Monday, June 15, 2026
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डॉ गरिमा संजय दुबे की कहानी-  लाल कफ़न 

सावधानी से बिना आवाज किए वो पेड़ पर चढ़कर देखना चाहता था, बचे खुचे जो थोड़े लोग थे उनका क्या करना है, लड़ाई लड़ते हुए मर जाना है या… भीतर घने जंगल में उनको छोड़ वो खुद दबे पांव थोड़ा आगे आया, और पैर जमा कर पेड़ पर चढ़ने लगा, जंगल आज अस्वाभाविक रूप से शांत था, कोई हलचल नहीं, परिंदे, जानवर जैसे किसी भय से दुबके हुए थे, पेड़ की पत्तियां सांस रोके खड़ी थी, पास के पेड़ पर लटकती जंगली बेल इस पेड़ की तरफ भी बढ़ गई थी,  लाल चींटियों की कतार दोनों पेड़ की तरफ आवाजाही कर रही थी, पास के पोखर से जब पानी पीकर वह निकला तो लगा कि कोई पीछा कर रहा है, थोड़ी देर वहीं पत्थर की आड़ में दुबका रहा, देखा तो  गिलहरियां दौड़ रही थीं, वह फुर्ती से पेड़ की तरफ आया, हर आहट पर चौकन्ना होने की ट्रेनिंग ने उनको हर आवाज़ पर शक करना सीखा दिया था, अब कोयल भी बोले या बांसुरी भी बजे तो वह उसको कोई गुप्त संदेश समझ सुनते हैं, संगीत समझ कर सुनने की उनकी क्षमता को खून खराबे ने ख़तम कर दिया है, पहले यही जंगल गाता था, गुनगुनाता था, अब यह जंगल गोलियों की आवाज़ों, बेदर्दी से कत्ल किए गए लोगों की चीखों और बम या सुरंग के धमाकों से गूंजता है, लाशों के चीथड़े  सूखे पत्तों से ज्यादा दिखते हैं कई बार, किससे लड़ रहे हैं, क्यों लड़ रहे हैं  यही पता नहीं होता कई को, और लड़ते हुए वह मिल गया जिसके लिए लड़ रहे हैं,   सब ख़ाली हाथ, ख़ाली पेट, नंगे बदन,  हां भरी हुई बंदूकें हैं उनके पास, इन सालों में बंदूकों का पेट ही तो भरा है उन्होंने, अपने बच्चों के तन पर कपड़े हो न हो, बंदूकों की पेटियां निर्बाध पहुंचती रही उनके पास । किसी ने कभी जानने की कोशिश भी नहीं की कि भरी बंदूकें देकर उन्हें खाली पेट रखकर, ज़हर पिलाकर किनके ख़िलाफ़ खड़ा किया गया । जंगल उनके हाथ न आया, कटता रहा,  काटकर किनके कहां पहुंचा यह भी नहीं पता, वे लोगों को काटते रहे और उन्हें बरगलाने वालों ने उनके नाम पर जंगल काट दिए । वे सरकार की नज़र में अपराधी हो गए उनके हिस्से कुछ न आया, जंगल के नाम की, उनके हक की लड़ाई लड़ने वालों ने अपने घर भर लिए, जंगल कराह रहा था, वे भी, गांव के गांव हथियारों से भर दिए गए और इस लड़ाई में वे सब हार गए ।

