फिल्म ‘शहीद’ के भगत सिंह नहीं रहे…
(मनोज कुमार के निधन पर विशेष – 14 जुलाई 1937- 4 अप्रैल 2025)
- सूर्य कांत शर्मा
जब मनोज कुमार ‘शहीद’ फिल्म बना रहे थे तो अमर शहीद भगत सिंह के छोटे भाई कुलतार सिंह जी उनसे मिलने आए और बाद में वे उन्हें अपनी माता स्वर्गीया विद्यावती कौर (जिन्हें हम पंजाब माता या वीर माता के नाम से भी जानते हैं) के पास ले गए और पूछा देखो यह हमारे भाई भगत सिंह जैसे नहीं लगते हैं। माता विद्यावती कौर ने देखा और मृदुल मुस्कान के साथ कहा… हाँ… काफ़ी कुछ ऐसे ही थे।
और आज वही अमर शहीद भगत सिंह के किरदार को जीवंत रूप से पर्दे पर उतार कर उनकी वीर कुर्बानी गाथा को अमर कर देने वाला कालजयी कलाकार 87 वर्ष की आयु में अपनी अनंत यात्रा पर चला गया, जहाँ देश भक्त शिरोमणि भगत सिंह और प्रेम धवन सरीखे मित्र भी उस राह में मिलें।
24 जुलाई सन 1937 एबटाबाद अविभाजित भारत (अब पाकिस्तान) में उनका जन्म हुआ। उनका असली नाम था हरि किशन गोस्वामी। लंबी ऊंची कद काठी लंबाई लगभग 6 फीट 1 इंच और खूबसूरती से लबरेज़ यह नौजवान पहले थिएटर और फिर फिल्म की दुनिया बंबई और अब मुंबई में आया और फिर यहीं का होकर रह गया। यहां उसे संघर्ष और समीचीन अभिनेताओं से कड़ी स्पर्धा मिली। इस कठोर मेहनत ने उन्हें भारत कुमार का नाम, शोहरत और वो सभी कुछ मिला जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है।
प्रेम धवन जैसे बहुआयामी सृजनकर्मी की दोस्ती प्रेम और सानिध्य जम कर मिला। स्वर्गीय प्रेम धवन की चर्चा यूं भी जरूरी है क्योंकि उनके लिखे गीत एक नज़ीर या दृष्टांत के तौर पर ए वतन, ए वतन, हमको तेरी कसम… मेरा रंग दे बसंती चोला… सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है… और एक और पंजाबी लोग संगीत में रंगा गीत – जोगी हम तो लुट गए तेरे प्यार में… ये वो गीत है जिन्होंने हरि किशन गोस्वामी को पहले मनोज कुमार और फिर भारत कुमार बना कर देश और दुनिया के सामने भारत के सांस्कृतिक राजदूत की सी छवि में प्रस्तुत कर दिया। मनोज कुमार जी मानते थे कि प्रेम धवन जी को वो शोहरत नहीं मिली जिसके वो हकदार थे।
मनोज कुमार अभिनय के बेताज़ बादशाह स्वर्गीय दिलीप कुमार से काफी प्रभावित थे। अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि अपने बचपन दिलीप कुमार साहब की फिल्म ‘शबनम’ देखी जिसने बतौर किरदार उनका नाम मनोज कुमार था। बस यहीं से उन्होंने अपना नाम बदल कर मनोज कुमार रख लिया था और यहीं से कला के आकाश में एक नया सितारा उदय हुआ जो साल 1957 में आई फिल्म फैशन से लोगों की नजरों में आया जिसमें उनका एक छोटा सा किरदार था, बूढ़े भिखारी का। इसके बाद उन्हें मशहूर अदाकारा स्वर्गीय मीना कुमारी के साथ ही कुछ छोटे-मोटे सीन करने के मौके मिले।
विधिवत रूप से सन 1961 में वे पहली बार हीरो बने और फिल्म थी ‘कांच की गुड़िया’ उनकी सादगी और ईमानदारी से उनकी एक अलग छवि बनी और सन 1962 में लगातार चार फिल्मों में संवेदनशील अभिनय के कारण उनकी फिल्मी करियर को एक नई उड़ान और पहचान मिली। मनोज कुमार के दिलों दिमाग पर अमर शहीद भगत सिंह का गहरा असर था वह देश को एक विकसित राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे उनकी अपनी बहुत सी फिल्म जो उन्होंने स्वयं या निर्देशित की या अभिनय किया और ऐसी प्रसिद्धि प्राप्त फिल्में हैं शहीद, उपकार, क्रांति, पूरब और पश्चिम यह सभी फिल्में देश के प्रति प्रेम को उजागर करती है और यही से उन्हें भारत कुमार की उपाधि भी मिल गई ।
