प्रेम और कथानक का प्रश्न

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कथानक और प्रेम के संदर्भ में हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सर्वप्रथम विचार किया है। हांलाकि उन्होने रामभक्ति और कृष्णभक्ति काव्य परम्परा के संदर्भ में ”सामाजिकता” का प्रश्न उठाया है। शुक्ल जी ने तुलसी के प्रेम चित्रण को इसलिए सराहा है क्योंकि वह लोक के बीच से विकसित हुआ है। इसके विपरीत सूरदास का प्रेम चित्रण समाज की मुख्यधारा से कटा हुआ है…समाज से नहीं जुड़ पाता। वस्तुतः इस प्रश्न के पीछे मुझे शुक्लजी की मुख्य चिन्ता कथानक और घटना की आवयविक एकता का अंर्तसंबंध टूटने से ही लगता है। कथानक और प्रेम के संदर्भ में हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सर्वप्रथम विचार किया है। हांलाकि उन्होने रामभक्ति और कृष्णभक्ति काव्य परम्परा के संदर्भ में ''सामाजिकता'' का प्रश्न उठाया है। शुक्ल जी ने तुलसी के प्रेम चित्रण को इसलिए सराहा है क्योंकि वह लोक के बीच से विकसित हुआ है। इसके विपरीत सूरदास का प्रेम चित्रण समाज की मुख्यधारा से कटा हुआ है...समाज से नहीं जुड़ पाता। वस्तुतः इस प्रश्न के पीछे मुझे शुक्लजी की मुख्य चिन्ता कथानक और घटना की आवयविक एकता का अंर्तसंबंध टूटने से ही लगता है। मेरी चिन्ता घटना और कथानक के अनिवार्य सम्बन्ध या द्वन्दात्मक संबंध बनने-न -बनने से जुड़ी हुइ है। किसी रचना में यदि कोई घटना तात्कालिक रूप से तो आ रही हो, किन्तु सम्पूर्ण रचना की गतिशीलता में न जुड़ पा रही हो तो उस कहा जाय? कृष्ण का रास-लीला प्रकरण क्या सूर की रचना का अनिवार्य अंग नहीं है? निश्चित रूप से सूरदास, नंददास या रत्नाकर जैसे कवियों का 'भ्रमरगीत सार' का प्रकरण उनकी रचना का अनिवार्य अंग है, हां, कृष्णकथा के मूल ग्रन्थ ''महाभारत'' में यह संबंध अवश्य खण्डित हुआ है। महाभारत के संपूर्ण कथानक में कृष्ण के प्रेम-चित्रण का रचना के साथ 'आयविक एकता' निर्मित नहीं हो पाती। यहां कथानक और प्रेम-चित्रण की संरचना के संदर्भ में कुछ प्रश्न उपस्थित होते हैं। पहला प्रश्न यह है कि क्लासिक रचना और प्रेम-रचना के कथानक-निर्माण में क्या मूलभूत अंतर होता है? और यदि अंतर होता है तो उसका स्वरूप किस प्रकार का होता है? क्लासिक रचना के साथ कथानक-निर्माण या प्रेम-रचना के साथ कथानक निर्माण के प्रश्न पर विचार करने से पूर्व क्लासिक रचना और प्रेम-रचना की प्रकृति को समझना अनिवार्य है। क्लासिक रचना के गठन में समाज की मूलभूत वृत्तियों की भूमिका मुख्य होती है, जबकि प्रेम-रचना के गठन में व्यक्ति की मूलभूत वृत्तियों की भूमिका मुख्य होती हैं। प्रश्न है समाज और व्यक्ति की मूलभूत वृत्ति में क्या अंतर है? समाज की संरचना ओर गति में सामूहिता-अनुशासन-त्याग-उदात्त-संघर्ष....जैसी वृत्तियों का बाहुल्य होता है, जबकि व्यक्ति की मूलभूत वृत्ति में भावावेग, एकान्त, प्रेम , आनन्द...जैसी वृत्तियों का बाहुल्य होता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे और स्पष्ट ढंग से विभाजित करते हुए 'साधनावस्था' और 'सिद्धावस्था' का काव्य कहा गया है। हांलाकि व्यक्ति की मूलभूत वृत्ति-प्रेम, क्रोध-घृणा, करूणा-त्याग...जैसे मनोविकारों की केन्द्रीयता क्लासिक रचनाओं में तथा स्वच्छन्द रचनाओं, दोनों में देखने को मिलती है। क्लासिक रचनाएं हर युग व समाज के लिए इसीलिए काम्य बन पाती हैं, क्योंकि वह हमारी मूलभूत वृत्तियों से संचालित होती हैं। स्वच्छन्द रचना में भी मूलभूत वृत्ति का चित्रण होता है, फिर क्लासिक एवं स्वच्छन्द रचना के चित्रण में मूलभूत अंतर क्या है? क्या इस संदर्भ में मुख्य अंतर यह है कि क्लासिक रचनाओं मे मूल वृत्ति को स्थायी भावों के संदर्भ में सामाजिक गति से जोड़ा जाता है और स्वच्छन्द रचनाओं में मूल वृत्ति को संचारी रूप के संदर्भ में व्यक्ति-मन की गति से? यहां यह न समझा जाय कि स्वच्छन्द रचना में स्थायी भाव की उपस्थिति नहीं होती, बल्कि हमारे कहने का अर्थ यह है कि इस प्रकार की रचना में एक ही स्थायी भावों के संदर्भ में संपूर्ण कथानक का विस्तार किया जाता है। एक स्थायी भाव प्रायः व्यक्ति मन-प्रवृत्ति से जुड़ता है और कई स्थायी भाव बड़े सामाजिक वृत्त से...। इसीलिए प्रेम रचनाओं में रति स्थायी भाव की पुष्टि ही पूरे काव्य में करनी काम्य होती है। श्रृंगार एवं वियोग श्रृंगार के भेदों का विस्तार...