सोचते हुए वह पेड़ पर चढ़ने लगा, चढ़ते चढ़ते अचानक एक नुकिला कोना हाथ में धंस गया, भर भर करता खून निकला और नीचे टप टप टपकने लगा, उसने धोती का किनारा फाड़ कर घाव दबा दिया, नीचे झांका तो उसके रक्त की बूंदों पर लाल चींटियां मंडरा रही हैं, सूखे पीले पत्तों पर पड़ा लाल रक्त लाल चींटियों का भोजन बन गया, वह फिक्क से हंस दिया, “खून किसी का पेट भरे है, ओह” अचानक वह चुप हो गया, वे भी तो खून पीने वाले ही हैं,  उनका भोजन भी तो खून ही है, सारी दुनिया खून की प्यासी है कोई ऐसे कोई वैसे, कितना खून बहाया उसने अपनों का, अपना, बेगानो का, याद करने लगा कितने लोग मार डाले होंगे, हूं हज़ार  दो हज़ार तो मार ही दिए होंगें और ज्यादा, खून का बदला खून, उन्होंने भी तो हमारे कितने साथी मारे, अब तो बहुत थोड़े बचे, देखें कहां तक पहुंची पुलिस”, देखने को ही आया था, खबर मिली है कि सब धीरे धीरे खतम हो रहा है, कोई कब तक खून से खेल सकता है, “हमारे आकाओं ने तो हमको ठगा ही है, वे सब फल फूल गए, और हम सब यहां धूल, मिट्टी, कीचड़ जंगल में अपनी पीढ़ियां बर्बाद कर दिए, न जंगल मिला न शहर”, चढ़ते चढ़ते फिर एक कांटा चुभा और लाल धार बह निकली, “आज क्या पूरा खून बह जाएगा, अरे लाल रंग तूने भी तो खूब पचाया,  अब छोड़ देना है यह, जिनपर भरोसा करके हथियार उठाए थे, उन्होंने तो कहीं का न छोड़ा, जंगल बचाने का दावा करने वालों ने जंगल लूट लिए, अधिकार दिलवाने का दावा करने वालों ने गुलाम बन दिया, पढ़ने लिखने जीवन सुधारने वालों ने तीन पीढ़ियों को बदबूदार ज़िन्दगी दी, उन्हें दया हो आई अपने पोतों पर, लाल बदबूदार दांत, गंधाते कपड़े, मल मूत्र से सनी रहने वाली जगहें, और उनके रहनुमाओं के संगमरमर से चमचमाते घर और गाड़ियां, थू…, उनके घर बड़े बड़े लोगों का आना जाना, शराब और मुर्गे, सिगरेट सिगार के धुएं में वे लोग अंग्रेज़ी में न जाने क्या क्या बोलते, उसने एक बार देखा था, बड़े बड़े नेताओं के साथ, बड़े मंचों पर, टी वी पर बोलते हैं यह लोग, जब मालिक के घर जाना होता तभी थोड़ा बहुत पता लगता, मालिक बोलते “तुम्हारे लिए ही तो लड़ रहे हैं, तुम्हें तुम्हारा हक़ मिल जाए, तुम्हारा देश मिल जाए” ।

उन्हें आजतक समझ नहीं आया, अपना हक, अपना देश की बात करता उनका दादा, उनका बाप मर गया भूखा, गोली खाकर, लेकिन यह कौन सा देश है जो अब तक न मिला, अब मन में कुछ खटकने लगा, इन लोगों का देश फिर कौन सा है, ये किस देश के लोग हैं, रहते तो यही है, फिर हमें किस देश का सपना दिखाते हैं, हमें अपने देश की बात बोलते हैं इनका देश कौन सा है । देश तो हमारा यही है, हमारा लोग यही है, लेकिन सबने बंदूक नहीं उठाया हमने उठाया, लेकिन कुछ न मिला अब तक, गोलियां मिली और नरक वाली ज़िनगी ।

