हाँ!! यही तो नाम था उसका, बचपन से बस इसी नाम से तो पुकारा जाता था उसे, नानी भी यही कहती थी ‘अरी कलमुँही! बहरी है क्या, अरे कलमुँही! पैदा होते ही मर क्यों न गयी, उनके ये शब्द सदा ही जिन्दा होने के एहसास को मार देते थे। लगता था कोई पुतला है वो, जिसमे रोबोटिक शक्ति आ गयी हो और नाना उसे देखकर जाने क्यों सर घुमा लेते थे। सच कहूँ तो कभी समझ नहीं पायी वो, कि ये घृणा थी या शर्मिंदगी, पर जो भी थी बहुत सच्ची थी। 
ये तो है जब भी जिसने भी उसके  प्रति अपनी भावना दर्शायी, बिलकुल सोलह आने सच्ची थी।
 हाँ!!  ये बात अलग है उसमे नफरत, घृणा, कडुवाहट ही उसके  हिस्से आई। कहते है न कोई बात बार – बार कही जाये, तो वो ही अच्छी लगने लगती है, बस बहुत प्यारा लगने लगा उसे उसका नाम ”कलमुँही”। 
कई बार जानना चाहा क्यों है कलमुँही वो।
रंग तो गोरा था उसका, शुक्लपक्ष के चाँद जैसा, उजला। कहा तो किसी ने कभी नहीं मुँह से, पर दर्पण कहता था रात के अँधेरे में चुपके से जब वो उसे देखती थी, अंतर्मन दर्पण की आवाज बनकर चीत्कार करता था “बहुत सुन्दर है रे तू कलमुँही”। 
हँस पड़ती थी वो खुलकर, एक रात और अंधेरा ही तो उसका अपना था। पर तब भी जाने क्यों आँखे कभी उसकी ख़ुशी का साथ नहीं देती थी, जलनखोट्टी भर जाती थी नीर से और कर देती थी धुंधला, अधूरे पूरे सच को। कहती थी वो दीदी!! दुश्मन अखियाँ ! मेरी सुन्दरता से जलकर आँसू बहाती है ।
यौवन आया तो सपने भी आये सोचा कोई तो अपना होगा जो उसके  रूप को सराहेगा कम से कम कलमुँही नहीं कहेगा। 
पर कलमुँही ! कलमुँही ही रही, क्या सास, क्या पति बस परिवेश और घर बदल गए थे। भावनाएं वही चित-परिचित।
यूँ तो उसे आदत थी अपने प्रति लोंगों की उपेक्षा और तिरस्कार के व्यवहार की। पर स्वप्न टूटे थे वो भी यौवन के प्रेम और अनुराग से पूर्ण। बचपन से यही व्यवहार उसके लिए सामान्य व्यवहार रहा था इसलिए बुरा लगने की भावना से कोसों दूर थी। पर प्रेम जिसकी लालसा थी उसे, जो कल्पना मे था उसके, पति से उपेक्षा असहनीय क्यों होने लगी थी। सुना था मिट्टी की दीवारों के पीछे से उसने जब नाना ने कहा था जमीन जाती है तो जाये बस इस कलमुँही को निकालो यहां से। प्रश्न तो ये भी था क्या वो दहेज के नाम पर बेची गयी थी पर उससे भी विकट प्रश्न प्रेम का न होना था। उम्र के सोलहवें दौर मे प्रेम से बड़ा कोई प्रश्न नही होता है।  क्यों नही करते मेरे अपने मुझसे प्रेम, जिज्ञासा ने मन को झकझोर दिया, माना गड़े मुर्दे उखाड़ने से सडांध ही फैलती है, पर जानना था और जान भी गयी, निशानी थी कलमुँही, किसी  की मानसिक विकृतता की, वहशी पन, तन की भूख की। 
उसकी माँ तो पुरुष के दंभ, भूख, हविश का शिकार हो गयी पर उसे छोड़ गयी जीते जी मरने के लिए।
सोच में थी और पीड़ा में भी …द्वन्द – अंतर्द्वंद सा उठा था मन में ”कलमुँही वो कैसे” ?? 
उसका तो दोष भी नहीं था, फिर आप उन्हें क्या कहेंगे जो कर्म काला करते है????
प्रश्न! प्रश्न!  प्रश्न! 
उत्तर अनुत्तरित 
कलमुँही।

1 टिप्पणी

  1. उसका तो दोष भी नहीं था
    प्रश्न! प्रश्न! प्रश्न!
    उत्तर अनुत्तरित

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