Saturday, September 19, 2026
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शोभना श्याम की लघुकथा – हद

रजनी की सास को आज राशन लेने जाना था, जहाँ भीड़ और लम्बी क्यू के चलते उनके तीन चार घंटे से पहले लौटने की सम्भावना ही नहीं थी सो बड़े बच्चों को स्कूल भेज सबसे छोटी पांच वर्षीय बेटी कन्नू को लेकर ही वह काम पर आ गयी थी। कन्नू को बरामदे में बैठाकर वह स्वयं बर्तन मांजने रसोईघर में चली गयी। अभी बमुश्किल पाँच मिनट हुए होंगे कि अम्माजी की गुस्से से भरी आवाज सुनाई पड़ी जो कन्नू को डाँट रहीं थीं। रजनी दौड़कर वहाँ पहुँची तो देखा कन्नू बरामदे के बजाय ड्राइंगरूम में रखी डाइनिंग की एक कुर्सी पर बैठी है।

रजनी को देखते ही अम्माजी उस पर बरस पड़ीं, “अपनी बेटी को जरा भी अकल नहीं सिखाई री। उसे ले भी आई थी तो उसे उसकी हद तो बतानी चाहिए थी। मेरी कुर्सी गन्दी कर दी।”

“अम्माजी मैं उसकी तरफ से माफ़ी मांगती हूँ। वैसे कन्नू नहा-धोकर साफ कपड़े पहनकर आई है, कुर्सी गन्दी नहीं हो सकती।” रजनी कन्नू को कुर्सी से उतारकर बरामदे में ले जाते हुए बोली।

“देखो तो इसको, एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी, कुर्सी ही क्यों हमारे सर पर बैठा दे अपनी बेटी को।” अम्माजी ने चिढ़कर कहा।

“अब बस भी करिये अम्मा जी! बच्ची है अभी ऊंच-नीच नहीं समझती, आगे से ऐसा नहीं करेगी।”यह कहकर रजनी तो फिर से फिर से बर्तन मांजने लगी, लेकिन अम्माजी अभी भी बड़बड़ा रही थीं।

तभी अम्माजी का बेटा अपने पालतू कुत्ते ब्रूनी को फारिग करवाकर बाहर से लौटा। ब्रूनी मिटटी भरे पैरों से ड्राइंग रूम में बिछे कालीन को पार करता कीमती सोफों पर उछलकूद करने लगा।

बरामदे से झांकती नन्ही कन्नू की पाँच साल पुरानी हैरतअंगेज नजरें कभी खुद को और कभी ब्रूनी को देखती हुई मानो अपनी और ब्रूनी की हद को तोल रही थी। लेकिन सर्विस विंडो से यह देख रहा रजनी का पैतीस वर्षीय स्वाभिमान रसोई से निकला और कन्नू का हाथ पकड़, अपना झोला उठा तीर की तरह घर से बाहर हो लिया।

  • शोभना श्याम
10/51, सेक्टर 3, राजिंदर नगर साहिबाबाद, ग़ाज़ियाबाद , उत्तर प्रदेश 201005

9953235840

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