सही कह रह था सरकार का कारिंदा, इससे तो उनके बीच रहकर शांति से अपने अधिकार की लड़ाई लड़ते तो आज उनके भाई जैसा जीवन होता, उसका भाई नहीं आया लाख लालच देने पर भी जंगल में, हथियार नहीं उठाए उसने, पढ़ता गया पढ़ता गया, अब देखो कैसा भला मानुष बन गया, और एक उनका जीवन है, चीगट खून से रंगे हुआ, सहसा खून की बदबू उनके नथुनों में समा गई, कितने सैनिक, कितने अधिकारी मारे उन्होंने, हंसिया लेकर न जाने कितनों के गले रेते, न जाने कितनी बारूद की सुरंगों से उड़ा दिए लोगों को, इस घने जंगल में यहां से वहां, कभी किसी पहाड़ में कभी किस गुफा में जैसा वैसा रूखा सूखा खाकर लड़ते रहे, जंगल चाहिए था, लेकिन जंगल को बचाने का यह रास्ता लाल पगडंडी, लेकिन उस पर खून से सने वे ही चलते रहे, और उनकी औलादें और उनकी औलादें, पीढ़ियां खप गईं  इस लाल नहर में, इस लाल पहाड़ पर लाशों के ढेर उनके लोगों के लगते गए, लेकिन इस लाल सड़क से हरे जंगल बच जाएंगे, यह सोच चलते रहे,  नहीं न जंगल बचे न वो, सबकुछ खून से रंग चुका था, अब तो उनकी आंखों में इतना खून है कि दुनिया उन्हें खून से रंगी दिखाई देती है, और वो जिन्होंने क्रांति के नारे लगाए, उनके चमचमाते गाल और गाड़ियां उनका बड़ा महल, और हमारे लिए टूटी फूटी छत भी नहीं, कहते थे सब समान रूप से बंटेगा, नहीं कुछ नहीं बटा, बस वे लूट कर ले गए, बटी तो उनकी बहन बेटियां, जिस पर जब जिसने चाहा देह फेर दी, थू कुत्ते साले, हरामी, हरामी कहते कहते अपने हाथ की कुल्हाड़ी से उस पेड़ को काट दिया, जब तक उनका गुस्सा निकलता तब तक पेड़ मर गया था, उस पेड़ में उन्हें उन सब  की शक्लें दिखाई दीं जिन्होंने उन्हें सब्ज़ बाग दिखाए थे और उसकी आड में उन्होंने खुद को बड़ा बनाकर इन्हें  इस गंदे घिनौने हालात पर मरने लड़ने के लिए छोड़ दिया, और नहीं अब और नहीं अब तय कर लिया था, अपनी जंगली आवाज़ में एक विशिष्ट सिटी बजाकर उन्होंने देखना चाहा कि उनका दोस्त पुलिस लेकर आ रहा है या नहीं, बदले में कोई आवाज़ सुनाई नहीं दी तो वही बैठे रहे ।

अब छोड़ देना है  यह लबादा जो ओढ़ रखा था, न जाने कब से।  इसके अंदर दम घुटने लगा था।  सच, नंगा सच सामने था, क्या मिला इतने लम्बे संघर्ष से  जिनको एक अच्छा समाज, शिक्षा , स्वास्थ्य गरीबी से मुक्ति देने का वादा किया था आज चालीस बरस बाद भी वे वही के वही हैं।

हथियार और हिंसा ने घर का छोड़ न घाट का,  एक नज़र अपने पीछे की बस्ती पर पर डाल, मुंह में दबी बीड़ी को हिकारत से फ़ेंक वह पगडंडी की तरफ ताकने लगा ।

समर्पण, आज पूरा जंगल समर्पण करने जा रहा है, सरकार के पास।  मोह भंग की अवस्था बडी विचित्र होती है,  मन भटकता है जहाँ तहाँ, वह सब याद करने लगा । कल पार्टी लीडर ने बुलाया था,  समझाया था कि “नहीं नहीं झुकना है इन सुवर की औलादों के सामने”,  यही बोले थे जो हर बार बोलते है लेकिन इस बार धमकी भी थी,  “देख मनुवा तू न माना तो तेरा हश्र भी वही होगा जो आज से तीन साल पहले,  बसेसर और  टांछिया का हुआ था,  जमीन में ज़िंदा गाड़ देने तुझे हम,  लाश पर नमक डाल के,  रातो रात किसी को खबर नहीं होगी” ।

