यह कहानी तीन किरदारों की है, प्रो नीलाभ, प्रो गीतिका और मैं अथार्त एडवोकेट राजदीप।एक जमाने में हमारी तिकड़ी पूरे कालेज में चर्चित हुआ करती थी,हम कालेज टाईम में शायद ही अकेले पाये जाते हों और हम तीनों कब एक दूसरे के इतने करीब हो गये हमे पता भी नहीं चला।हमारी पहली मुलाकात कालेज के पहले दिन हुई थी,हम तीनों आई एस सी (बायो)में थे और कालेज के पहले दिन नोटिस बोर्ड पर टाइम टेबल लगाया गया था जिसे नोट करने की होड़ लगी थी।मै अमूमन भीड़ भाड़ से दूर रहने वाला प्राणी था इसलिये एक कोने में खड़ा भीड़ कम होने की इन्तेजार कर रहा था।मेरे बगल में ही एक और सुन्दर सी लड़की खड़ी थी जिसे देख कर यही लग रहा था कि वह भी भीड़ के कम होने का इन्तेजार कर रही है।उसके हाथ में कालेज फीस जमा करने की रसीद थी जिसे उसने इस तरह पकड़ रखा था कि उस पर लिखा पी सी बी साफ साफ दिख रहा था।
मेरा अनुमान सही था, वह भी न्यू एडमिशन वाली ही थी वह भी बायो ग्रुप में।एक बार मेरा मन हुआ कि उससे कुछ बात करूं पर जाने क्यों हिम्मत नहीं हुई।पर हमे ज्यादा देर इन्तेजार नहीं करना पड़ा,कुछ ही देर बाद जब नोटिस बोर्ड के पास जब थोड़ी सी जगह दिखी तो हम दोनों के कदम साथ साथ ही उठे।टाईम टेबल को उस समय नोट करना मुझे सम्भव नहीं लगा इसलिये मैने सिर्फ यह देखा कि अभी कौन सी क्लास है और किस  रुम मे है और वहां से निकल गया।मुझे  वगैर टाइम टेबल नोट किए निकलता देख उसने आश्चर्य मिश्रित भाव से मुझे  देखा पर उसे नज़र अन्दाज़ करते हुए वहां से निकल गया।
मेरा क्लास रुम नम्बर 3 में 2 बजे से था,जबकि अभी काफी वक़्त था पर मैने क्लास रुम में ही जाना बेहतर समझा।मै अपनी पूरी स्कूलिंग के दौरान कभी भी फ़र्स्ट बेंच पर नहीं बैठा था पर न जाने क्यों अपने कालेज  के पहले दिन मुझे ऐसा लगा कि मुझे फ़र्स्ट बेंच पर बैठना चाहिए और मैने वैसा ही किया।पूरी क्लास खाली थी,तभी मैने देखा कि वह नई लड़की भी अन्दर आ रही थी और जैसे ही मेरी नजरें उससे मिली,उसने मुस्कुरा दिया और धीरे से पूछा।
-अगर तुम्हे कोई प्रॉब्लम नहीं हो तो यहां बैठ जाउँ?एक बार तो मेरा मन हुआ कि सीधे मना ही कर दूं पर ऐसा कर नहीं पाया और मैने ईशारों में ही स्वीकृति दे दी औरे कुछ दूरी रखते हुए वह मेरे बगल में बैठ गई।
-मेरा नाम गीतिका है,मैं भी बायो में ही हूँ
मेरा नाम राजदीप है,मैं भी बायो में ही हूँ पर मैने मैथ के लिए भी अप्लाई कर दिया है,देखते हैं क्या होता है
-क्या तुम्हे बायो में इंट्रेस्ट नहीँ
-देखो,सच कहूँ तो मुझे साइन्स में ही इंट्रेस्ट नहीं है
-तो फिर पढ़ना ही क्यों,आर्ट्स क्यों नहीं ले लेते
-अभी मैं इस पर कोई बहस नहीं करना चाहता हूँ,प्लीज
-सॉरी
-कोई बात नहीं,यह कह कर मैं चुप हो गया,पर कुछ ही देर बाद उसने कहा
-मुझे लगता है तुम भी लोकल नहीं हो
-लोकल से तुम्हारा क्या मतलब है
-मेरा मतलब इस शहर के नहीं हो,अगर तुम इसी शहर के होते तो तुमने स्कूलिंग भी यहीं से की होती और तुम्हारा कोई न कोई दोस्त इस कालेज में ज़रुर आता और तुम इस तरह अकेले नहीं होते
-क्या लॉजिक है,मेरे मुहँ से यह वाक्य अचानक ही निकल गया,मेरे पापा स्टेट बैंक में हैं और कुछ दिनों पहले ही उनका ट्रांसफर यहाँ हुआ है।