भारत के कर्मठ और जुझारू प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री से उनकी मुलाकात दिल्ली में उनकी ही एक फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान हुई ।जहां शास्त्री जी ने मनोज कुमार से कहा कि जय जवान जय किसान पर कुछ ऐसी फिल्म बनाएं कि लोग याद रखें। यदि मीडिया की माने तो कहते हैं कि वह जब ट्रेन से मुंबई लौट रहे थे तो उन्होंने मुंबई सेंट्रल स्टेशन तक आते-आते फिल्म उपकार की कहानी तैयार कर दी थी।
यहां पर पाठकों और विशेष रूप से युवा वर्ग को, रोमांटिक हीरो के तौर पर उन्हें यानी मनोज कुमार को प्रसिद्धि मिली सन 1962 में आई फिल्म हरियाली और रास्ता से और उसके बाद तो हिमालय की गोद में (1965) दो बदन (1966) पत्थर के सनम (1967) अनीता (1967) आदमी (1967) नील कमल (1968) उनकी इस छवि पर मुहर पर मुहर लगाती चली गईं।यह भारत कुमार एक स्वाभिमानी और आत्मविश्वास से लबरेज़ संपूर्ण व्यक्तित्व था।
अभिव्यक्ति की आजादी उनके प्राथमिक मिशन में से एक थी और यही कारण है कि मनोज कुमार पर जब स्वर्गीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लागू की और एक डाक्यूमेंट्री बनाने के लिए कहा तो इस अभिनेता ने साफ-साफ मना कर दिया जिसका खामियाजा उनकी प्रसिद्ध फिल्म 10 नंबरी रोक लगाने से हुआ था। इस पर भी उनकी प्रसिद्ध फिल्म पूरब और पश्चिम पर तारीफ के साथ-साथ सवाल भी उठे उनकी फिल्मों में भारतीय संस्कृति की तुलना में पश्चिमी संस्कृति को दिखाने जैसे लड़कियों का सिगरेट पीना और छोटे कपड़े पहने पर उंगलियां उठती रही हैं।
यह स्वाभाविक भी है क्योंकि कलाकार भी तो इंसान ही है। उनकी प्रसिद्ध फिल्में थी उपकार (1967),पूरब और पश्चिम( 1970), शोर (1972), रोटी कपड़ा और मकान (1974), क्रांति (1981), कलयुग और रामायण (1987) क्लर्क (1989) जय हिंद (1999)।इस कलाकार को समय-समय पर बहुत से सम्मान मिलते रहे जिसमें पद्मश्री और पूरे जीवन काल में सात फिल्म फेयर अवार्ड, दादा साहब फाल्के जैसे खिताब उन्हें मिले। सन 1968 उनके लिए विशेष रहा जिसमें उन्हें चार फिल्म अवार्ड दिए गए। दादा साहेब फाल्के अवार्ड साल 2016 में उसे वक्त के राष्ट्रपति स्वर्गीय श्री प्रणब मुखर्जी के द्वारा दिया गया था।
भारत कुमार यानी मनोज कुमार और असली नाम वाले हरि किशन गोस्वामी शिरडी के साईं बाबा के अनन्य भक्त रहे हैं और उनकी साइन बाबा के प्रति भक्ति को मान्यता देते हुए शिर्डी में श्री साइन बाबा संस्थान ट्रस्ट ने शिर्डी में पिंपल वादी रोड का नाम बदलकर मनोज कुमार गोस्वामी रोड कर दिया था।
देश भक्ति,अभिव्यक्ति की आज़ादी और दिलों पर राज करने वाला यह नायक अब हमारे बीच नहीं है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की खुशबू सदैव हमारे साथ
अपनी कलात्मकता रचनात्मकता और सकारात्मकता के रहेगी। पुरवाई पत्रिका परिवार और उसके देश और पूरी दुनिया में फैले पाठक और प्रशंसकों की ओर से फिल्मी दुनिया की विभूति को विनम्र श्रद्धांजलि।

सूर्य कांत शर्मा
फिल्म समीक्षक एवं प्रसारण कर्मी
Mobile: +91 79826 20596

Shat shat naman.aap sada jeewit rahenge
Shat shat naman.aap sada jeewit rahenge
जिस दिन मनोज कुमार नहीं रहे उस दिन से उनके न जाने कितने वीडियो देख लिये।उनकी शख्सियत को और बेहतर जाना है आपकी इस श्रद्धांजलि से। उपकार की कहानी का जन्म कैसे हुआ यह नई बात पता चली।
मनोज कुमार के लिए तो जितना भी कहा जाए कम है।
हमारी ओर से भी भारत कुमार को सादर श्रद्धांजलि