“श्री विशेश्वर नाथ घर पर हैं क्या?” बाहर चूड़ियों की खनखनाहट के साथ मधुर एक स्त्री- स्वर खनका।
“एक मिनट,” वैजयंती मेरे पास चली आई। उसे मेरा स्थायी आदेश है, मेरी आज्ञा के बिना घर के अंदर कोई नहीं आएगा।
“एक स्त्री है।उसे अंदर आ लेने दूं?” “ठीक है,” मधुर स्वर का चेहरा देखने के लिए मैं आकुल हो उठा।
तीस और पैंंतीस वर्ष के बीच की आयु वाली आगंतुका आकर्षक थी। नारंगी टी- शर्ट के साथ उस ने नीली जीनज़ पहन रखी थी। कंधों तक कटे हुए उस के बाल सिंदूर की बुंदकी दिखा रहे थे।
“मैं सुचित्रा आनंद,” उस ने नमस्कार की मुद्रा में हाथ जोड़े, “आज कल प्रदेश के भाषा विभाग में उप सचिव हूं। टी.वी. पर आप की साहित्यिकी वाला प्रोग्राम बहुत शौक से देखती हूं। आप की बहुत सी कवितांए भी पढ़ रखी हूं। आप को ढेर सारी यूट्यूब पर भी देख- सुन चुकी हूं। “हां, मुझे एक टी.वी. प्रोड्यूसर होने का लाभ तो मिल ही जाता है…”
“आप के पति नहीं आए?” वैजयंती ने पूछा। उस के अतिक्रमण को मापने हेतु। जब भी कोई स्त्री मुझ से मिलने आती है वैजयंती उस के वर्ग,कुल,परिवार का पूरा अभिसाक्ष्य सुस्पष्ट रूप से जान लेना चाहती है।
“मैं पति पास नहीं रखती, वह हंसी, “हम दोनों की नौकरियां अलग- अलग शहरों में हैं। दो बैंकों की अलग- अलग राशियां हैं हम….”
“मतलब?” मुझे हैरानी हुई, “आप यहां अकेली रहती हैं?”
“अभी इधर आए मुझे एक महीना भी नहीं हुआ,” वह मुस्कराई, “इस बीच दो शनिवार मेरे पति इधर आए थे और एक शनिवार मैं उधर उन के पास गई थी।” “और बच्चे? वे कहां रहते हैं?” वैजयंती ने पूछा।
“बच्चे अभी नहीं हैं। अभी मेरी शादी कुल जमा डेढ़ साल पहले ही हुई रही।”
“शादी तुम ने इतनी देर से की?” मैं चौंका।
“आप पूछ रहे हैं, इस लिए झूठ नहीं बोल सकती। यह मेरी दूसरी शादी है।” “लव मैरिज?” वैजयंती ने पूछा।
“नहीं,यह अरेंजड है,” वह हंसी, “इसलिए शायद टिकेगी भी।
“तुम ऐसा कैसे कह सकती हो?” मैं ने लंबा ठहाका छोड़ा।
“आप की तरफ़ देख कर,” वह मुस्कराई, “आप की शादी ज़रूर अरेंजड है और कम-से-कम अठारह या बीस साल पुरानी है….”
“गलत,” मैं ने कहा, “हमारी लव मैरिज है और बाइस साल पुरानी है।”
“आप को देख कर विश्वास नहीं होता,” वह वैजयंती की ओर मुड़ ली, “कि आप ने लव मैरिज की है।”
“क्यों?” वैजयंती ने पलटवार किया, “लव मैरिज केवल आप जैसी अप्सराएं ही कर सकती हैं क्या?”
देखने में वैजयंती साधारण रंग- रूप की है। बल्कि अति साधारण।
“नहीं,नहीं,” वह झेंप गई, “आप के बच्चे? वे दिखाई नहीं दे रहे? क्यों?”
“हमारे दो बच्चे हैं,” मैं ने उत्तर दिया, “बेटी, संध्या, दिल्ली के एम्ज़ में डाक्टरी की पढ़ाई कर रही है और बेटा,एकनाथ, एहमदाबाद के आए.ए.एम.में मैनेजमेंट कोर्स।”
“आप बहुत भाग्यशाली हैं,” वह मुस्कराई, “दोनों ही बच्चे बहुत अच्छी जगहों पर हैं।”
“आप की पहली शादी कैसे टूटी?” वैजयंती को अपने विवरण जमा करने की जल्दी रही।
“दोनों पी.सी.एस. में साथ बैठे थे। मैं निकल गई और वह फ़ेल हो गया।”
“आप के दूसरे पति क्या करते हैं?” मैं ने पूछा। नई तृणभूमि ताड़नी रही मुझे भी।
“वह भी मेरी तरह पी.सी.एस. में हैं,” उस ने अपनी टकटकी मेरे चेहरे पर बांध ली, “लेकिन हम ये सब बातें क्यों कर रहे हैं? कविता और साहित्य की बात क्यों नहीं कर रहे?”