-मेरे पापा नहीं हैं,तीन साल पहले उनकी डेथ हो गई।वे रेलवे में थे तो उनकी जगह पर मम्मी को नौकरी मिल गई।मम्मी ने मेरे एडमिशन के लिए ही यहां ट्रांसफर लिया है क्योंकि हम जहां पहले थे वहां कालेज नहीं था।पता नहीं क्यों यह सुन कर मुझे उस पर दया आ गई पर मैने कुछ बोला नहीं।तब तक क्लास का टाईम हो गया और देखते ही देखते पूरी क्लास भर गई।उस दिन पहला लेक्चर  वाइस प्रिन्सिपल सर ने लिया और कालेज,सिलेबस,युनिवर्सिटी आदि के बारे में ही बातचीत हुई।उनके लेक्चर के दौरान ही एक और स्मार्ट सा दिखने वाला लड़का क्लास में दाखिल हुआ,और गीतिका की बगल वाली सीट पर बैठ गया।
चेहरे से वह थोड़ा डरा और सहमा सा लग रहा था।उसकी इन्ट्री क्लास के दौरान ही हुई थी इसलिये उससे बातचीत करने का कोई सवाल ही नहीं था।वाइस प्रिन्सिपल सर ने अपने लेक्चर में ही बता दिया था कि आज कोई और लेक्चर नहीं होगा और कल से रेगुलर क्लासेज चलेंगी।अब सभी को उनके लेक्चर के खत्म होने का इन्तेजार था।उनकी क्लास जैसे ही खत्म हुई कि स्टूडेंट्स में बाहर निकलने की होड़ लग गई।गीतिका ने मुझसे कहा कि सबको निकलने दो फिर हम निकलेंगे और मैने भी बिना किसी बहस के उसकी बात को मान लिया।हमने कुछ देर इन्तेजार किया और जब पूरी क्लास खाली हो गई तब हम बाहर निकले और गीतिका की बगल वाली सीट पर बैठा लड़का भी हमारे साथ ही निकला।बाहर आते ही उसने कहा
-क्यों नहीं थोड़ी देर कहीं बैठा जाये,अभी घर जाकर भी क्या करेंगे,यह सुन कर गीतिका ने कहा
-अपना नाम तो बताओ ऐसे कैसे शामिल कर लें तुम्हे अपने ग्रुप में,यह सुनकर हम सब हँस पड़े।
मेरा नाम नीलाभ है,मेरे पापा इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में हैं और कुछ दिनों पहले ही यहां ट्रांसफर हो कर आये हैं।इसके बाद हम दोनों ने उसे अपने अपने बारे में बताया और तय हुआ कि गार्डन में चल कर बैठा जाये।हमने गार्डन में तकरीबन दो घन्टे बिताये और इन दो घण्टों में हमने एक दूसरे के बारे लगभग सारी जानकारी इकट्ठी कर ली,मसलन हम मूल रूप से कहाँ के हैं,परिवार में और कौन कौन है,हम आगे क्या करना चाहते हैं,हमारी रुचि किन किन चीजों में है और इसके साथ ही हम एक दूसरे से काफी खुल गये और ऐसा एहसास हुआ कि हमारी अच्छी पटेगी।
मेरे ख्याल से इसकी कई  वज़ह थी,पहली बात तो यह कि हम तीनों का कोई लोकल फ्रेंड नहीं था,दूसरा हम सब मिडल क्लास फैमिली से थे और तीसरा यह कि हम बायोलोजी ज़रुर पढ़ रहे थे परंतु कोई डाक्टर बनना नहीं  चाहता था।मैने यह सोच रखा था कि ग्रेज्युएशन मे आर्ट्स ले लूंगा फिर सोचूंगा क्या करना है।गीतिका और नीलाभ  दोनों ही प्रोफेसर बनना चाहते थे ।
कालेज का पहला दिन और ऐसी तिकड़ी का बन जाना हम सब के लिए किसी सर्प्राइज से कम नहीं था,हम सब ने अपने अपने घर जाकर इस तिकड़ी के बारे में बताया तो हमारे घर वालों को भी अच्छा लगा क्योंकि आस पास का कोई दोस्त हमारे पास नहीं था।धीरे धीरे हमारी दोस्ती गहरी होती गई,कालेज में भी हम हमेशा साथ ही होते थे,पूरे बैच में हमारी तिकड़ी बहुत फेमस हो गई थी।
इसी बीच मैथ सेक्शन के लिए दिये गये मेरे आवेदन को भी मंजूरी मिल गई पर इतना अच्छा ग्रुप छोड़ कर कौन जाता,यह सोच कर मै बायो में ही रह गया।हमने एक दिन अपने घरवालों को भी मिलाने की प्लानिंग की और नीलाभ के घर पर हम सपरिवार मिले,सभी लोगों ने इन्ज्वाय किया और हमारी दोस्ती की तारीफ भी की।हमारे दो साल कैसे बीत गए हमें पता ही नहीं चला,दरअसल जब फाइनल एक्जाम के तारीख की घोषणा हुई तो हमारे कान खड़े हो गए।
