जीतेंद्र शिवहरे की कहानी - डेली अप डाउन 3
  • जीतेंद्र शिवहरे

कामाक्षी बस की प्रतिक्षा में खड़ी थी। उसे विश्वास था कि आज बस वाले लोकल सवारियां नहीं बैठायेंगे। उसने दौड़कर एक बस पकड़ी ली।
“अरे! मैडम आपको बोला था न कि अमावस-पुनम के दिन बस में न चढ़ा करो।” बस कंडक्टर क्रोधित होकर बोल रहा था। कामाक्षी अनमने-मन से बनावटी हंसी हंसते हुये रिक्त सीट पर बैठ गयी।
उसने बस के दरवाजे से बाहर झांका। बाहर उसके अन्य सहकर्मी शिक्षक भी बस में चढ़ने की कोशिश कर रहे थे। किन्तु द्वारपाल की तरह बस के दोनों गेट पर बस कंडक्टर डटे थे। वे दोनों बस में लम्बी दुरी की संवारीयां ही बैठा रहे थे। डेली अप-डाउनर्स तो उन्हें आज सर्वाधिक अप्रिय लग रहे थे।
“कामाक्षी मैडम! अगर लम्बी दुरी की संवारी बस में चढ़े तो आप सीट से खड़ी हो जाना।” बस कंडक्टर कामाक्षी को चैतावनी देकर अन्य सवारियों को बस में बैठाने लगा। कामाक्षी ने सहमती दे दी।
बस धीरे-धीरे चल रही थी। सवारियां थी की आज बसों पर टूट पड़ी थी। कामाक्षी विचार मग्न थी। ‘आज की सीएल ले लेती तो कितना अच्छा होता! सुबह जल्दी उठकर घर का सारा काम किया, खाना बनाया, बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजा। सभी का टीफीन तैयार किया फिर स्कूल के लिए भागी। उफ्फ! ये बसों की धक्का-मुक्की। कितना कठीन कार्य है ये रोज-रोज अप-डाउन।’ विचारों में वह मग्न थी।
‘इनसे इतना भी नहीं होता कि सुबह जरा जल्दी उठकर बच्चों को तैयार कर दे। खाना टीफीन में पैक कर दे। मगर नहीं! अपने ऑफिस में बाॅस है न! केवल हुक्म देना जानते है।’ उसके चेहरे की भाव भंगिमा कभी क्रोध लिये होती तो कभी निराशा के लिए।
‘हाय राम! आज कितना कुछ कह दिया मैंने इन्हें। चुपचाप खड़े सब सुनते रहे। क्या जाने टिफिन अपने साथ ले गये की नहीं? नहीं ले गये तो दिन भर भूखे रहेंगे? शाम को साॅरी बोली दूंगी….’
बस में सवारियां बढ़ती जा रही थी। अनंतः वह समय आ ही गया जब कामाक्षी को लम्बी दुरी की संवारी के लिए अपनी सीट का बलिदान देना पड़ा। दम्पति बस में चढ़े। वह महिला कामाक्षी द्वारा छोड़ी गई सीट पर बैठ गई। कुछ दुरी पर खड़ा एक अन्य अधेड़ उम्र का आदमी लगातार कामाक्षी को घुरे जा रहा था। वह कामाक्षी को देख-देख अपने पीले-सफेद दाँतों से शैतानी मुस्कान भी बिखेर रहा था। कामाक्षी का मन किया कि जाकर उस आदमी के गालों पर एक थप्पड़ रसीद कर आये। फिर सोचा मुंह पर स्कार्फ बांध ले। किन्तु इससे लिपस्टिक मिटने का खतरा था। उसने कल ही न्यू ब्रांड लिपस्टिक खरीदी थी। आज उसी से होठो को सुर्ख लाल किया था। हो सकता है वह आदमी उसी पर मोहित हो? एक बुढ़े बुजुर्ग भी सीट का सहारा लेकर नीचे फर्श पर बैठ गए थे। उनकी जलती बीड़ी कडंक्टर ने बस से नीचे फिकवा दी थी। किन्तु मुख से निकलती श्वास से अभी भी बीड़ी की दुर्गंध कामाक्षी को परेशान कर रही थी। उसने अपनी नाक ढक ली। बारिश के मौसम में सड़क पर गड्ढे हो गए थे। कामाक्षी ने एक हाथ से बस की छत पर लगे पाइप नुमा हेन्डल को कसकर पकड़ लिया। आज हेण्ड बैग का वजन भी उससे उठाये नहीं जा रहा था। छाता, टीफीन, पानी की बाॅटल, शाला के कुछ आवश्यक डाक प्रपत्र, मेकअप कीट और भी कितना कुछ था उसमें। कामाक्षी को भुख भी लग आई थी। सुबह आधा कप चाय ही