 हंस दिया था मनुवा “हमारी बिल्ली हम से म्याऊ दादा,  जो तरीके हमसे सीखे हमपर ही आजमाने चले आप तो,  अपनी बड़ी बड़ी आग्नेय आँख से आग बरसाता मनुवा बोला “जो मारने के तरीके बता देता है ना,  वह अपना को बचाना भी जाने है । अब यह तुम्हारे ढकोसले ना चले,  40 साल से लड़ रहे न इधर के रहे न उधर के,  बचवा के लिए अच्छी शिक्षा की बात किये था न तुम हमारे टोले  का कोई छोरा पढ़ नहीं सका, बिना इलाज के हर बार लोग मर जाता है तुम डॉक्टर न दे सके,  खाने को जंगली फल खाएं,   यहां  वहाँ भटके और किसी दिन पुलिस की गोली खा लै सो जाए,  का सब किसके लिए कर रहे हम, कछु ना मिलो,  इहाँ बड़ा घर में रहकर, अपना बचवा के विदेस भेज कर हमको शिक्षा की बात करत हो अब नहीं, अब नहीं,  अब कौनो भुलावा ना चलेगा साब,  हम सब देख लिए तोहार ढकोसला” ।

वह अपने गले का लाल गमछा लगभग उनके मुंह पर मार कर चल दिया,  क्रोध में तमतमा गया उनका चेहरा,  उनकी विचारधारा की तरह ही लाल हो गया।  सब हाथ से निकल रहा है,  रक्त क्रांति की बात का समर्थन  करते करते इस देश के कई राज्यों में अपना वर्चस्व रखा था राजनीति में भी और परोक्ष रूप से इन लोगों के साथ भी।

आदर्श कैसे अपनी दिशा बदल व्यक्तिगत लाभ का साधन बन जाता है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण था उनका जीवन।

 न्याय की लड़ाई केवल विरोध बन गई, सबका विरोध और अंधा विरोध,  विरोध भी ऐसा  रक्त पिपासु  कि अपने दुश्मन को खत्म कर देने वाला,बर्बर तरीके से । आज वह हिंसक सोच उनके  हाथ से जा रही है जिनके माध्यम से वे लडाई लड़ रहे थे,  अब वह विचार मरणासन्न है,  क्यों है,  क्या वे खुद जिम्मेदार नहीं हैं इसके,  सोचते सोचते उन्होंने सिगार जला ली।

मनुवा सोच रहा था “क्या मिला, धर्म गया, कर्म गया, ज़मीन गई, बचवा लोग भी गया,  जिन जमींदारन से बचन को इनके पास आया था, इन लोगन ने भी कहाँ उनकी लुगाई छोड़ी” ।

मुंह कड़वा हो गया,  याद आया जब एक लीडर उनकी लुगाई को देख बड़ी ही गंदी नज़र से बोला, “भाई अपने विचारधारा में तो सारा धन सबसे बराबर बटत है, अब लुगाई भी तो धन है, कहकर किसना के शरीर पर हाथ फेरने लगा था तो”,  थू … मनुवा ने थूक दिया,  तब न थूक सका था,  उसके बाद तो धन बाटो न बाटो लेकिन उसका टोला की हर बहु बेटी पता नहीं कहाँ कहाँ कितनी बार बटी,  रोते रोते बोलती थी लुगाई,  “मन्नू जमीदार में इतनी हिम्मत न हती रही, कभी कभार किसी लुगाई पर बुरी नज़र डाली, हमे का लाभ हुआ इहाँ तो जो आवत है वो हमारी इज्जत पर हाथ दालत है, लीडर आत है, पुलिस की धमकी देत है, जान बचाने खातिर हथियार देव की बात करत है,  और अब तोहरे लिए इत्ता कर रहे तो हमारी कछु हक बने के ना” पुलिस आत है कहत है “चाहे तो एक दिन में तुम सबके मौत की नींद सुला दे,  हमे का पतो नहीं, जंगल का पत्ता पत्ता का जानकार हैं हम, का तुम्हारा ठिकानों न पतो, सब पतो है,  अब बचने की कीमत तो चुकानी पड़े री की नहीं,  नहीं तो सालों जेल में सड़,  वह भी कीमत ले जाता”, और कीमत हर बार औरते चुकाती,  हर बार अपने बच्चो को बचाने की कीमत, एक बार इस दुष्चक्र में फँस गए तो निकलने को कौनो रस्तों नहीं, लड़ो, मारो, मरो और जंगल जंगल नंगे पैर दौड़ते फिरों”   अपने पोते की याद आई, बेटा बहू, बच्चे बच्चियां सब इस लड़ाई में लग गए, गंदे पीले दांत को सिंक से कुरेदते हुए वह हंस दिया । कितना गंध आता है सबका शरीर से, सब गंधाते हैं, हमसे तो अच्छा जानवर है जंगल का ।