अब सिर्फ एक महीना ही बचा था और तारीख के बढ़ने की भी कोई सम्भावना नहीं थी  इसलिये हम जी जान से एक्जाम की तैयारी में जुट गए।कालेज जाना लगभग हमने बन्द ही कर दिया था क्योंकि हमारे अटेन्डेन्स लगभग पूरे हो चुके थे।हमारा घर भी दूर दूर ही था इसलिये मिलना जुलना भी नहीं ही होता था,हाँ कभी कभी फोन से बात हो जाती थी।गीतिका के घर फोन नहीं था तो वह कभी कभी बाहर निकल कर बात कर लिया करती थी।
फाइनल एक्जाम के दिन हम तीनों बहुत दिनों बाद मिले पर ज्यादा बात नहीं हो सकी,हाँ एक दूसरे को “ऑल द बेस्ट “बोल कर अपने अपने रुम में बैठ गए।फाइनल एक्जाम दो हफ्ते मे खत्म हो गया,प्रैक्टिकल की तारीख आनी बाकी थी,हम लोग भी थोड़े रिलैक्स हो गये थे क्योंकि प्रैक्टिकल का उतना डर नहीं था।इन दो सालों में मैने मह्सूस किया था कि नीलाभ,गीतिका में बहुत रुचि लेने लगा था या दूसरे शब्दों में कहूँ तो उसे लेकर काफी पोजेसिव रह्ता था।
मसलन,वह किन किन लड़कों से बात करती है,कितनी देर बात करती है,और वह फिर उसे आगाह भी किया करता था।कई बार तो गीतिका उससे झिड़क भी दिया करती थी और नीलाभ चुपचाप सुन लिया करता था।मुझे भी नीलाभ का ऐसा कहना अच्छा तो नहीं लगता था पर मैं यह भी सोचता था कि शायद वह गीतिका को एक दोस्त के नाते प्रोटेक्ट करना चाहता है क्योंकि उसके पापा नहीं हैं और ऐसे में उसके साथ कुछ गलत नहीं होना चाहिए।जब मैं ऐसा सोचता था तो मैं खुद को अपराध बोध से ग्रस्त मह्सूस करता था कि मैं अपने दोस्त के बारे में ऐसा कैसे सोच सकता हूँ।
प्रैक्टिकल एक्जाम की तारीख भी जल्दी ही घोषित हो गई,उसमे कुछ ज्यादा डर तो नहीं था पर वैवा को लेकर थोड़ी टेंशन ज़रुर थी कि पता नहीं एक्सटर्नल किस कालेज से होगा?क्या पूछेगा?पर जब वक़्त आया तो यह सब इतनी आसानी से हो गया कि पता ही नहीं चला कि कब हमारे प्रैक्टिकल भी हो गये।अन्तिम एक्जाम के दिन हम तीनों काफी देर तक कालेज कैम्पस में ही बैठे रहे और आगे क्या करना है इस पर बातचीत करते रहे।
मैने स्पस्ट कर दिया कि अब मैं आगे साइन्स नहीं पढूंगा,मै इंग्लिश लिटरेचर मे आनर्स करने के बाद एल एल बी करना चाहता हूँ,और मैने इस बारे में अपने घर में सभी को बता दिया है।गीतिका और नीलाभ दोनों के लिए मेरा यह निर्णय किसी आश्चर्य से कम नहीं था।
– तुम तो डाक्टर बनते बनते वकील बन गये,गीतिका ने हँसते हुए कहा था।
-मैं ज़ूलोजी में पी जी करने के बाद किसी कालेज में पढ़ाना चाहूंगी और हो सका तो पी एच डी भी करूँगी,दर असल मेरी माँ को प्रोफेसर का जॉब बहुत पसंद है।यह गीतिका का प्लान था।
-गीतिका यह मत कहना कि मैं कॉपी कैट हूँ,पर मेरा ईरादा भी प्रोफेसर बनने का ही है।मैं भी ज़ूलोजी में ही पी एच डी करना चाहता हूँ और फिर किसी अच्छे कालेज या युनिवर्सिटी से जुड़ना चाहूंगा,नीलाभ यह सब कुछ एक ही सांस में बोल गया।पर यह तो हम सोच रहे हैं ना,पता नहीं हमारी किस्मत हमे कहाँ ले जायेगी।
अरे,जो होगा देखा जायेगा,हम तीनों ने एक साथ कहा और फिर अपने अपने घरों के लिए चल पड़े।
