Sunday, May 31, 2026
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दो महानगर… दो क्लब… एक सा विवाद…!

भारत में हर राजनीतिक दल महँगाई, गरीबी और बेरोजगारी का ज़िक्र दिन में कम से कम एक बार तो करता ही है, मगर ज़मीनी सच्चाइयाँ कुछ और ही होती हैं। राजनीति में सिद्ध पुरुष के मुकाबले कुबेर हमेशा जीत जाता है। कुबेरों के लिए सिंघवी और सिब्बल हमेशा लड़ते दिखाई दे जाते हैं। टीएमसी के प्रतिनिधि पवन वर्मा टीवी बहसों में तो महँगाई और बेरोजगारी की बात करते हैं, मगर असल जीवन में शरमाते हुए बताते हैं कि वे दिल्ली जिमखाना क्लब के सदस्य हैं और उनके पिता भी इसके सदस्य थे।

बात हो रही है दो शहरों के अति-धनाढ्य लोगों के दो क्लबों की- दिल्ली जिमखाना क्लब और मुंबई का ब्रीच कैंडी क्लब। पहले को सरकार ने 7 जून तक संपत्ति खाली करने के आदेश दे दिए हैं, वहीं दूसरे को लेकर शशि थरूर ने मोर्चाबंदी कर रखी है।

ब्रीच कैंडी क्लब, मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) की स्थापना 1878 में हुई थी। उस समय केवल श्वेत लोग, अर्थात अंग्रेज़ या यूरोपीय मूल के लोग, इसके सदस्य बन सकते थे। इसकी मैनेजिंग कमेटी में आज भी किसी भारतीय का नाम शामिल नहीं है। 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात भी किसी भारतीय को इस क्लब की सदस्यता देना शुरू नहीं किया गया। 1960 के दशक के बाद ही भारतीय मूल के लोगों के लिए इसके द्वार खुल सके।

वहीं 27.3 एकड़ भूमि पर फैले दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना 2 जुलाई 1913 को ‘इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब’ के रूप में हुई थी। इस अमीर लोगों के क्लब के पहले अध्यक्ष स्पेंसर हरकोर्ट बटलर बने थे, जिनके नाम पर दिल्ली में विद्यालयों की स्थापना भी की गई। वे ब्रिटिश राज की एक प्रभावशाली हस्ती थे। इस क्लब की स्थापना में भारत की सात प्रमुख रियासतों- ग्वालियर, जयपुर, जोधपुर, कश्मीर, उदयपुर, किशनगढ़ और भोपाल के शासकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन सभी को क्लब की आजीवन सदस्यता प्रदान की गई थी। भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात इस क्लब के नाम से ‘इंपीरियल’ शब्द हटा दिया गया और इसका नाम केवल ‘दिल्ली जिमखाना क्लब’ रह गया।

‘पुरवाई’ के पाठक यह प्रश्न उठा सकते हैं कि हमारे संपादक को आज ऐसी क्या सूझी कि आम आदमी की बात करने के स्थान पर वे ऐसे विषय पर कलम चला रहे हैं, जो समाज के उस वर्ग से जुड़ा है, जिसके पास अगाध दौलत है, और जो केवल अपनी शान-ओ-शौकत दिखाने के लिए ऐसे विशिष्ट क्लबों की रौनक बनने जाता है। ये लोग टीवी बहसों में तो आम आदमी के दुःखों का रोना रोते हैं, मगर उसी गरीब आदमी से जुड़े दुःखों को भुलाने के लिए महँगी शराब के जाम लेने दिल्ली जिमखाना या फिर ब्रीच कैंडी क्लब पहुँच जाते हैं।

‘जिमखाना’ का शब्दकोशीय अर्थ है- सार्वजनिक स्थान जहाँ लोग एकत्र होकर व्यायाम आदि करते हैं; अर्थात् व्यायामशाला। दिल्ली जिमखाना की भूमि की अनुमानित कीमत लगभग 27,000 करोड़ रुपये आँकी जाती है। इस जिमखाना में व्यायाम या खेल-कूद की गतिविधियाँ नाममात्र की ही दिखाई देती हैं। कहने को यहाँ लगभग 40 टेनिस कोर्ट, 3 स्क्वैश कोर्ट, एक इनडोर हीटेड स्विमिंग पूल, तीन लाउंज बार, एक फाइन डाइनिंग रेस्तराँ, 35,000 पुस्तकों वाला पुस्तकालय, जहाँ लगभग 85 समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ मँगाई जाती हैं, 43 ट्रांज़िट रूम अथवा कॉटेज, तथा बैडमिंटन कोर्ट, बिलियर्ड्स कक्ष और क्रिकेट मैदान जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

