भारत में हर राजनीतिक दल महँगाई, गरीबी और बेरोजगारी का ज़िक्र दिन में कम से कम एक बार तो करता ही है, मगर ज़मीनी सच्चाइयाँ कुछ और ही होती हैं। राजनीति में सिद्ध पुरुष के मुकाबले कुबेर हमेशा जीत जाता है। कुबेरों के लिए सिंघवी और सिब्बल हमेशा लड़ते दिखाई दे जाते हैं। टीएमसी के प्रतिनिधि पवन वर्मा टीवी बहसों में तो महँगाई और बेरोजगारी की बात करते हैं, मगर असल जीवन में शरमाते हुए बताते हैं कि वे दिल्ली जिमखाना क्लब के सदस्य हैं और उनके पिता भी इसके सदस्य थे।
बात हो रही है दो शहरों के अति-धनाढ्य लोगों के दो क्लबों की- दिल्ली जिमखाना क्लब और मुंबई का ब्रीच कैंडी क्लब। पहले को सरकार ने 7 जून तक संपत्ति खाली करने के आदेश दे दिए हैं, वहीं दूसरे को लेकर शशि थरूर ने मोर्चाबंदी कर रखी है।
ब्रीच कैंडी क्लब, मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) की स्थापना 1878 में हुई थी। उस समय केवल श्वेत लोग, अर्थात अंग्रेज़ या यूरोपीय मूल के लोग, इसके सदस्य बन सकते थे। इसकी मैनेजिंग कमेटी में आज भी किसी भारतीय का नाम शामिल नहीं है। 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात भी किसी भारतीय को इस क्लब की सदस्यता देना शुरू नहीं किया गया। 1960 के दशक के बाद ही भारतीय मूल के लोगों के लिए इसके द्वार खुल सके।
वहीं 27.3 एकड़ भूमि पर फैले दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना 2 जुलाई 1913 को ‘इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब’ के रूप में हुई थी। इस अमीर लोगों के क्लब के पहले अध्यक्ष स्पेंसर हरकोर्ट बटलर बने थे, जिनके नाम पर दिल्ली में विद्यालयों की स्थापना भी की गई। वे ब्रिटिश राज की एक प्रभावशाली हस्ती थे। इस क्लब की स्थापना में भारत की सात प्रमुख रियासतों- ग्वालियर, जयपुर, जोधपुर, कश्मीर, उदयपुर, किशनगढ़ और भोपाल के शासकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन सभी को क्लब की आजीवन सदस्यता प्रदान की गई थी। भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात इस क्लब के नाम से ‘इंपीरियल’ शब्द हटा दिया गया और इसका नाम केवल ‘दिल्ली जिमखाना क्लब’ रह गया।
‘पुरवाई’ के पाठक यह प्रश्न उठा सकते हैं कि हमारे संपादक को आज ऐसी क्या सूझी कि आम आदमी की बात करने के स्थान पर वे ऐसे विषय पर कलम चला रहे हैं, जो समाज के उस वर्ग से जुड़ा है, जिसके पास अगाध दौलत है, और जो केवल अपनी शान-ओ-शौकत दिखाने के लिए ऐसे विशिष्ट क्लबों की रौनक बनने जाता है। ये लोग टीवी बहसों में तो आम आदमी के दुःखों का रोना रोते हैं, मगर उसी गरीब आदमी से जुड़े दुःखों को भुलाने के लिए महँगी शराब के जाम लेने दिल्ली जिमखाना या फिर ब्रीच कैंडी क्लब पहुँच जाते हैं।
‘जिमखाना’ का शब्दकोशीय अर्थ है- सार्वजनिक स्थान जहाँ लोग एकत्र होकर व्यायाम आदि करते हैं; अर्थात् व्यायामशाला। दिल्ली जिमखाना की भूमि की अनुमानित कीमत लगभग 27,000 करोड़ रुपये आँकी जाती है। इस जिमखाना में व्यायाम या खेल-कूद की गतिविधियाँ नाममात्र की ही दिखाई देती हैं। कहने को यहाँ लगभग 40 टेनिस कोर्ट, 3 स्क्वैश कोर्ट, एक इनडोर हीटेड स्विमिंग पूल, तीन लाउंज बार, एक फाइन डाइनिंग रेस्तराँ, 35,000 पुस्तकों वाला पुस्तकालय, जहाँ लगभग 85 समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ मँगाई जाती हैं, 43 ट्रांज़िट रूम अथवा कॉटेज, तथा बैडमिंटन कोर्ट, बिलियर्ड्स कक्ष और क्रिकेट मैदान जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
दिल्ली जिमखाना में सदस्यता का भी एक ख़ास प्रकार का आरक्षण निर्धारित है। 40 प्रतिशत सदस्य सिविल सेवाओं के अधिकारी (जिसमें आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारी शामिल हैं), 40 प्रतिशत भारतीय सेना (जल, थल और वायु) के अधिकारी तथा शेष 20 प्रतिशत उद्योगपति, वकील, डॉक्टर, कलाकार आदि होते हैं। सदस्यता की एक मोटी फ़ीस है और प्रतीक्षा सूची 40 वर्ष से भी अधिक लंबी हो चुकी है। दिल्ली जिमखाना में केवल पैसा ही महत्वपूर्ण नहीं है; उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आपके ‘कनेक्शन’ किस स्तर के हैं।