करना ही लेखक का काम्य होता है। इस संदर्भ में एक मुख्य भेद और भी है, क्लासिक रचना में स्थायी भावों को सामाजिक वृत्त के संदर्भ में विस्तार दिया जाता है, जबकि प्रेमपरक रचना में व्यक्ति-केंद्रीयता के संदर्भ में...। इस प्रकार की संरचना के मूल में एक तीसरा आधार चरित्र-निर्माण का प्रश्न भी है। पूरी रचना में एक ही 'स्थायी भाव' हो, तो निश्चित रूप से एक चरित्र के विकास की संभावना ज्यादा पुष्ट होगी। क्लासिक रचना में कई स्थायी भाव हों, और वे अध्याय-क्रमानुसार परिवर्तित होते रहें तो चरित्र के ''वैभिन्न-विस्तार'' की ज्यादा संभावना होगी। हर अध्याय का चरित्र केंद्र भी बदल जाता है और स्थायी भाव भी, किन्तु स्वच्छन्दपरक रचना या प्रेमपरक रचना में अध्याय परिवर्तन के पश्चात भी रचना का मूल भाव, आदि से अंत तक एक ही बना रहता है। प्रश्न है इस प्रकार के चित्रण का मूल कारण क्या है? इसका एक कारण यह भी समझ में आता है कि क्लासिक रचना में चूंकि कथानक का विस्तार/विकास सामाजिक-परिवृत्त में स्थिर किया जाता है। इसलिए भी उसमें सामाजिक गति के अनुसार भाव-परिवर्तन अवश्यंभावी हो जाता है, जबकि प्रेमपरक रचना में व्यक्ति-मनोवेग के अनुसार कथानक का विस्तार किया जाता है। इसलिए उसमें एक गीति/महाकाव्य ही भाव को घनत्व'' प्राप्त होता है। इसे दूसरे संदर्भ में समझें, क्लासिक रचनाओं में विस्तार ज्यादा होता है और प्रेमपरक रचनाओं में गहराई/घनत्व। क्या यह कहना उचित होगा? क्या विस्तार और गहराई में ऐसा द्वैतपूर्ण सम्बन्ध है? कुछ लोगों ने इस प्रकार के तर्क का खण्डन किया है। क्लासिक मन के अनुयायियों न इस मन्त्र को खण्डित करते हुए कहा है कि व्यापकता और गहराई में इस प्रकार का द्वन्द/द्वैत देखना मूर्खता है। जिस प्रकार समुद्र में विस्तार भी है और गहराई भी...इसलिए वह अपनी भूमिका में शास्वत बना रहता है; जबकि कुएं को बहुत गहरा करने के लिए भी व्यापक आधार-भूमि की ही आवश्यकता पड़ती है। कई बार कुएं को ज्यादा खनने पर भी वह 'पट' (ढक) जाता है, इसी प्रकार भावों के विस्तार और समाज के अंर्तसम्बन्ध को भी हम समझ सकते हैं, जो भाव जितने (बडे़) सामाजिक आधार के संदर्भ में विकसित होगा, वह उतनी ही गहराई को धारण करने की संभावना से युक्त होगा। यहां इस तथ्य की जांच आवश्यक है। चूंकि यह बात प्रेम के संदर्भ में हो रही है, इसलिए प्रेम व दूसरे मनोविकारों के पार्थक्य का समझना अनिवार्य है। प्रेम में घनत्व इसलिए होता है कि वह 'स्मृति' के माध्यम से बार-बार रेचित करता चलता है। दूसरा मनोविकार (करूणा के अतिरिक्त...) बार-बार एक ही दशा में नहीं आता...किन्तु प्रेम एक ही घटना, मनोवृत्ति, परिस्थिति की स्मृति-कल्पना में घनत्व-ग्रहण कर लेता है। इसीलिए क्या सूर का चित्रण घनत्व प्राप्त कर लेता (वात्सल्य के प्रसंग में शुक्लजी 'कोना-कोना झांकना' कहते हैं...) हैं? यहां उस संरचना को समझना अनिवार्य प्रतीत होता है कि किसी रचना को घनत्व और व्यापकता किस प्रकार प्राप्त होती है? जैसा कि हमने संकेत किया घनत्व और व्यापकता व्यापक रूप में जुडे़ हुए हैं, लेकिन अपने चित्रण के क्रम में...प्रमुखता में 'व्यापकता' और 'गहराई' अलग रूप ग्रहण कर लेते हैं। ''व्यापकता'' में सामाजिक वृत्त, गति और व्यापक परिवर्तनकारी दृष्टि शामिल हो जाती है और ''गहराई'' में भावों का उद्रेक, कल्पना-शक्ति, मानवीय सम्बन्ध की तीव्रता...