चर्चित लेखक राजीव रंजन प्रसाद के महाभारत केन्द्रित आगामी उपन्यास का एक अंश 1
  • राजीव रंजन प्रसाद

बुरहानपुर में मध्यप्रदेश सरकार के गेस्टहाउस, ताप्ती रिट्रीट का यह कमरा बिलकुल कोने में था। अंशिका की प्रवृत्ति में उतावलापन अवश्य है, वह उतना ही एकांत प्रिय थी। इस समय चुपचाप रहना और चाह कर भी रूमपार्टनर श्रेया को अनसुना करना सम्भव नहीं था। अंशिका के दिल दिमाग में अश्वत्थामा किसी चलचित्र की भांति घूम रहा था। वह बार बार महाभारत युग में पहुँच जाती। आँख़ों के आगे बलिष्ट किंतु ज़ख्मों से भरे एक व्यक्ति की कल्पना आकार ले रही थी। 
“बड़ा सुंदर गाउन है, कहाँ से लिया था” श्रेया ने इधर-उधर टहलती अंशिका की बेचैनी को नजरंदाज करते हुए पूछा। 
“…..” 
“तू सुन रही है?” 
“अ…हां, सोच तो, अगर सच में अश्वत्थामा हमारे सामने आ जाये तो?” 
“ले, मैं गाउन की बात कर रही हूँ तू….” 
“सॉरी यार, मैं कुछ और ही सोच रही थी”  
“पिंक गाउन पहन कर यूं मधुबाला स्टाईल में टहलते हुए अश्वत्थामा के खयालों में खोये रहना, तुझे इश्क हो गया है।” 
“हाँ कोई और नहीं मिला मुझे?” 
“यहाँ किस्मत से आयी है, लपक ले…अखण्ड सौभाग्यवती रहेगी।”
“मार खायेगी…” 
“बाई द वे, अश्वत्थामा की पत्नी का क्या नाम था?” 
“पता नहीं, क्यों?”  
“तुझे ले कर इस लोकेशन पर पीरियड फिल्म बनाउंगी, पुनर्जन्म बेस्ड….पाँच हजार साल बाद, कैसा नाम रहेगा।”
“बस कर यार, सोच कर देख, अगर सच में अश्वत्थामा सामने आ जाये तो? क्या प्रतिक्रिया होगी हमारी?” 
“मेरा तो हार्ट अटैक” श्रेया ने आँखें मटका कर कहा। 
“हम कुछ पलों के दर्द से बेचैन हो जाते हैं कल्पना कर कि पाँच हजार साल से लगातार, आत्मग्लानि से जूझते हुए, पूरे शरीर पर जख्मों का बोझ लिये भटकते हुए आदमी की क्या मनोदशा होगी” 
“मिथक है यार, ऐसा कभी हो सकता है?” 
“कितने लोगों ने उसे देखा है” अंशिका ने तर्क दिया। 
“उनका भ्रम होगा, कोई साईकोलॉजिकल समस्या होगी।”
“यार उस किले पर अगर हम रात को चलें…।” 
“पहली बात तो खडूस प्रोफेसर पर्मिट नहीं करेगी, दूसरी बात कि क्यों रात की मीठी नींद खराब करनी है। क्या पता सपने में अभिषेक बच्चन आ जाये।”
“अभिषेक को तू ऐश्वर्या के लिये छोड, प्रोफेसर कुमुद को कुछ मेकअप ट्रिक्स दे देना, मान जायेगी।” 
“तेरी भूतिया प्रेम कहानी के लिये मैं अभिषेक का बलिदान नहीं दे सकती।” 
“तू कुमुद मैडम को ही पटा ले।”
“विभाष ये काम कर सकता है।”
“इंटरकॉम लगा, बुला उसको कमरे में।”
“छि: भले घर की लड़कियाँ यूं सरे शाम किसी लडके को कमरे में नहीं बुलाती।”
“तू फोन लगा रही है कि तेरी भलाई निकालूं।”
“लगाती हूँ चिमट मत।”
विभाष को आश्चर्य हुआ कि अंशिका रात असीरगढ किले पर जाना चाहती है। उसे इस प्रस्ताव से खुशी ही हुई। मंदिर के पास कैम्पफायर करने की योजना बन गयी। एक एक कर के सभी साथी कमरे में चर्चा के लिये बुला लिये गये थे। किले में रात गुजारने का रोमांच अनुभव करने में किसी को भी समस्या नहीं थी। अब केवल प्राध्यापिका से अनुमति प्राप्त करना शेष था। 
“चलो मैडम के कमरे में चलते हैं” अभिनव ने योजना में उत्साह दिखाया।
“अंशिका तू गार्डन से एक गुबाब तोड ला, वो खिडकी से देख सामने ही दिख रहा है” विभाष ने कहा। 
“गुलाब क्यों?” 
