Tuesday, April 14, 2026
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प्रीतिमा वत्स की कहानी – कलादीर्घा

प्रदर्शनी का यह तीसरा दिन था। कलादीर्घा में अकेली बैठी मैं अपनी अच्छी-बुरी यादों में खोई हुई हूँ। चारों तरफ दीवार पर लगी बड़ी-बड़ी पेंटिंग्स कलात्मक लाइटों के सामने ऐसे लग रहे थे मानों इनके किरदार एक-एक कर निकलकर आते हैं और मुझसे बातें करते हैं। ये मुझे अतीत के उस हिस्से में पहुँचा देते हैं जब मैंने उस पेंटिंग के रचना की थी……..मेरे ठीक सामने वाली ये पेंटिंग जो मुझे बहुत पसंद है, मुझे याद है मैं बेहद डिप्रेश हो रही थी उस दिन जब मैंने काफी समय के बाद अपने रंग का बॉक्स उतारा था आलमारी के ऊपर से। कुछ धूसर रंग मैंने कटोरियों मे घोले और कैनवस पर यूँ हीं फैला दिया। थोड़ी देर आकार खोजती रही थी पर मन यदि शान्त न हो तो कोई भी रचना सफल नहीं होती, सो पेंटिंग में भी कुछ आकार देना नहीं हो पाया। मैंने कैनवस को धीरे-धीरे अपने बेड के नीचे सरका दिया और कलर समेट कर रख दिया । दूसरे दिन सुबह बहुत तड़के हीं मेरी नींद खुली, मुझे बेड के नीचे रखे अपने कैनवस की याद आई। मैंने फौरन उसे निकाला, कलर सूख चुके थे और बड़े प्यारे लग रहे थे। मैं अब पूरी तरह से तैयार थी पेंटिंग बनाने के लिए। जल्दी-जल्दी झाड़ू लगाकर किनारे रखा और रंग का डब्बा लेकर बैठ गई और कैनवस में संभावएँ तलाशने लगी। पिछले दिन मैंने कैनवस पर काला, भूरा और धूसर पीला रंग डाला था, आज मैनें हल्का और गहरा हरा रंग चुना था। मुझे नहीं पता कि उसके बाद मैं कबतक पेंटिंग करती रही और कैसे मैंने इन चित्रों को उकेरा। मेरी तंद्रा तब टूटी जब कामवाली ने डोरबेल बजाया।
उसने घुसते ही पूछा, “दीदी आज बाबू स्कूल नहीं जाएगा क्या तुम अबहीं तक पेंटिंग कर रही हो। बाबूजी भी अबहीं तक सो रहे हैं।” मैंने घड़ी में देखा तो आठ बजने ही वाले थे। जल्दी से अपने सब पेंटिंग ब्रुश को पानी में डाला और आशु के कमरे में गई तो देखा आशु तैयार हो चुका है स्कूल जाने के लिए। उसने मुझे देखते हीं हँसकर कहा, “आप काम करने में व्यस्त थी, काफी दिनों के बाद मैंने आपको इतने मन से पेंटिंग बनाते हुए देखा तो डिस्टर्ब करने का मन नहीं किया। आप परेशान न हों मैंने नाश्ता भी कर लिया है और टिफिन में ब्रेड जैम ले भी लिया है।” अपने इस समझदार बेटे पर मुझे इतना प्यार आया कि मैंने उसे गले से लगा लिया। उसने मुझसे कहा बहुत ही कमाल की पेंटिंग बनी है ये वाली माँ। कितनी सारी चीजें आपने एक साथ डाल दिये हैं इस पेंटिंग में। मैंने हँसकर पूछा,  तुम्हें समझ में आ गया, तो उसने हमें कुछ-कुछ वैसा हीं बताया जिसकी कल्पना मैंने पेंटिंग में की थी। मैं हैरान रह गई उसकी समझदारी देखकर। कुछ देर में वह स्कूल चला गया।
