जमनिया
नाम तो उसका जमना है पर बिगड़ते-बिगड़ते जमनिया हो गया है जो कि गाली-सा प्रतीत होता है । वह सोचती जा रही है, आज इस लकड़ी के गट्ठर के 50 रुपए मिल जाएँ तो 10 रुपए का, बच्चे के लिए कुछ ले लूँगी और बचे हुये पैसो का चावल ले लूँगी । कम से कम दो दिन का काम तो चल ही जाएगा । पता नही, भगवान भी क्यों हमारी कठिन से कठिन परीक्षा लेता है । ठेकेदार के ईंटों की भट्टी पर काम करते-करते मेरे रामन्ना के साथ ही दुर्घटना होनी थी, वह भी इतनी भयंकर कि अस्पताल जाने का भी चांस नहीं मिला । उदासी की प्रतिरूप जमनिया बड़े-बड़े कदम बढ़ाए चलाये जा रही थी।
अचानक सामने से लड़कियों के स्कूल की ‘बड़ी बहिन जी’ आती दिखाई दी। डांटते हुये बोलीं, ‘क्या रे जमनिया, कहाँ जा रही है, बच्चे को लेकर कड़कती धूप में, बीमार पड़ जाओगे तुम दोनो’ ‘अरे बहिन जी रोटी का ठिकाना नहीं है, हमें काहे की बीमारी’ जिस दिन लकड़ियाँ बिक जाती हैं, उस दिन पेट में अन्न चला जाता है, नहीं तो हम दोनों भगवान मालिक….’
मानवता से लबालब रहम दिल ‘बड़ी बहिन जी’ का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा वे बोलीं, ‘‘ऐसा नहीं बोलते, भगवान सबका ध्यान रखता है । इतना सुंदर बच्चा तुझे भगवान ने दिया है, इसका ध्यान रख, और ये लकड़ियाँ कहाँ बेचती है तू।’ ‘वह शराब की भट्टी वाला मंगतराम ले लेता है’ ‘अच्छा कितने पैसे देता है, वह तुझे… ‘बहन जी वो तो अपनी मर्जी से पैसे दे देता है, हिसाब तो कुछ करता नही है, कभी-कभी डांटकर भगा भी देता है और गंदी नजर रखता है मेरे ऊपर।’ बहन जी बोलीं ‘सुन, शराब की भट्टी वाले को लकड़ी मत बेचा कर, मुझे दे दिया कर, सर्दी में तापने के काम आएगीं और अब ये गट्ठर लेकर मेरे साथ चल। तू मेरे स्कूल में सफाई का काम करेगी क्या ? तेरे रहने के लिए एक कमरा भी मिल जाएगा। मैं तेरे आदमी को जानती थी, बहुत ही ईमानदार और मेहनती लड़का था। वह जब सुबह ठेकेदार के बच्चों को स्कूल छोडने आता था तब हमेशा मुझे नमस्ते करता था और मुझे देखकर रास्ते से दूर खड़ा हो जाता था। मैं अभी झोपड़-पट्टी की महिलायों को सफाई से रहने के बारे में सिखाने के लिए जा रही हूँ, पर अब चल, पहले तेरा काम करती हूँ।’
जमनिया सोचती है, भगवान तेरे कितने रूप हैं, कोई समझ ही नहीं पता। ‘थैंकू बहिन जी’ कहते हुये उनके पीछे-पीछे चलने लगी ।
हाफ़डे सी एल
सीमा उस दिन ऑफिस से जल्दी निकली और भाग-भाग कर उसने 5.28 की लोकल पकड़ ही ली । जैसे ही ट्रेन में घुसी, पुरानी सहेली रेखा दिख गई । रेखा बोली, “…अरे सीमा तू कहाँ है, कौन-सी ट्रेन से जाती है…” ? सीमा बोली, “थाम ग, जरा मला सांस घेऊ दे…” सीमा ने अपना बेग ऊपर रखा, दुपट्टे से पसीना पोंछा, फिर बोली,
“हाँ बोल रेखा, क्या बोल रही थी तू” ?