“कविता और साहित्य में आप की रुचि है?” मैं सक्रिय हो लिया।
“कविता और साहित्य में भी और साहित्यिक गतिविधियों मे भी। अभी फ़िलहाल मैं शहर में नई हूं । इस लिए यहां के साहित्यकारों से मिल लेना चाहती हूं। इसी प्रयोजन से अपने घर पर इस शनिवार को एक गोष्ठी रखना चाहती हूं और उस में मुख्य अतिथि के रूप में आप को बुलाना चाहती हूं।आप मुझे निराश नहीं करेंगे, ऐसी आशा रखती हूं।”
“आशा आप की पूरी होगी। लेकिन पहले हमें चाय पीनी चाहिए,” मैं ने वैजयंती की ओर देखा, “चाय के साथ बिस्कुट लाओगी या फिर कुछ नमकीन?”
“मैं नमकीन लूंगी,” सुचित्रा आनंद चहकी, “मठरी और अचार होगा आप के पास?”
“सब है,” वैजयंती की टेकरी फिर फिरकी, “लेकिन पहले आप अपना पता तो बता दीजिए। कोई कार्ड हो आप का?” “क्यों नहीं?” सुचित्रा आनंद ने अपने बटुए से अपना कार्ड निकाल लिया।
हाथ बढ़ाकर मैं ने वह कार्ड थाम लिया। उस से संपर्क बढ़ाने से मुझे लाभ उठाने में सुविधा रहने वाली थी।
“और आप के पति?” अपना चक्रण वैजयंती भी पूरा कर लेना चाहती थी, ”उन का शहर? पद और नाम?”
सुचित्रा आनंद ने अपने बटुए से दूसरा कार्ड हाथ में ले लिया।
इस बार वैजयंती ने उसे थामा और पढ़ा, “हरीश भनोट। ए.डी.एम. कस्बापुर।” “आप ने शादी के बाद अपना सरनेम नहीं बदला?” वैजयंती ने टिप्पणी की।
“पहले भी नहीं बदला था,” उस ने ठीं- ठीं छोड़ी, “और शायद तीसरी बार भी पति का सरनेम अपने नाम के साथ नहीं जोड़ूंगी। मैं सुचित्रा आनंद हूं और सुचित्रा आनंद ही मरूंगी भी….”
उत्तरवर्ती तेरह माह हम दोनों के लिए व्यस्त तथा महत्वपूर्ण रहे। टी.वी. के अपने अनेक कार्यक्रमों में मैं ने सुचित्रा आनंद को भाग लेने के कई अवसर दिए। उस की कवितांए भी तीन कविता- संग्रहों में पिंडीभूत करवाने में मेरी भूमिका प्रमुख व प्रभावशाली रही।
यह अलग बात थी कि दिखाव- बनाव एंव परिधान में अपने पदानुसार आस्वाद व सुरुचि का प्रदर्शन करने वाली सुचित्रा आनंद की अधिकतर कवितांए नितांत नीरस व औसत दर्जे की रहा करतीं।
सपाट व कृत्रिम।
कुछ तो हास्यास्पद व दयनीय भी।
और कुछ आत्मश्लाघा से भरी या फिर इधर- उधर से चुराईं हुईं ।
लेकिन उस के सौजन्य से भाषा विभाग का एक बड़ा पुरस्कार लेने का मुझे जो लोभ रहा, उसी के अंतर्गत मैं ने उसे कभी हतोत्साहित नहीं किया।
और अंततोगत्वा उस ने मुझे वह दिलाया भी। निस्संदेह उस से पहले भी मुझे कई छिटपुट पुरस्कार मिल चुके थे,किंतु सभी की धनराशि नगण्य रही थी।
“मेरा नाम आप के साथ सम्बद्ध किया जा रहा है,” उसी पुरस्कार- समारोह के कुछ ही दिन बाद वह मेरे घर पर फिर आन बैठी।
वैजयंती उस समय पड़ोस में थी। अन्य दिनों के असदृश।
“इस का कारण ठहराना या बतलाना ज़रूरी है क्या?” मैं हंसा।
“आप जब कहें, हरीश भनोट को मैं तलाक का नोटिस भेज दूं,” वह तुरंत गंभीर मुद्रा में आ चली, “आप के नाम को लेकर वह मुझे बहुत खिझाता है। कहता है अपने टी.वी. में आप मुझे अपना स्वार्थ साधने के लिए बुलाते रहे हैं। वरना आप के लेखन में कोई दम नहीं। आप की बहुत बुराई करता है। आप के बारे में अशुभ बोलता है। अमंगल बोलता है।मुझ से वह सहन नहीं होता….”