एक मज़ेदार बात यह है कि सरकारी ज़मीन पर एक निजी क्लब चलाया जा रहा है और लुटियंस दिल्ली में प्रधानमंत्री निवास से सटी भूमि पर स्थित इस विशाल जिमखाना का वार्षिक लीज़ किराया मात्र एक हज़ार रुपये है। दरअसल, वर्ष 1918 में ब्रिटिश सरकार ने 27.3 एकड़ की यह ज़मीन एक विशेष शर्त पर दी थी- ‘सामाजिक और खेल गतिविधियों के संचालन’ की शर्त पर। उस समय लीज़ का किराया एक हज़ार रुपये वार्षिक निर्धारित किया गया था। आश्चर्य की बात यह है कि 107 वर्षों में भी इस किराये में एक रुपए की वृद्धि नहीं हुई। कहने को यह जिमखाना एक ‘नॉन-प्रॉफ़िट’ संस्था है।
भारत की वर्तमान सरकार ने इस लीज़ समझौते का गहन अध्ययन किया और उसमें उन्हें ‘धारा-4’ दिखाई दी। इस धारा के अनुसार, “यदि सरकार को यह भूमि किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए चाहिए होगी, तो वह यह लीज़ समाप्त कर सकती है।” वर्ष 2026 में यही धारा क्लब के लिए अस्तित्व-संकट की चेतावनी बनकर खड़ी हो गई है।
भारत सरकार ने क्लब को कानूनी नोटिस जारी कर उसकी प्रबंधन समिति से 5 जून तक भूमि खाली करने को कहा है। जिस क्लब की सदस्य सूची में देश के पूर्व प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री, नौकरशाह, जनरल, न्यायाधीश और उद्योगपति शामिल रहे हैं, वह आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहा है।
22 मई 2026 को शहरी कार्य मंत्रालय के भूमि एवं विकास कार्यालय ने एक पत्र जारी करते हुए क्लब को सूचित किया कि 5 जून 2026 तक जिमखाना क्लब को संपत्ति का शांतिपूर्ण कब्ज़ा भूमि एवं विकास विभाग को सौंपना होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो कानूनी कार्रवाई के माध्यम से कब्ज़ा प्राप्त किया जाएगा। सरकार का सीधा तर्क है कि जिमखाना प्रधानमंत्री आवास के अत्यंत निकट स्थित है और सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में आता है।
ज़ाहिर है कि दिल्ली जिमखाना चुपचाप कब्ज़ा देने वाला नहीं था। सिंघवी और कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ वकीलों ने क्लब की ओर से अदालत का दरवाज़ा खटखटा दिया है। मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है, किंतु सरकार ने एक बार फिर पूरे देश का ध्यान इस जिमखाना की ओर आकर्षित कर दिया है।
एक रोचक तथ्य यह भी है कि दिल्ली जिमखाना की बार में ‘ब्लडी मेरी’ नामक पेय उस समय उपलब्ध था, जब अधिकांश भारतीय इसके नाम से भी परिचित नहीं थे। वैसे आम आदमी को आज भी इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं होगी। एअर इंडिया में फ़्लाइट पर्सर के रूप में कार्य करने का लाभ उठाते हुए मैं बता दूँ कि ‘ब्लडी मेरी’ एक कॉकटेल है, जो मुख्यतः वोडका से बनाई जाती है। इसमें टमाटर का रस, टबैस्को सॉस, वूस्टरशायर सॉस, ताज़ा नींबू का रस, नमक, काली मिर्च तथा हॉर्सरैडिश (मूली के समान एक कंद) मिलाया जाता है।
दूसरी ओर, ब्रीच कैंडी क्लब आज भी उस मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं दिखता, जिसका प्रतीक कभी यह बोर्ड हुआ करता था- “कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित।” आज भी क्लब की प्रबंधन समिति में किसी भारतीय को शामिल नहीं किया जाता। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने इस विषय पर टिप्पणी करते हुए कहा है, “सरकारी भूमि पर नस्लवादी प्रावधानों को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है। यह कहना पूरी तरह हास्यास्पद है कि क्लब के संविधान में इसकी आवश्यकता है। हमारे देश के संविधान का क्या होगा?”
