Saturday, May 18, 2024
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शिल्पा सोनटके की तीन कविताएँ

1- खोज 
काँप गए थे हाथ जिन वादों को करते हुए,
उनको निभाने की रस्म ढूंढ लाएँ,
बेसुरी जिंदगी में लय ही नहीं है ,
बेतरतीब लफ्जों से नज्म ढूंढ लाएँ,
रुसवाईयां ही थी जागे हैं जब भी,
हो जो बुलंद वो स्वप्न ढूंढ लाएँ,
बेभरोसे के रिश्तों की इस भीड़ में,
मांग सकें जिसका साथ बेझिजक,
जो समझ सके बहुत कुछ बिन कहे,
अनुभूतियों की ऐसी चलो ढूँढे सूरत,
और इंसा की नयी एक नस्ल ढूंढ लाएँ॰
2- नितांत अपनी 
घूँघट की ओट में रतनारी पलकें,
बह जाने को बेकल व्यथा कौन समझेगा ?
कहना है जो उसे केवल वही
शब्दों का अभिप्रेत कौन समझेगा ?
होंगी जहां नाराजगी केवल रुसवाईयां,
प्रीत और सुलह कौन समझेगा ?
बर्दाश्त नहीं चोटों की भरमार है,
छोड़ दें तकरार उलझन कौन समझेगा ?
ये जहां नहीं दिल का अफसोस कैसा,
हर मन की नितांत अपनी है ….
अपनी कहते हैं जिसे वो तड़पन कौन समझेगा ?

3 – आदमी 

अजब हालातों में पल गया है आदमी,
मशीनों के साँचे में ढल गया है आदमी,
अपने परायों के बीच बेमेल फासले,
देख इनको दहल गया है आदमी ,
तिलमिला उठा था यू तो बेबात के फरेब से ,
चंद सपनों से मगर बहल गया है आदमी,
बर्फीले हो चले एहसासों के दरमियाँ,
देख ऊर्मिल पल मचल गया है आदमी,
जीते रहना एक अनिवार्य शर्त हो गयी है जब,
टूटा तो बहुत पर संभल गया है आदमी
शिल्पा सोनटके
शिल्पा सोनटके
शिल्पा सोनटके के 6 हिन्दी उर्दू मिश्रित काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. साझा संग्रहों में रचनाएं प्रकाशितहैं. कई पुस्तकों का अनुवाद कार्य भी आपने किया है. डिस्कवरी चैनल के कथाशों का अनुवाद भी किया है. साहित्य सरस्वती सम्मान, महादेवी वर्मा साहित्य रत्न सम्मान आदि अनेक सम्मानों से सम्मानित. संपर्क - cool.craby@gmail.com
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