 पेड़ की ऊंचाई से उसने नज़र अपने बच्चों पर डाली, फ़टे पुराने गले कपडे पहने,  बाल धूल मिट्टी से जटा हुए, खाने को कुछ मिले तो खा लो नहीं तो जंगल तो दे ही देता है,  जंगल तो पहले भी देता था तब फिर किस मरीचिका की तरफ भागे थे वो।

बहुत दिनों बाद कुछ महीने पहले छोटा भाई टकरा गया था गांव में, कुछ दवाई लेने गए थे अपने बच्चे के लिए,  गाँव में छोटे भाई की खेती देखी, उसके नाती पोतों को साफ सुथरे कपड़े पहने स्कूल जाते देखा, मन कसमसा गया,  अपने बच्चों का बचपन भी बेकार गुज़र गया, अब उनके बच्चों का भी वही हाल,  जंगल की किसी खोह में, रात किसी पेड़ पर,  बारिश किसी झोपड़ी में, ठंड किसी पहाड़ पर गुजरी,  “इन बड़े लोगन जो उनके मालिक रहे के बच्चे काहे लडाई नहीं लड़ते, वे किते हैं,  विदेस में” , है है है एक वीभत्स हंसी कान में गूंजने लगी,  “बड़ो बुद्धू निकलो रे मनुवा, इनका बच्चा विदेस में जो भाई इनका भकावे में न आवा उनका बच्चा का बच्चा पढ़ लिख गया,  और हम हमको का मिला यह बन्दुक, यह जंगल और यह लाल पत्ता थू है साले,  हे भगवान ऐसा कैसा गलती हो गया” ।  भगवान कौन भगवान, आज भगवान कैसे याद आ गए मनुवा को, “भगवान को तो कब का मार दिये ना हम, हमारा भगवान तो यह लाल पत्तो है,  कहे थे न वो मालिक कि ई भगवान जी तो सारे फसाद की जड़ है, सबसे पहले उसे ही तो छुड़वाए थे ई।  लेकिन लुगाई कह रही थी कि “दूसरों के भगवान मानने को मना करत ई लोगन का घर में मंदिर है,  पूजा पाठ त्यौहार  सब मनाए जे लोग है, बच्चों का जन्म पर कथा भी रखी और बड़ा बाबू का मरने पर गया जी जा श्राद्ध भी कर दियों, फिर हमें भगवान को मानने से मना काहे करत रहे” ।

“सब जादू टोना, फालतू बात है तुम्हारा  धर्म,  सब मन की उपज है,  कोई भगवान नहीं”,  सारी मूर्ति के फेंकने को बोल दिये थे लोग,  “सब इंसान करत है,  हमी हमार भगवान है, हम तुमको इस रास्ते से जीवन देगा”,  एक सफेद कोट वाला  भी था उनका साथ, थोड़ा बहुत अनाज पानी दे जाता, दिया उन लोगन ने , आज 40 साल से वही जंगल, वही कीचड़, और वही ज़िन्दगी।

“पहले कभी निरास हुए तो भगवान को नाम ही बड़ो आसरो हिम्मत देतो तो अब कभी परेशान हुए तो निराधार हो जात हैं, भगवान की मंदरी  तुड़वाय दी ए लोग, लेकिन मजाल  और सफेद कोट वाला अंग्रेज बाबू का  पूजाघर पे हाथ लगावे की” लुगाई तिलमिलाती रहती ।