सूत्रों के अनुसार, शशि थरूर ने अपने बचपन की एक घटना साझा करते हुए बताया कि उन्हें भी बचपन में इस क्लब में प्रवेश नहीं करने दिया गया था, क्योंकि उनकी त्वचा का रंग भारतीयों जैसा था। उन्हें एक विदेशी मेज़बान ने आमंत्रित किया था, किंतु उन्हें प्रवेश नहीं मिला।
उस समय केवल विदेशी होना पर्याप्त नहीं था; यूरोपीय दिखना भी आवश्यक था। एक फ़्रांसीसी महिला का रंग अपेक्षाकृत साँवला था, इसलिए उसे क्लब में प्रवेश के लिए अपना पासपोर्ट साथ रखना पड़ता था। उल्लेखनीय है कि भारतीयों को इस क्लब में प्रवेश स्वतः नहीं मिला था। इसके लिए हमें एक अश्वेत अमेरिकी राजनयिक का भी आभार मानना चाहिए।
घटना यह थी कि 1960 के दशक में एक अश्वेत अमेरिकी राजनयिक को उसके श्वेत सहयोगी तैराकी के लिए क्लब में ले आए। किंतु क्लब प्रबंधन ने उन सभी को बाहर जाने के लिए कह दिया। इसके बाद अमेरिकियों ने तीव्र विरोध दर्ज कराया और व्यापक आक्रोश फैल गया। उसी घटना के परिणामस्वरूप भारतीयों के लिए भी इस प्रतिष्ठित क्लब के द्वार खुलने लगे।
विचार करने की बात यह है कि स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद भी हमारे देश में ऐसी संस्थाएँ मौजूद हैं, जो आम भारतीय को समान सम्मान देने में संकोच करती हैं। इन 79 वर्षों में देश में विभिन्न दलों की सरकारें सत्ता में आईं। महाराष्ट्र में बालासाहेब ठाकरे की पार्टी सत्ता में रही, दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, किंतु इन दिव्य संस्थानों की संरचना और कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न बहुत कम उठाए गए। आज तक भारत में 14 प्रधानमंत्री हो चुके हैं, फिर भी दिल्ली जिमखाना और ब्रीच कैंडी जैसे क्लब अपने विशेषाधिकारों के साथ आज भी उसी प्रकार खड़े दिखाई देते हैं।

बहुत ही कम शब्दों में गहरा संदेश
हार्दिक धन्यवाद कपिल भाई।
सादर नमस्कार सर…..
कुछ दिन पहले मुझे इसके बारे में एक छोटी सी पोस्ट मिली थी… पढ़कर यह आश्चर्य हुआ कि ये लोग आज भी हमें अंधा बेहरा बनाकर रखे हुए हैं… और हम हैं भी। आपने इतनी संवेदनशील बात पुरवाई के माध्यम विश्वपटल रखने का जो निडर प्रयास किया हैं इसके लिए आपको साधुवाद। कुछ नहीं बिगड़ेगा किसीका भी। यहाँ एक से एक धुरंदर है…. जहाँ इतने साल बीत गए…. आगे… क्या होगा….
धन्यवाद सर….
आदरणीय अनिमा जी आपकी टिप्पणी में कुछ निराशा का पुट है। हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।
जितेन्द्र भाई: मशहूर कहावत है कि रस्सी तो जल गई मगर उसके बल नहीं गए। और १९४७ के बाद भी गोरे साहबों के जले हुए बलों को ऐसे ही कायम रखने के लिए इस देश में बहुत सारे काले साहब आगे आगए। न जाने यह हीन भावना कि अकल से चाहे वो एकदम डफ़र हो मगर यदि वो शकल से गोरा है तो बस उसे झुक कर सलाम करना इन काले साहबों का एक तरह से फ़र्ज़ बन जाता है। सब से पहले तो मैं यह जानना चाहूँगा कि १९४७ के बाद या उस से पहले भी इन दोनों क्लबों का देश के उद्धार में कितना योगदान रहा है। 27.3 एकड़ में फ़ैले हुए जिमख़ाना क्लब की लीज़ केवल एक हज़ार रुपये सालाना एक मज़ाक ही नहीं बल्कि देशद्रोह है। आजकल के ज़माने में तो इतने पैसों में तो उस इलाके में सुई की नोक जितनी ज़मीन भी लीज़ पर नहीं मिलेगी। देश की सुरक्षा को देखते हुए प्रधान मन्त्री निवास के साथ जुड़ी होने के कारण अब इस स्थान को खाली कराना बहुत ज़रूरी हो गया है। सरकार ने जो फ़ैसला लिया है वो बिल्कुल सही है। मोदी जी से पहले बहुत सारे शासक आए लेकिन किसी में भी इतना दम नहीं था कि इस तरफ़ ध्यान भी दें। उन्हें तो अपनी कुर्सी कायम रखने और वोटों से मतलब था।
मुंबई के ब्रीच कैण्डी क्लब में जो यूररिपीय दीखने की प्रथा थी वो अभी भी है या नहीं। यदि नहीं है तो “ कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित” क्लब में आज सांवले रंग वाले काले साहब अपने आप को ब्रीच कैण्डी क्लब में दाख़िला मिलने पर बहुर गर्व महसूस कर रहे होंगे।
आपके इस सम्पादकीय के अन्तिम पैरे को मैं दोहराना नहीं चाहता। बस इतना कहना चाहूँगा कि सारे सम्पादकीय के साथ साथ इस पैरे के लिए बहुत बहुत साधुवाद।