“तू ला तो सही फिर देख उसका कमाल।”
गुलाब ने सचमुच काम किया था। प्रोफेसर कुमुद प्राय: स्टडी टूर पर जाते हुए बच्चों के प्रति सख्ती का भाव रखती थीं, फिर भी करीबी छात्र-छात्राओं के प्रति उनके मन का एक कोना लचीला था। 
“मैडम इससे अच्छा प्रेक्टिकल नॉलिज फिर नहीं लिया जा सकता” अभिनव ने जानबूझ कर यह वाक्य जोड़ा था। 
“मुझपर आप सभी की जिम्मेदारी है। अगर कोई ऊँच-नीच हो गयी तो जवाब मुझे ही देना है। गाईड भी बता रहा था न, कैसी भूतिया जगह है” कुमुद ने विद्यार्थियों को टालने का आखिरी प्रयास किया। 
“मैडम आपने ही कहा था कि मिथक और मान्यताओं पर नहीं चलना चाहिये” प्रज्ञा ने आग्रह के शब्दों में कहा।
“बात केवल इतनी ही नहीं है, रात भर एक सूनसान खण्डहर में रुकना….” 
“थ्रिलिंग एक्पीरियंस होगा” नंदिनी ने भी इस अनुभव को हासिल करने में रुचि प्रदर्शित की। 
“अब तुम शैतानों की राय से अलग तो मैं जा नहीं सकती…….अभिनव यहाँ आसपास किसी दुकान से एक-दो बड़ी टॉर्च या सर्चलाईट रख लेना। विभाष अगर कोई स्थानीय व्यक्ति हमारे साथ चलना चाहे तो बात करो।” 
“मैने गाईड का मोबाईल नम्बर ले लिया था, उससे बात करता हूँ।” 
“अगर सच में अश्वत्थामा…” अंशिका ने बोलना चाहा। 
“चुप्प” सबने लगभग एक साथ कहा और इसके साथ ही सभा विसर्जित हो गयी। 
     
*****
शाम की लालिमा भी अब ढलने पर थी। गाड़ी असीरगढ किले की ओर बढ़ रही थी।  आसपास फैला सन्नाटा वातावरण को अधिक डरावना करता प्रतीत हो रहा था। केवल हैडलाईट की रौशनी और उसमे चमकती सड़क के अतिरिक्त आसपास का घटाटोप अंधकार रहस्यमय कहानियों को स्वत: जन्म दे रहा था। 
“पीछे एक गाड़ी और आ रही है” प्रज्ञा पिछली सीट पर बैठी हुई थी, उसने अपनी ओर चमकती दो रौशनियों को देख कर प्रतिक्रिया दी। 
“होंगे हमारी ही तरह के पागल” प्रोफेसर कुमुद ने कहा, हालाकि वह तनाव में लग रही थीं।
“अच्छा है इस खण्डहर में हम अकेले नहीं होंगे” नंदिनी के स्वर में आश्वस्ति थी। 
“इसका अर्थ है, रात को भी लोग इस किले में आते हैं?” अभिनव ने कहा। 
“लगता तो नहीं। इत्तेफाक होगा कि दो दल आज एक स्थान पर रात गुजारने का सोच कर पहुँच रहे हों। मैंने गाईड से भी रिक्वेस्ट की थी लेकिन वह रात को चलने के लिये तैयार नहीं हुआ। आसपास के कुछ लोगों से भी बात की लेकिन कोई भी हिम्मत नहीं कर रहा था” विभाष को पीछे से वाहन के आने पर आश्चर्य हो रहा था। 
