Wednesday, April 15, 2026
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ममता मेहता – ग़ज़ल

ग़ज़ल – ममता मेहता

चलते चलते यूं रुक जाना किसको अच्छा लगता है
मंजिल से यूं दूर जाना किसको अच्छा लगता है

ऊंची नीची राहों पर चलना सबकी मजबूरी है
राहों में यूं ठोकर खाना किसको अच्छा लगता है

दिख जाए बस एक झलक हर दिल को है चाहत इतनी
दिख जाने पर यूं कतराना किसको अच्छा लगता है

सर्द हवा के झोंके आएं फूलों में उठती सिहरन
मौसम का भी यूं बहकाना किसको अच्छा लगता है

नदियों की ही हिम्मत है जो सागर से जाकर मिलतीं
मीठे से खारा हो जाना किसको अच्छा लगता है

होठों पर हैं कई अफ़साने आंखों में सैलाब भरे
रोते रोते यूं मुस्काना किसको अच्छा लगता है

काट रही है हँस कर जीवन ‘ममता’ का अंदाज़ यही
जीवन भर यूं दुखड़े गाना किसको अच्छा लगता है

 

 

डॉ ममता मेहता अमरावती
Mobile: +91 94045 17240

 

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2 टिप्पणी

  1. अच्छी ग़ज़ल है ममता आपकी। वैसे तो पूरी ही अच्छी है लेकिन जो सबसे अधिक अच्छा लगा-

    “नदियों की ही हिम्मत है जो सागर से जाकर मिलतीं
    मीठे से खारा हो जाना किसको अच्छा लगता है”

    बेहतरीन गजल के लिए आपको बधाई।

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