इत्यादि प्रमुखता पा जाते हैं, तो क्या इसीलिए व्यापक आधार वाले काव्य सामाजिक समस्याओं से युक्त हो जाते हैं और गहराई के आधार वाले काव्य व्यक्ति-समस्या से युक्त हो जाते हैं। यहां यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि व्यापकता और गहराई मूल रूप से विरोधी दशा है, जैसा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के कथन के संदर्भ में यह भ्रम फैलाया गया कि तुलसी का काव्य सामाजिक और सूर का काव्य स्वच्छन्द परम्परा का...। रचना की व्यापकता केवल कथ्य में बड़ी-बड़ी समस्याओं को ले आने से नहीं होती, बल्कि ''चित्रण की सद्धयता'' से मिलती है। ''चित्रण की सद्धयता'' व्यापकता को घनत्व प्रदान कर देता है और घनत्व को व्यापकता। कथानक और प्रेम के संदर्भ में सूफी काव्य परम्परा का विश्लेषण करना उचित होगा, प्रेमाख्यानक काव्य परम्परा (सूफी काव्य परम्परा) में कथा का विस्तार, दूसरे कथानकों की अपेक्षा भिन्न आदर्शों एवं पद्धति पर हुआ है। नायिका (परमात्मा) के गुण-श्रवण, चित्र-दर्शन इस प्रकार की कहानियों का विस्तार दिखाया गया है। इस प्रकार के सूत्र भारतीय परम्परा में भी मिल जाते हैं और फारस में भी..., लेकिन इस संदर्भ मे...कथानक की दृष्टि से खटकने वाली बात यह है कि इस प्रकार की संरचना में 'अस्वाभाविकता का तत्व' प्रभावी हो जाता है। प्रेम की उत्पत्ति में नायक-नायिका को एक-दूसरे को देखना-परस्पर आकर्षण (शारीरिक..........) या तो प्रेम के उदय का आधार बनता है या लम्बे साहचर्य के कारण एक-दूसरे के गुणों-व्यक्तित्वों से प्रभावित हो जाना, आप्लावित हो जाना...आधार बनता है। लम्बी अवधि का साहचर्य प्रेम की प्रगाढ़ता व पुष्टता का कारक बनता है। गुण-श्रवण से किसी के बारे में जिज्ञासा हो सकती है, प्रेम नहीं। चित्र-दर्शन भी 'विपरीत व्यक्ति' के प्रति प्रेम का पुष्ट आधार नहीं बनता। प्रेम की उत्पत्ति की इस अस्वाभाविकता के प्रति सूफी कवि भी सचेत थे, इसीलिए उन्होने इसे ''अलौकिकता''/परमात्मा...से सम्बद्ध कर दिया। यहां एक प्रश्न यह उठता है कि क्या प्रेमाख्यानक काव्यों एवं दूसरे प्रकार के ग्रन्थों के कथानक-बुनावट में तात्विक भेद है? कथा की संरचना में 'समाज की उपस्थिति' प्रेमाख्यानक परम्परा के ग्रन्थों में कम नहीं है, फिर कथानक में क्या अन्तर है? क्या यह अन्तर है कि 'कथानक की पूर्व-निश्चित योजना' जैसी प्रेमाख्यानक कथाओं में मिलती है, वैसी योजना दूसरे प्रकार के ग्रन्थों में नहीं पायी जाती। प्रेम और कथानक के संदर्भ में इस प्रश्न पर भी विचार किया जा सकता है कि महाकाव्यों एवं गीति-परम्परा (मुक्तक) की रचनाओं में भेद किस प्रकार उपस्थित हो जाता है? भारतीय परम्परा के चर्चित प्रेम-प्रसंग प्रायः क्लासिक ग्रन्थों में वर्णित मिलते हैं। इस संदर्भ में हम प्रमुख कहानियों पर अपना ध्यान केंद्रित करें-रघुवंष में अज-इन्दुमती (अज का विलाप), महाभारत का पुरूरवा-उर्वषी प्रेम-प्रसंग (पुरूरवा का विरह...), रामायण का राम-सीता प्रकरण (सीता हरण पर राम का शोक/विलाप...), नैषधीय चरित्र का नल-दमयन्ती प्रकरण (हंस विलाप..)। यहां एक चीज ध्यान देने योग्य है कि सभी प्रमुख विलापों-विरह के केंद्र में 'पुरूष' ही रहे हैं। आम अवधारणा है कि सामंती समाज में पुरूष-वियोग का चित्रण करना उचित नहीं है, किन्तु क्लासिक रचनाओं में इस प्रकार का चित्रण मिलना अपने आप में विचार के अलग आधार-बिन्दु निर्मित करता है। यहां इन प्रेम-घटनाओं के माध्यम से संपूर्ण कथानक में इनकी अनिवार्यता/महत्ता की जांच कर लेना उचित होगा। उपर्युक्त विरह/विलाप प्रसंगों में से राम-सीता वियोग ही केवल मुख्य कथानक का भाग है या दूसरे शब्दों में कहें तो वही सीधे-सीधे मुख्य घटनाक्रम से जुड़ता है। बाद के समाज का ध्यान इस प्रसंगों पर अवश्य गया और उन्होंने इन पर स्वतंत्र ग्रन्थ लिखे। जैसे अज विलाप पर नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता ''कालिदास सच-सच बतलाना'' पुरूरवा-उर्वशी प्रसंग पर दिनकर का खण्डकाव्य, उर्वशी, पुरूरवा-उर्वशी के संदर्भ से सखाराव विष्णुराव खांडेकर की ययाति...तो उन प्रसंगों को, जो घटना के...