जय श्रीराम
भाई विजय विक्रांत जी आपको संपादकीय की मर्म अंतिम पैराग्राफ़ मेंं महसूस हुआ… इसे संपादकीय की सफलता कहा जा सकता है। हार्दिक आभार आपका।
आदरणीय सर,
सादर प्रणाम।
‘पुरवाई’ के इस अंक का संपादकीय ‘दो महानगर… दो क्लब… एक सा विवाद…!’ आज के दौर की कड़वी सामाजिक विडंबना को पूरी बेबाकी से उजागर करता है। आपका यह लेख केवल दो आलीशान क्लबों के कानूनी विवादों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि उस खोखली ‘विशेषाधिकार संस्कृति’ पर एक गहरा प्रहार है जो स्वतंत्रता के इतने दशकों बाद भी आम भारतीय को हीन भावना से देखती है। आपने जिस निडरता से राजनीतिक दलों के दोगलेपन और तथाकथित कुबेरों के पाखंड को सामने रखा है, वह पाठकों के अंतर्मन को झकझोरने के साथ-साथ सोचने पर विवश कर देता है।
आलेख के आरंभ में ही आपने देश के राजनीतिक परिदृश्य पर तीखा कटाक्ष किया है। आपने बहुत ही सटीक ढंग से रेखांकित किया है कि कैसे राजनेता टीवी बहसों में महँगाई, गरीबी और बेरोजगारी का रोना रोते हैं, मगर व्यावहारिक जीवन में वे स्वयं को उसी विशिष्ट ‘सम्भ्रांत वर्ग’ का हिस्सा बनाए रखना चाहते हैं। दिल्ली जिमखाना और मुंबई के ब्रीच कैंडी क्लब का उदाहरण देकर आपने यह सिद्ध कर दिया है कि कैसे देश की नीतियां तय करने वाले और न्याय के रक्षक ही इस ‘काले साहब’ वाली मानसिकता को पोषित कर रहे हैं।
संपादकीय का ऐतिहासिक पक्ष इस कड़वी हकीकत को और अधिक पुख्ता करता है कि कैसे औपनिवेशिक दौर की नस्लवादी मानसिकता आज भी हमारे समाज में जीवित है। ब्रीच कैंडी क्लब में स्वतंत्रता के बाद भी भारतीयों के प्रवेश पर लगी पाबंदी और दिल्ली जिमखाना की करोड़ों की सरकारी ज़मीन का महज़ एक हज़ार रुपये वार्षिक लीज़ किराया, इस देश के संसाधनों पर चंद रईसों के एकाधिकार को दर्शाता है। आपका यह विवरण कि एक फ्रांसीसी महिला को अपनी त्वचा के रंग के कारण पासपोर्ट दिखाना पड़ता था और आपको स्वयं बचपन में जो कटु अनुभव हुआ, वह हमारी संप्रभुता और राष्ट्रीय स्वाभिमान पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।
लेख की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ज्ञानवर्धक और खोजी दृष्टि है, जहाँ आपने खेल के नाम पर चलने वाले इन क्लबों के भीतर की विलासिता, आरक्षण तंत्र और ‘कनेक्शन’ के खेल को पूरी तरह बेनकाब किया है। ‘ब्लडी मेरी’ कॉकटेल के रोचक संदर्भ के माध्यम से आपने उस भाषाई और सांस्कृतिक दूरी को भी स्पष्ट किया है जो इन क्लबों के सदस्यों को आम भारतीय जनता से अलग करती है। सरकार द्वारा दिल्ली जिमखाना को खाली करने का नोटिस और उस पर मची रस्साकशी को आपने वर्तमान समय का एक बड़ा अस्तित्व-संकट माना है।
यह संपादकीय अपनी सहज-सरल भाषा और मार्मिक विश्लेषण के माध्यम से देश की सामूहिक चेतना को जगाने का काम करता है। स्वतंत्रता के उन्यासी वर्ष बाद भी यदि हमारे देश में ऐसी संस्थाएँ फल-फूल रही हैं जो आम भारतीय को समान सम्मान देने में संकोच करती हैं, तो यह हमारी व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है। आपकी लेखनी ने इन ‘दिव्य संस्थानों’ की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठाकर न केवल बाज़ारवाद और विशेषाधिकारवाद के विरुद्ध एक दस्तावेज़ तैयार किया है, बल्कि हमें एक अधिक समतावादी और स्वाभिमानी समाज के निर्माण का आत्मीय आग्रह भी किया है। इस साहसिक और आंखें खोलने वाले संपादकीय के लिए आपको हृदय से साधुवाद।
भाई चन्द्रशेखर तिवारी जी, आपने लिखा है कि – आपकी लेखनी ने इन ‘दिव्य संस्थानों’ की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठाकर न केवल बाज़ारवाद और विशेषाधिकारवाद के विरुद्ध एक दस्तावेज़ तैयार किया है, बल्कि हमें एक अधिक समतावादी और स्वाभिमानी समाज के निर्माण का आत्मीय आग्रह भी किया है। इस साहसिक और आंखें खोलने वाले संपादकीय के लिए आपको हृदय से साधुवाद।…
पुरवाई पत्रिका आपकी हृदयतल से धन्यवादी है।
आँखे खोलने वाला संपादकीय! धन्यवाद, तेजेंद्र जी!
