भोपाल स्थित दुष्यंतकुमार स्मृति पांडुलिपि संग्रहालय देश का एक ऐसा अनोखा संग्रहालय है, जहां अनेक ज्ञात-अज्ञात वरिष्ठ रचनाकारों की स्मृतियां सुरक्षित हैं. किसी का टाइपराइटर है, किसी की छड़ी तो किसी की हस्तलिखित पांडुलिपि. अपने किस्म का अभिनव दर्शनीय स्थल है यह संग्रहालय. इसे आकार दिया था राजुरकर राज ने, जो अब इस संसार में नहीं हैं.
यह मनहूस खबर मिली 14 फरवरी, 2023 को, और आँखें बरबस ही छलक उठीं. न जाने कितने चेहरे गमगीन हो गए. राजुरकर राज आकाशवाणी भोपाल के पूर्व एनाउंसर थे। वे पिछले कुछ अरसे से अस्वस्थ चल रहे थे. इसके बावजूद वह समय निकाल कर संग्रहालय का काम देखते रहते थे. एक अद्भुत संग्रहालय उन्होंने विकसित किया था, जहां अनेक साहित्यकारों की दुर्लभ सामग्री देखने को मिलती है. उनके परिसर में बड़े-बड़े आयोजन भी होते रहे.
मेरा सौभाग्य रहा कि 2018 को उन्होंने मुझे भोपाल बुलाकर का आजीवन साधना सम्मान प्रदान किया था. पहले भी अनेक अवसर आते रहे, तब भी मुझे याद करते थे.जब जब मैं भोपाल गया, राजुरकर भाई से अनिवार्य रूप से मिलना होता रहा। पिछले महीने भी भोपाल जाना हुआ, तब भी उनसे भेंट हुई थी. स्वास्थ्य की दृष्टि से भले कमजोर हो गए थे लेकिन उनके मन में संग्रहालय के लिए काम करने का जबरदस्त जज्बा था. कई बार वे छेनी हथौड़ी लेकर खुद संग्रहालय के किसी काम में भिड़ जाया करते थे.
हम सब का दुर्भाग्य है कि ऐसा व्यक्ति अब हमारे बीच नहीं है, जो सही मायने में श्रमवीर था. पता नहीं अब संग्रहालय का क्या होगा . बहरहाल, राजुरकर राज ने जो ऐतिहासिक कार्य किया उसके लिए वे हमेशा याद किए जाएँगे . वे बैतूल के पास के गांव गोधनी में जन्मे थे. गाँव वाले समझ गए थे कि यह बालक बड़ा हो कर ”शब्द साधक” बनेगा. और साधको का ”आकलन” भी करेगा. और वही हुआ, राजुरकर का पूरा जीवन ”शब्दशिल्पियों के आसपास” ही मंडराता रहा.
ध्वनि-तरंगों की दुनिया में विचरने के बाद जो थोड़ा-बहुत समय बचता, ये महानुभाव शब्दशिल्पियों को ही समर्पित कर देते. आकाशवाणी में भी इन्होने उदघोषक के रूप में भी अनेक कमाल दिखाए. सेवानिवृत्ति के अंतिम दिन में आकाशवाणी भोपाल से फरमाइशी कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले थे। तब मैंने फोन लगाकर अपना नाम बताया और साहिर लुधियानवी का लिखा गीत ‘क्या मिलिए ऐसे लोगों से’ सुनने की फरमाइश की तो वे बहुत प्रसन्न हुए. कुछ देर बात करते रहे, फिर उन्होंने ‘इज़्ज़त’ फिल्म का वह गीत लगाया. अपनी अनोखी प्रस्तुतियों के कारण वे हजारों श्रोताओं के दिलों में ‘राज’ करते थे. मतलब उन्होंने अपना नाम सार्थक किया और लोगों के दिलों में राज करते रहे. श्रोताओं का एक ऐसा वर्ग भी था, जो भोपाल आता, तो वह कोशिश करता कि राजुरकर से भी मिल ज़रूर मिल कर लौटे.
जो काम बड़ी-बड़ी सरकारें नहीं कर पाती, राजुरकर राज अकेले कर दिखाया.भोपाल में इनसे अनेक आत्माएं आतंकित रहती थीं, कि आखिर ये बन्दा चाहता क्या है? इसका हिडन एजेंडा क्या है? जलने की आदत के शिकार कुछ लोग आपस में चर्चा करते कि ‘पार्टनर, इसकी पालिटिक्स क्या है?’लेकिन सच तो यह है, कि ‘राज’ का कोई ‘राज’ नहीं हिडन एजेडा नहीं था, .जो कुछ , वह विशुद्ध रूप से लोक मंगल ही था. ये महानुभाव चाहते थे, कि जितने भी महान किस्म के साहित्यकार हुए हैं, उनकी हस्तलिखित पांडुलिपियाँ इनके दुष्यंत स्मृति संग्रहालय में संजो कर रखी जाये.
इनके संग्रहालय में अब अनेक दुर्लभ सामग्री संचित हो चुकी है. जिन्हें देखने बड़े-बड़े नामवर लोग पधार चुके है और सबने जी भर कर शुभकामनाएँ भी दी. भोपाल में अनेक दर्शनीय स्थल हैं, मगर जो लोग साहित्य में रुचि रखते हैं, उनके लिये अब दुष्यंत स्मृति संग्रहालय भी दर्शनीय हो चुका है. ये राजुरकर का प्रयास ही था कि भोपाल की दो सडकों का नाम लेखकों के नाम हो चुका है. ”शरदजोशी मार्ग” और ”दुष्यंतकुमार मार्ग”.