इसके बाद हम दो तीन बार और मिले थे,एक बार गीतिका के घर,एक बार मेरे घर और एक बार रेस्तराँ में हमने साथ लंच किया था।रिजल्ट निकलने में अभी वक़्त था इसलिये हम सभी ने अपने अपने हिसाब से प्रोग्राम बना लिया था और एक रिश्तेदार से दूसरे रिश्तेदार के यहाँ घूम रहे थे।तकरीबन दो महीने बाद खबर मिली कि 12 जून को रिजल्ट आने वाला है।हमारे जमाने में रिजल्ट युनिवर्सिटी से कालेज मे पोस्ट से आया करता था जिसे कालेज के नोटिस बोर्ड पर लगा दिया जाता था।12 जून सुबह सुबह धड़कते दिल से हम तीनों कालेज पहुंच गए,फ़ेल होने का डर तो नहीं था पर अच्छे मार्क्स का टेंशन ज़रुर था।कालेज में हमे साथ देख कर कुछ दोस्तों ने कहा भी था
-मान गये तुम लोगों को गज़ब की दोस्ती है तुम्हारी,और हम तीनों ने मुस्कुराते हुए उनकी पीठ थपथपा दी थी।
रिजल्ट दिन के एक बजे नोटिस बोर्ड पर लगा दिया गया, हम सभी अपना अपना रौल नम्बर खोजने के लिये यहाँ वहाँ देख रहे थे कि इतने में  गीतिका जोर से चिल्लाई,
-अरे हम तीनों को फ़र्स्ट डिविजन मिली है,ये देखो 456, 423 और 515  ये हमारा ही नम्बर है
-गीतिका नाम भी देखो,नीलाभ ने खुशी से चीखते हुए कहा
-देख लिया,हमारा ही है और वह भीड़ से बाहर आ गई
-यह तो कमाल हो गया,मैं और नीलाभ एक साथ ही बोल पड़ें और फिर हमने दोबारा देखने की ज़रुरत नहीं समझी।तब तक अन्य सहपाठी जो हमारा नाम देख चुके थे,हमे बधाई देने लगे थे।थोड़ी देर बाद स्थिति स्पष्ट हो गई थी,हमारे बायो ग्रुप में आठ छात्रों को फ़र्स्ट डिवीजन मिली थी और ऐसे में हमारी तिकड़ी का चर्चे में रहना स्वाभाविक था,हर जगह हमारा नाम लिया जा रहा था।हमें अपने घर वालों को यह खबर जल्दी से जल्दी देनी थी,अतएव हम बिना और देर किये वहां से निकल पड़ें,बस हमने इतना पता कर लिया कि मार्क्सशीट एक हफ्ते बाद मिलेगी और उसके बाद ही एडमिशन की प्रक्रिया शुरु होगी।
हमने घर पहुँचने के बाद जब यह जानकारी दी सभी बहुत खुश हुए।मैने जब पापा को  गीतिका और नीलाभ के प्लान के बारे में बताया तो उन्होनें हँसते हुए कहा “तुम भी एक बार फिर से सोच लो,साइन्स सही मे छोड़ना है या इसी में आगे पढना है
-नहीं पापा,मैंने सोच लिया है कि मुझे क्या करना है और मैं वही करना चाहता हूँ,आपको तो कोई तकलीफ नहीं है?
-देखो,मैने वही किया जो मैं करना चाहता था,बाबूजी कभी बीच में नहीं आये,तो मैं तुम्हे क्यों रोकना चाहूंगा,तुम्हे जो अच्छालगता है वही करो।
एक हफ्ते बाद एडमिशन की प्रक्रिया शुरु हो गई ।गीतिका और नीलाभ को कुछ खास नहीं करना पड़ा,बस उन्होने फीस जमा की और एडमिशन मिल गया पर मेरा एडमिशन प्रोविजनल हुआ और मुझसे यह कहा गया कि मुझे इण्टर लेवल की अगले वर्ष होने वाली परीक्षा में इंग्लिश लिटरेचर सबजेक्ट की परीक्षा पास करनी होगी तभी मैं इस सबजेक्ट में ऑनर्स कर पाउंगा।मुझे इससे कोई परेशानी नहीं हुई बल्कि मुझे खुशी इस बात की थी कि अब प्रैक्टिकल से मुक्ति मिल चुकी थी वर्ना अर्थवर्म और कॉकरोच से मैं त्रस्त हो चुका था।कुछ दिनों बाद ही नया सेशन शुरु हो गया।अब मेरा रूटीन उन दोनों से अलग हो गया था,मेरा समय 11 वजे का था  और उन दोनों का सुबह 8.30 का ज़ाहिर है हमारी मुलाकात कम होने लगी।पर हमारी कोशिश होती थी कि जब भी वक़्त मिले हम एक बार ज़रुर मिल लें।