घर गया, धरम गया, जीवन गया, बन गए लाल सिपाही, देस की सरकार, पुलिस कुत्तों की तरह पीछे पड़ी है, कई ने तो छोड़ दिया और समर्पण कर दिया, बहुत थूके थे उनके नाम पर मनुवा, लेकिन जब भाई का हंसता खेलता परिवार देखे तो, मन तबसे टीस मार रहा है, भाई का कहा याद आया, “एको दिन में सबकुछ नहीं बदलता है भैया, धीरे धीरे बदलाव होत है, और इस बंदूक की नाली से निकली गोली और खून के लाल रंग से कोई बदलाव नहीं होत, अब देखो सरकारी नौकरी मिली, घर मिला था हमको, पढ़ने लिखने का मौका मिला आज सब बच्चा सुख से है अपना कमा खा रहा है, और जोन साथी आपके समर्पण किए न उनको हूनर सीखा कर काम पर लगाया है सरकार ने, पैसा दिया, घर दिया, पढ़ने लिखें का मौका भी दे रही, आप कब तक उन लोगन के लिए अपना खून बहाते रहिएगा जिन्होंने आपको यह गंदा बदबूदार ज़िन्दगी दिया है”

मनुवा चौंक गया “का कहत हो, हमार मालिक ने तो हमको खबर दिया कि उन सबको मार डाला और उनकी लुगाई बच्चा सब…” ओह खबर केवल उनका मालिक उन्हें देता, वही देता जिससे उसे लाभ होता, सरकार की कोई योजना, कोई पहल उन तक नहीं पहुंचती, पुलिस और सरकार के ख़िलाफ़ ज़हर भर भर कर उन्हें भरमाया जाता, उनकी अज्ञानता, भोलेपन का इतने बरस फ़ायदा उठाते रहे वे लोग, वे हर बार मुसीबत में उन्हीं के पास जाते और वे हर बार सरकार को गाली देकर, पुलिस का डर दिखाकर, कहीं आने जाने, किसी से मिलने बतियाने से रोकते रहते,और उनके लिए कुछ मदद कर देते, इस बार दवाई लेने वह खुद आ गए यहां छुपते छुपाते तो यह सच हाथ लगा ।

मनुवा के भाई ने उनके दल के समर्पण कर चुके लोगों को दिखाया उन्हें, वे देखकर रो पड़े, उनके साथी बोले, “भैया जिस जंगल को बचाने की बात कर हमको ले गए थे न अब सरकार उस जंगल में हमारे से काम करवाएगी, उसका लाभ देगी” ।

मनुवा को भरोसा नहीं हुआ, “देखो पहले लीडर हमको भरमा दिए, अब यह सरकार भरमा रही, तुम लोग पगला गए हो, थोड़ा सा रुपया घर देकर तुमसे जंगल ले लेगी सरकार”

“नहीं भैया नहीं, सरकार अपनी लड़ाई लड़ने से नहीं रोक रही, बस हिंसा नहीं, खून नहीं, लड़ाई यहां रहकर भी लड़ रहे हैं, बस अब जंगल जंगल दौड़ और खून खराबा नहीं, सरकार का मंत्री हमसे खुद बात करे है, हमारी बात सुनत है, अब तक का मिल गया भैया सिवा खून के”,

