त्यौहारों के मौसमत्यौहारों के मौसम - संस्मरण - आरती तिवारी 9

  • आरती तिवारी

अगस्त का महीना हमारी सालाना छुट्टियों का ही नहीं,..त्यौहारों के मौसम का भी हुआ करता था,.इसी अगस्त में मेरे देश को अंग्रेजों की 200 सालों की गुलामी से आज़ादी मिली थी,.इसी आज़ादी के जश्न हम हर साल मनाते चले आ रहे हैं!..कुछ आंकड़े हर साल एक विकास का ग्राफ बताते हैं,..किन्तु सोशल मीडिया में छाई स्त्री उत्पीड़न यौन हिंसा,आये दिन घटने वाली रेल और सड़क दुर्घटनाएँ,भृष्टाचार के बड़े खुलासे,आतंकवाद की निरन्तर निरन्तर दिल दहला देने वाली घटनायें,रोज़गार के अवसरों की कमी,बढ़ती जनसंख्या,बीमारी,प्राकृतिक आपदाएं और इन सबके निराकरण के लिए बनाई जा रही शासकीय योजनायें जो या तो क्रियान्वित होती ही नहीं दिखतीं या होती भी हैं तो इनसे कोई मुक़म्मल हल होते नहीं दिखते..पर विकास का ग्राफ दिखाया जाता है जो निरन्तर ऊपर चला जा रहा है,..

आज भी आज़ादी के इस जश्न को मनाने मैं मन्दसौर के राजीव गांधी क्रीड़ांगन में चली जाती हूँ,वे ही भाषण सुनती हूँ जो त्यौहारों के मौसम - संस्मरण - आरती तिवारी 10सालों-साल से सुनती चली आ रही हूँ,…वे ही राष्ट्रभक्ति के गाने भी जिन्हें पहली बार सुनकर बहुत आंदोलित हुई थी–हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्हाल के/ऐ मेरे वतन के लोगो ज़रा आँख में भर लो पानी जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो क़ुरबानी और भी ऐसे ही न जाने कितने ही गाने हैं जो दिल में घर कर गए थे,..

आज भी मेरे एकान्त में जब कोई गीत दख्ल दे देता है तो वो पल बस भगतसिंह हो जाता है,..और मैं उनके ख्यालों में खो सी जाती हूँ,..राजगुरु और सुखदेव को उनसे ठिठोली करते देखने लगती हूँ,..राजगुरु हमेशा यही कहते थे,..कि रब बड़े अच्छे मूड में रहा होगा और फुरसत में भी तब उसे सूझा कि चलो भगतसिंह को बनाया जाये,..और जिस तन्मयता से उसने भगतसिंह को बनाया न कि किसी गोरी मेम को अगर कह दो कि ये ही है असेम्बली में बम फेंकने वाला बन्दा है मार दो इसे,..तो पता है वो भगतसिंह को तो देखती ही रह जायेगी और गोली किसी गोरे को मार देगी,..

त्यौहारों के मौसम - संस्मरण - आरती तिवारी 11और एक साले अपन हैं कि जब रब का भयंकर मूड बिगड़ा होगा न कि किसी को धोने के लिए एक बेढंगा सा सोंटा बना दिया जाये तो उसने भैये अपुन को बना दिया,.राजगुरु की इस बात पर श्रीकृष्ण सरल के राजगुरु पर ही लिखे इस उपन्यास में से गूंजते कहकहे मेरी तऱफ भी आ जाते और मैं सोचने लग जाती कैसे बांके नौजवान रहे होंगे वे सब और उनकी ज़िन्दादिली भी,…अरे देखिये न ये पचमढ़ी की बेटियाँ भी एक बात को विस्तार नहीं देतीं और बीच बीच में बार बार वहीँ पहुँच जाती हैं,..जहाँ से चली थीं,..चलिए एक बार और मुआफ़ कीजिये आगे से ध्यान रखूंगी,..तो ये बारिशों का त्यौहारो का मौसम हमें भरपूर आनन्द देता था,..

आज अगस्त में भी इतनी उमस है जबकि 80 के दशक में पचमढ़ी में पहली बारिश होने के बाद से ही हमारे ऊनी कपड़े बाहर निकल आते थे,.. इसी मनभावन सी ठंडक में आता था भादों की अमावस को “पोला” का त्यौहार और ये त्यौहार मेरी अम्मा के साथ आचार्य कुल में प्रविष्ट हुआ था,.मेरे नानाजी जो मूलतः कृषक थे बाद में शिक्षक होकर निमाड़ के ग्राम खंडवा जिले के गुयड़ा में बसे उन्हीं से अपनी ये सांस्कृतिक विरासत लेकर मेरी अम्मा अपने साथ कृषि कर्म से जुड़ा ये पर्व भी लाई,..