दिल्ली जिमखाना में सदस्यता का भी एक ख़ास प्रकार का आरक्षण निर्धारित है। 40 प्रतिशत सदस्य सिविल सेवाओं के अधिकारी (जिसमें आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारी शामिल हैं), 40 प्रतिशत भारतीय सेना (जल, थल और वायु) के अधिकारी तथा शेष 20 प्रतिशत उद्योगपति, वकील, डॉक्टर, कलाकार आदि होते हैं। सदस्यता की एक मोटी फ़ीस है और प्रतीक्षा सूची 40 वर्ष से भी अधिक लंबी हो चुकी है। दिल्ली जिमखाना में केवल पैसा ही महत्वपूर्ण नहीं है; उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आपके ‘कनेक्शन’ किस स्तर के हैं।
एक मज़ेदार बात यह है कि सरकारी ज़मीन पर एक निजी क्लब चलाया जा रहा है और लुटियंस दिल्ली में प्रधानमंत्री निवास से सटी भूमि पर स्थित इस विशाल जिमखाना का वार्षिक लीज़ किराया मात्र एक हज़ार रुपये है। दरअसल, वर्ष 1918 में ब्रिटिश सरकार ने 27.3 एकड़ की यह ज़मीन एक विशेष शर्त पर दी थी- ‘सामाजिक और खेल गतिविधियों के संचालन’ की शर्त पर। उस समय लीज़ का किराया एक हज़ार रुपये वार्षिक निर्धारित किया गया था। आश्चर्य की बात यह है कि 107 वर्षों में भी इस किराये में एक रुपए की वृद्धि नहीं हुई। कहने को यह जिमखाना एक ‘नॉन-प्रॉफ़िट’ संस्था है।

भारत की वर्तमान सरकार ने इस लीज़ समझौते का गहन अध्ययन किया और उसमें उन्हें ‘धारा-4’ दिखाई दी। इस धारा के अनुसार, “यदि सरकार को यह भूमि किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए चाहिए होगी, तो वह यह लीज़ समाप्त कर सकती है।” वर्ष 2026 में यही धारा क्लब के लिए अस्तित्व-संकट की चेतावनी बनकर खड़ी हो गई है।

भारत सरकार ने क्लब को कानूनी नोटिस जारी कर उसकी प्रबंधन समिति से 5 जून तक भूमि खाली करने को कहा है। जिस क्लब की सदस्य सूची में देश के पूर्व प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री, नौकरशाह, जनरल, न्यायाधीश और उद्योगपति शामिल रहे हैं, वह आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहा है।

22 मई 2026 को शहरी कार्य मंत्रालय के भूमि एवं विकास कार्यालय ने एक पत्र जारी करते हुए क्लब को सूचित किया कि 5 जून 2026 तक जिमखाना क्लब को संपत्ति का शांतिपूर्ण कब्ज़ा भूमि एवं विकास विभाग को सौंपना होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो कानूनी कार्रवाई के माध्यम से कब्ज़ा प्राप्त किया जाएगा। सरकार का सीधा तर्क है कि जिमखाना प्रधानमंत्री आवास के अत्यंत निकट स्थित है और सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में आता है।
ज़ाहिर है कि दिल्ली जिमखाना चुपचाप कब्ज़ा देने वाला नहीं था। सिंघवी और कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ वकीलों ने क्लब की ओर से अदालत का दरवाज़ा खटखटा दिया है। मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है, किंतु सरकार ने एक बार फिर पूरे देश का ध्यान इस जिमखाना की ओर आकर्षित कर दिया है।

एक रोचक तथ्य यह भी है कि दिल्ली जिमखाना की बार में ‘ब्लडी मेरी’ नामक पेय उस समय उपलब्ध था, जब अधिकांश भारतीय इसके नाम से भी परिचित नहीं थे। वैसे आम आदमी को आज भी इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं होगी। एअर इंडिया में फ़्लाइट पर्सर के रूप में कार्य करने का लाभ उठाते हुए मैं बता दूँ कि ‘ब्लडी मेरी’ एक कॉकटेल है, जो मुख्यतः वोडका से बनाई जाती है। इसमें टमाटर का रस, टबैस्को सॉस, वूस्टरशायर सॉस, ताज़ा नींबू का रस, नमक, काली मिर्च तथा हॉर्सरैडिश (मूली के समान एक कंद) मिलाया जाता है।

दूसरी ओर, ब्रीच कैंडी क्लब आज भी उस मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं दिखता, जिसका प्रतीक कभी यह बोर्ड हुआ करता था- “कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित।” आज भी क्लब की प्रबंधन समिति में किसी भारतीय को शामिल नहीं किया जाता। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने इस विषय पर टिप्पणी करते हुए कहा है, “सरकारी भूमि पर नस्लवादी प्रावधानों को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है। यह कहना पूरी तरह हास्यास्पद है कि क्लब के संविधान में इसकी आवश्यकता है। हमारे देश के संविधान का क्या होगा?”