कामवाली ने तब-तक रसोईघर साफ कर दिया था। मैंने तीन कप चाय बनाया। रोहित को उठाकर चाय दिया और खुद कामवाली के साथ बालकनी में बैठकर चाय पीने लगी और इधर-उधर की बातें करने लगी।
चाय पीकर कामवाली किचन में चली गई और मैं अपनी पेंटिंग के पास। मुझे ऐसा लगा कि मेरी पेंटिंग का दूसरा लेयर करीब-करीब तैयार हो चुका है। जल्दी-जल्दी मैंने कुछ और रंग भरे, कैनवस को सूखने के लिए एक तरफ रखा और रंग का डब्बा समेटकर किचन में चली गई। उसके बाद फाइनल टच तो काफी समय के बाद हीं दे पाई थी।
आज इस गैलरी में मुझे वो पेंटिंग बहुत ही प्यारी लग रही है। मैं उस पेंटिंग के पास जाती हूँ और प्यार से उसे निहारने लगती हूँ। एक शख्स मेरे पीछे कब आकर खड़ा हो गया था, मुझे पता ही नहीं चला। मेरी तंद्रा तब टूटी जब उसने बड़े हीं सलीके से मुझसे पूछा, “क्या आप हीं रचनाकार हो इस चित्र की?” मैंने घबराकर पीछे देखा, वो सज्जन मुस्कुरा रहे थे। मैंने अपने आप को संयत करते हुए कहा, “जी मैंने ही बनाया है इन चित्रों को।” उस सज्जन को मेरी पेंटिंग शायद पसंद आ गई थी। थोड़ी ही देर में वह सज्जन कुछ कागजी कार्रवाई पूरी करके एक चैक मुझे थमा गए और उस पेंटिंग पर लाल बिन्दी लगा गए।
कितना कुछ बदल गया पिछले आधे घंटे में। चैक को देखती तो मुझे अपनी सफलता पर गर्व और खुशी महसूस हो रहा था, और पेंटिंग की तरफ देखती तो लाल बिन्दी मुझे यह एहसास दिला रही थी कि अब वह पेंटिंग मेरी नहीं थी। कोई उसे खरीद चुका है। मैं समझ नहीं पा रही थी कि मेरी पेंटिंग बिक गई इसके लिए खुशी मनाऊँ या वह मेरे पास से चली गई इसके लिए दुखी होऊँ। इस गैलरी में कुल 20 पेंटिंग लगाई है मैंने। हर एक पेंटिंग को रचते वक्त मैंने जिया है उसको। हर एक पेंटिंग के साथ गहरा लगाव महसूस करती हूँ मैं। इतने में स्कूल के कुछ बच्चे शोर मचाते हुए गैलरी में आए और अपने-अपने सवालों की झड़ी लगा दी। मैं उनके प्यारे-प्यारे सवालों के जबाव देने में व्यस्त हो गई। ये बच्चे इसी गैलरी के नीचे चलनेवाले स्कूल से आए थे जो गैलरी की मालकिन आस-पास के गरीब और बेसहारा बच्चों को शिक्षित करने के उद्देश्य से चलाती हैं। थोड़ी देर तक ये बच्चे पूरी गैलरी में घूम-घूमकर इत्मीनान से पेंटिंग देखते रहे और तरह-तरह के सवाल करते रहे। उनको अपने टीचर से यह हिदायत मिली थी कि किसी भी चित्र को हाथ नहीं लगाना है, सो वे एक दूसरे को समझा रहे थे कि छूना नहीं है किसी चित्र को। फिर मैंने सबको एक-एक टॉफी दी और वे खुश होकर चले गए।
दोपहर हो चुकी थी और मैं केंटींन में कुछ खाने के उद्देश्य से जा रही थी। तभी एक प्रेस रिपोर्टर वहाँ पर आए। मैंने उनसे भी खाने का आग्रह किया और वह तैयार हो गए। हम दोनों बातें करते हुए केंटींन में आ गए और खाना खाया। खाना खाने के बाद जब हम पुनः गैलरी में आए तो प्रेस रिपोर्टर ने कुछ सामान्य से सवाल किए और चले गए। जाते-जाते कह गए एक दो दिन में अखबार में लिखूँगा पढ़ना मत भूलना, मैं आपको लिंक भेज दूँगा। इस बार तो आपकी कलाकारी कमाल की है। मैंने उनका आभार जताया, उन्हें गेट तक छोड़कर आई और अपनी कुर्सी पर बैठ गई। 