ये भी भाई बहन के स्नेह को परस्पर व्यक्त करने वाला एक उत्सव होता है,.पोला अमावस पर घर में मीठे गुड़ के खुरमे और बेसन के नमकीन ठेंठरे बनाये जाते हैं,..लकड़ी के बैल जिन्हें घुल्ले कहते हैं उनकी पीठ पर कपड़े की एक ऐसी थैली जिसके दोनों तरफ दो जेब होते हैं रखी जाती है इस थैली को “गोन” कहते हैं,..इसमें एक तरफ खुरमे और एक तरफ ठेंठरे भरे जाते हैं,..जो इस बात का प्रतीक हैं कि जीवन में रिश्तों की मिठास बनी रहे इसके लिए नमक कितना ज़रूरी और महत्वपूर्ण है,..भाई और बहन के इस पवित्र रिश्ते की आधारशिला ये गोन है जो दोनों को बराबर तौलती है,..न किसी की झोली में कम न ही किसी की झोली में ज़्यादा,.ये संतुलन ही रिश्तों को ताउम्र जीवन्त बनाये रखता है,..इसके कम ज़्यादा होते ही जीवन में से कभी मिठास गायब न होने लगे या मिठास अधिक होकर मीजान न गड़बड़ा जाये इसलिए नमक उसे साध लेता है,..

सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है,..कभी बेटी बड़ी दूर ब्याही गई हो राखी पर भी न पहुँच सकी हो तो उसे अपने मायके की कितनी याद सताती होगी,..जब चिट्ठी पत्री भी न रही होंगी तो माँ बाप अपने आँगन की बिछुड़ी चिरैया को बैलों पर लाद कर ये मीठे नमकीन पकवान उसके भैया के साथ पहुँचा देते थे,..भाई बहन मिल भी लेते थे और माँ के हाथ का बना बेटी चख भी लिया करती थी,.इसी बहाने भैया को दो चार दिनों तक रोक कर ऋषि पंचमी को राखी बाँध कर फिर विदा करती थी,..आज भी रिवाज़ है माहेश्वरी परिवारों में ऋषि पंचमी को ही राखियाँ बंधती हैं,..

उन दिनों हरियाली तीज,सातूड़ी तीज,हरितालिका तीज ये सारे पर्व स्त्रियों के मिलने जुलने के परस्पर मन मुताबिक समय बिताने के कुछ बहाने थे,..जिनमें से झरती थी अपनत्व की गन्ध जो नेहबन्धों को मज़बूती से जोड़ती थी,..हमने भी खूब झूले झूले हैं सावन के,..तीजा का फुलेरा चन्दन चाचा के यहाँ बंधता सारी रात ढोलक बजती खूब भजन होते,..हालांकि उनमें मेरी भूमिका एक रसिक दर्शक की होती थी, हिस्सेदारी नहीं होती थी पर अपने से पिछली पीढ़ी के उत्सव मनाने के तरीके,सलीके और तहज़ीब से बहुत कुछ सीखा,..जो सम्माननीय था,. दूसरे दिन सुबह से ही गणेशोत्सव की धूम मच जाती थी,..गजानन घर घर विराजते थे,सुबह शाम पांडालों में आरती के लिए भीड़ उमड़ती,..शाम की आरती के बाद अपने अपने मोहल्ले की टीम रोज़ नई नई झाँकियाँ सजाती,..कहीं कृष्ण की बाल लीलाएँ तो कहीं कंस वध,कहीं भक्त सुदामा और सखा कृष्ण का मिलाप,कहीं राम वन-गमन की झाँकी तो कहीं सिया स्वयंवर अब कहाँ तक गिनाऊँ,..एक एक दृश्य मेरे सामने है…क्या भूलूँ क्या याद करूँ!

पूरे दस दिनों तक इन अलग अलग झाँकियों में त्रेता और द्वापर की झलकियां मिलतीं,..कल ही तो मैं फोन पर एक बरसों से बिछुड़ी सखी से यही बतिया रही थी जो फेसबुक पर जुड़ कर इन दिनों मुझे लगातार पढ़ रही है,.और पूछती बताती रहती है उन दिनों और इन दिनों के बीच का हाल,..हमारी बातें सुनते सुनते एकाएक उसकी जेठानी की पाँच वर्षीय पोती ने उससे पूछा,..ये त्रेता और द्वापर क्या है?

उसने कहा मैं ही इस जिज्ञासा का समाधान करूँ! एक नामी स्कूल में अपनी तमाम योग्यताओं के बावज़ूद बमुश्किल एडमिशन पाई बच्ची का ये एक बौद्धिक प्रश्न था,…उसे अपनी संस्कृति की कितनी जानकारी थी ये उसकी पाँच साल की मासूम उम्र से मैं नहीं पूछ सकती थी,..सखी उस गुड़िया के इस जटिल प्रश्न से किनारा कर उसे मेरे साथ वार्तालाप में शामिल कर खुद असम्पृक्त हो गई थी,.