शुरुआत में तो यह सिलसिला नियमित चला पर समय के साथ साथ इसका अन्तराल बढ़ता गया।मेरे भी कुछ नये दोस्त बन गये थे और इंग्लिश  लिटरेचर सोसायटी की गतिविधियाँ भी चलती रहती थीं और मैं उनमे कुछ ज्यादा ही सक्रिय रहा करता था।एक दिन डिबेट की तैयारी के सिलसिले में मुझे काफी देर हो गई थी,मैं जल्दी से घर पहुँचना चाह्ता था और तेज तेज चल रहा था क्योंकि मेनगेट पर मुझे एक बस आती हुई दिख रही थी।मुझे अचानक ऐसा लगा मानो कोई मुझे पुकार रहा हो,एक बार तो लगा मेरा भ्रम है क्योंकि इतनी देर तक कालेज में कौन रुकता है,पर जब दोबारा आवाज़ आई तो मैने पीछे मुड़ कर देखा,अरे यह तो गीतिका थी जो लगभग दौड़ते हुए आ रही थी।
-मैं कब से पुकार रही हूँ तुम्हे,वह हाँफ रही थी
-ओह्ह,बिल्कुल ध्यान नहीं गया,भूख लगी थी सोचा जल्दी घर पहुँच जाउँ
-भाई भूख तो मुझे भी लगी है चलो कुछ खा लेते हैं।प्रस्ताव बुरा नहीं था और गीतिका को नहीं कहना मुश्किल था,इसलिये बिना कुछ बोले मैंने  उसके साथ हो लेना बेहतर समझा।हमने वेटर को दो डोसा जल्दी लाने को कहा और इन्तेजार करने लगे।गीतिका ने ही मुझसे पूछा,
-आज इतना लेट क्यों हो गये
-अगले हफ्ते कालेज में डिबेट कम्पीटिशन है और यह जिम्मेदारी मेरी है,बस इसी में लेट हो गया आज
-और तुम क्यों लेट हो गई
-लाइब्रेरी में थी,कुछ नोट्स बना रही थी
-नीलाभ साथ में नहीं था
-नहीं,आज वह आया ही नहीं था,उसके पापा की तबियत ठीक नहीं है
-औह,वैसे कुछ सीरियस तो नहीं है
-ऐसा कुछ बताया नहीं उसने,शायद हाई फीवर है
-इस संडे घर ही चला जाऊँगा उसके,बहुत दिनों से मिला नहीं हूँ उससे
-राज,एक बात बताउँ,वह मुझे लेकर कुछ ज्यादा ही पोजेसिव होने लगा है आजकल,मुझे बहुत कोफ्त होती है
-नीलाभ थोड़ा सेंटीमेंटल टाईप है,वह तुम्हारी केयर करता है,अच्छा है ना,टेंशन क्यों लेती हो,प्रपोज तो नहीं किया ना उसने!
-शटअप,,कह्ते हुए उसने मुझे झिड़क दिया
तब तक वेटर डोसा ले कर आयेगा,हम दोनों को ही जोर की भूख लगी थी इसलिये अब बात करने के मूड मे कोई नहीं था।हमने जल्दी से डोसा खत्म किया और बाहर आ कर बस का इन्तेजार करने लगे।आने वाली पहली बस गीतिका के घर की तरफ जाती थी,उसने वह बस ले ली और थोड़ी देर बाद मुझे भी बस मिल गई।अगले संडे घर में कुछ गेस्ट आ गये तो मैं नीलाभ से मिलने नहीं जा पाया।
समय बहुत तेजी से गुजरता जा रहा था,हमारी मुलाकात गाहे बगाहे होती रही  दो तीन बार गीतिका के घर पर मिलना भी हुआ।मुझे भी नीलाभ का व्यवहार थोड़ा अलग सा लगा पर मैने इसे गम्भीरता से नहीं लिया।इसी बीच हमारे फाइनल एक्जाम की तारीख भी आ गई,सब अपनी अपनी तैयारी में लग गये।हम तीनों का ही सेंटर पास के ही एक कालेज में था पर सबजेक्ट अलग अलग होने के कारण हमारा मिलना नहीं हुआ।फाइनल के रिजल्ट आने के पहले ही मेरे पापा का प्रमोशन हो गया और उनका ट्रांसफर भोपाल हो गया।
पापा की राय यही थी कि मेरे यहां सिर्फ कानून की पढ़ाई के लिये अकेले रहने का कोई औचित्य नहीं था इसलिये मेरे लिए यह शहर छोड़ना लाजिमी था।जब यह बात मैने दोनों को बताई तो उन्हें बहुत बुरा लगा पर इसका कोई विकल्प नहीं था।पापा   ऑर्डर आते ही भोपाल चले गए और अगले महीने हम सपरिवार भोपाल शिफ्ट हो गये।शहर छोड़ने के पहले हम तीनों मिले थे,हमारी लम्बी बातचीत हुई थी,यह तय हुआ था कि जब मै रिजल्ट लेने आऊँगा तो नीलाभ के घर ही रुकूंगा और फिर एक हफ्ते हम तीनों साथ मिल कर खूब इन्ज्वाय करेंगे।
