम्मो के साथ जो हादसा हुआ वह पढ़ कर दिल दहल गया। हमने डेढ़ दिन तक सड़क पर एक गाय को इस तरह तड़पते हुए देखा। बच्चे डॉक्टर को भी बुलाकर लेकर आए उसने बहुत कोशिश की की अंदर से किसी तरह पन्नी निकाली जा सके। पर बहुत कोशिशों के बाद भी कुछ ना हो सका। ऑपरेशन की कोई व्यवस्था नहीं थी तब।
    बहुत दुखद लगता है इस तरह। एक बेहद स्वस्थ गाय पन्नी की वजह से खत्म हो गई।
    इस क्षेत्र में कुछ कठोर कदम उठाने चाहिये शासन को।
    सांडों वाली घटना ने तो मर्माहत किया।
    आवारा पशुओं के लिये भी कुछ करना जरूरी है।
    हमारे यहाँ तो ऐसी व्यवस्था है कि गाड़ी में उठाकर ले जाते हैं पशुपालन केंद्र में और बाँध के रखते हैं ऐसे पशुओं को जो मरखन्ने होते हैं।

    आपकी कहानी बहुत अपनी सी लगी दिल को अंदर तक छू गई।
    बधाई इस कहानी के लिये।

    • नीलिमा जी आपकी गहन टिप्पणी ने कलम को बहुत संतोष प्रदान किया । जब कोई इतने मन से कहानी पढ़ता है और अपने देखे सुने जगत से कहानी को जोड़ता चलता है तो लेखक का लेखन सार्थक हो जाता है । आपने मेरे लेखन को सार्थकता दी बहुत आभार और स्नेह

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