“अब जो भी हो, एक से भले दो..” प्रज्ञा ने कहा और हाथ में थामे पर्स का फ्लैप खोल कर उसमें लगे आईने में खुद को निहारने लगी। 
गाड़ी किले की तलहटी में रुक गयी थी। ड्राईवर अकेला नीचे रुकने की हिम्मत नहीं जुटा सकता था, उसने समूह के साथ ही शिव मंदिर तक चलने में भलाई समझी। सर्चलाईट की व्यवस्था हो गयी थी अत: उसके उजाले ने सभी में हिम्मत का संचार कर दिया। किले का द्वार खुला हुआ था। गाईड ने विभाष को बता दिया था कि रात में किले के द्वार को बंद करने जैसी औपचारिकता नहीं की जाती है। जब वे सभी शीर्ष पर पहुँचे उसे समय नीचे की ओर से उन्हें गाड़ी के तेज ब्रेक लगा कर रोके जाने की आवाज सुनाई दी।  
“यहाँ कौन सा ट्रैफिक है जो इतनी तेज ब्रेक लगा रहा है?” प्रज्ञा को असहज लगा। 
“शरारती तत्व हो सकते हैं, इग्नोर दैम” प्रोफेसर कुमुद ने कहा और हाथ से सभी विद्यार्थियों को आगे बढ़ने का इशारा करने लगीं।  
“आग जलाने की व्यवस्था तो है, लकडियाँ आसपास से देखनी पडेंगी। मैंने सामान ने एक दराती भी रख ली है” विभाष ने जोडा। 
“पूरा इलाका ही जंगल है, वहीं बहुत सूखी लकडियाँ पड़ी मिल जायेंगी” अभिनव ने कहा। 
किले के शीर्ष पर पहुँचने के पश्चात सारा ही लगभग मैदानी परिक्षेत्र है। दल के पुरुष सदस्य दोनो ओर से रोशनी दिखाते हुए आगे बढ़ रहे थे जबकि छात्रायें तथा प्रोफेसर कुमुद बीच में चलती हुई खामोश बनी हुई थीं। सभी ने हिम्मत तो कर ली थी लेकिन डरे हुए भी थे। ड्राईवर हाथों में खाने-पीने का सामान लिये पीछे पीछे चला आ रहा था। मंदिर को सामने देख कर सभी ने राहत की स्वांस ली। किले के एक छोर पर स्थित यह मंदिर जमीन में धँसा हुआ लगता है। चारो ओर अवशेषों के अतिरिक्त गहरी खाईयाँ हैं जिन्हें इस समय अंधकार ने निगल लिया था। 
“अश्वत्थामा ने क्यों चुनी होगी यह जगह?” अंशिका मंदिर के करीब पहुँचते ही बोल पडी। 
“तू उसी से पूछ लेना, तेरी फैंटसी के कारण ही आज का रतजगा हो रहा है” बनावटी नाराजगी से श्रेया ने कहा। 
“हाँ हाँ सारा दोष मेरा ही है…कैम्पफायर का आईडिया किसका था?” 
