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ज़हीर अली सिद्दीक़ी की दो कविताएँ

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1 – रोटी
रोटी नभ में पर नभचर नही
थलचर, नभचर बन
गिद्ध के माफ़िक़ दिख रहे हैं
मंडरा भी रहे पैनी निग़ाह लिए
परन्तु गिद्ध नही
गिद्ध तो मृतकों को नोचते हैं
ये तो मरणशैय्या पर लिटा देते हैं
मज़बूरों, लाचारों को
अपने चंगुल में फँसा लेते हैं
जीते जी मृत बना देते हैं
आँख मूँद निगल जाते हैं
आज मैं उसी रोटी पर
निशाना लगाने जा रहा हूँ
रोटी ज़मीन पर लाने जा रहा हूँ
लोगों की भूख मिटाने जा रहा हूँ
भूख से मौत रोकने जा रहा हूँ
मुझे क्या पता था!
रोटी ज़मीन पर आने से पहले
भूख को मिटाने से पहले
बड़े पेट वाला जीव  मानो
मुँह से पेट की पाइप लाइन
बिछाये बैठा है
रोटी भूखे तक
न पहुँचाने की फ़िराक़ में
तोंद छुपाये बैठा है
घड़ियाली आँसू बहाये बैठा है
उसी तोंद पर निशाना लगा रहा हूँ
घड़ियाल भगाने जा रहा हूँ
भूखे तक रोटी पहुंचाने जा रहा हूँ।।
2 – क़िरदार है मेरी
मैं प्रेमी तू प्यार है मेरी
नायक मै क़िरदार है मेरी
मै शायर अल्फ़ाज़ है मेरी
मैं रागी तू राग है मेरी।।
मै घायल तू कराह है मेरी,
मूरत मै मूर्तिकार है मेरी
नाविक मैं पतवार है मेरी
मैं दरिया तू बहाव है मेरी।।
मैं अंधा तू आँख है मेरी
लँगड़ा मैं तू पैर हूँ मेरी
मैं बहरा तू कान है मेरी
गूंगा मै तू आवाज़ है मेरी।।
मैं राही तू राह है मेरी
अंधेरे में प्रकाश है मेरी
मैं ज्ञानी तू ज्ञान है मेरी
कदमों की पहचान है मेरी।।
यदि भौरा तू कली है मेरी
फूल अग़र खुशबू है मेरी
प्यासा मैं तू प्यास है मेरी
मैं निराश एक आस है मेरी।।

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