पर ऐसा हुआ नहीं जब रिजल्ट आया तो उस समय मेरी माँ काफी बीमार चल रही थीं,लिहाजा मैं आया तो ज़रुर पर रिजल्ट और सारे पेपर्स ले कर उसी दिन लौट गया।हमारी मुलाकात मुश्किल से एक घन्टे की हुई होगी।नीलाभ और गीतिका दोनों को ही फ़र्स्ट क्लास मिली थी जबकि मुझे सेकंड क्लास।पर इसका मुझे ज्यादा मलाल नहीं था,हालांकि वो दोनो मेरे रिजल्ट को ले कर थोड़ा अपसेट थे,पर मैं बिल्कुल सहज था क्योंकि मुझे पता था कि मैं जिस करियर को अपनाने जा रहा हूँ वहाँ कुछ अंकों से फ़र्स्ट क्लास छूट जाने का कोई खास महत्व नहीं होता।उस छोटी सी मुलाकात के दौरान ही मुझे जानकारी मिली कि उन दोनों का इरादा बी एच यू जाने का है ताकि पी जी के बाद रिसर्च भी वहीं से किया जा सके।मैं उसी दिन वहां से लौट गया और मैने भोपाल में ही एल एल बी में एडमिशन ले लिया।जिन्दगी एक पटरी पर चलने लगी।एक नया शहर,नई रवायत,नये दोस्त और एक गम्भीर पढ़ाई,यानी थोड़े में एक चुनौती और मैं उसका सामना करने में व्यस्त हो गया।शुरु में उन दोनों से पत्र व्यवहार होता रहा पर धीरे धीरे अन्तराल बढ़ता गया और मेरी पढाई पूरी होते होते लगभग खत्म हो गया।
मैने भी कानून की डिग्री हासिल करने के बाद एक चैंबर ज्वाइन किया,मेरे सीनियर बहुत सुलझे हुए इन्सान थे,उनकी शागिर्दी में जो कुछ सीखा था मैने। आज उसका ही तकाजा था कि पिछ्ले बीस सालों की प्रैक्टिस में आज मैं शहर का माना हुआ वकील था।इज्जत,शोहरत, एक भरा पूरा परिवार और पैसा सबकुछ था मेरे पास। आज इतने दिनों बाद अपने अतीत में झांकने की वज़ह थी,मेरे टेबल पर रखा वह लिफ़ाफ़ा जिसे मैं खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।भेजने वाले का नाम डा गीतिका था और पता दिल्ली का था।मेरे क्लर्क ने बताया कि यह रजिस्ट्री से आया था।लिफ़ाफ़ा खोलते वक़्त मेरे जैसे अनुभवी क्रिमिनल एडवोकेट के हाथ भी कांप रहे थे।पत्र पर कोई तारीख नहीं थी,सीधे सम्बोधन ही था
प्रिय राज
ऐसा नहीं है कि मै तुम्हे भूल गई हूँ या तुम मुझे भूल गये होगे सच यही है कि हम एक दूसरे को कभी भूल ही नहीं सकते,भले ही हमारा आपसी सम्पर्क हो या नहीं हो।पिछ्ले हफ्ते ही एक हिन्दी दैनिक मे तुम्हारे बारे में छपा था,शायद तुम्हे किसी संस्था ने सम्मानित किया था,फिर मैं खुद को रोक नहीं पाई और फिर उस दैनिक के दफ्तर को फोन करके तुम्हारा पता लिया और तुम्हे लिखने बैठ गई।अपने आस पास जमा भीड़ में एक तुम ही ऐसे लगे जिससे कुछ कहने की हिम्मत जुटा पा रही हूँ। मैं बहुत टूट चुकी हूँ राज ,मैं यह भी नहीं तय कर पा रही हूँ कि तुम्हे सब कुछ बताना कहाँ से शुरु करूं,,,चलो शुरु से बताती हूँ।
हम दोनों को ही  बी एच यू  मे एडमिशन मिल गया था और हॉस्टल भी,मेरी माँ को इस बात की तसल्ली होती थी कि मैं अकेली नहीं हूँ,पर वे खुद को बहुत अकेली मह्सूस करती थीं इसलिए मैं हर महीने माँ के पास एक दो दिन के लिए चली जाया करती थी।वो दो तीन दिन नीलाभ के लिये मुश्किल वाले दिन होते थे क्योंकि वह बहुत अकेला फ़ील करता था।एक दिन उसने मुझसे कहा भी मेरे नहीं रहने पर उसे अच्छा नहीं लगता तो मैने हँसते हुए कहा कि मैं उसकी कौन हूँ,,दोस्त ही ना कल को जब मेरी शादी   हो जायेगी तो उसका क्या होगा।मुझे उसके चेहरे से लगा कि मेरी बात उसे बुरी लगी है पर उसने कुछ बोला नहीं।ऐसे ही वक़्त गुजरता रहा पर उसका मेरे प्रति पोजेसिव होना दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा था।