“चुप रहो लड़कियों, पहले व्यवस्थायें पूरी कर लो फिर झगड़ती रहना” कुमुद ने बीच-बचाव किया। 
“वहाँ टॉर्च की रोशनी दिख रही है। जो गाड़ी से आये थे वो लोग वहाँ उस किले की दीवार के पास हैं” प्रज्ञा ने इशारा किया। 
“छोड न उनको” नंदिता ने कहा और फिर मंदिर के अहाते में बिछाने के लिये बैग से चादर निकालने लगी।
सामूहिकता से कई कार्य सहज हो जाते हैं। इस सूनसान स्थान में अकेले आने की सोचना सम्भव नहीं था किंतु एक साथ सभी यह दुस्साहस करने के लिये तैयार थे। उपर पहुँच कर कार्य का सहजता से बटवारा हो गया। किसी ने बैठक की व्यवस्था की तो कोई सूखी लकड़ियों को इकट्ठा करने में लगा। आग जलाई गयी जिससे समुचित रोशनी का प्रसार हो गया था। आपसी हास-परिहास से वातावरण को ले कर चिंतायें धीरे धीरे धुंधली होने लगी। व्याप्त हल्की सी ठंडक से भी सुहावनेपन की प्रतीति हो रही थी।
“तेरा अश्वत्थामा तो आने से रहा। इसी बनाने पिकनिक जरूर हो गयी” श्रेया ने अंशिका को छेड़ा। 
“लेकिन उसे ले कर जो कहानियाँ हैं, हम उसे तो जांच सकते हैं?” अंशिका के भीतर एक आस थी। उसे लग रहा था कि यहाँ उसे अवश्य कुछ ऐसा देखने को मिलेगा जो जीवन भर का अनुभव होगा। 
“मंदिर के भीतर चल कर देखते हैं। अभी क्या स्थिति है उसकी फोटोग्राफ खींच लेते हैं। फिर सुबह-सुबह देखेंगे कि भीतर की क्या स्थिति है। अगर यहाँ से जुडी कहानी सच्ची है तो हमें ताजे फूल चढे हुए मिलने चाहिये” अभिनव ने सुझाव दिया। 
“हम बाहर ही बैठे हैं, कोई भी फूल अंदर चढाने गया तो दिखाई देगा” नंदिता ने तर्क दिया। 
“हो सकता है हमें न दिखाई दे। उस जमाने के लोगों के पास क्या शक्तियाँ थीं,  हम उसका अंदाजा नहीं लगा सकते” अंशिका के लिये अश्वत्थामा एक सच्चाई थी। 
“मानी तेरी बात, लेकिन सुबह हमें शिवलिंग पर ताजे फूल तो चढ़े हुए मिलने चाहिये?” प्रज्ञा ने अंशिका के तर्क को मानते हुए कहा। 
“यह प्रयोग करना चाहिये, आओ मंदिर के भीतर चलते हैं” कुमुद ने छात्र-छात्राओं की अभिरुचि को बढाने के उद्देश्य से कहा। 
मंदिर का गर्भगृह, जिसमें बड़ी सी जलहरी के मध्य छोटे आकार का शिवलिंग स्थापित था। सिंदूर, गुलाल तथा फूलों से शिवलिंग एवं जलहरी को सज्जित किया गया था। पीतल के कलश को भी चेन के माध्यम से लटकाया गया था जिसमें पुजारी द्वारा भरा गया जल, एक छिद्र के माध्यम से बूंद-बूंद कर शिवलिंग पर टपकता रहता था। सभी छात्र-छात्रायें इस तरह गर्भगृह का मुआयना कर रहे थे मानो वे किसी मंदिर के भीतर नहीं अपितु प्रयोगशाला में हैं।
“हम शिवलिंग पर चढे बासी फूल हटा देते हैं” नंदिता ने सुझाव दिया।
“ठीक है, द्वार को भी बाहर से लगा देते हैं। किसी के आने की आहट का अंदाजा हम लोगों को हो जायेगा” प्रज्ञा की रुचि भी प्रयोग में थी। 