मनुवा असमंजस में लौट आया था, लुगाई को सब बात बताई, लुगाई मुंह खोले सुनती रही, “जानत हो अपन अपना ही देस का सिपाही मारकर जस्न मनाते रहे है, का मिलो हमें, वो पिछली बार जो गाड़ी उड़ाई थी, उनमें अपना मुन्ना जैसा बचवा नया रंगरूट लोग था, उड़ा दिया गाड़ी, उनका हाथ में अपना माई का तस्वीर था किसी का हाथ में बचवा का, उनका भी घर बार, महतारी लुगाई होगी, हम बहुत दुःख दिए लोगन के, खून खराबा  से का मिला, अब चला यह खून खराबा हमार तीसरी पीढ़ी को बर्बाद कर दे उसके पहले चला, अपनी शर्तों पर चला, मौकों मिलो है चलो, हम अब थक गइल हम भी अपना घर चाही, तीज त्यौहार चाही, परिवार चाही, चलो यहां से”, उस टोले के लोगों ने निश्चय कर लिया कि अब समर्पण कर दिया जाना चाहिए, खाली हाथ आए थे, अब तक हाथ ख़ाली ही हैं, बाकियों में अपने घर भर लिए इनके कंधे पर बंदूक रखकर, अब अपना कंधा किसी को नहीं देना है । लीडर तिलमिला रहे थे लेकिन सरकार की तैयारी इस बार उन्हें अपना खेल नहीं खेलने देगी इसकी पूरी तैयारी थी, उनकी पूरी चेन पर अदृश्य पहरे थे, उनकी हर हरकत की ख़बर थी । आज समर्पण के लिए ही जाना था आज वह दिन था ।

पेड़ पर बैठे बैठे ऊंघने लगे थे कि तभी एक विशिष्ट पक्षी की तरह आवाज़ आई, बिजली की फुर्ती से पेड़ से उतरे और दौड़ते हुए अपने टोले के पास पहुंच गए, गाड़ियों का काफ़िला उन्हें लेने आ चुका था, एक एक करके सबको गाड़ी में बिठा दिया गया, उनके दल का पहले समर्पण कर चुका मिनथिया उनके साथ था , गाड़ी तेज गति से थाने की और बढ़ रही थी, एक एक चप्पे के सन्नाटे को सूंघते वे जा रहे थे, तभी मनुवा ने कहा, “नहीं इस रास्ते से नहीं, एक दूसरे रास्ते से जाएंगे”, सरकार के तय रास्ते से न जाने का कहने पर, पुलिस अधिकारी असमंजस में थे, इनके हिंसक हमलों में अपने कई साथी गंवा चुके जवान थोड़े झिझके, लेकिन मनुवा ने इशारे में बात समझाई, जगह जगह जमीन के नीचे बारूद बिछाने के अभ्यस्त उसके हाथ और इतने वर्षों के अनुभव ने यह समझ दे दी थी कि उनके लीडर को सरकार का तय रास्ता पता लग गया होगा, वे उन्हें भी उड़ाने में संकोच नहीं करेंगे, अपने ही साथियों को जरा से विरोध पर खत्म होते उन्होंने देखा है, उन को कभी पुलिस की गोली मिलती, कभी लीडर की, नहीं मिला तो उनका जंगल । इसलिए सबने उनकी बात मान ली, धड़कते दिल से दूसरे रास्ते से वे निकले, मनुवा का शक सही था, पुराने रास्ते पर घात लगाए लोगों को निराशा हाथ लगी और आहिस्ता आहिस्ता, हर आहट पर चौकन्ना, हर कदम पर आगे बड़े पत्थर लुढ़काते हुए,   बारूद की टोह लेते धीरे धीरे वे बढ़ते रहे, एक एक मिनट भारी था, लेकिन अंततः वे पहुंच गए ।

