Wednesday, May 22, 2024
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गिरीश पंकज की कलम से स्मृति-शेष राजुरकर राज को श्रद्धांजलि – वह व्यक्ति नहीं, संस्था थे!

भोपाल स्थित दुष्यंतकुमार स्मृति पांडुलिपि संग्रहालय देश का एक ऐसा अनोखा संग्रहालय है, जहां अनेक ज्ञात-अज्ञात वरिष्ठ रचनाकारों की स्मृतियां सुरक्षित हैं. किसी का टाइपराइटर है, किसी की छड़ी तो किसी की हस्तलिखित पांडुलिपि. अपने किस्म का अभिनव दर्शनीय स्थल है यह संग्रहालय. इसे आकार दिया था राजुरकर राज ने, जो अब इस संसार में नहीं हैं.
यह मनहूस खबर मिली 14 फरवरी, 2023 को, और आँखें बरबस ही छलक उठीं. न जाने कितने चेहरे  गमगीन हो गए. राजुरकर राज आकाशवाणी भोपाल के पूर्व एनाउंसर थे। वे पिछले कुछ अरसे से अस्वस्थ चल रहे थे. इसके बावजूद वह समय निकाल कर संग्रहालय का काम देखते रहते थे. एक अद्भुत संग्रहालय उन्होंने विकसित किया था, जहां अनेक साहित्यकारों की दुर्लभ सामग्री देखने को मिलती है. उनके परिसर में बड़े-बड़े आयोजन भी होते रहे.
मेरा सौभाग्य रहा कि 2018 को उन्होंने मुझे भोपाल बुलाकर का आजीवन साधना सम्मान प्रदान किया था. पहले भी अनेक अवसर आते रहे, तब भी मुझे याद करते थे.जब जब मैं भोपाल गया, राजुरकर भाई से अनिवार्य रूप से मिलना होता रहा। पिछले महीने भी भोपाल जाना हुआ, तब भी उनसे भेंट हुई थी. स्वास्थ्य की दृष्टि से भले कमजोर हो गए थे लेकिन उनके मन में संग्रहालय के लिए काम करने का जबरदस्त जज्बा था. कई बार वे छेनी हथौड़ी लेकर खुद संग्रहालय के किसी काम में भिड़ जाया करते थे.
हम सब का दुर्भाग्य है कि ऐसा व्यक्ति अब हमारे बीच नहीं है, जो सही मायने में श्रमवीर था. पता नहीं अब संग्रहालय का क्या होगा . बहरहाल, राजुरकर राज ने जो ऐतिहासिक कार्य किया उसके लिए वे हमेशा याद किए जाएँगे . वे  बैतूल के पास के गांव गोधनी में जन्मे थे. गाँव वाले समझ गए थे कि यह बालक बड़ा हो कर ”शब्द साधक” बनेगा. और साधको का ”आकलन” भी करेगा. और वही हुआ, राजुरकर का पूरा जीवन ”शब्दशिल्पियों के आसपास” ही मंडराता रहा.
ध्वनि-तरंगों की दुनिया में विचरने के बाद जो थोड़ा-बहुत समय बचता, ये महानुभाव शब्दशिल्पियों को ही समर्पित कर देते. आकाशवाणी में भी इन्होने उदघोषक के रूप में भी अनेक कमाल दिखाए. सेवानिवृत्ति के अंतिम दिन में आकाशवाणी भोपाल से फरमाइशी कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले थे। तब मैंने फोन लगाकर अपना नाम बताया और साहिर लुधियानवी का लिखा गीत ‘क्या मिलिए ऐसे लोगों से’ सुनने की फरमाइश की तो वे बहुत प्रसन्न हुए. कुछ देर बात करते रहे, फिर उन्होंने ‘इज़्ज़त’ फिल्म का वह गीत लगाया. अपनी अनोखी प्रस्तुतियों के कारण वे हजारों श्रोताओं के दिलों में ‘राज’ करते थे. मतलब उन्होंने अपना नाम सार्थक किया और लोगों के दिलों में राज करते रहे. श्रोताओं का एक ऐसा वर्ग भी था, जो भोपाल आता, तो वह कोशिश करता कि राजुरकर से भी मिल ज़रूर मिल कर लौटे.
जो काम बड़ी-बड़ी सरकारें नहीं कर पाती, राजुरकर राज अकेले कर दिखाया.भोपाल में इनसे अनेक आत्माएं आतंकित रहती थीं, कि आखिर ये बन्दा चाहता क्या है? इसका हिडन एजेंडा क्या है? जलने की आदत के शिकार कुछ लोग आपस में चर्चा करते कि ‘पार्टनर, इसकी पालिटिक्स क्या है?’लेकिन सच तो यह है, कि ‘राज’ का कोई ‘राज’ नहीं हिडन एजेडा नहीं था, .जो कुछ , वह विशुद्ध रूप से लोक मंगल ही था. ये महानुभाव चाहते थे, कि जितने भी महान किस्म के साहित्यकार हुए हैं, उनकी हस्तलिखित पांडुलिपियाँ इनके दुष्यंत स्मृति संग्रहालय में संजो कर रखी जाये.
इनके संग्रहालय में अब अनेक दुर्लभ सामग्री संचित हो चुकी है. जिन्हें देखने बड़े-बड़े नामवर लोग पधार चुके है और सबने जी भर कर शुभकामनाएँ भी दी. भोपाल में अनेक दर्शनीय स्थल हैं, मगर जो लोग साहित्य में रुचि रखते हैं, उनके लिये अब दुष्यंत स्मृति संग्रहालय भी दर्शनीय हो चुका है. ये राजुरकर का प्रयास ही था कि भोपाल की दो सडकों का नाम लेखकों के नाम हो चुका है. ”शरदजोशी मार्ग” और ”दुष्यंतकुमार मार्ग”.