“ठीक है, हम जनश्रुतियों और इतिहास के सही मायनों को इस तरह समझ सकते हैं” कुमुद ने अध्यापन आरम्भ कर दिया था।
“जनश्रुतियों मे भी तो इतिहास छिपा होता है” अंशिका बोल पड़ी। 
“हाँ हाँ, मैडम ने कब कहा कि तेरा अश्वत्थामा नहीं आयेगा” श्रेया ने फिर छेड़ा। सभी हँस पड़े। अंशिका को पहली बार इस मजाक से भीतर गुदगुदी का अनुभव हुआ था।
फूल हटा दिये गये, शिवलिंग तथा जलहरी को धोया गया। पूरी तरह आश्वस्त होने के पश्चात सभी मंदिर का पट बंद कर अहाते में आ गये। रात्रि के वाद्य बज उठे थे और इसमें भी झिंगुर का स्वर सबसे तीखा था। 
“जुगनू” प्रज्ञा चहल उठी। 
“बहुत से हैं” श्रेया ने कहा। सभी का ध्यान गया कि सैंकडों जुगनुओं ने वैकल्पिक प्रकाश व्यवस्था बनायी हुई थी। अंधकार में रह रह कर जगमग करता यह कीट-समूह  रात की सुंदरता को बढा रहा था। 
“मैने पहली बार देखा है जुगनू” अभिनव ने सच्चाई बयान की। 
“दिल्ली या महानगरों में यह सब देखना सम्भव नहीं” 
“क्या इतना चमकता हुआ साफ आकाश देखा है? ऐसे जगमगाते तारे….दिल्ली में तो रात भी बुझी बुझी सी लगती है और आकाश तो चुंधला ही बना रहता है” प्रज्ञा ने इस तरह कहा जैसे कोई कविता कह रही हो। 
“सही बात है” विभाष ने सहमति दी। 
“ड्राईवर कहाँ है?” कुमुद का ध्यान गया। 
“उसने मंदिर के दरवाजे के पास ही अपना बिस्तर लगा लिया था, सो गया होगा।” 
“चलो ठीक है, किले में या अश्वत्थामा में उसकी कोई रुचि भी नहीं थी” कुमुद ने कहा।
“मैडम आपको क्या लगता है महाभारत महाकाव्य है या इतिहास” विभाष ने चर्चा का आरम्भ किया। 
“क्या कविता में इतिहास नहीं लिखा जा सकता?” कुमुद ने प्रतिप्रश्न किया। 
“अधिकतम तो गद्य में ही…” 
“वेदों की ऋचाएं काव्यात्मक शैली में रची गईं, क्या उनका इतिहास में योगदान नहीं है?” 
“वेदों के अलावा कोई और उदाहरण?” नंदिता ने प्रश्न किया। 
“कल्हण रचित राजतरंगिणी को क्या कहोगे? केवल काव्य? क्या इतिहास नहीं कहोगे?” कुमुद ने उत्तर देने के स्थान पर पुन: प्रश्न सामने रखा। 
“राजतरंगिणी में इतिहास के अतिरिक्त बहुत कुछ है” अभिनव ने राजतरंगिणी के बहुतायत अंश पढे हुए थे। 
“ठीक कह रहे हो अभिनव। राजवंशों की जानकारी इसके कथाप्रवाह का महत्वपूर्ण हिस्सा है न? राजतरंगिणी का अर्थ ही है राजाओं की नदी। महाभारत काल से आज के इतिहास को जोडने में इस कृति की खासी भूमिका है” कुमुद ने बताया। 
“महाभारत से कैसे जोडती है राजतरंगिणी?” अंशिका की आँखों में चमक उभरी। 
“वो इस तरह कि इस कृति के अनुसार पाण्डवों के सबसे छोटे भाई सहदेव ने कश्मीर में अपने राज्य की स्थापना की। ग्यारहवी सदी की इस कृति में सहदेव के बाद से क्रमवार राजाओं का इतिहास है” अपने छात्रों की रुचि देख कर कुमुद को चर्चा में आनंद आने लगा। 
“मैडम क्या केवल यही अकेला संदर्भ है जो महाभारत काल के इतिहास के वर्तमान के ज्ञात इतिहास से जोडता है?” नंदिता ने पूछा। 