बहुत शुक्रिया भाई हरिहर झा साहब।
आपका सम्पादकीय बहुत महत्त्वपूर्ण होता है. स्वतंत्र भारत में ऐसा संस्थान होना शर्मनाक है. आपके इस लेख का मैं कहीं उपयोग करना चाहूँगा. अपने समूह में, तो शेयर कर रहा ही रहा हूँ.
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
बहुत सुंदर संपादकीय। इस बार भी आम से हटकर एक विशिष्ट अछूते से मुद्दे पर सच्चाई बयान करता संपादकीय बहुत अच्छा लगा। जनता के बीच और आभासी दुनिया तथा गलत बहसों के आधार पर सही बात कोई जान नहीं पाता।जिमखाना क्लब तथा ब्रीच कैंडी क्लब से जुडे तमाम तथ्य केवल निरर्थक बहसों और अनियमित समाधानों का विषय रहे.हैं।हम सब इतना तो बिल्कुल भी नहीं जानते थे जैसा कि संपादकीय में पढा।इतनी बेबाक और सटीक अभिव्यक्ति एक साहसिक कदम है।बहुत बहुत बधाई हो भाई आपको।संपादकीय में लिखा है–विचार करने की बात यह है कि *स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद भी हमारे देश में ऐसी संस्थाएँ मौजूद हैं, जो आम भारतीय को समान सम्मान देने में संकोच करती हैं।* हार्दिक धन्यवाद इस सुंदर सार्थक पोस्ट के लिए। सादर प्रणाम।
प्रिय पद्मा, आपने हमेशा की तरह एक सकारात्मक टिप्पणी लिखकर हमारा उत्साह बढ़ाया है। तुम्हारी टिप्पणी की हमें अपेक्षा रहती है। दिल से शुक्रिया।
दिल्ली जिमखाना क्लब और ब्रीच कैंडी क्लब मुंबई अंग्रेजी शासनकाल में स्थापित ऐसी सार्वजनिक जगह थी जहां सिर्फ अमीर लोगों की ही एंट्री थी। आम भारतीयों का वहां जाना वर्जित था।
देश को स्वतंत्रता मिले लगभग 79 वर्ष हो चुके हैं। लेकिन परतंत्रता के ये दो चिह्न आज भी इस देश में स्थित है। इसका इंपीरियल शब्द हटाकर इसे देशी बना दिया गया है। मेरे हिसाब से स्वतंत्रता और परतंत्रता आमजन के लिए ही महत्वपूर्ण है। विशिष्ट लोगों को इन चीज़ों से ज्यादा वास्ता नहीं होता है, जब तक कि उसमें कोई लाभ न दिखाई देता हो। ये व्यवस्था में एडजस्ट हो जाने वाले लोग होते हैं। उस व्यवस्था में दूसरा स्थान या तीसरा स्थान नहीं मिलेगा तो चौथा स्थान तो पा ही जाएंगे। इसी सोच के साथ वे अपने को तैयार रखते हैं। दो चार बातें अपने खिलाफ सुन भी ली तब भी यह स्थान बुरा नहीं है। इस स्थिति में भी वह ठाठ-बाट रहता है जो एक छोटे-मोटे राजा का होता था।
बड़े अफसोस की बात है कि स्वतंत्रता के बाद भी ये क्लब उन्हीं नस्लवादी नियमों के साथ चले आ रहे हैं। मतलब Indian and dogs are not allowed. पहले इसके सदस्य अंग्रेज और अमीर भारतीय होते थे। आज देश का उच्च वर्ग इसमें काबिज है। देश में अभी और भी इस तरह के क्लब या संस्थाएं सक्रिय हों तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।
सरकार ने दिल्ली क्लब की प्रबंध समिति को 7 जून तक इसे खाली करने का नोटिस दे दिया है। हो सकता वहां की प्रबंध समिति इसे इतने जल्दी खाली न करे। वे न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं। आपने संपादकीय में इस बात की शंका जाहिर की है। हम भी इस बात को मानकर चल रहे हैं।
देश की कोई भी महत्वपूर्ण व्यवस्था कोर्ट का स्पर्श किए बिना अपने मूल स्वरूप में प्राप्त नहीं हो पाती है। न्यायालय की मोहर ही उसकी प्रामाणिकता का प्रमाण बन जाती है। निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि हमारा विश्वास न्याय व्यवस्था के प्रति कायम है। यह विश्वास आगे भी कायम रहेगा।
राजनेता शशि थरूर जी की टिप्पणी, क्लब की एकड़ों में जमीन और ‘ब्लडी मेरी’ नामक पेय आदि ने इस संपादकीय को प्रामाणिक बना दिया है।
इस संदर्भ में मैं इतना ही कहूंगा कि आपने संपादकीय कला से अपने पाठकों को बहुत कुछ दिया है।सच कहा जाए तो रिपोर्टिंग और विषयगत विश्लेषण दो भिन्न विधाएं हैं। विश्लेषण हमेशा विशिष्ट प्रतिभा की मांग करता है। यह प्रतिभा पूरे संपादकीय में दृष्टिगोचर हो रही है। इसका कायल हुए बिना कोई नहीं रह सकता है।
इस तरह के संपादकीयों का हम बेसब्री से इंतजार करते हैं।
प्रिय भाई लखन लाल पाल जी, आपने पुरवाई के संपादकीयों की कला की तारीफ़ करते हुए कहा है कि इसने पाठकों को बहुत कुछ दिया है। बस यह रिश्ता बना रहे… आप बेसब्री से इंतज़ार करते रहें और हमें हर सप्ताह अछूते विषय मिलते रहें। हार्दिक आभार।
आदरणीय संपादक महोदय!