कथानक से सीधे नहीं जुड़े हुए हैं। उनको रचना में रखने का क्या औचित्य है? क्या यह कथानक की अनिवार्यता थी? या कथानक में वर्णित चरित्र को सघन बनाने के लिए इन प्रसंगों की आवश्यकता थी? जिस 'रामायण' में राम का मर्यादित-धीर चरित्र चित्रित-विकसित किया गया है, उसी रचना में राम का विलाप (तब जबकि वे ईश्वर रूप में चित्रित हैं और सुख-दुःख की मानवीय अनिवार्यता से बंधे हुए नहीं हैं...)? क्या इसे हम घटना/कथानक में कवि के हस्तक्षेप के रूप् में देखें? या इस रूप में कि कथानक में ''प्रेम-प्रसंगों को कारूणिक'' रूप देना कथानक की आवश्यकता हो सकती थी? जैसा कि हमने पूर्व में संकेत किया था कि स्थायी भावों में भी रति-करूणा दो भाव सर्वाधिक ''सघन'' रूप में निर्मित होते हैं। कवि/लेखक इन दोनों भावों को एक-साथ रखकर रचनात्मक...''सृजनात्मक गाम्भीर्य'' का अंकन करता है। इस रूप में प्रेम-विलाप के ये दृष्य रचना को 'आत्मिक उत्कर्ष ' प्रदान करते हैं, इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता। कथानक के संदर्भ में महाकाव्य एवं गीतिपरक रचनाओं में वर्णित प्रेम-प्रसंगों की संरचना को देखना उचित जान पड़ता है। महाकाव्यों में वर्णित प्रेम-प्रसंग सामाजिक प्रसंगों की 'इतिवृत्तात्मकता' को तोड़कर उसे लालित्य...सरस...मानवीय...आत्मिक रूप प्रदान करने के क्रम में रचित होत हैं, जबकि गीतिपरक रचनाओं में प्रेम के माध्यम से समाज को देखने की आकांक्षा कार्य कर रही होती है। समाज की दृष्टि से प्रेम और प्रेम की दृश्टि से समाज को देखना मात्र प्राथमिकता का बदल जाना नहीं है, अपितु व्यक्ति-समाज के द्वैत...द्वन्द के साथ ही कथानक के बनने-ढलने की प्रक्रिया भी जुड़ी हुई है। क्लासिक रचनाओं का प्रेम-चित्रण सामाजिक परिवृत्त की बनावट में मानवीय-रोमानी अनुभूति के बनने की प्रक्रिया को उद्घाटित करता है। स्त्री-पुरूष के प्रेम-संबंध की प्रगाढ़ता उसके व्यक्तित्व को धीर-त्यागमय उत्कर्ष और औदात्य से कैसे भर देती है, यह इन प्रसंगों के माध्यम से जाना जा सकता है। गीतिपरक रचनाओं में प्रेम की दृष्टि से समाज (कथ्य-कथानक) को देखने का प्रयास होता है। व्यैक्तिक अनुभूतियों की गति-उमंग-उल्लास को कथ्य (आश्रय-आलम्बन यानी इत्यादि...) में ढालना पड़ता है। कथ्य और अनुभूति का प्रवाह जहां कुछ देर...दूर तक निभ जाता है, वहां प्रबन्ध रूप में प्रेम-चित्रण होता है और जहां कथ्य से अनुभूति का सम्बन्ध बनता-टूटता (पूर्ण) रहता है। वहां मुक्तक विधान में प्रेम-चित्रण संभव हो पाता है। गीतात्मकता में भावों का 'नृत्य' होता है और प्रबन्ध में 'भावों का अनुशासन', स्वाभाविक है कि नृत्य में लय और अनुशासन में स्थिरता, सघनता का आधिक्य हो...। प्रेम-चित्रण के कथ्य में ढलने की प्रक्रिया का क्या साहित्य विधा के अनुशासन से भी सम्बन्ध है? काव्य और गद्य के अनुशासन का क्या प्रेम-चित्रण पर प्रभाव पड़ता है? कवित और गद्य के कथानक की सृजन-प्रक्रिया का पार्थक्य क्या 'प्रेम' की आंतरिक संरचना पर प्रभाव डालता है? प्रेम, कविता में 'फिट' बैठता है या गद्य में? कविता या काव्य में ''संवेदना का धनीभूत रूप'' गद्य की अपेक्षा ज्यादा प्रभावी-आवेगात्मक होता है। पद्य में संवेदना, बिम्ब रूप में आकर हमें तत्काल विस्फार कर देता है...अतः उसमें गद्य की अपेक्षा भावात्मक आग्रह ज्यादा होता है। चूंकि 'प्रेम' अपनी संरचना में 'भावात्मक-आवेग' ज्यादा लिए हुए होता है। अतः उसमें पद्य से ज्यादा साम्य होता है। बावजूद इसके आधुनिक साहित्य में प्रेम कविताओं से कम प्रेम कहानियां नहीं लिखी गईं। गद्य और पद्य में क्रमिकता और प्रभाव का अंतर होता है, तात्कालिक संवेग में प्रवृत्त करने की दृश्टि से पद्य भले ज्यादा असरकारक होता है, किन्तु लम्बी प्रक्रिया में गद्य के 'कथानक-संरचना' की समझ आवश्यक है। गद्य में 'संवेदना' के ढलने की प्रक्रिया परिवेश-कथ्य-चरित्र इत्यादि के घात-प्रतिघात/द्वन्द से निर्मित होती है। पद्य में भी कथ्य होता है, चरित्र होते हैं और उनका परिवेश भी होता है, फिर दोनों अनुशासनों में पार्थक्य किस बिन्दु पर उत्पन्न हो जाता है? यहां प्रक्रिया और क्रम की समझ आवष्यक है। कविता में अनुभूति को ढालने के लिए परिवेश-कथ्य की आवश्यकता पड़ती है, किन्तु गद्य में विचार को संवेदना में ढालने के लिए कथ्य-परिवेश-विचार की आवश्यकता पड़ती है। एक विचार से चलता है (गद्य) और दूसरा संवेदना से चलता है (पद्य)। एक में संवेदना को कथ्य का आधार चाहिए, दूसरे में संवेदना के ढलने की प्रक्रिया में कथ्य का आधार ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार प्रेम के चित्रण में गद्य और पद्य का अनुशासन उसकी प्रक्रिया की समझ के दो रास्ते, मार्ग की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है।