“चलो कश्मीर से मगध चलते हैं। मगध के एक साम्राज्य बनने की कहानी आरम्भ होती है जब कुरुवंशी राजा वसु ने इस क्षेत्र को जीता था। उनके निधन के बाद  बार्हद्रथ राजा बने। इनके नाम पर ही बार्हद्रथ वंश जाना जाता है…।” 
“हाँ शायद जरासंध को बार्हद्रथ वंश का माना जाता है” अभिनव ने जोड़ा। 
“जरासंध….वही जिसको भीम ने मारा था” श्रेया ने पूछा। 
“हाँ हाँ वही जरासंध। सचमुच कडियाँ जोड़ो तो महाभारत कालीन इतिहास सामने आने लगता है। श्रीकृष्ण ने पाण्डवों की सहायता से जरासंध का वध करवा दिया था” विभाष ने विषय में अपनी रुचि दिखाई। 
“सही कहा विभाष।…..और इस राजनीतिक हत्या के बाद बार्हद्रथ वंश का विनाश होने लगा। इस वंश के अंतिम राजा थे – रिपुंजय जिनका उसके ही मंत्री पुलिक ने वध कर दिया था। पुलिक को राजा बने थोडा ही समय गुजरा था कि भट्टिय नाम के उसके एक सामंत ने विद्रोह कर दिया। अब भट्टिय के बेटे बिम्बिसार को सत्ता मिली। इसी बिम्बिसार ने हर्यंक वंश की नींव रखी और उसने 544 से 492 ईसापूर्व तक शासन किया था” प्रोफेसर कुमुद की बातें सभी बहुत ध्यान से सुन रहे थे।    
“मैने एक रिफरेंस दक्षिण भारत के वारंगल में काकतीय साम्राज्य का इतिहास पढते हुए देखा था। बहुत प्रामाणिक नहीं है लेकिन चर्चा के लिये ठीक है। सम्राट युधिष्टिर के बाद परीक्षित सम्राट बने। परीक्षित के बेटे थे जनमेजय….इसी तरह अश्वमेघ, चित्ररथ, उग्रसेन, शूरसेन, भीमपाल….और इस तरह तीस पीढियों के नाम मिलते हैं। सभी चक्रवर्ती थे। सबसे आखिरी नाम मुझे सम्राट दोमक का मिला। सम्राट दोमक की उनके ही मंत्री विश्रवा ने हत्या कर दी। इसके बाद इस वंश के कमजोर पडने और पलायन करने की जानकारी मिलती है। शायद इनके वंशज मथुरा, जयपुर होते हुए अंत में वारंगल में बस गये होने”  अभिनव ने चर्चा मे जोडा। 
“काकतीय, वारंगल, चित्ररथ, विश्रवा…कैसे कठिन कठिन नाम रट रखे हैं” प्रज्ञा ने प्रशंसा मे कहा। 
“इसीलिये टॉप करता है अभिनव” कुमुद ने प्रशंसा की।
 अंशिका का ध्यान चर्चा में कम ही था। वह अंधेरे में उभरती हर आकृति को ध्यान से देख रही थी। वह उठी और सामने ही किले की दीवार की ओर टहलते हुए बढ़ गयी। 
“सामने ही रहना अंशिका” कुमुद ने टोका। 
“मैं यहीँ हूँ मैडम” उसने आश्वस्त किया।
ठंडी हवा चल रही थी। अंशिका ने कानों में ईयरफोन ठूंसे और मोबाईल पर अपने संग्रह में से किशोरकुमार के गीत सुनने लगी। “हमें इन्तजार कितना, ये हम नहीं जानते….” गीत ने उसे दूसरी ही दुनिया में पहुँचा दिया। गुलाबी लहँगा जमीन पर घिसटता हुआ घाँस-झाड़ियों से खेल रहा था। मंदिर और उससे लग कर किले की दीवारों के कारण सभी को यह स्थान सुरक्षित प्रतीत हुआ अत: अंशिका के समूह से अलग टहलने पर किसी को आपत्ति नहीं थी। सभी की रुचि महाभारत काल के इतिहास का वर्तमान से अंतर्सम्बंध स्थापित करने में थी अत: बहस कभी तेज कभी धीमी हो रही थी। कैम्पफायर के दौरान सभी इतने सहज हो गये थे कि किले को ले कर उनके भीतर बैठा भ्रम और भय अब महसूस नहीं हो रहा था। चर्चा कुछ थमी तो अंत्याक्षरी खेली जाने लगी। 
