पुरवाई पत्रिका के संपादक के लिए यह एक अनूठी उपलब्धि है कि उनके साथ रेलवे में कार्यरत सीमा द्विवेदी को पुरवाई पढ़ते-पढ़ते ऐसी प्रेरणा मिली कि उन्होंने अपने जीवन में लिखी गईं पहली दो कविताएं काग़ज़ पर उतार कर हमें पत्रिका में शामिल करने हेतु भेजी हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि प्रवासियों की युवा पीढ़ी इन कविताओं से प्रेरणा पाते हुए साहित्यिक कृतियों का सृजन करना आरंभ करेगी। – पुरवाई टीम
1.
पड़ाव
मैं जीवन के उस पड़ाव में हूँ,
ना धूप में हूँ, ना छाँव में हूँ।
ना शहर बसा सकी अपना,
ना लगता है कि गाँव में हूँ।
मैं जीवन के उस पड़ाव में हूँ।
निरंतर उम्र के चढ़ाव में हूँ,
ना किसी का मोह ना, कोई लगाव में हूँ।
खुद को समेट रही हूँ रोज़,
अब नहीं देखती कि, किस घाव में हूँ
मैं जीवन के उस पड़ाव में हूँ।
कुछ खो सा गया है कहीं,
और कुछ के बचाव में हूँ।
तूफानी समंदर खड़ा है सामने,
और मैं छोटी सी, जैसे नाव में हूँ।
मैं जीवन के उस पड़ाव में हूँ।
मन मंथन करने को आतुर है,
पर मैं निश्चल, निर्मल भाव में हूँ।
तन-मन और अंतर्मन से जूझती,
अंतर्द्वंद्व के, तनाव में हूँ।
मैं जीवन के उस पड़ाव में हूँ।
अब चुनना चाहती हूँ स्वयं के सर्वोपरि,
अब ना किसी रिश्तों के चुनाव में हूँ।
नहीं सुनना चाहती अब किसी की,
अब मैं अपने मन-मर्जियों वाले बर्ताव में हूँ।
मैं जीवन के उस पड़ाव में हूँ।—
2.
सुकून
बचपन की परिभाषा में
जिसकी तलाश न थी
मगर वो हुआ करता था
माँ की लोरी में, गोद में…
झूलों में, स्कूलों में
और था मन-मर्जियों में।
वो दिन भी थे जब
चाहिये नहीं था, और
मिलता था, किसी की
एक हसीन झलक में,
एकटक देखने तलक में
किसी से मिलने की ललक में
ख़्यालों में सोई पलक में।
फिर यूं चढ़ी धूप ज़िन्दगी की
ज़िम्मेदारियों की, पहरेदारियों की।
फिर खोया, तो मिला ही नहीं
आज तलक ढूंढते फिरते हैं
कभी नौकरियों में कभी सैलरियों में
और कभी टेलिफ़ोन की गैलरियों में
रिश्तों में, किश्तों में, छुट्टियों में
…. सुकून!
सीमा द्विवेदी
लंदन ओवरग्राउण्ड रेलवे, लंदन।
ईमेल – [email protected]
मोबाइल – +44 7412147876