“तुम्हें ऐसा कतई नहीं सोचना चाहिए,” मैं सतर्क हो लिया, “हम एक पिछड़े देश के वासी हैं। यहां लोग एक तलाक को तो माफ़ कर सकते हैं। किंतु दूसरा तलाक कतई नहीं….”
हरीश भनोट से मैं कई बार मिल चुका था। सुचित्रा आनंद के साथ भी और उस के बिना भी। अपनी पत्नी की तुलना में सरकार में उस की पहुंच ऊंची थी। दमदार थी। उस के क्रोध का भाजन बनना मुझे गवारा न था।
“आप मुझे चाहते नहीं क्या?” उस के चेहरा बुझ चला।
“दोस्त हूं तुम्हारा।प्रेमी तो नहीं….” यह सच था। इश्कबाज़ी का हल्का- फुल्का जो भी मामला हमारे बीच रहा था वह केवल शब्दों तक सीमित रहा था। वह भी शिष्टाचार ही की तहत। नैतिकता के किसी भी नियम का मैं ने कभी भी उल्लंघन नहीं किया था।
“क्यों? उस के आगे कुछ भी नहीं?”
“सच कहूं, तो नहीं। कुछ भी नहीं। न ही उस के आगे कुछ होना ही चाहूंगा। अपनी गृहस्थी, अपने बच्चे बहुत प्यारे हैं मुझे। और तुम्हें भी तो किसी बात की कमी नहीं। अच्छी-भली नौकरी है तुम्हारे पास। वैसी ही अच्छी- भली नौकरी वाला पति है। नियोजन शक्ति है। अपने अधिकार त्यागने की बजाए तुम्हें अपने अधिकार ग्रहण करने चाहिए। विवाह की सत्ता छोड़ने की बजाए उस की सत्ता बढ़ानी चाहिए। उपयोग करनी चाहिए।” “लेकिन मैं ने सोचा था,” वह रोने लगी, “उधर मैं तलाक लूंगी तो इधर आप मुझे अपने संरक्षण में ले लेंगे। पूरी तरह।”
“तुम्हें अपनी आंखों में आंसू लाने की बजाए निश्चय लाना चाहिए। व्यावहारिक दृष्टि से अपने विवाह को आंको। भावनात्मक दृष्टि से नहीं। फिर तुम देखोगी कोई समस्या रहेगी ही नहीं। सभी बाधाएं दूर हो जांएगी। स्वतः।” “कैसी समस्या?” जभी वैजयंती पड़ोस से लौट आई, “कैसी बाधाएं?”
“हम एक नई कविता पर चर्चा कर रहे थे,” प्रस्थान की मद्रा में सुचित्रा आनंद उठ खड़ी हुई।
“मिलते रहेंगे,” मैं ने उस से विदा ली।
“गिलहरी बेचारी,” उस के सरकारी वाहन के हार्न की आवाज़ जैसे ही हमारे घर से दूर खिसकी, वैजयंती मेरे कंधे से आन लगी।
मुझे अचंभा हुआ। स्नेह का निरूपण उस की प्रकृति में नहीं।
“गिलहरी?” मैं ने पूछा, “कौन गिलहरी?”
“सुचित्रा गिलहरी ही तो है। ताड़ गिलहरी। पेड़- पेड़ फलांगती है। धावा बोलने की ताड़ में।”
“तुम पड़ोस में नहीं रहीं क्या?”
“गई तो थी वहां लेकिन फिर लौट भी तो आई। और मौके पर ही लौट आई।” “लेकिन मैं पेड़ कहां हूं?” हंसते हुए मैं ने वैजयंती को अपने अंक में भर लिया। “आप सच कह रहे हैं,” वैजयंती हंसने लगी, “आप तो एक पहाड़ हैं। अचल। अपराजेय।”
चाहते हुए भी मैं उसे बता न पाया मैं कोई पहाड़ न था। मेरी प्रकृति भी किसी ताड़ गिलहरी से कम न थी। वरना संभावित कोई बड़ा पुरस्कार पाने की प्रबल अपनी ललक के अन्तर्गत सुचित्रा आनंद जैसी प्रतिभाहीन कवियित्री को अपने कार्यक्रमों में ‘एक प्रतिभावान स्वर’ कह कर क्यों प्रस्तुत किए होता?
