एक दिनएक दिन __ लघुकथा जानकी वाही 3

अलार्म की आवाज़ सुन बिटिया ने सिर तकिया के नीचे घुसा दिया। दरवाज़ा खोल अंदर आती पदचाप को अनसुना कर।
एक  हाथ आगे बढ़ा  दुबारा बजते को अलार्म बन्द किया।प्यार से बेटी को देखा।लौटते हुए दरवाजे को हल्के से उड़काया ,थोड़ी देर और सो लेगी।
रसोई में जाकर फ्रिज खोला ,असमंजस से अंदर देखा क्या बनाया जाय।कुछ पल सोच गूंथा आटा और  भिंडी निकाली।  भरवां भिंडी बिटिया को बहुत पसंद है।भिंडी धोकर सब्जी गैस पर चढ़ाई और  ठंडे ,अकड़े आटे से किसी तरह दो पराठे बनाकर सब्जी के साथ बिटिया के टिफिन में रखे।घड़ी पर नज़र मारी-
“ओह ! समय कितनी तेजी से भागता है।”
जाकर बिटिया को जगाया।उसके तैयार होकर आने तक दूध और ब्रेड पर मक्खन लगाकर प्लेट पर रखा।
” बाल बना दीजिये ,कंघी लेकर बिटिया पास आ गई।”
फटाफट बाल बनाये।
” चलो -चलो,बस निकल जायेगी।”
स्कूल बैग कंधे पर टांगा। भागते हुए स्टॉप पर पहुँचे।बिटिया के माथे पर प्यार किया। कुछ हिदायत दी।
” अच्छे से पढ़ना।”फिर मिलते हैं।”
जब तक बस आँखों से ओझल नहीं हो गई हाथ हिलता रहा।घर लौटते हुए चाल धीमी थी।सुबह की भागमभाग के बाद अब कुछ पल आराम के।
रसोई में जाकर अपने लिए एक कप चाय बनाई अख़बार लिया डायनिंग टेबल पर बैठ कर कमर और कंधों को दबाया ,बड़ी टीस कर रहे थे दोनों।आज ही काम वाली को भी छुट्टी पर जाना था।फिर कुछ सोचकर मोबाईल निकाला एक नम्बर डायल किया।
”   मीता , अब तुम्हारे पापा की तबियत कैसी है?  मेरी सुबह तो ठीक-ठाक निबट गई पर अभी पूरा दिन सामने खड़ा है।कैसे करूँगा सोचकर मन घबरा रहा है।वैसे मैं बिल्कुल तुम्हारे कहे अनुसार बिटिया और घर को संभाल रहा हूँ।  यार, नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए सब पत्नियों को। घर-बाहर, कैसे करती हो ?तुम ये सब? “

ज़वाब में फोन के दूसरी ओर से खनक भरी मीठी हँसी ही सुनाई दी।

जानकी बिष्ट वाही

बी.150/ प्रथम तल
सेक्टर -15
नोएडा-उत्तर प्रदेश
16/4/18

फोन .नम्बर-7838405520
ईमेल-jankiwahie@gmail. com

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