“अंशिका….आ न हमारी टीम में” श्रेया ने आवाज दी। 
“शुरु करो, मैं आती हूँ थोडी देर में” अंशिका को टहलते हुए माहौल का जायजा लेना अच्छा लग रहा था। 
रंग जमने लगा। किले का सन्नाटा अब गीतों में रम गया। अंशिका किले की दीवार से टिकी ईयरफोन पर किशोर के गीतों में डूबी हुई थी। विभाष ने एक निगाह उसपर डाली और जैसे मोहित हो गया। हल्की रोशनी अंशिका के चेहरे पर पड़ रही थी। उसके चेहरे का भोलापन किसी अधखिले गुलाब सा प्रतीत हो रहा था। गाने की अपनी बारी आते ही विभाष ने अंशिका पर से निगाह हटा ली और अंत्याक्षरी का हिस्सा बन गया। अंशिका की सोच में इस समय फिर अश्वत्थामा ही था। लगभग छ: फुट से अधिक लम्बा और बलिष्ट जिसके सिर के मध्य भाग में गहरा जख्म…। 
एकाएक किसी ने उसका मुँह दबाया और इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती या चीख सकती, उसे किले की दीवार के दूसरी ओर खींच लिया गया। अंशिका के चारो ओर अंधकार था। उसका मुँह इतनी कस कर दबाया गया था कि वह चीख भी नहीं सकती थी। गले से घुटन की जो आवाज वह निकाल रही थी उसका अंत्याक्षरी के बीच साथियों का सुना जाना संभव नहीं था। उसने महसूस किया कि चार से छ: लोग हैं जिनके शिकंजे ने उसे किसी पंछी की तरह फाँस लिया है। उसे हथेलियों में उटा लिया गया था, किसी ने कंधा पकड़ा तो किसी ने उसके लगातार पटके जाते पैरों पर काबू पाया। किले के इस हिस्से में रोशनी नहीं पहुँच रही थी, केवल आवाजें ही अंशिका के लिये अपनी स्थिति समझने का जरिया थीं। 
“यहीं कहीं पटकते हैं इसको और निबटाते हैं।” 
“गायब होने का मालूम पडते ही इसके साथी ढूंढने लगेंगे।” 
“तालाब की तरफ ले चल।”
“गाड़ी में ले चल बे..वहाँ कोई आ गया तो पटक के निकल लेंगे।”
“साथ ले चल यार, क्या लड़की है…..।”
“यही मौज कर ले साले, कोई पहचानेगा नहीं और काम भी हो जायेगा।”
“इसके साथी…।”    
“लडकियाँ है सारी, आ गयीं तो एक एक हमारी…” एक गंदी सी हंसी का स्वर।
अंशिका का दिमाग अपने बचाव में बहुत तेजी से चल रहा था। इस बीच उसे महसूस हुआ कि अंत्याक्षरी की आवाज बंद हो गयी है। अंशिका ने किसी तरह अपना मुँह छुडाने में सफलता हासिल की और पूरी ताकत लगा कर चीख पड़ी। अगले ही पल उसका मुँह राक्षसी तौर से दबाने का यत्न किया गया। 
“चीखेगी तो यहीं तुझे मार डालेंगे।” 
“सब किले में इसको ढूंढेगे, तालाब की तरफ ले चल बे।” 
“छटपटा रही है।” 
“जल्दी जल्दी चल नहीं तो पी हुई सारी उतर जायेगी।” 
“और चढ जायेगी बे, मस्त है….।” 