आपके संपादकीय पाठक को सदैव समृद्ध बनाते हैं। आपकी लेखनी यूँ ही नवोन्मेषी बनी रहे…आभार
दोनों क्लबों को लेकर आपने बड़ी रोचक एवं हैरान करने वाली जानकारी प्रस्तुत की है. ऐसे क्लबों में जो भेदभावपूर्ण नीति है उसे समाप्त किया जाना चाहिए. शायद मीडिया ने इस मुद्दे को ठीक से उछाला नहीं और सत्ताधीन लोगों ने भी इस पर गौर नहीं किया. मगर अब उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में ये मुद्दा सुलझ जाएगा. दिल्ली जिमखाना का मसला कोर्ट में है. इसी तरह ब्रिजकैंडी जिमखाना का मसला भी हल किया जाना चाहिए.
नया विषय और रोचक जानकारी से परिपूर्ण इस सम्पादकीय के लिए साधुवाद.
रमेश भाई, आपको संपादकीय का विषय और जानकारी पसंद आए… हार्दिक धन्यवाद।
यह विडंबना ही तो है कि आज़ादी के 79 वर्षों के बाद भी देश में ऐसे क्लब हैं जिनमें भेदभाव रहता है। पुराने नियम चल रहे हैं और आम जनता को इसका संज्ञान ही नहीं। ख़बर ज़रूर सुनी थी कि पाँच जून तक दिल्ली जिमख़ाना क्लब को ख़ाली करने के आदेश दिए गए हैं। आपके सम्पादकीय के विश्लेषण से पूरी जानकारी मिलना हमारा सौभाग्य है। यह सब आपकी लेखनी का जादू है तेजेंद्र जी तभी तो हर शनिवार आपके सम्पादकीय की प्रतीक्षा रहती है। साधुवाद।
।
सुदर्शन जी आपकी टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण भी है और उत्साहवर्धक भी। हार्दिक धन्यवाद।
इस बार के संपादकीय को पढ़ कर कुछ पुरानी कहावतें याद आई अन्धा बाँटे सीरनी,फिर फिर अपने को दे,हाथी के दांत खाने के और ,,और दिखाने के और ,,।
ब्रीच कैंडी क्लब और जिमखाना प्रतीक हैं अगाध अमीरी,अहंकार और अपने को छोड़ शेष को गिरा हुआ समझने की कुत्सित और विद्रूपताओं पूर्ण सोच और शैतान का सा आचरण,,,,।
अविकसित देश में राजनीति,नौकर शाही, व्यापार और भ्रष्टाचार के जीवंत प्रमाण होते है और भारत में तो ये इतिहास बारहवीं शताब्दी के बाद से आजतक चलता ही आ रहा है।
संपादकीय निडर होकर यही कारगुजारी स्पष्ट रूप से बयां कर पाठकों को इस अहम मुद्दे पर प्रचलित और संचालित भरम को दूर कर एक आज़ाद सोच और उड़ान देता है।काश भारत और इसके सरीखे देश के नागरिक इसे समझ पाते और राजनीति के छुटभैयों को भी देश से देश बदर कर पाते ।
बढ़िया और रणनीति के अंधेरों की कलई खोलता संपादकीय।
भाई सूर्य कांत जी आपको संपादकीय ‘रणनीतियों के अंधेरों की कलई खोलता’ महसूस हुआ है। दिल से शुक्रिया।
दिल्ली जिमखाना पर सरकारी आदेश के बारे में संपादकीय में आपका संशय सही है कि यह तो सिर्फ सरकार की मंशा है जिसे हमारी न्यायिक प्रणाली की सुस्त चाल और बड़े वकीलों के हस्तक्षेप के चलते हकीकत का जामा पहनाने में कई साल लग सकते हैं। वैसे भी दिल्ली उच्च न्यायालय में सरकार ने सफाई दी है कि 5 जून को क्लब को जबरदस्ती खाली नहीं करवाया जाएगा। यह तो सर्व विदित है कि आज भी दिल्ली और अन्य राज्यों की प्राइम लोकेशन पर स्थित सरकारी बंगलो पर सालों से राजनीतिक पार्टियों और राजनीतिज्ञों और उनके बाद उनके परिवार जनों का अनधिकृत कब्जा कायम है और सरकार बस नोटिस भेज कर अपनी फाइलों का पेट भर लेती है। बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने सरकार को खुली चुनौती दी है कि हिम्मत है तो उससे पटना का 10, सर्कुलर रोड वाला बंगला खाली करवा के दिखाए जिस पर उसका परिवार दशकों से उसकी कुर्सी छिन जाने पर भी काबिज है। दिल्ली जिमखाना की प्रधानमंत्री निवास से सटी इतनी बड़ी जमीन का उपयोग कुछ गिने चुने प्रभावशाली लोग अपनी मौज मस्ती के लिए एक पूरी सदी से करते आए हैं और क्योंकि न्यायाधीशों के तबके का भी इस पर अधिकार है, यह मामला लंबा खींचेगा। मजेदार बात है कि लीज़ पर्पेचुअल है यानि कि कभी न खत्म होने वाली। 