ठीक समय पर वे थाने पहुंचे मंत्री और उनके अधिकारी इंतज़ार ही कर रहे थे, एक गाड़ी से हथियारों का ज़ख़ीरा भी निकाल कर टेबल पर जमा दिया गया था, उनके पास ऐसे आधुनिक हथियारों की आपूर्ति सीधे सीधे सरकार की विफलता थी,  लेकिन अब जगह जगह से पकड़ हो रही थी, सभी अधिकारियों ने लिखा पड़ी की, सबके नाम, उम्र, संख्या परिवार की संख्या के साथ उनके आधार, उनके राशन कार्ड, उनको समर्पण करने के एवज में दी जाने वाली सुविधाओं की सूची मंत्री जी से वेरिफाई करवाई और उन सबको प्रेस के सामने प्रस्तुत किया । मनुवा का मन झंझावात में था, असमंजस में, वह क्या खोया क्या पाया के हिसाब में उलझा था, सर झुकाकर अपनी दयनीय स्थिति पर उसका मन कचोट रहा था, एक ठंडी आह भरकर उसने अपने पोतों की तरफ देखा, उनको नाश्ता दिया जा रहा था, ऐसी चीजें उसके बच्चों ने कभी न देखी होंगी, मन में एक बार फिर ग्लानि हुई, “कछु न दे सके हम इन्हें,  साथ ही भय भी कि “कहीं  कोई छलावा न हो, क्या सरकार अपनों काम करेगी, जो कहो है, क्या हमें अपनों हक, अपनों स्थान मिलेगो”, फिर खुद ही जवाब दिया मन को, ” जो भी हो, अब आगे की लड़ाई यहां से लड़ेंगे, अब खून नहीं, अब बंदूक नहीं, यह हमारो ही तो देश है, कहां का देश के लिए लड़ रहे थे अब तक,  यहां जिए यहीं मरेंगे, अब किसी भुलावा के पीछे नहीं भागना है”, अपनी लुगाई की तरफ देखा, वह भी नाश्ता करते हुए मुस्कुरा दी, उसके चेहरे पर ऐसी शांति उन्होंने पहले कभी न देखी थी, जैसे किसी दुष्चक्र से निकल आई हो । बच्चे बिना डर के खिलखिला रहे थे, बेटा बहू भी शांत दिख रहे थे, साथी भी,  सरकार के आदमी ने समर्पण करने वालों के घर, उनकी खेती और सुविधाओं का कागज़ उन्हें पकड़ा दिया, खेती की ज़मीन और बच्चों को पढ़ने लिखने की मुफ़्त सुविधा दी, अस्पताल का कार्ड और रहने को एक घर, यह सब उनके लिए सपना था ।

 उन्हें कुछ बोलने के लिए कहा गया तो वे हाथ जोड़कर खड़े हुए और भरे गले से बोले “अब हम नागरिक बनेंगे देश के, अपना हक भी मांगेंगे, अपना देश के लिए काम भी करेंगे, अपना घर में किसी से लड़ाई हो तो घर को आग थोड़ी न लगाई जाए,  बात समझने में हमने बहुत टैम लगा दियो, अब किसी के भुलावे नहीं आना है, अब अपना काम शांति से करना है” उनका भाई जोर जोर से ताली बजा कर उनका उत्साह बढ़ा रहा था । अचानक मनुवा को न जाने क्या हुआ,  वह तेजी से दौड़ता हुआ हथियारों के ज़खीरे के पास पहुंचा, पलक झपकते ही एक बंदूक उठाई, पुलिस वालों ने घबरा कर अपनी बंदूकें तान दी, इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता उसने सारी गोलियां जमीन में धड़ धड़ धड़ करते हुए दाग दी, बंदूक खाली करके उसे वापस ढेर में रख अपने गले में डाला हुआ लाल कपड़ा उन बंदूकों पर ढंक दिया, मन ही मन बुदबुदाया, “खून पर अब लाल कफ़न डाल दिया हमने”और शांति से मुस्कुराता हुआ मंत्री जी के पास पहुंच कर उनके हाथ से सफेद रंग  का गमछा अपने गले में डलवा लिया ।

डॉ. गरिमा संजय दुबे
डॉ. गरिमा संजय दुबे
सहायक प्राध्यापक , अंग्रेजी साहित्य , बचपन से पठन पाठन , लेखन में रूचि , गत 8 वर्षों से लेखन में सक्रीय , कई कहानियाँ , व्यंग्य , कवितायें व लघुकथा , समसामयिक लेख , समीक्षा नईदुनिया, जागरण , पत्रिका , हरिभूमि , दैनिक भास्कर , फेमिना , अहा ज़िन्दगी, आदि पात्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। संपर्क - [email protected]
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