मैं उन सौभाग्यशाली लोगों में हूँ, जो गर्व से कह सकता है,कि राजुरकर मेरा मित्र था. वैसे भी राज को यारों-का-यार कहा जा सकता था. दुश्मनों-का-दुश्मन नहीं, क्योंकि उनका कोई दुश्मन भी तो हो. दिल ऐसा मिला है कि भोपाल और रायपुर की दूरी पल भर में ख़त्म हो जाती थी. मैं इनके अनेक कार्यक्रमों  में शामिल हो चुका हूँ.
पिछले दिनों जब राजुरकर को मैंने बताया कि अभी मैंने अपना  व्यंग्य उपन्यास पूर्ण किया है तो उन्होंने तपाक से कहा, ”आप भोपाल आइये, ”पूर्वपाठ” कार्यक्रम के तहत हमलोग उपन्यास के कुछ अंश को सुनना चाहेंगे”.  मगर मैं ही समय नहीं निकाल सका, वर्ना अपने उपन्यास कां अंश भोपाल के अपने मित्रों को ज़रूर सुनाता. इतनी उदारता के साथ किसी को कौन बुलाता है आज के ज़माने में? यह बात मैंने इसलिये बताई कि लोग राजुरकर राज को ठीक से समझ सके. ‘हलकट’ लोग साधन संपन्न होने के बावजूद ऐसी उदारता नहीं दिखा सकते.
राजुरकर में आत्मीयता कूट-कूट  कर भरी हुई थी. सबके लिये.क्या छोटा, क्या बड़ा. सबको स्नेह. सड़क से उठ कर जो शख्स शिखर की ओर बढ़ाता है, वह बिल्कुल राजुरकर राज जैसा ही होता है. पिछले दो दशकों में हम अनेक बार मिले. कभी रायपुर में, कभी भोपाल, में कभी पचमढ़ी में, कभी दिल्ली में. भारत ही नहीं, विदेश में भी साथ-साथ घूमे-फिरे. हर जगह मैंने राज में गहरी यारी की भावना देखी. भोपाल के मित्रों के साथ-साथ शहर के बाहर के मित्रों से भी उनका वही प्रेम-भाव. कई बार सोचता हूँ कि इस आदमी की किसी कमी को पकडूं, मगर ससुरी हाथ ही नहीं आती. होगी तो ज़रूर, क्योंकि आदमी है, तो कुछ न कुछ बुराई भी ज़रूर होगी, पर मुझे तो दिखाई पड़े. हमेशा अच्छी ही अच्छाई नज़र आती.
जब भी भोपाल में राज के घर जाना हुआ, मजाल है कि खाली पेट लौटना हुआ हो. घर नहीं जा सके तो होटल में ले जा कर खिलाया. अपने मित्रों की सेवा के लिये अपनी कार का भरपूर दोहन किया  राज ने. एक बार हम लोग पचमढ़ी से भोपाल राज की कार से ही लौटे थे. ये महानुभाव अपनी कार ले कर पहुँच गए थे ‘एनबीटी’ की एक कार्यशाला में. एक नहीं ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं,जब राज ने अपनी मनुष्यता का परिचय दिया और सबसे बड़ी बात तो यही है कि वे ”शब्दशिल्पियों के आसपास” के माध्यम से पूरी साहित्यिक बिरादरी के सुख-दुःख का लेखा-जोखा पेश करते रहते थे.
निश्छल भाव से. कोई स्वार्थ नहीं. परमार्थ की भावना से ही यह काम किया जा रहा है. यही कारण है कि  ”शब्दशिल्पियों के आसपास” साहित्यकारों की एक आदत -सी बन गई थी, इंतज़ार रहता था कि नया अंक आये तो पता चले कि कहाँ क्या घटित हो रहा है, इसके दुबारा प्रकाशन की वे तैयारी कर रहे थे. ”शब्द साधक” तो कमाल का काम था, जिसमे देश भर के पंद्रह हजार से ज्यादा साहित्यकारों के बारें में जानकारी संगृहीत थी.
राजुरकर  राज की अनेक उपलब्धियां रहीं. इनको मै दुहराना नहीं चाहता. घर-परिवार की चिंता के साथ-साथ समाज के लेखको और सामान्य लोगों के बारे में भी यह शख्स  सोचता रहा कि राजुरकर राज एक व्यक्ति नहीं संस्था थे. वे अन्तिम सांस तक शब्दशिल्पियों की सेवा में ही रत रहे.
राज भाई के पैंक्रियाज में ट्यूमर था, जिसका चार पाँच बार आपरेशन करवा चुके थे । उसके बाद आयुर्वेदिक उपचार चल रहा था। अंतिम समय मे ज तबीयत कुछ ज़्यादा बिगड़ने लगी तो में अपने गाँव गोधनी (मुलताई के पास) आ गए । वहीं उन्होंने अंतिम साँस ली। उन्हें अपने गाँव से बहुत प्यार था । वे अकसर कुछ दिनों के लिए गाँव आ कर तरोताज़ा हो जाया करते थे। यह भी एक अद्भुत संयोग है कि गोधनी में जन्मा उस मिट्टी का लाल अंततः उसी गांव की मिट्टी में विलीन हो गया।
उनको शत-शत नमन!
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