अंशिका ने स्वयं को खींचे जाते हुए महसूस हुआ कि उसे घसीट रहे सभी युवक नशे में हैं। वे लडखडा रहे थे लेकिन चाल तेज थी। यह पियक्कड आवारा लडकों का दल था। इस बियाबान में इन लड़कियों को देख कर उनके भीतर के शैतान ने दूसरी ही योजना बना ली थी। अंशिका को अपने साथियों की पुकार स्पष्ट सुनाई दे रही थी लेकिन आवाज स्वयं से दूर जाती प्रतीत हुई, उसने स्वयं को असहाय महसूस किया। अंशिका को कोई दिशाबोध नहीं था। जिस स्थान पर उसे पटका गया वह पथरीला था। उसे पीठ पर जाने कितने कांटे चुभते महसूस हुए लेकिन उससे अधिक चोट उसे उन अश्लील हथेलियों से महसूस हो रही थी जो बेशर्म खिलखिलाहट के बीच उसके शरीर पर यहाँ वहाँ निर्दयता से रेंग रहे थे। 
“जल्दी कर, खींच खींच इसके कपडे” यह आवाज उसकी थी जिसने एक हाथ से अंशिका का मुंह दबाया हुआ था।  
अंशिका ने पूरी ताकत लगा कर स्वयं को छुडाने की कोशिश की। कभी पैर छूटता तो उससे किसी को लात मार कर पीछे धकेलती, कभी हाथ छुड़ा पाती तो किसी को नोंच लेती। 
“एक लड़की तुम लोगों से नहीं सम्भलती..” अंशिका ने महसूस किया कि यह आवाज सामने से आयी है। अब ठीक आगे जो खड़ा था, अंधेरे में उसकी कद-काठी का ही अंदाजा लग सकता था। हालाकि अंधेरे के बाद भी आधे चांद और जगमगाते तारों की रोशनी में वह आसपास का अनुमान लगा सकती थी। उसे हालात से लड़ना था, वह आत्मसमर्पण नहीं कर सकती थी। उसे अपने उपर कोई झुकता हुआ महसूस हुआ। शराब की दुर्गंध उसके चेहरे की ओर भभक पड़ी। अंशिका ने पूरी ताकत बटोर कर स्वयं को छुडाने में सफलता हासिल की। किसी को धकेलती, किसी से जूझती वह उठ खड़ी हुई और जिधर उसकी समझ में आया दौड़ पड़ी। कई आवाजें उसका पीछा कर रही थीं….। 
“अबे भाग गयी, पकड़ उसको”
“आगे खाई है, कहाँ तक भागेगी…” 
अंशिका के पैरों मे चप्पल नहीं थी, लहंगा उसे तेज भागने में अवरोधक बन रहा था और जो कुछ उसने अब तक झेला उसकी पीड़ा भी असहनीय थी। ठोकर लगी और वह मुँह के बल गिर पड़ी। अगले ही पल उसने चारो ओर से खुद को घिरा पाया। अंशिका में अब ताकत जवाब दे गयी थी। उसने अपनी कमर पर अशालीन हाथों की छुअन महसूस की। उसने महसूस किया कि उसका लंहगा खींचा जा रहा है लेकिन तभी……। उसे छोड दिया गया। वह महसूस कर सकती थी कि कुछ ऐसा हुआ है जिसने उसके अपहर्ताओं को भयभीत कर दिया है। क्या उसके साथियों ने उन्हें ढूंढ लिया है?……। अंशिका ने हिम्मत कर स्वयं को खींचा और बैठने का प्रयास किया। आसपास कोई नहीं था, सामने धुंधली सी आकृति खड़ी दिखाई पड़ी। क्या इस व्यक्ति से डर कर ही उसे छोड कर लडके भाग गये हैं? वे तादाद में थे और यह अकेला फिर भी….? कौन है यह? 
“आप कौन?” अंशिका की आवाज में पीड़ा थी, कृतज्ञता भी। 
“मैं….अश्वत्थामा” एक गंभीर और भारी आवाज। 

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