तो पी थी। वैसे उसके हेण्ड बैग में बिस्कुट और कुछ चिप्स के वेपर भी रखे थे। मगर इस भीड़-भाड़ में बैग खोलकर वह खाये भी तो कैसे? कामाक्षी ने ध्यान दिया कि उसके पिछे जो पुरूष खड़ा है। उसके हाथ बारम्बार बस की छत पर लगे हेन्डल को पकड़े हुये उसके हाथों को जबरिया छू रहे थे। उस पुरूष का साहस बढ़ता ही जा रहा था और इधर कामाक्षी का ध्येर्य टूटता जा रहा था। अनचाहे स्पर्श से जब कामाक्षी परेशान हो गयी तब उसे अपने बैग का सबसे उपरी जेब खोलना पड़ा। इस जैसी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए ही वह अपने बैग में सेफ्टी पिन रखती थी। उसने सेफ्टी पिन निकालकर अपने उसी हाथ में रख ली जिससे उसने बस का हेन्डल पकड़ रखा था। हेण्ड बेग को व्यवस्थित कांधे पर टांगकर वह पीछे खड़े पुरूष की अगली अवांछनीय क्रिया की प्रतिक्षा करने लगी। बस गड्ढों से गुजर रही थी। सवारियां हिचकोले खाने लगी। अवसर पाकर उस पुरूष ने कामाक्षी का हाथों जोरों से दबा दिया। कामाक्षी ने प्रतिक्रिया देते हुये सेफ्टी पिन उस पुरूष के हाथ में चूभो दी। वह कराह उठा। पिन चुभने के स्थान से रक्त बह निकला। वह आदमी छटपटाते हुये बस के एक कोने में चला गया। इस संपूर्ण घटनाक्रम को जिसने भी आरंभ से देख था, वह कामाक्षी की प्रशंसा आंख उठाकर और सिर हिला कर अवशय कर रहा था। कामाक्षी की अन्य महिला सहकर्मी जो उसी के स्कूल के आसपास पदस्थ थी, आगे बस केबिन में घूसकर बैठी थीं। कामाक्षी से उनकी आंखों में ही बातें सकी। वह सोचने लगी- ‘देखो! कैसे ऐठकर बैठी हैं। ये भी नहीं की झुठे मुंह ही पुछ लेती कि मेरी सीट पर बैठ जाओ। मैं क्या सचमुच इनकी सीट पर जाती? हूंssह! मैंने कितनी ही बार इन्हें अपनी सीट पर बैठाया है। मगर देखो! आज मुझे पहचान भी नहीं रही है।’
अगले स्टाॅप से श्रृणिक भाटियां बस में चढ़ गये। भाटिया जी को देखकर कामाक्षी अप्रसन्न हो गई। एक तो वह पास ही उसकी ओर मुंह किये खड़ा अधेड़ पुरूष कम था, उसे तांकने के लिए जो अब भाटिया जी आ गये। भाटिया जी उसी बैंक के कर्मचारी थे जिसमें कामाक्षी का बचत खाता था। कामाक्षी ने भाटिया जी के कारण ही बैंक जाना लगभग कम ही कर दिया था। भाटिया जी कामाक्षी पर कुछ अधिक कृपा बरसाते थे। उसकी महिला सहकर्मी सहेलियां तो भाटियां जी का नाम लेकर कामाक्षी को चिढ़ाना नहीं भुलती। बस में भी भाटियां जी कामाक्षी के इर्द-गिर्द ही बने रहते। उन्हें कामाक्षी की प्रशंसा करने में गर्व की अनुभूति होती थी। कामाक्षी के कपड़ो से लेकर उसके साज और श्रृंगार तक की वह प्रशंसा करना कभी नहीं भुलते। मगर आज वे कामाक्षी तक नहीं पहूंच पा रहे थे। कंडक्टर ने उन्हें बस के द्वार पर ही खड़े रहने का सख़्त निर्देश दे दिया। वे वहीं खड़े अपनी ढीली-ढाली पतलून को ऊपर खींसका कर कामाक्षी को देखकर मुस्कुरा रहे थे। कंडक्टर की अभद्रता से वह क्षुब्ध थी। उसे आज से कुछ वर्ष पुर्व की कामाक्षी याद आ गई। ऐसे ही एक बस कंडक्टर ने उस दिन कामाक्षी से अमर्यादित वचन कह दिये थे। कामाक्षी ने अदम्य साहस का परिचय देकर उस बस कंडक्टर को जोरदार थप्पड़ लगाया था। कामाक्षी ने बस को बीच मार्ग में ही रूकवा दिया। पुलिस को बुलवाकर कंडक्टर से क्षमा मांगायी तब जाकर बस अपने गंतव्य जा सकी। कामाक्षी तब बहुत चर्चित हुई थी। इस घटना के बाद बस वाले कामाक्षी को बहुत सम्मान देने लगे थे। समय के साथ यह घटना भुली-बिसरी यादें हो चूकी थी।