“मैं पूंछ रही थी, कौन-सी ट्रेन से जाती है, इतने दिन मिली क्यों नहीं…?
“आजकल मैं थोड़ा जल्दी जाती हूँ…” दोनों इधर-उधर की बातें करने लगीं।
बातों के दौरान रेखा ने पूछा, “सीमा दिसम्बर आ गया तूने छुट्टियाँ खत्म की या नहीं…”
सीमा रुयांसी होकर बोली, “छुट्टियाँ तो खत्म हो गई, पर एक हाफडे सीएल बर्बाद हो गई।”
“…क्या यार…कैसे तूने सीएल बर्बाद कर दी” रेखा ने पूछा.
“…अत्ता तुला काय सांगू मी, मेरे एक रिश्तेदार बहुत दिनों से बीमार हैं। वे मेरे दूर के मामाजी लगते हैं। बहुत बीमार हैं तो मुझे लगा, 2-4 दिनों में उनके घर से बुरी खबर आएगी और मुझे जाना ही पड़ेगा। इसीलिए मैंने आधे दिन की छुट्टी बचाकर रख्खी थी। अब उनकी तबीयत सुधरने लगी।
दिसम्बर खत्म हो गया और मेरी हाफ़डे सीएल बेकार चली गई…।”
उनके हित में…,
सेठ ब्रजभानु ने आदिवासी-बहुल क्षेत्र में एक फेक्ट्री लगाई। अविकसित क्षेत्र होने की वजह बताकर, प्रशासन से बहुत सारी रियायतें हासिल कीं। पंचों को, सरपंचों को, दलालों को और जिनकी ज़मीनें ली गई थीं उनको ठेके की और नौकरियों की रेवड़िया बांटी गईं।
विदेश से कच्चे माल के अलावा बड़े-बड़े विषय-विज्ञ, इंजीनियर्स इमोर्ट किए गए। उनके लिए आरामदायक आवासीय फ्लेट, हेल्थ क्लब, रिकरीयेशन क्लब स्वीमिंग पुल आदि का रातों-रात निर्माण कराया गया । गाँव के लोगों के लिए, पक्की प्राथमिकशाला और चिकित्सालय खुलवाने का “आश्वासन” दिया गया।
अब सवाल आया ट्रांसपोर्ट का। सरपंच महोदय ने सुझाया, गाँव से फ़ेक्ट्री तक आने के लिए दो रास्ते हैं । एक तो इस तरफ वाला छोटा रास्ता है, जो ऊबड़-खाबड़ है, इसके दोनों तरफ गहरी खाई है । दूसरा पक्का रास्ता है, पर जरा लंबा है। फ़ेक्ट्री का माल कीमती है, माल के लिए पक्का रास्ता ही इस्तेमाल करें। गाँव से आने वाले मजदूरों के लिए छोटा रास्ता ठीक रहेगा । इस पथरीले रास्ते पर तो मेरे खड़खड़िया (टूटी-फूटी पुरानी मोटर) भी चल सकती है। भगवान न करे, माल से भरी आपकी एकाध गाड़ी खाई में गिर गई तो आपका कितना नुकशान हो जाएगा, कैसे भरपाई होगी । इन मुफ्तखोरों का क्या है …. एक सीटी बजाओ तो पचासों खड़े हो जाएंगे।
सरपंच की बात पर अमल कर, तैयार माल के लिये लंबा और पक्का रास्ता और मज़दूरों के लिए छोटा ऊबड़-खाबड़ रास्ता निर्धारित कर दिया गया। इस नेक सलाह के लिए ट्रांसपोर्ट का ठेका भी सरपंच महोदय को दे दिया गया।
डिस्ट्रिक कलेक्टर महोदय को इस तरह जानकारी दी गई।
“मजदूरों के हित को ध्यान में रखते हुए, उन्हें फ्रेक्ट्री तक आने-जाने के लिए वाहन उपलब्ध करा दिया गया है और इसका ठेका भी एक स्थानीय व्यक्ति को दे दिया गया है। ये आपकी जानकारी के लिए है।
- उषा साहू, मुंबई।