सूत्रों के अनुसार, शशि थरूर ने अपने बचपन की एक घटना साझा करते हुए बताया कि उन्हें भी बचपन में इस क्लब में प्रवेश नहीं करने दिया गया था, क्योंकि उनकी त्वचा का रंग भारतीयों जैसा था। उन्हें एक विदेशी मेज़बान ने आमंत्रित किया था, किंतु उन्हें प्रवेश नहीं मिला।

उस समय केवल विदेशी होना पर्याप्त नहीं था; यूरोपीय दिखना भी आवश्यक था। एक फ़्रांसीसी महिला का रंग अपेक्षाकृत साँवला था, इसलिए उसे क्लब में प्रवेश के लिए अपना पासपोर्ट साथ रखना पड़ता था। उल्लेखनीय है कि भारतीयों को इस क्लब में प्रवेश स्वतः नहीं मिला था। इसके लिए हमें एक अश्वेत अमेरिकी राजनयिक का भी आभार मानना चाहिए।
घटना यह थी कि 1960 के दशक में एक अश्वेत अमेरिकी राजनयिक को उसके श्वेत सहयोगी तैराकी के लिए क्लब में ले आए। किंतु क्लब प्रबंधन ने उन सभी को बाहर जाने के लिए कह दिया। इसके बाद अमेरिकियों ने तीव्र विरोध दर्ज कराया और व्यापक आक्रोश फैल गया। उसी घटना के परिणामस्वरूप भारतीयों के लिए भी इस प्रतिष्ठित क्लब के द्वार खुलने लगे।

विचार करने की बात यह है कि स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद भी हमारे देश में ऐसी संस्थाएँ मौजूद हैं, जो आम भारतीय को समान सम्मान देने में संकोच करती हैं। इन 79 वर्षों में देश में विभिन्न दलों की सरकारें सत्ता में आईं। महाराष्ट्र में बालासाहेब ठाकरे की पार्टी सत्ता में रही, दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, किंतु इन दिव्य संस्थानों की संरचना और कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न बहुत कम उठाए गए। आज तक भारत में 14 प्रधानमंत्री हो चुके हैं, फिर भी दिल्ली जिमखाना और ब्रीच कैंडी जैसे क्लब अपने विशेषाधिकारों के साथ आज भी उसी प्रकार खड़े दिखाई देते हैं।

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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3 टिप्पणी

  1. सादर नमस्कार सर…..
    कुछ दिन पहले मुझे इसके बारे में एक छोटी सी पोस्ट मिली थी… पढ़कर यह आश्चर्य हुआ कि ये लोग आज भी हमें अंधा बेहरा बनाकर रखे हुए हैं… और हम हैं भी। आपने इतनी संवेदनशील बात पुरवाई के माध्यम विश्वपटल रखने का जो निडर प्रयास किया हैं इसके लिए आपको साधुवाद। कुछ नहीं बिगड़ेगा किसीका भी। यहाँ एक से एक धुरंदर है…. जहाँ इतने साल बीत गए…. आगे… क्या होगा….

    धन्यवाद सर….

  2. जितेन्द्र भाई: मशहूर कहावत है कि रस्सी तो जल गई मगर उसके बल नहीं गए। और १९४७ के बाद भी गोरे साहबों के जले हुए बलों को ऐसे ही कायम रखने के लिए इस देश में बहुत सारे काले साहब आगे आगए। न जाने यह हीन भावना कि अकल से चाहे वो एकदम डफ़र हो मगर यदि वो शकल से गोरा है तो बस उसे झुक कर सलाम करना इन काले साहबों का एक तरह से फ़र्ज़ बन जाता है। सब से पहले तो मैं यह जानना चाहूँगा कि १९४७ के बाद या उस से पहले भी इन दोनों क्लबों का देश के उद्धार में कितना योगदान रहा है। 27.3 एकड़ में फ़ैले हुए जिमख़ाना क्लब की लीज़ केवल एक हज़ार रुपये सालाना एक मज़ाक ही नहीं बल्कि देशद्रोह है। आजकल के ज़माने में तो इतने पैसों में तो उस इलाके में सुई की नोक जितनी ज़मीन भी लीज़ पर नहीं मिलेगी। देश की सुरक्षा को देखते हुए प्रधान मन्त्री निवास के साथ जुड़ी होने के कारण अब इस स्थान को खाली कराना बहुत ज़रूरी हो गया है। सरकार ने जो फ़ैसला लिया है वो बिल्कुल सही है। मोदी जी से पहले बहुत सारे शासक आए लेकिन किसी में भी इतना दम नहीं था कि इस तरफ़ ध्यान भी दें। उन्हें तो अपनी कुर्सी कायम रखने और वोटों से मतलब था।

    मुंबई के ब्रीच कैण्डी क्लब में जो यूररिपीय दीखने की प्रथा थी वो अभी भी है या नहीं। यदि नहीं है तो “ कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित” क्लब में आज सांवले रंग वाले काले साहब अपने आप को ब्रीच कैण्डी क्लब में दाख़िला मिलने पर बहुर गर्व महसूस कर रहे होंगे।

    आपके इस सम्पादकीय के अन्तिम पैरे को मैं दोहराना नहीं चाहता। बस इतना कहना चाहूँगा कि सारे सम्पादकीय के साथ साथ इस पैरे के लिए बहुत बहुत साधुवाद।

    जय श्रीराम

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