बस के कैबीन में बैठी कामाक्षी की सहेलियां भाटियां जी से हंस-हंस कर बातें कर रही थी। कामाक्षी को पूर्णतः विश्वास था कि उसकी सहेलीयां उसी के संबंध में भाटियां जी बातें कर आनन्द लुट रही है। सुबह के दस बज चूके थे। बस तीव्रता से दौड़ जा रही थी। यकायक बस सर्प सी लहराने लगी। सवारियां यहां-वहां गिरने लगी लगी। बस ड्राइवर ने जैसे-तैसे बस को नियंत्रित किया। बस का पिछला पहियां पंचर हो चूका था। प्रतिदिन अप डाउन करने वाली संवारीयां व्याकुल हो उठी। उन सभी को निश्चित ही आज कर्त्तव्य स्थल पर पहूंचने में विलम्ब होने का डर सताने लगा। कामाक्षी विचार कर रही थी कि कोई मोटरसाइकिल पर लिफ्ट मिल जाये तो वह जल्दी ही अपने विद्यालय पहूंच जाये! कामाक्षी की सहेली शिक्षिका मनोरमा ने हाथ देकर एक राहगीर मोटरसाइकिल संवार से लिफ्ट मांग ली। मोटरसाइकिल संवार रूका। मनोरमा मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बैठकर रफूचक्कर हो गयी। कामाक्षी उसे दुर तक जाते हुये देखती रही। ‘जाने कौन आदमी है? ऐसे कैसे किसी के भी साथ बैठकर चली गई? कुछ अनर्थ हो गया तो?’ कामाक्षी को आश्चर्य हो रहा था।
“चलो कामाक्षी! कंडक्टर ने टायर बदल दिया है।” एक अन्य महिला शिक्षका सुपर्णा ने कामाक्षी की चीर निद्रा भंग करते हुये कहा।
बस पुनः चल पड़ी। मनोरमा से रिक्त हुई सीट पर अब कामाक्षी का कब़्जा था। भाटिया जी भी कामाक्षी के पास ही आकर खड़े हो गए। उमस की गर्मी के मारे सवारियों का बुरा हाल था। खिड़कियों से आ रही हवा से कुछ राहत तो मिल रही थी। किन्तु क्षमता से अधिक संवारी बस में संवार थी और अधिकतर संवारीयां खड़ी थी। फलतः सीट पर बैठी संवारीयों को हवा नहीं लग पा रही थी।
सड़क पर वाहनों की रैलम-पैल थी। वाहनों ने रेंगना आरंभ कर दिया। कुछ आगे सड़क पर दो वाहनों में जोरदार भिडंत हो गई थी। जिसके कारण छोटे-बड़े सभी वाहन जगह मिलने पर ही आगे बढ़ते वर्ना अपने स्थान पर खड़े रहते। गर्मी से सभी परेशान थे। बस से कुछ संवारी उतर कर पैदल सड़क किनारे-किनारे चलने लगी। कामाक्षी ने अपने स्कूल के सहकर्मी शिक्षक भुवनेश्वर को फोन लगाया। वे इस समय अपनी मोटरसाइकिल से इसी मार्ग से होते हुये स्कूल जाते थे। संयोग से भुवनेश्वर कामाक्षी को वहीं जाम में मिल गये। कामाक्षी तुरंत उनकी मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बैठ गई। सड़क पर जाम बढ़ता ही जा रहा था। भुवनेश्वर का इस मार्ग पर यात्रा करने का पिछले पन्द्रह वर्षों का अनुभव था। बचते-बचाते उन्होंने सड़क जाम से मुक्ति प्राप्त कर ही ली। स्कूल अब कुछ ही दुरी पर था। कामाक्षी ने लम्बी सांस लेकर ईश्वर का धन्यवाद किया। शाम ढले घर छोड़ने की बात कहकर भुवनेश्वर ने कामाक्षी की आज तक की चिंता समाप्त कर दी। मगर कल पुनः उसे इसी मार्ग से डेली अप-डाउन करना था। ‘माह के एक दो दिन की तो समस्या है। शेष दिन तो आराम से विद्यालय आ ही जाती हूं।’ यह सोचकर कामाक्षी ने विधार्थी उपस्थित रजिस्टर उठा लिया। अपनी उपस्थिति पर हस्ताक्षर कर वह अपनी कक्षा की ओर चल पड़ी।

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