मैं उसकी भोली उम्र को न ही भ्रमित करना चाहती थी न ही उसे फतांसी दुनिया में ले जाना चाहती थी और उसकी जिज्ञासा का समाधान भी उसकी उम्र के हिसाब से करना चाहती थी,..कि यकायक मेरी उलझन मानो  विघ्नहर्ता गणेश ने स्वयं ही सुलझा दी,..बच्ची स्काइप पर मेरे साथ जुड़ी थी वो जहाँ सीढ़ियों के नीचे खड़ी थी उसी के ठीक ऊपर एक तस्वीर थी,..मैंने उससे कहा देखो चारु ऊपर जो तस्वीर है न,जिसमें तुम्हारे पापा तुम्हारे दादू और तुम्हारे पापा के दादू के साथ बैठे हैं,..और अब तुम हो वैसे ही एक समय से दूसरे समय के बीच में एक डिस्टेंस होता है,.जैसे तुम्हारी आज जो डॉल तुम्हारे पास है,..कल उसमें बहुत सारे चेंजेस होंगे,.बच्ची बड़ी ज़हीन थी,..तुरन्त रिप्लाई किया वैसे ही न जैसे हम रोज़ नई नई सर्च करते हैं,जैसे चेलेंज भी एक्सेस्प्ट करते हैं और इम्प्रूव करते जाते हैं,..

मैंने भी तुरन्त उसे थम्ब दिखाकर चीयर अप किया और जैसे तैसे उसके नन्हें सवालों से पीछा छुड़ाया  जिनका सामना करने में मैं पसीना पसीना हो गई थी,..ये सुखद विस्मय था हर्ष भी था पर कहीं मन में एक स्वगत-प्रश्न भी था,..हमारी अत्याधुनिक जीवन शैली सब सुख सुविधाओं से युक्त है,.हम हमारे बच्चों को वो सब हर कीमत पर मुहैया करवाना चाहते हैं जो हमें नहीं मिल पाया या उस समय वो था ही नहीं तो उसे न पा सकने का हम मलाल भी क्यों करें?

पर क्या हमारे बच्चों को विशेषकर महानगरों की एक नवविकसित संस्कृति में पलने,बढ़ने वाले बच्चों को क्या हम वो सब जो हमारी जड़ों से होकर हममें प्रवाहित होता है का एक अंश भी दे पा रहे हैं,..तकनीकी क्रांति ने हर पुरानी चीज़ को विस्थापित कर नई सर्व सुविधायुक्त सर्व सुलभ वस्तुओं को उनकी ज़गह स्थापित कर दिया है और ये पीढ़ी भी उसी की आदि हो चली है,..

बच्चों ने अपने बचपन से समझौते किये जिनके माता पिता दोनों ही कामकाजी थे या जिनकी माएं घर से बाहर किसी भी काम से जाती रही हों सोशल वर्कर हों या सोसायटी की किटीज में जाती रही हों,..जिन्हें दादा दादी नाना नानी या अन्य परिवार जनों का सानिंध्य न मिल पाया हो,..एकल परिवार के भी सिंगल चाइल्ड हों,..मध्यमवर्गीय या निम्न मध्यम वर्गीय या धनाढ्य हों,…उन्हें एक ऐसा बचपन मिला जिन्होंने कार्टून्स देखकर ही राम,कृष्ण,गणेश,सरस्वती को जाना या स्कूलों में कभी ग्रीन डे कभी राखी कभी जन्माष्टमी डे मनाकर ही कुछ अधकचरा,अधूरा सा अपनी संस्कृति को जाना,..

डर्टी शब्द उच्चारते ही उसमें आदतें और वस्तुएँ ही नहीं कुछ अभावग्रस्त मैलेकुचेले गरीब इंसान भी आ गए,..विसंगति ये है कि महानगरों में ही नहीं कस्बों में भी इस नवधनाढ़य संस्कृति के साथ साथ वो स्लम एरिया भी चला आता है,..जहाँ अभाव, दुःख, परेशानी एक विकृति को रोप ही नहीं देती पोषती भी चलती है,..कमतर जब हीनता के बोध से ग्रस्त होता है,..तो ये असमानता उसे असामाजिक बनाती है,अपराधी बनाती है,..और बार बार दुत्कारे जाने पर इस बराबरी पर आने के लिए वो किसी भी हद को पार करने से नहीं चूकता,..

क्या हमें ज़रूरत महसूस नहीं होती कि इस असमानता को घृणा से नहीं स्नेह से देखा जाये,..हमारे अभिभावक जो हमें सिखा गए कि सब बराबर हैं,..जिसके पास अच्छे कपड़े हैं वो भी और जो फटेहाल हैं वो भी और इसमें ये भी कि हमें इनकी बेहतरी के लिए भी कुछ सोचना और करना चाहिए- मैंने अपनी सखी को कहा चारु को रोज़ नहीं तो जब भी सम्भव हो कृष्ण-सुदामा की मित्रता की जैसी कुछ कहानियाँ सुनाये और कार्टून्स के किरदार में जो उसकी जिज्ञासाएँ हों या शंकायें हों उनका शमन करे–उसने हंसकर कहा यस बॉस

मुझे याद आया,…

किसी सन्त ने कभी कहा था

अव्वल अल्लह नूर उपाया क़ुदरत दे सब बन्दे।

एक नूर ते सब जग उपज्या कौन भले को मन्दे।।

 

त्यौहारों के मौसम - संस्मरण - आरती तिवारी 12आरती तिवारी, ई-मेलः atti.twr@gmail.com

 

 

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.