इस बीच मैने उससे कई बार कहा था कि हमें राज से मिलने की कोशिश करनी चाहिए पर वह यह कह कर  टाल जाता था  कि हम उसे कहाँ खोजेंगे,जबकि इस बात को वह भी जानता था कि तुम अपना पता अपने मकान मालिक को दे कर आये हो।मुझे ऐसा लगता है कि उसे इस बात का डर था कि तुम कहीं मुझे उसके खिलाफ भड़का तो नहीं दोगे।इसी दरम्यान मेरी माँ और अंकल दोनों का प्रमोशन हो गया और वह शहर लगभग छूट ही गया।एक दिन तो हद ही हो गई जब उसने हमारे लैब ब्वाय को डांट दिया कि वह मेरे से दूर रहा करे और जब मैने इस बात पर आपत्ति उठाई तो उसने मुझे यह कह डांट दिया कि मैं बहुत इनोसेंट हूँ और अपना भला बुरा नहीं सोच पाती।मैने भी उसे उस दिन बहुत कुछ बोला पर उस पर कोई असर नहीं हुआ।मैने यह सारी बातें अपनी माँ को बताई थी पर उन्होने कुछ खास रिएक्ट नहीं किया।
कुछ दिनों बाद हमारे फाइनल एक्जाम हो गये और हम अपने अपने घरों को लौट गये जबकि नीलाभ कुछ दिनों और रहना चाह रहा था पर मैने मना कर दिया।इस बीच वह लगातार घर पर फोन करता था,एक बार मिलने भी आया था।माँ ने मुझसे हँसते हुए कहा था गीतू,लड़का बुरा नहीं है सोच लो और मैने भी माँ को हँसते हुए कहा था “नो वे मम्मी “।
एक लम्बे इन्तेजार के बाद पी जी फाइनल का रिजल्ट आ गया पर वह चौंकाने वाला था।मैने युनिवर्सिटी में टॉप किया था और नीलाभ की भी फ़र्स्ट क्लास थी पर कोई रैंक नहीं था।इस बात को लेकर नीलाभ कई दिनों तक अपसेट रहा था।मेरे रैंक की वज़ह से मेरे एच ओ डी ने मुझे एक लोकल कालेज में एडहाक लेक्चरशीप  दिलवा दी और रिसर्च शुरु करने की औपचारिकता भी शुरु हो गई।नीलाभ थोड़ा परेशान चल रहा था,मैने उससे कहा कि वह भी रिसर्च के लिए अप्लाई कर दे पर वह नहीं माना,उसका कहना था कि वह जॉब मिलने के बाद ही रिसर्च करना चाहेगा।करीब एक हफ्ते बाद उसने मुझसे कहा कि वह घर जा रहा है और कुछ दिन बाद आयेगा।
मैने पढ़ाना शुरु कर दिया था और रिसर्च शुरु करने का भी मन बना चुकी थी।शायद किस्मत को मेरी खुशी रास नहीं आई,एक दिन मेरे पड़ोसी का मेसेज आया कि मेरी माँ का हार्ट अटेक हुआ है और मुझे जल्दी आने को कहा।मैं तुरंत वहां से निकल पड़ी पर मुझे माँ के अन्तिम दर्शन नहीं हो सके।तुम सोच सकते हो मुझ पर क्या गुजरी होगी।मैं बिल्कुल टूट चुकी थी पर नीलाभ ऐसे बुरे दिनों में मेरे साथ ही रहा,उसने मुझे हौसला दिया और माँ की तेरहवीं होते ही मेरे साथ ही युनिवर्सिटी आ गया।कुछ दिनों तक तो मेरी स्थिति पागलों जैसी हो गई थी पर यह नीलाभ ही था जिसने मुझे फिर से नई जिन्दगी दे दी।मेरे एच ओ डी मुझे अपनी बेटी ही मानते थे,उन्होँने मेरे कहने पर नीलाभ को भी एक दूसरे लोकल कालेज में एडहाक लेक्चरशीप दिलवा दी।हम दोंनों ने पढ़ाना शुरु कर दिया था।
वसंत पंचमी के दिन मेरे कालेज में सरस्वती पूजा का भव्य आयोजन किया गया था,मैने नीलाभ को भी बुलाया था,वह आया और काफी देर मेरे साथ ही रहा।चलते समय उसने अचानक मेरे हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा कि वह मुझसे शादी करना चाहता है,मैने उसे कोई जबाब नहीं दिया पर उसने कहा की वह कल सुबह आयेगा और हम सीधे मन्दिर चलेंगे,उसने यह भी कहा कि उसने अपने घर वालों से बात कर ली है और उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।मैने रात भर खूब सोचा पर कोई निष्कर्ष नहीं निकला,किससे सलाह लेती,तुम भी टच में नहीं थे।सुबह वह फिर आया मैने ज्यादा सोचा नहीं,हम दोनों ने मन्दिर में जा कर शादी कर ली।इस तरह एक नई जिन्दगी की शुरुआत हो गई।हम एक हफ्ते के लिए नीलाभ के घर गये सभी लोग खुश थे,वहां एक छोटी सी पार्टी भी हुई,फिर हम लौट आये और अपने अपने काम में व्यस्त हो गये।