मेरी चिन्ता घटना और कथानक के अनिवार्य सम्बन्ध या द्वन्दात्मक संबंध बनने-न -बनने से जुड़ी हुइ है। किसी रचना में यदि कोई घटना तात्कालिक रूप से तो आ रही हो, किन्तु सम्पूर्ण रचना की गतिशीलता में न जुड़ पा रही हो तो उस कहा जाय? कृष्ण का रास-लीला प्रकरण क्या सूर की रचना का अनिवार्य अंग नहीं है? निश्चित रूप से सूरदास, नंददास या रत्नाकर जैसे कवियों का ‘भ्रमरगीत सार’ का प्रकरण उनकी रचना का अनिवार्य अंग है, हां, कृष्णकथा के मूल ग्रन्थ ”महाभारत” में यह संबंध अवश्य खण्डित हुआ है। महाभारत के संपूर्ण कथानक में कृष्ण के प्रेम-चित्रण का रचना के साथ ‘आयविक एकता’ निर्मित नहीं हो पाती।  यहां कथानक और प्रेम-चित्रण की संरचना के संदर्भ में कुछ प्रश्न उपस्थित होते हैं। पहला प्रश्न यह है कि क्लासिक रचना और प्रेम-रचना के कथानक-निर्माण में क्या मूलभूत अंतर होता है? और यदि अंतर होता है तो उसका स्वरूप किस प्रकार का होता है? क्लासिक रचना के साथ कथानक-निर्माण या प्रेम-रचना के साथ कथानक निर्माण के प्रश्न पर विचार करने से पूर्व क्लासिक रचना और प्रेम-रचना की प्रकृति को समझना अनिवार्य है। क्लासिक रचना के गठन में समाज की मूलभूत वृत्तियों की भूमिका मुख्य होती है, जबकि प्रेम-रचना के गठन में व्यक्ति की मूलभूत वृत्तियों की भूमिका मुख्य होती हैं। प्रश्न है समाज और व्यक्ति की मूलभूत वृत्ति में क्या अंतर है? समाज की संरचना ओर गति में सामूहिता-अनुशासन-त्याग-उदात्त-संघर्ष….जैसी वृत्तियों का बाहुल्य होता है, जबकि व्यक्ति की मूलभूत वृत्ति में भावावेग, एकान्त, प्रेम , आनन्द…जैसी वृत्तियों का बाहुल्य होता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे और स्पष्ट ढंग से विभाजित करते हुए ‘साधनावस्था’ और ‘सिद्धावस्था’ का काव्य कहा गया है। हांलाकि व्यक्ति की मूलभूत वृत्ति-प्रेम, क्रोध-घृणा, करूणा-त्याग…जैसे मनोविकारों की केन्द्रीयता क्लासिक रचनाओं में तथा स्वच्छन्द रचनाओं, दोनों में देखने को मिलती है। क्लासिक रचनाएं हर युग व समाज के लिए इसीलिए काम्य बन पाती हैं, क्योंकि वह हमारी मूलभूत वृत्तियों से संचालित होती हैं। स्वच्छन्द रचना में भी मूलभूत वृत्ति का चित्रण होता है, फिर क्लासिक एवं स्वच्छन्द रचना के चित्रण में मूलभूत अंतर क्या है? क्या इस संदर्भ में मुख्य अंतर यह है कि क्लासिक रचनाओं मे मूल वृत्ति को स्थायी भावों के संदर्भ में सामाजिक गति से जोड़ा जाता है और स्वच्छन्द रचनाओं में मूल वृत्ति को संचारी रूप के संदर्भ में व्यक्ति-मन  की गति से? यहां यह न समझा जाय कि स्वच्छन्द रचना में स्थायी भाव की उपस्थिति नहीं होती, बल्कि हमारे कहने का अर्थ यह है कि इस प्रकार की रचना में एक ही स्थायी भावों के संदर्भ में संपूर्ण कथानक का विस्तार किया जाता है। एक स्थायी भाव प्रायः व्यक्ति मन-प्रवृत्ति से जुड़ता है और कई स्थायी भाव बड़े सामाजिक वृत्त से…। इसीलिए प्रेम रचनाओं में रति स्थायी भाव की पुष्टि ही पूरे काव्य में करनी काम्य होती है। श्रृंगार एवं वियोग श्रृंगार के भेदों का विस्तार…करना ही लेखक का काम्य होता है। इस संदर्भ में एक मुख्य भेद और भी है, क्लासिक रचना में स्थायी भावों को सामाजिक वृत्त के संदर्भ में विस्तार दिया जाता है, जबकि प्रेमपरक रचना में व्यक्ति-केंद्रीयता के संदर्भ में…। इस प्रकार की संरचना के मूल में एक तीसरा आधार चरित्र-निर्माण का प्रश्न भी है। पूरी रचना में एक ही ‘स्थायी भाव’ हो, तो निश्चित रूप से एक चरित्र के विकास की संभावना ज्यादा पुष्ट होगी। क्लासिक रचना में कई स्थायी भाव हों, और वे अध्याय-क्रमानुसार परिवर्तित होते रहें तो चरित्र के ”वैभिन्न-विस्तार” की ज्यादा संभावना होगी। हर अध्याय का चरित्र केंद्र भी बदल जाता है और स्थायी भाव भी, किन्तु स्वच्छन्दपरक रचना या प्रेमपरक रचना में अध्याय परिवर्तन के पश्चात भी  रचना का मूल भाव, आदि से अंत तक एक ही बना रहता है। प्रश्न है इस प्रकार के चित्रण का मूल कारण क्या है? इसका एक कारण यह भी समझ में आता है कि क्लासिक रचना में चूंकि कथानक का विस्तार/विकास सामाजिक-परिवृत्त में स्थिर किया जाता है। इसलिए भी उसमें सामाजिक गति के अनुसार भाव-परिवर्तन अवश्यंभावी हो जाता है, जबकि प्रेमपरक रचना में व्यक्ति-मनोवेग के अनुसार कथानक का विस्तार किया जाता है। इसलिए उसमें एक गीति/महाकाव्य ही भाव को घनत्व” प्राप्त होता है। इसे दूसरे संदर्भ में समझें, क्लासिक रचनाओं में विस्तार ज्यादा होता है और प्रेमपरक रचनाओं में गहराई/घनत्व। क्या यह कहना उचित होगा? क्या विस्तार और गहराई में ऐसा द्वैतपूर्ण सम्बन्ध है? कुछ लोगों ने इस प्रकार के तर्क का खण्डन किया है। क्लासिक मन के अनुयायियों न इस मन्त्र  को खण्डित करते हुए कहा है कि व्यापकता और गहराई में इस प्रकार का द्वन्द/द्वैत देखना मूर्खता है। जिस प्रकार समुद्र में विस्तार भी है और गहराई भी…इसलिए वह अपनी भूमिका में शास्वत बना रहता है; जबकि कुएं को बहुत गहरा करने के लिए भी व्यापक आधार-भूमि की ही आवश्यकता पड़ती है। कई बार कुएं को ज्यादा खनने पर भी वह ‘पट’ (ढक) जाता है, इसी प्रकार भावों के विस्तार और समाज के अंर्तसम्बन्ध को भी हम समझ सकते हैं, जो भाव जितने (बडे़) सामाजिक आधार के संदर्भ में विकसित होगा, वह उतनी ही गहराई को धारण करने की संभावना से युक्त होगा। यहां इस तथ्य की जांच आवश्यक है। चूंकि यह बात प्रेम के संदर्भ में हो रही है, इसलिए प्रेम व दूसरे मनोविकारों के पार्थक्य का समझना अनिवार्य है। प्रेम में घनत्व इसलिए होता है कि वह ‘स्मृति’ के माध्यम से बार-बार रेचित करता चलता है। दूसरा मनोविकार (करूणा के अतिरिक्त…) बार-बार एक ही दशा में नहीं आता…किन्तु प्रेम एक ही घटना, मनोवृत्ति, परिस्थिति की स्मृति-कल्पना में घनत्व-ग्रहण कर लेता है। इसीलिए क्या सूर का चित्रण घनत्व प्राप्त कर लेता (वात्सल्य के प्रसंग में शुक्लजी ‘कोना-कोना झांकना’ कहते हैं…) हैं? यहां उस संरचना को समझना अनिवार्य प्रतीत होता है कि किसी रचना को घनत्व और व्यापकता किस प्रकार प्राप्त होती है? जैसा कि हमने संकेत किया घनत्व और व्यापकता व्यापक रूप में जुडे़ हुए हैं, लेकिन अपने चित्रण के क्रम में…प्रमुखता में ‘व्यापकता’ और ‘गहराई’ अलग रूप ग्रहण कर लेते हैं। ”व्यापकता” में सामाजिक वृत्त, गति और व्यापक परिवर्तनकारी दृष्टि शामिल हो जाती है और ”गहराई” में भावों का उद्रेक, कल्पना-शक्ति, मानवीय सम्बन्ध की तीव्रता…इत्यादि प्रमुखता पा जाते हैं, तो क्या इसीलिए व्यापक आधार वाले काव्य सामाजिक समस्याओं से युक्त हो जाते हैं और गहराई के आधार वाले काव्य व्यक्ति-समस्या से युक्त हो जाते हैं। यहां यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि व्यापकता और गहराई मूल रूप से विरोधी दशा है, जैसा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के कथन के संदर्भ में यह भ्रम फैलाया गया कि तुलसी का काव्य सामाजिक और सूर का काव्य स्वच्छन्द परम्परा का…। रचना की  व्यापकता केवल कथ्य में बड़ी-बड़ी समस्याओं को ले आने से नहीं होती, बल्कि ”चित्रण की सद्धयता” से मिलती है। ”चित्रण की सद्धयता” व्यापकता को घनत्व प्रदान कर देता है और घनत्व को व्यापकता।