अपनी पेंटिंग के साथ एक बार फिर मैं अकेली रह गई। मुझे यह अकेलापन बहुत हीं प्यारा लगता है। कितना शुकून मिलता है इस अकेलेपन में, कितना कुछ नया सोच पाती हूँ में अपने इस शुकून भरे पल में। इस बार मैं अपने एक सूर्ख लाल पेंटिंग के पास जाकर रुकती हूँ। उसे निहारने लगती हूँ। कल हीं तो एक सज्जन आए थे और इस पेंटिंग की तारीफ कर गए थे। कह रहे थे क्या स्ट्रोक लगाए हैं आपने इस पेंटिंग में मैडम, मजा आ गया। कितना पावरफुल कलर कॉम्बिनेशन है। लाल बैकग्राउण्ड के साथ धुँआ उगलता हुआ सफेद घोड़ा, पेड़ से गिरते हुए ये पीपल के काले-काले पत्ते और घोड़े की चमकती हुई आँख। बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देता है। पर्यावरण प्रदूषण और प्रकृति पर चल रहे बेहद खतरनाक दौर को पूरी तरह से समेटने की कोशिश की है शायद आपने। वह आदमी काफी जोर-जोर से बोल रहा था परन्तु उस सज्जन का विश्लेषण मेरी सोच से काफी मिल रहा था। मैंने कुछ कहा नहीं पर मैं मुस्कुराए बिना नहीं रह पाई। काफी देर तक वे इधर-उधर की बातें करते रहे, पेंटिंग का दाम पूछा और चले गए।
आज सुबह-सुबह उनका फोन आया, बड़ी जल्दबाजी में लग रहे थे, बगैर किसी औपचारिकता के बोले “मैडम मुझे आपकी वह पेंटिंग चाहिए। मेरे नाम की बिन्दी लगा देना उसपर। एक- दो दिन में आकर चैक दे जाउँगा। अच्छा अभी रखता हूँ।” कहकर फोन रख दिया। तभी मुझे ध्यान आया मैंने इसपर लाल बिन्दी तो लगाई ही नहीं, हँसकर पर्स से एक लाल बिन्दी निकाली और पेंटिंग के कोने में धीरे से लगा दिया।
वापस आकर फिर अपनी कुर्सी पर बैठ गई। अकेली होने की वजह से फिर ख्यालों में खो जाती हूँ। प्रदर्शनी आयोजित करने के कई दिन पहले से कितनी भागदौड़ मची थी। कभी घर में एक हफ्ते का राशन जमा करने में लगी थी, तो कभी आमंत्रण पत्र छपवाने, उनपर पते लिखने, समय पर लोगों तक पहुँचे इस हिसाब से उन्हें पोस्ट करने, कैटलॉग बनवाने में। प्रेस को एक-एक कर जाकर खबर करना, फ्रेमर के पास चक्कर लगाना कि कहीं कोई गड़बड़ ना कर दे। सुबह से कैसे रात हो जाती पता ही नहीं चल पा रहा था। लेकिन मन को कोई शिकायत नहीं है क्योंकि इतनी आपाधापी के बाद, गैलरी का ये शान्त सा वातावरण मन को खूब सारे शुकून और ऊर्जा से भर रहा है। 