शुरुआत के कुछ महीनों में सब कुछ सामान्य चलता रहा पर धीरे धीरे नीलाभ की पोजेसिवनेस ने रंग दिखाना शुरु कर दिया।कालेज के  किसी भी पुरुष सहकर्मियों से मेरा बात करना उसे बिल्कुल पसंद नहीं आता था।यहाँ तक कि मेरे गाईड  को भी वह पसंद नहीं करता था।पर मैं सब कुछ मैनेज करती रही।मैने अपना थीसिस निर्धारित समय के भीतर जमा कर दिया और मैने उसे पूरा भी कर लिया।नीलाभ के थीसिस का अभी बहुत काम बाकी था पर वह मेरी हेल्प लेने को बिल्कुल तैयार नहीं था।धीरे धीरे स्थितियां बद से बदतर होती जा रही थीं,इसी बीच मैं एक बेटी की माँ भी बन गई लेकिन उसके स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया।मेरा जीना मुश्किल होता जा रहा था,पर मैं क्या करती,निर्णय मेरा ही था।हमारे बीच संवाद लगभग खत्म हो चुका था।उसे मेरी बेटी पर भी शक़ था कि वह उसकी है भी या नहीं।मेरी मानसिक स्थिति का अन्दाजा तुम लगा सकते हो फिर भी मैं टूटी नहीं थी,बल्कि मैं अपने परिवार को बचाने की यथा सम्भव कोशिश कर रही थी।पर उस दिन तो नीलाभ ने सारी हदें तोड़ दी जब उसने मेरे जूनियर के सामने ही मुझे ज़लील करना शुरु कर दिया,बेचारा प्रो भटनागर खुद शर्मिन्दा हो कर वहाँ से निकल गया।घर लौटने पर घंटों हमारी तू तू  मैं मैं होती रहे।मैने उसे स्पष्ट शब्दों में कहा कि तुम मानसिक रोगी हो,तुम्हे ईलाज की ज़रुरत है,इतना सुनते ही वह अपने गुस्से को काबू में नहीं रख सका और उसने मुझे तड़ा तड़ तीन चार थप्पड़ दे दिये,मैं खुद को सम्भाल नहीं सकी और नीचे गिर गई,यह सब देख कर मेरी बेटी भी रोने लगी। मैं उस दिन अपने एक फ्रेंड के घर चली गई पर वह वहाँ भी पहुँच गया और घर चलने की जिद करने लगा।मेरे नहीं तैयार होने पर उसने वहाँ भी मुझ पर हाथ उठा दिया।यह सब मेरे लिए असहनीय  था,मेरा स्वाभिमान मुझे धिक्कारने लगा था,मैने तुरंत पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।हालांकि उसे कोर्ट से ज़मानत मिल गई है और  हमारा केस चल रहा है।मैं समझ सकती हूँ कि यह उसकी हताशा और निराशा है,पर मैं भी तंग आ चुकी थी,मैं क्या करती।
यह सब तुम्हे बता कर तुम्हे दुखी करने का कोई इरादा नहीं है पर शायद थोड़ा जी हल्का हो जाये इसलिये लिख दिया है।
मैं अब बिल्कुल ठीक हूँ,मेरी चिन्ता मत करना।
तुम्हारी दोस्त
गीतिका
पत्र खत्म होते होते मैं पसीने से बुरी तरह भींग चुका था,मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं!पुरानी सारी बातें चल चित्र की तरह घूमने लगीं थीं।कालेज का वह पहला दिन और आज का दिन,,,,जिन्दगी कैसे कैसे रंग दिखाती है,,हरेक किरदार की अपनी अपनी भूमिका होती है,,,,हरेक किरदार अपनी भूमिका को बखूबी निभाने की कोशिश करता है,,चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक,,पर किरदारों का यह दाव पेंच जिन्दगी को कैसे मुकाम पर ला खड़ा करता है,, यह अपने आप मे किसी सन्जीदा सवाल से कम नहीं होता,,,,हम तीन किरदारों को इससे बेहतर कौन समझ सकता है।
मैं यह तय कर लेता हूँ,जल्दी ही गीतिका और नीलाभ दोनों से मिलूंगा।

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