कथानक और प्रेम के संदर्भ में सूफी काव्य परम्परा का विश्लेषण करना उचित होगा, प्रेमाख्यानक काव्य परम्परा (सूफी काव्य परम्परा) में कथा का विस्तार, दूसरे कथानकों की अपेक्षा भिन्न आदर्शों एवं पद्धति पर हुआ है। नायिका (परमात्मा) के गुण-श्रवण, चित्र-दर्शन इस प्रकार की कहानियों का विस्तार दिखाया गया है। इस प्रकार के सूत्र भारतीय परम्परा  में भी मिल जाते हैं और फारस में भी…, लेकिन इस संदर्भ मे…कथानक की दृष्टि से खटकने वाली बात यह है कि इस प्रकार की संरचना में ‘अस्वाभाविकता का तत्व’ प्रभावी हो जाता है। प्रेम की उत्पत्ति में नायक-नायिका को एक-दूसरे को देखना-परस्पर आकर्षण (शारीरिक……….) या तो प्रेम के उदय का आधार बनता है या लम्बे साहचर्य के कारण एक-दूसरे के गुणों-व्यक्तित्वों से प्रभावित हो जाना, आप्लावित हो जाना…आधार बनता है। लम्बी अवधि का साहचर्य प्रेम की प्रगाढ़ता व पुष्टता का कारक बनता है। गुण-श्रवण से किसी के बारे में जिज्ञासा हो सकती है, प्रेम नहीं। चित्र-दर्शन भी ‘विपरीत व्यक्ति’ के प्रति प्रेम का पुष्ट आधार नहीं बनता। प्रेम की उत्पत्ति की इस अस्वाभाविकता के प्रति सूफी कवि भी सचेत थे, इसीलिए उन्होने इसे ”अलौकिकता”/परमात्मा…से सम्बद्ध कर दिया। यहां एक प्रश्न  यह उठता है कि क्या  प्रेमाख्यानक काव्यों एवं दूसरे प्रकार के ग्रन्थों के कथानक-बुनावट में तात्विक भेद है? कथा की संरचना में ‘समाज की उपस्थिति’ प्रेमाख्यानक परम्परा के ग्रन्थों में कम नहीं है, फिर कथानक में क्या अन्तर है? क्या यह अन्तर है कि ‘कथानक की पूर्व-निश्चित योजना’ जैसी प्रेमाख्यानक कथाओं में मिलती है, वैसी योजना दूसरे प्रकार के ग्रन्थों में नहीं पायी जाती।
प्रेम और कथानक  के संदर्भ में इस प्रश्न  पर भी विचार किया जा सकता है कि महाकाव्यों एवं गीति-परम्परा (मुक्तक) की रचनाओं में भेद किस प्रकार उपस्थित हो जाता है? भारतीय परम्परा के चर्चित प्रेम-प्रसंग प्रायः क्लासिक ग्रन्थों में वर्णित मिलते हैं। इस संदर्भ में हम प्रमुख कहानियों पर अपना ध्यान केंद्रित करें-रघुवंष में अज-इन्दुमती (अज का विलाप), महाभारत का पुरूरवा-उर्वषी प्रेम-प्रसंग (पुरूरवा का विरह…), रामायण का राम-सीता प्रकरण (सीता हरण पर राम का शोक/विलाप…), नैषधीय चरित्र का नल-दमयन्ती प्रकरण (हंस विलाप..)। यहां एक चीज ध्यान देने योग्य है कि सभी प्रमुख विलापों-विरह के केंद्र में ‘पुरूष’ ही रहे हैं। आम अवधारणा है कि सामंती समाज में पुरूष-वियोग का चित्रण करना उचित नहीं है, किन्तु क्लासिक रचनाओं में इस प्रकार का चित्रण मिलना अपने आप में विचार के अलग आधार-बिन्दु निर्मित करता है। यहां इन प्रेम-घटनाओं के माध्यम से संपूर्ण कथानक में इनकी अनिवार्यता/महत्ता की जांच कर लेना उचित होगा। उपर्युक्त विरह/विलाप प्रसंगों में से राम-सीता वियोग ही केवल मुख्य कथानक का भाग है या दूसरे शब्दों में कहें तो वही सीधे-सीधे मुख्य घटनाक्रम से जुड़ता है। बाद के  समाज का ध्यान इस प्रसंगों पर अवश्य  गया और उन्होंने इन पर स्वतंत्र ग्रन्थ लिखे। जैसे अज विलाप पर नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता ”कालिदास सच-सच बतलाना” पुरूरवा-उर्वशी प्रसंग पर दिनकर का खण्डकाव्य, उर्वशी, पुरूरवा-उर्वशी के संदर्भ से सखाराव विष्णुराव खांडेकर की ययाति…तो उन प्रसंगों को, जो घटना के…कथानक से सीधे नहीं जुड़े हुए हैं। उनको रचना में रखने का क्या औचित्य है? क्या यह कथानक की अनिवार्यता थी? या कथानक में वर्णित चरित्र को सघन बनाने के लिए इन प्रसंगों की आवश्यकता थी? जिस ‘रामायण’ में राम का मर्यादित-धीर चरित्र चित्रित-विकसित किया गया है, उसी रचना में राम का विलाप (तब जबकि वे ईश्वर रूप में चित्रित हैं और सुख-दुःख की मानवीय अनिवार्यता से बंधे हुए नहीं हैं…)? क्या इसे हम घटना/कथानक में कवि के हस्तक्षेप के रूप् में देखें? या इस रूप में कि कथानक में ”प्रेम-प्रसंगों को कारूणिक” रूप देना कथानक की आवश्यकता हो सकती थी? जैसा कि हमने पूर्व में संकेत किया था कि स्थायी भावों में भी रति-करूणा दो भाव सर्वाधिक ”सघन” रूप में निर्मित होते हैं। कवि/लेखक इन दोनों भावों को एक-साथ रखकर रचनात्मक…”सृजनात्मक गाम्भीर्य” का अंकन करता है। इस रूप में प्रेम-विलाप के ये दृष्य रचना को ‘आत्मिक उत्कर्ष ‘ प्रदान करते