मुझे इस बात से बड़ी तसल्ली मिलती है कि मेरा अपना भी कोई वजूद है। एक माँ और पत्नी के अलावा भी मेरी एक पहचान है। जो मैंने खुद अपने बूते बनाई है। मुझे आज भी वो दिन याद है जब सामुहिक प्रदर्शनी के लिए भी कई-कई दिन चक्कर लगाना पड़ता था और अंत में कह देते कि सॉरी मैडम इतने ज्यादा पेंटिंग्स आ गए हैं कि अब और नहीं ले सकते। आपका काम अच्छा तो है अगली बार देखते हैं। और मैं चुपचाप घर आ जाती। मुझे लगने लगा था कि शायद मेरी कला में दम नहीं है चित्रकारी छोड़ देनी चाहिए। महीनों तक कलर को हाथ नहीं लगाती, लेकिन मन के अंदर एक तुफान सा चलता रहता कि तूम दूसरे के कहने पर हार नहीं मान सकती। यह तुफान धीरे-धीरे बवंडर बन जाता और मैं फिर अपने कैनवस और कलर के साथ शुकून से अपनी नयी रचना में लग जाती। आज मुझे यह अहसास हो रहा है कि निराशा का वो दौर भी काफी महत्वपूर्ण था जिन्दगी में। यदि मेरी कला नकारी नहीं जाती तो आज न तो मैं इतनी मजबूत होती और न हीं मेरी कला इतनी निखर पाती। उस दौर का हीं असर है कि मैं अब अपनी और अपने कला की आलोचना सहज भाव से सुन पाती हूँ। दो दिन पहले की हीं तो बात है, एक बहुत बड़े गैलरी की मालकिन मेरी प्रदर्शनी को देखने आई, मैं खुद उन्हें आमंत्रित करने गई थी। काफी देर इधर-उधर की बातें करती रहीं फिर मुझसे पूछा, कला की शिक्षा आपने कहाँ से ली है? मैंने कहा, कहीं भी नियमित सीखा नहीं है मैंने। तो वह मुँह बनाते हुए बोली, हाँ दिख रहा है वह। नियमित तालीम की बात हीं कुछ और होती है। मैंने बड़े हीं सहज ढंग से कहा, जी वो तो है आप बिल्कुल ठीक बोल रही हैं। अब उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि क्या आलोचना करें मेरी। मैंने हीं बात को घुमाते हुए पूछा कि चाय लेंगी आप। फिर हम चंद मिनट पहले की बात को भूलकर साथ में चाय पी रहे थे और सहज भाव से इधर-उधर की बाते कर रहे थे। जाते समय कह गईं, सो नाइस ऑफ यू मैडम। नेक्स्ट शो मेरी गैलरी में ही करना। 
इस बात को सोचकर कि मैंने एक बड़े मनमुटाव अपने धैर्य से दोस्ती में बदल दिया गजब की शांति मिलती है मुझे। शायद इसकी एक वजह कलादीर्घा का ये शान्त और शुकुन भरा माहौल भी है।
…………………..
-प्रीतिमा वत्स
4/6, एकेडमी ऑफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर, सीरी फोर्ट इंस्टीट्यूशनल एरिया, दिल्ली- 110049. मो0- 9891122805


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1 टिप्पणी

  1. प्रीतिमा जी!
    आपकी कहानी कलादीर्घा पढ़ी। अच्छी लगी।
    हर इंसान में कोई ना कोई कला तो होनी चाहिये और निरंतर प्रयासों से ही कोई भी कला निखरती है।
    कला सिर्फ टाइम पास नहीं होती, वह समय का सदुपयोग है और फिर उसमें रोजगार भी तलाशे जा सकते हैं।
    वैसे आपका नाम बहुत अलग और अच्छा लगा।
    यह बात कठोर सत्य की तरह है कि कुछ लोग आगे बढ़ने के लिए रास्ते खोलने में मदद करते हैं तो कुछ लोग नाम के पीछे भागते हैं।
    यह कहानी सिखाती है-रुकने का नाम हार है, चलना है जिंदगी।
    बहुत-बहुत बधाई आपको।

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