1913 में भी 27.3 एकड़ प्राइम लैंड का वार्षिक किराया मात्र एक हजार रुपए जो आज के साढ़े छह लाख रुपए ही बनता है वाजिब नहीं है जबकि वसंत विहार, शांति निकेतन आदि जैसे जगह में कोठियों के मालिक इतना किराया तो एक महीने के लिए ही वसूल करते हैं। आम आदमी चाहेगा कि यह जमीन चंद रसूख वाले लोगों की अय्याशी के बजाय देश के विकास में काम आए।
सर इस मामले में आपकी टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है। आप तो एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस का हिस्सा रहे हैं। हार्दिक धन्यवाद।
नमस्कार जी
तारीखों और आकड़ों से सुसज्जित इस अनूठे संपादकीय के लिए, हम आपके आभारी हैं । आप हरेक संपादकीय में इतने विस्तार से जानकारी देते हैं कि हमें और अधिक जानने के लिए कुछ बचता ही नहीं है । इसके अलावा संबंधित विषय की एतिहासिक जानकारी भी मिल जाती है ।
…. और एक बात, जिस विषय में बड़े-बड़े राजनायक, बड़े उद्योग पति, बड़े सरकारी अधिकारी शामिल हों, जिनके एक इशारे से सत्ता में परिवर्तन हो जाते हैं, उनके विरोध में कुछ बोलना या लिखना सचमुच दिलेरी का कार्य है । निष्पक्ष पत्रकारिता का प्रतीक है । इसके लिए पुरवाई के संपादक, परम आदरणीय श्री तेजेन्द्र शर्मा साहब का हार्दिक अभिनंदन !!!
गरीबी और अमीरी ये दो शब्द ऐसे हैं, जिनका वास्तव में कुछ अस्तित्व है ही नहीं । ये तो अति संपन्न, राजनैतिक वर्ग के लोगों के लिए एक भाषण देने के लिए सदाबहार विषय है जिसे कहीं भी भुनाया जा सकता है ।
आपके ही लेख से पता चला कि दिल्ली जिमख़ाना और ब्रीच केंडी क्लब इस बात का उदाहरण हैं कि स्वतन्त्रता के इतने वर्षों के बाद भी मानसिक तौर पर हम गुलामी से उभरे नहीं है ।
आपके संपादकीय से ही ब्रीच केंडी क्लब के बारे में जानकारी मिली, अब तक तो हमें मुंबई के ब्रीच केंडी असपताल ka ही पता था और जिमख़ाना तो ऐसा है शब्द है जिससे साधारण व्यायाम शाला का ही आभास होता है ।
क्लब की सदस्यता लेने के लिए चालीस वर्ष इंतजार मतलब अगर आप आवेदन करेंगे तो आपकी संतान को सदस्यता मिलेगी ।
दिल्ली जिमख़ाना और ब्रीच केंडी क्लब की जानकारी तो हमें आपके संपादकीय से मिल गई । इसके अलावा देश में, मतलब स्वतंत्र भारत में ऐसे ही और न जाने कितने क्लब होंगे, जो भारतीयों को अपमानित कर, विदेशी गतिविधियों के साथ, शान से सिर उठाकर खड़े हैं ।
पुरवाई के संपादकीय से निरंतर हमारे ज्ञान में वृद्धि होती है ।
धन्यवाद
उषा जी इस सार्थक एवं सार्गर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
आपने अपने संपादकीय में दो महानगर… दो क्लब… एक सा विवाद…में दिल्ली के जिमखाना क्लब तथा मुंबई के ब्रीच कैंडी क्लब के इतिहास के साथ वर्तमान समय की स्थिति के बारे में बताते हुए दिल्ली जिमखाना क्लब के रेंट के साथ उसके बार में उपस्थित ‘ब्लडी मेरी’ नामक पेय के बारे में जानकारी दी है। मेरा मानना है कि उस समय तो क्या आज भी अधिकतर भारतीय इसका नाम नहीं जानते होंगे। आपने इसे बनाने की विधि भी बताई है जो इस बात का सूचक है कि आप जो भी लिखते हैं, गहन शोध के आधार पर ही लिखते हैं।