हैं, इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता। कथानक के संदर्भ में महाकाव्य एवं गीतिपरक रचनाओं में वर्णित प्रेम-प्रसंगों की संरचना को देखना उचित जान पड़ता है। महाकाव्यों में वर्णित प्रेम-प्रसंग सामाजिक प्रसंगों की ‘इतिवृत्तात्मकता’ को तोड़कर उसे लालित्य…सरस…मानवीय…आत्मिक रूप प्रदान करने के क्रम में रचित होत हैं, जबकि गीतिपरक रचनाओं में प्रेम के माध्यम से समाज को देखने की आकांक्षा कार्य कर रही होती है। समाज की दृष्टि  से प्रेम और प्रेम की दृश्टि से समाज को देखना मात्र प्राथमिकता का बदल जाना नहीं है, अपितु व्यक्ति-समाज के द्वैत…द्वन्द के साथ ही कथानक के बनने-ढलने की प्रक्रिया भी जुड़ी हुई है। क्लासिक रचनाओं का प्रेम-चित्रण सामाजिक परिवृत्त की बनावट में मानवीय-रोमानी अनुभूति के बनने की प्रक्रिया को उद्घाटित करता है। स्त्री-पुरूष के प्रेम-संबंध की प्रगाढ़ता उसके व्यक्तित्व को धीर-त्यागमय उत्कर्ष और औदात्य से कैसे भर देती है, यह इन प्रसंगों के माध्यम से जाना जा सकता है। गीतिपरक रचनाओं में प्रेम की दृष्टि  से समाज (कथ्य-कथानक) को देखने का प्रयास होता है। व्यैक्तिक अनुभूतियों की गति-उमंग-उल्लास को कथ्य (आश्रय-आलम्बन यानी इत्यादि…) में ढालना पड़ता है। कथ्य और अनुभूति का प्रवाह जहां कुछ देर…दूर तक निभ जाता है, वहां प्रबन्ध रूप में प्रेम-चित्रण होता है और जहां कथ्य से अनुभूति का सम्बन्ध बनता-टूटता (पूर्ण) रहता है। वहां मुक्तक विधान में प्रेम-चित्रण संभव हो पाता है। गीतात्मकता में भावों का ‘नृत्य’ होता है और प्रबन्ध में ‘भावों का अनुशासन’, स्वाभाविक है कि नृत्य में लय और अनुशासन में स्थिरता, सघनता का आधिक्य हो…।
प्रेम-चित्रण के कथ्य में ढलने की प्रक्रिया का क्या साहित्य विधा के अनुशासन से भी सम्बन्ध है? काव्य और गद्य के अनुशासन का क्या प्रेम-चित्रण पर प्रभाव पड़ता है? कवित और गद्य के कथानक की सृजन-प्रक्रिया का पार्थक्य क्या ‘प्रेम’ की आंतरिक संरचना पर प्रभाव डालता है? प्रेम, कविता में ‘फिट’ बैठता है या गद्य में? कविता या काव्य में ”संवेदना का धनीभूत रूप” गद्य की अपेक्षा ज्यादा प्रभावी-आवेगात्मक होता है। पद्य में संवेदना, बिम्ब रूप में आकर हमें तत्काल विस्फार कर देता है…अतः उसमें गद्य की अपेक्षा भावात्मक आग्रह ज्यादा होता है। चूंकि ‘प्रेम’ अपनी संरचना में ‘भावात्मक-आवेग’ ज्यादा लिए हुए होता है। अतः उसमें पद्य से ज्यादा साम्य होता है। बावजूद इसके आधुनिक साहित्य में प्रेम कविताओं से कम प्रेम कहानियां नहीं लिखी गईं। गद्य और पद्य में क्रमिकता और प्रभाव का अंतर होता है, तात्कालिक संवेग में प्रवृत्त करने की दृश्टि से पद्य भले ज्यादा असरकारक होता है, किन्तु लम्बी प्रक्रिया में गद्य के ‘कथानक-संरचना’ की समझ आवश्यक  है। गद्य में ‘संवेदना’ के ढलने की प्रक्रिया परिवेश-कथ्य-चरित्र इत्यादि के घात-प्रतिघात/द्वन्द से निर्मित होती है। पद्य में भी कथ्य होता है, चरित्र होते हैं और उनका परिवेश भी होता है, फिर दोनों अनुशासनों में पार्थक्य किस बिन्दु पर उत्पन्न हो जाता है? यहां प्रक्रिया और क्रम की समझ आवष्यक है। कविता में अनुभूति को ढालने के लिए परिवेश-कथ्य की आवश्यकता पड़ती है, किन्तु गद्य में विचार को संवेदना में ढालने के लिए कथ्य-परिवेश-विचार की आवश्यकता पड़ती है। एक विचार से चलता है (गद्य) और दूसरा संवेदना से चलता है (पद्य)। एक में संवेदना को कथ्य का आधार चाहिए, दूसरे में संवेदना के ढलने की प्रक्रिया में कथ्य का आधार ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार प्रेम  के चित्रण में गद्य और पद्य  का अनुशासन  उसकी प्रक्रिया की समझ के दो रास्ते, मार्ग की ओर हमारा ध्यान  आकृष्ट   करता है।

Shashank Shuklaशशांक शुक्ला
अध्यक्ष,हिंदी विभाग
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय,
हल्द्वानी, नैनीताल
ईमेल: parmita.shukla@gmail.com;
 मोबाईल नं०: 09917157035 

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