किरण बेदी, भारत की प्रथम महिला पूर्व I P S अधिकारी ने जिम खाना क्लब को अपना घर बताया है। कपिल सिब्बल जैसे लोग कोर्ट भी जा रहे हैं। उम्मीद है कोर्ट उनकी अर्जी स्वीकार भी कर लेगी। यही बात मुंबई के ब्रीच कैंडी क्लब के सन्दर्भ में शशि थरूर जी कर रहे हैं। भारत को गरीबों का देश कहकर भले ही प्रचारित किया हो लेकिन यह भी सच है कि यहाँ पर अभी भी ऑपनिवेशिक मानसिकता हावी हैं, अभी भी अमीरों और उच्च पदस्थ लोगों का सिक्का ही चलता है जो स्वयं को आम जनता से अलग समझते हैं,तभी भी आज भी dogs and indians are not allowed वाली मानसिकता के ये क्लब आज भी चल रहे हैं। दिल्ली गोल्फ क्लब की भी सदस्यता लेना सहज नहीं है।
आम पाठक को इन क्लब की असलियत बताने के लिए साधुवाद।
सुधा जी इस सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
तेजेन्द्र शर्मा जी का यह संपादकीय पढ़ते हुए मुझे बार-बार लगा कि चर्चा केवल दिल्ली जिमखाना और ब्रीच कैंडी क्लब की नहीं है। मुझे यह लेख उन मानसिक और सामाजिक संरचनाओं पर एक गंभीर विमर्श जैसा लगा, जो समय के साथ अपना स्वरूप तो बदल लेती हैं, पर पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं।
एक पाठक के रूप में मुझे महसूस हुआ कि लेखक क्लबों के इतिहास का वर्णन भर नहीं कर रहे, बल्कि उन प्रश्नों की ओर भी संकेत कर रहे हैं जो लोकतंत्र, समानता, विशेषाधिकार और सामाजिक चेतना से जुड़े हैं। पढ़ते हुए मेरे मन में बार-बार यह विचार आया कि स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक सतत सामाजिक प्रक्रिया है, जिसकी परीक्षा समय-समय पर हमारी संस्थाओं, परम्पराओं और व्यवहारों में होती रहती है।
मुझे इस संपादकीय की सबसे बड़ी विशेषता यह लगी कि यह किसी निष्कर्ष को पाठक पर आरोपित नहीं करता। इसके विपरीत, यह कुछ ऐसे असुविधाजनक प्रश्न सामने रखता है जिन पर सोचने के लिए पाठक स्वयं विवश हो जाता है। क्या औपनिवेशिक मानसिकता वास्तव में इतिहास का हिस्सा बन चुकी है, या उसके कुछ रूप आज भी हमारे बीच मौजूद हैं? क्या विशेषाधिकार समय के साथ समाप्त हो जाते हैं, या केवल नए रूपों में हमारे सामने उपस्थित होते रहते हैं?
लेख पढ़ते हुए मुझे यह भी लगा कि लेखक केवल क्लबों की इमारतों की बात नहीं कर रहे, बल्कि उन अदृश्य दीवारों की ओर संकेत कर रहे हैं जो समाज में कभी वर्ग, कभी पहुँच, कभी प्रतिष्ठा और कभी परम्परा के रूप में दिखाई देती हैं। शायद इसी कारण यह लेख एक समाचार या विवाद की सीमाओं से बाहर निकलकर एक व्यापक सामाजिक विमर्श का रूप ले लेता है।
संपादकीय समाप्त होने के बाद मेरे मन में क्लबों की इमारतें नहीं बचीं, कुछ प्रश्न बच गए। और मुझे लगता है कि किसी अच्छे संपादकीय की यही सबसे बड़ी सफलता होती है— वह केवल सूचना नहीं देता, केवल मत नहीं बनाता, बल्कि पाठक के भीतर विचार की एक प्रक्रिया आरम्भ कर देता है।
लेख पढ़ लिया है, पर उसके कुछ प्रश्न अभी भी खुले हुए हैं।
सुनीता जी आपने लिखा है – मुझे यह लेख उन मानसिक और सामाजिक संरचनाओं पर एक गंभीर विमर्श जैसा लगा, जो समय के साथ अपना स्वरूप तो बदल लेती हैं, पर पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं।… संपादकीय का मुख्य उद्देश्य होता है कि पाठक पढ़ने के बाद उस विषय पर सोचना शुरू कहे और कुछ कहे… आपने तो इतना सब कुछ कह डाला कि संपादकीय पूरी तरह से स्पष्ट हो गया हर पाठक के लिये। हार्दिक आभार।
हमेशा की तरह एक और महत्वपूर्ण सम्पादकीय। हार्दिक धन्यवाद । आपको अपनी संपादकीय की एक किताब प्रकाशित करवाना उचित होगा।
बहुत शुक्रिया सुषमा जी।
हम जैसे आम आदमी को तो अपनी जिंदगी की जद्दोजहद से ही फुर्सत नहीं मिलती है।हर संपादकीय की तरह यह भी आँख खोलने वाला है।आपको बधाई व आभार।